: आखिर कैसे कोई लिख सकता है सक्सेज स्टोरी : उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बनाई गयीं योजनाओं की बात की जाये, तो अधिकतर योजनायें दलितों, शोषितों व गरीबों के हितों की ही नजर आती हैं। सभी योजनायें अगर पात्रों तक पहुंच जाती, तो इसमें कोई शक नहीं कि समतामूलक समाज की स्थापना होने में देर नहीं लगती, पर आश्चर्य की बात ही कही जायेगी कि दलितों, शोषितों व गरीबों का शुभचिंतक होने का दावा करने वाली बसपा सुप्रीमो व मुख्यमंत्री मायावती योजनाओं को पात्रों तक पहुंचाने में नाकाम ही रही हैं। सवर्णों को बसपा सरकार से हानि है या लाभ, इस पर चर्चा करना ही सही नहीं रहेगा, क्योंकि बसपा सुप्रीमो व सरकार की मुखिया मायावती ही स्वयं को सवर्णों का हितैषी नहीं मानती हैं और मनुवादी विचारधारा का आरोप लगाते हुए सवर्णों की आलोचना भी करती हैं, जिससे बसपा सरकार द्वारा अनुसूचित जाति/जनजाति व पिछड़ा वर्ग के उत्थान के लिए चलाई जा रही कुछ प्रमुख योजनाओं पर ही एक नजर डालने का प्रयास करते हैं। प्रदेश में पहले से ही एक समाज कल्याण विभाग बना हुआ था, लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही मायावती ने प्रथम कार्यकाल में ही 12 अगस्त 1995 को समाज कल्याण विभाग से अलग अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण विभाग, उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग व उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक कल्याण विभाग बना दिये, जो सिर्फ सरकार, मंत्री व अधिकारी-कर्मचारी कल्याण विभाग बन कर ही रह गये हैं।
सरकारी योजनाओं व कार्यक्रमों को एक भी विभाग अक्षरश: लागू नहीं करा पा रहा है। मायावती के पूर्व के कार्यकालों की विफलता को इस लिए नजर अंदाज किया जा सकता है कि उन्हें पूरा मौका नहीं मिला, पर इस बार पूर्ण बहुमत की सरकार होने के कारण मायावती विफलता की जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। बसपा सरकार ने प्रतिदिन की मजदूरी 58 रूपये से बढ़ा कर सौ रुपये व मासिक मजदूरी छब्बीस सौ रुपये प्रतिमाह कर दी, पर महंगाई को देखते हुए यह भी कम ही है। श्रम विभाग इस कानून का पालन नहीं करा पाया, जिससे प्रदेश के गरीब मजदूरों की हालत में सुधार नजर नहीं आ रहा।
अनुसूचितों की कन्याओं की शादी के लिए सहायता राशि की व्यवस्था है, पर धन की स्वीकृति में भ्रष्टाचार व लापरवाही इतनी आड़े आती है कि कई बार गरीब थक-हार कर बैठ जाता है या धन शादी के बाद मिलता है, जिससे गरीब पिता को शादी सूदखोर के धन से ही करनी पड़ती है। वृद्धा, विधवा व विकलांग पेंशन का हाल भी कुछ ऐसा ही है। सम्बंधित बाबू के पास रिश्वत के रूप में अग्रिम धनराशि पहुंच जाये, तभी पेंशन पहुंचती है, जिससे पेंशन योजना का लाभ अपात्र ही अधिक उठा रहे हैं।
छात्रवृत्ति की बात करें, तो यह योजना शिक्षा विभाग, समाज कल्याण विभाग, अल्पसंख्यक विभाग व विद्यालयों के प्रबंधकों के भ्रष्टाचार की शिकार हो चुकी है। अनूसूचितों को ऋण देने सम्बंधी योजनाओं पर नजर डालें, तो भ्रष्टाचार के चलते लाभार्थी को मिलने वाली छूट का हिस्सा अधिकारी-कर्मचारी पहले ही हजम कर जाते हैं, जिससे लाभार्थी कुछ ही समय बाद बर्बाद हो जाता है। अन्य तमाम योजनाओं का भी यही हाल है। उपलब्धि के नाम पर अनुसूचित वर्ग की हस्तियों पर किये गये नामकरण व लखनऊ एवं नोएडा में बने पार्क ही नजर आते हैं, जिसे विपक्ष ने बदनामी का प्रमुख कारण पहले ही बना दिया है।
योजनाओं, कार्यक्रमों या विकास कार्यों पर प्रदेश का भ्रष्ट तंत्र पूरी तरह हावी है। ऐसे में यह कैसे कहा जा सकता है कि तंत्र उनकी ढिलाई के बगैर ही भ्रष्ट हो गया है, साथ ही जब उन्हें किसी तरह का लालच भी नहीं है, तो वह यह सब नजर अंदाज क्यूं कर रही हैं और ऐसा हो नहीं सकता कि उन्हें प्रदेश के हालातों के बारे में जानकारी न हो? उत्तर प्रदेश में विकास की गति का पहिया पूरी तरह से जाम ही नजर आ रहा है। ऐसे में सरकार निर्देश दे रही है कि जिलाधिकारी जनपद स्तरीय संवाददाताओं से बेहतर सम्बंध स्थापित कर सरकार का गुणगान करने वाली खबरें व लेख प्रकाशित करायें। जिला सूचना अधिकारियों की पिछले दिनों लखनऊ में हुई बैठक में विशेष तौर पर यह निर्देश दिये गये कि वह जिलाधिकारियों व संवाददाताओं के बीच संवाद का माध्यम बनें और जो अच्छी खबरें व लेख प्रकाशित हों, उन्हें प्रदेश मुख्यालय में भी प्राथमिकता से भेजें, ताकि उन्हें आधार बना कर बाकी जनपदों में व प्रदेश स्तर पर प्रकाशित कराया जा सके।
हर्ष की बात यह है कि मीडियाकर्मियों से दूरी बनाये रखने का आदेश देने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती को चुनाव आते देख मीडिया की शक्ति का आभास होने लगा है, तभी उन्होंने पिछले दिनों प्रदेश मुख्यालय पर जिला सूचना अधिकारियों की बैठक आयोजित कराई, जिसमें सक्सेज स्टोरीज तैयार कराने के निर्देश दिये गये। यह भी कहा गया कि जहां जिला अधिकारियों व मीडिया कर्मियों में संवादहीनता है, वहां सूचना अधिकारी माध्यम बनें और सम्बंध बेहतर करायें, पर सवाल उठता है कि जब प्रदेश या जनपदों के हालात चारों ओर और हर स्तर पर बेकार हैं, तो यह सब कैसे हो सकता है? मीडिया कर्मियों की कलम जो दिख रहा है, उसके ठीक विपरीत लिख दें कि हालात बहुत अच्छे हैं। सम्बंधों की बात की जाये तो कलेक्ट्रेट, विकास या पुलिस विभाग के अधिकारी-कर्मचारी मीडिया कर्मियों से बहुत दूर भागते हैं, क्योंकि अधिकतर भ्रष्ट हैं और डरते हैं कि किसी मामले को लेकर बात न करने लगें। इसलिए भ्रष्ट, लापरवाह व जातिवादी अधिकारियों-कर्मचारियों के रहते कोई मीडियाकर्मी सक्सेज स्टोरीज कैसे लिख पायेगा?
नव वर्ष में प्रदेश के गरीब, शोषित व अनुसूचित वर्ग को यही आस रहेगी कि जो गुजरे साल नहीं हो पाया, वह इस साल हो जाये, ताकि वह भी समाज की मुख्यधारा में शामिल हो जायें, लेकिन सरकार की मुखिया मायावती को कागजी व जमीनी हकीकत के विशाल अंतर को कौन समझाये?
लेखक बीपी गौतम स्वतंत्र पत्रकार है.

