कल लखनऊ के एक अखबार में एक खबर पढ़ रहा था. खबर ठीक-ठाक स्थान घेरे हुए था. चार कालम का तो होगा ही. खबर में सबसे मजेदार बात यह थी कि उसे देख कर आप समझ तो जाते कि लिखने वाले का उद्देश्य कुछ चुभाना है, पर आप जाहिरा तौर पर कुछ कह नहीं सकते. खबर में लिखा था कि देवरिया जिले के बरहज थाने में किसी ताकतवर नेता, जो पत्रकारों की भाषा में रसूखदार हैं और शासकीय शब्दावली में भी जो कतिपय संवैधानिक पद वहां कहते हैं, के घर शादी थी. शायद उनके दो बच्चों की. फिर यह लिखा था कि इस शादी की पूरी व्यवस्था वहां की पुलिस ने संभाल रखी थी. बड़े विस्तार से लिखा था कि कितने-कितने लोग कहां-कहां थे. आगवानी कौन कर रहा था, मंच की व्यवस्था कौन देख रहा था, खान-पान का इंतज़ाम देखना किसका काम था, ढोल-मजीरे वाले और गाने-बजाने वालों की ओर कौन ध्यान दिए था आदि-आदि. खबर में यह भी लिखा था कि चूँकि इस काम के लिए जिले की फ़ोर्स पर्याप्त नहीं पाई जा रही थी, इसीलिए बाहर की भी फ़ोर्स बुला ली गयी थी. शायद दो या तीन जिलों से. इस पत्रकार की नजर में पूरी मुकमल व्यवस्था थी, जिसकी कमान स्वयं कप्तान साहब (जी हाँ, उतर प्रदेश में एसपी को कप्तान साहब भी कहते हैं, शायद अंग्रेजों के समय से प्रचालन हो) संभाले हुए थे, जो मुख्य द्वार पर थे. फिर और भी विस्तार से अलग-अलग जगह का ब्यौरा दे रखा था.
अगर ऊपर से देखें तो इसमें कोई बात नहीं हुई, पर एक पाठक के रूप में जब आप इसे पढ़ते हैं तो आम तौर पर आपके मन में क्या भाव उठते हैं? शायद यही न कि देखो इस पुलिस को. मेरे लिए तो एक सिपाही तक नहीं है, जब मैं मार खाया था, जब मेरी लड़की को किसी ने गाली दिया था, जब मुझसे किसी ने बदतमीजी की थी, जब किसी ने मेरी जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया था, जब मेरा भयानक एक्सिडेंट हो गया था, जब मेरे घर डकैती पड़ गयी थी और ना जाने ऐसे तमाम हादसे अपने-अपने अनुभवों से, तब तो इन लोगों में कोई मुझे नहीं दिखता था. पाठक शायद सोचता है कि मैं तो थाने दौड़ते-दौड़ते थक गया, पर भगवान नज़र नहीं आये और यहाँ वही थाने के महान भगवान रसोईये, शहनाई वादक, स्टेज कलाकार और प्रोग्राम कोर्डिनेटर बने दिख रहे हैं. आपके मन में कहीं ना कहीं टीस और आह निकल गयी हो तो आश्चर्य नहीं.
लेकिन फिर बात कही इस ढंग से कि कोई यह भी नहीं कह सकता कि भाई तुमने यह क्यों लिख दिया. मैं एक पुलिस अधिकारी के रूप में भी और इस देश के नागरिक के रूप में भी समझता हूँ कि यह कुशल पत्रकारिता का एक नमूना है, जो बात कहते हुए जनता की संवेदनाएं भी जगाता है और उन्हें हालाती खतरों से आगाह भी करता है, साथ ही मेज की दूसरी तरफ बैठे आदमी की जमीर को भी झकझोरता है.
मुझे खुद याद आता है कि कुछ जगहों पर किसी ताकतवर आदमी की नाराजगी से बचने के लिए मैंने भी इस तरह ने निजी कार्यक्रमों में अपनी जान झोंकी थी. मैं तो उस जगह पर हमेशा के लिए नहीं रहा, मेरे मन में वह बिना कारण तेजी एक शर्म की तरह जरूर आज भी पड़ी रहती है. निस्संदेह वे जो भारी संख्या में सिपाही उन जगहों पर मैंने खुद की सुरक्षा के लिए भेजे थे, वे किसी न किसी जरूरी घर और जरूरतमंद आदमी के काम को दरकिनार कर के ही तो यहाँ गए होंगे. पर कहते हैं ना कि समय सिर्फ एक दिशा में चलता है और बाद में आदमी सिर्फ उन बीती बातों पर सोच विचार ही कर सकता है. लेकिन इन सबका मतलब यह नहीं है कि मैं यह कह रहा हूँ कि जो गलती मैंने की है वही गलती ऊपर दर्शाए मामले में भी हुई होगी.
लेखक अमिताभ ठाकुर पुलिस अधिकारी हैं. इन दिनों अवकाश लेकर शोध, लेखन और घुमक्कड़ी के काम में व्यस्त हैं.

