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हमनें नमाजें भी पढ़ी है, गंगा तेरे पानी से वजू करके

: नजीर साहब के जन्म दिन पर : नजीर साहब की एक गजल है – कभी खामोश बैठोगे कभी कुछ गुनगुनाओगे, मैं उतना याद आऊंगा मुझे जितना भुलाओगे। नजीर बनारसी भूलाने की चीज हो भी नहीं सकते। एक ऐसी शख्सियत जो दुनियां के हर मसले का हल मोहब्बत को ही मानते रहे। कहते रहे, ‘‘अगर इन्सां को इन्सां से मोहब्बत हो जाए यही दुनियां जो जहन्नुम है जन्नत हो जाए।’’ नजीर साहब की शायरी का यही दर्शन भी है और यही शिक्षा भी। शायरी को नजीर साहब वतनपरस्ती का जरिया और लोगों को एक दूसरे से जोड़ने का जरिया मानते रहे। नजीर साहब कहा करते थे, ”मैं शायरी को सिर्फ अदब नहीं वतन की खिदमत का एक बड़ी सेवा मानता हूं। मेरे विचार से भाषा और वतनपरस्ती में घनिष्ट संबंध है।” अपने शहर बनारस और गंगा से बेपनाह मोहब्बत करने वाले नजीर साहब कहा करते थे, ‘‘सोयेंगे तेरी गोद में एक दिन मरके, हम दम भी जो तोड़ेंगे तेरा दम भर के, हमने तो नमाजें भी पढ़ी हैं अक्सर, गंगा तेरे पानी से वजू कर करके।’’

नजीर

: नजीर साहब के जन्म दिन पर : नजीर साहब की एक गजल है – कभी खामोश बैठोगे कभी कुछ गुनगुनाओगे, मैं उतना याद आऊंगा मुझे जितना भुलाओगे। नजीर बनारसी भूलाने की चीज हो भी नहीं सकते। एक ऐसी शख्सियत जो दुनियां के हर मसले का हल मोहब्बत को ही मानते रहे। कहते रहे, ‘‘अगर इन्सां को इन्सां से मोहब्बत हो जाए यही दुनियां जो जहन्नुम है जन्नत हो जाए।’’ नजीर साहब की शायरी का यही दर्शन भी है और यही शिक्षा भी। शायरी को नजीर साहब वतनपरस्ती का जरिया और लोगों को एक दूसरे से जोड़ने का जरिया मानते रहे। नजीर साहब कहा करते थे, ”मैं शायरी को सिर्फ अदब नहीं वतन की खिदमत का एक बड़ी सेवा मानता हूं। मेरे विचार से भाषा और वतनपरस्ती में घनिष्ट संबंध है।” अपने शहर बनारस और गंगा से बेपनाह मोहब्बत करने वाले नजीर साहब कहा करते थे, ‘‘सोयेंगे तेरी गोद में एक दिन मरके, हम दम भी जो तोड़ेंगे तेरा दम भर के, हमने तो नमाजें भी पढ़ी हैं अक्सर, गंगा तेरे पानी से वजू कर करके।’’

अपनी राम कहानी अपनी जुबानी में एक जगह नजीर साहब ने लिखा है, ‘‘यहां की पवित्र गंगा जिसकी लहरें लहरा-लहरा कर हमें एक साथ मिलजुल कर चलने का आठों प्रहर संदेश देती रहती है, जो बिना किसी भेदभाव के आठों प्रहर हर मजहब और धर्म के इंसानों को नहलाती-धुलाती रहती है, जिसकी पाकिजगी और पवित्रता सबकों पवित्र और पाकिजा बनाती है।’’ इसी तरह नजीर साहब की शायरी भी जुड़ने और जोड़ने की बात करती है। नफरत की आग बुझाने के लिए प्रेम की गंगा बहाने की बात करने वाले नजीर साहब ने जमकर फिरकापरस्ती पर हमला बोला कहा-

‘खून किसी इंसान का तुझे पीने नहीं दूंगा
ऐ फिरकापरस्ती तुझे जीने नही दूंगा’

इस बात से तो हम सब वाकिफ हैं कि फिरकापरस्ती का मौसम जब आता है, हम बंटते हैं, लड़ते हैं, मरते हैं और मारते हैं। इस मौसम में जिंदगी का हरा-भरा पेड़ पतझड़ की तरह हो जाता है। चेहरों पर नफरत दिखती है। ये फिरकापरस्ती अपने साथ लोगों की हंसी, खुशी सब साथ ले जाती है। फिरकापरस्ती ऐलानिया ये कहते हुए आती है।नजीर

‘मैं छेद कर रख देती हू मजलूम का सीना
दरकार हुआ जब भी मुझे खून ज्यादा
मैं आ गई ओढे़ हुए मजहब का लबादा
गोली को सीखा देती हू मैं चलने का करीना’

नजीर साहब जानते थे कि फिरकापरस्ती को मात देने के लिए एक ऐसे जेहन की जरूरत है, जिस पर इसका रंग न चढ़े उनके शायरी ऐसे ही जेहन को बनाने की कोशिश करती नजर आती हैं। वो जब कहते हैं-

‘खून किसी इंसान का पीने नहीं दूंगा
ऐ फिरकापरस्ती तुझे मैं जीने नहीं दूंगा
माना की तू बच सकती है तेगो ददम से
पर बच नहीं सकती तू मेरे कलम से’

लोग मंदिर और मस्जिद के लिए लड़ बैठे तो नजीर साहब ने कहा-

‘एक ही पत्थर लगे हैं हर इबादत गाह में
गढ़ लिए एक बुत के सबने अफसाने कई’

घाट किनारे मंदिरों के साये में बैठकर अक्सर अपनी थकान दूर करने वाले नजीर साहब चाहते थे कि जिंदगी में हमारी पहली और अंतिम पहचान हमारे मानवीय गुण बने। हम अपने मादरे वतन की खिदमत कर सके। सबको अपनाने का जज्‍बा सबको गले लगाने की सहूलियत हमारे अन्दर पैदा हो सके। राजनीतिक अवसरवादिता, धार्मिक कट्टरता, जातीय उन्मादता के बीच नजीर साहब को याद करना और भी जरूरी हो जाता है। उनकी इस बात को मानना-

‘कदम और आगे बढ़ाना है हमको
इक उजड़े जहां को बसाना है हमको
अभी दूर मंजिल जाना है हमको’

कबीर के शहर में ही पैदा होने वाले नजीर साहब की शायरी में कबीर सरीखे सा ही तेवर नजर आता है। जिस ढाई आखर प्रेम को लेकर कबीर उम्र भर चलते रहे, नजीर उसी ढाई आखर प्रेम के सच्चे वारिस बने। पेशे से हकीम रहने वाले नजीर साहब ने अपनी शायरी को जरिया बनाकर जिंदगी जीने का नुस्खा दिया, उसको मानने की जरूरत है। जरूरत है इस बात को समझने की हमें साथ रहकर ही अपने सुख-दुःख को बांटना है। एक दूसरे के कंधे पर सिर रखकर रोना भी है और साथ-साथ मुस्कुराना भी है। एक जैसी जरूरत, एक जैसे एहसास लेकर जिदंगी के रास्ते पर चलना भी है। तो हमें केवल जुबान से नहीं मन की गहराईयों से नजीर साहब के इस बात को मानना होगा-

‘वो सौ जगह से हुस्न को अपने अयां करे
हम तो ये पूछते है कि सजदा कहां करें?
नीयत दुरूस्त चाहिए चौखट कोई भी हो
सजदे का क्या है सजदा तो चाहे जहां करें!

नजीर साहब को याद करना या याद रखने का इससे बेहतर कोई और मतलब हो ही नहीं सकता कि हम उनकी शायरी के सबक को याद करते हुए चलें, क्योंकि नजीर साहब भुलाने की चीज हो ही नहीं सकते।

लेखक भास्‍कर गुहा नियोगी वाराणसी के निवासी हैं तथा हिन्‍दी दैनिक युनाइटेड भारत से जुड़े हुए हैं.

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