आज सुबह से ही मुझे बधाइयों का तांता लगा हुआ है. बल्कि सुबह क्यों, रात ग्यारह बजे के बाद से ही मुझे कई सारी बधाइयां मिल चुकी हैं. पहला एसएमएस मिलने के बहुत पहले मैं समझ चुका था कि भारतीय क्रिकेट टीम वर्ल्ड कप जीत चुकी है. मैं मैच तो नहीं देखता और चुपचाप अपने कमरे में बैठा जेफेरी आर्चर की पुरानी मशहूर किताब “शैल वी टेल द प्रेसिडेंट” पढ़ रहा था, पर मोहल्ले वाले भला हम जैसे लोगों को इस “ऐतिहासिक” और “महान” घटना से अनजान कैसे रख सकते थे. ग्यारह बजे से शायद कुछ पहले ही अचानक पूरे मोहल्ले में पटाखों का शोर मचने लगा, ताबड़-तोड़ पटाखे चलने की आवाजें और साथ ही हर्ष-ध्वनि के स्वर पूरे इलाके में गूँज गए.
मैं भी समझ गया कि अब अगले कुछ दिनों तक देश में चर्चा का मुख्य बिंदु क्या रहेगा, कल अखबारों में किस तरह की और किस तरह से ख़बरें आएँगी और देश की दशा और दिशा में इस “विजय” के महान योगदान का किस प्रकार से चित्रण और विश्लेषण होगा. आज के किसी भी अखबार ने कत्तई निराश नहीं किया है. कहीं आधे पेज का फोटो तो कहीं इतने मोटे-मोटे अक्षर कि शायद ही उसकी बानगी देखने को मिले. ऐसा तो संभवतः हमारे देश की आजादी के समय ही दिखा होगा.
उसके बाद एसएमएस पर एसएमएस. लोगों की खुशियों का पारावार नहीं है. एक से बढ़ कर एक उदगार प्रकट हो रहे हैं. एक एसएमएस पर विजयगाथा का कुछ इस तरह बखान है-“भारत और श्रीलंका के बीच इस विश्वकप की दशा कुछ ऐसी है- भारत (राम) ने वर्ल्ड कप (सीता) से 1983 में ब्याह किया और उस वर्ल्ड कप (सीता) को 1996 में श्रीलंका हरण करके ले गया. अब चौदह साल के वनवास के बाद ये दोनों भारत (राम) और वर्ल्ड कप (सीता) पुनः मिल सके हैं.”
मुबारकवाद तो शायद उन लोगों ने भी दे दी, जिनसे लंबे समय तक ना-इत्तेफाकी या नाराजगी थी. दुश्मन दोस्त बने जा रहे हैं, मानो इस शुभ अवसर पर छोटी-छोटी बातों का मतलब समाप्त हो गया है और हम एक महान और विशाल सामूहिक परिवार के अभिवाज्य अंग बन गए हैं, जहां ना तो कोई झगड़ा है, ना कोई कानाफूसी है, ना विभेद और ना ही आपसी विवाद. यह अलग बात है कि सब जानते हैं कि इस उपरी एकता के पीछे अंदरूनी तमाम बातें किस स्थिति में हैं.
एक मित्र की बहुत ही आनंदित टिप्पणी आई- “बधाई हो, हम वर्ल्ड कप जीत गए.” और एक बार तो सचमुच लगने लगा कि इस वर्ल्ड कप को हममे से हर एक आदमी ने जीता है, पर फिर यह भी याद आया कि इन्हीं बड़े-बड़े क्रिकेटरों से कल यदि मैं या आप इस जीत में अपना हिस्सा मांगने जायेंगे तो मेरे और आपके हक में क्या मिलेगा. एक ने लिखा- “आई लव माय इंडिया, द वर्ल्ड कप विनर.” अर्थात क्रिकेट खेल में दस या बारह (या इसके कुछ आगे-पीछे) देशों के बीच की यह प्रतियोगिता जीत लेने से स्थिति इतनी बदल गयी है कि अब ये सज्जन उस वर्ल्डकप विजेता इंडिया से प्यार भी करने लगे हैं.
एक और मित्र ने फरमाया-“आज हम सब बहुत ही प्राउड इंडियन हैं. हमने वर्ल्ड कप जो जीता है.” कुछ इस तरह जैसे किसी व्यक्ति की सारी हीन भावनाएं कोई मित्र सुपरमैन आ कर हमेशा के लिए मिटा देता है. एक प्यारा जुमला भी मिला- “होनी को अनहोनी कर दे, अनहोनी को होनी. एक जगह जब जमा हो तीनों, रजनी, गजनी और धोनी.” एक दूसरा बोल सुनें- “फिर बजा इंडिया का डंका, फूंक दिया रावण की लंका. अब मिला है अवसर सुनहरा, आज हो गया फिर से दुशहरा.” एक ने सवाल पूछा-“ औकात क्या है श्रीलंका की?” तो दूसरे ने जवाब दिया-“वाट लगा दी.”
अब इन सारी बातों के निचोड़ के रूप में एक साथी का कहना था-“आज लग रहा है मैं इंडियन हूँ. मुझे भारतीय होने का गर्व हो रहा है.” इतनी सारी बातों को सुनने के बाद, अखबारों के मोटे-मोटे अक्षरों को पढ़ने के बाद, क्रिकेट के महान, गौरवशाली इतिहास के बखान के ज्ञान के बाद अब तो कोई ऐसा नहीं कहे कि इंडिया में किसी तरह की कोई दिक्कत है. बल्कि उचित यही होगा कि हर आदमी एक स्वर में जोर से बोले- “हम कोई ऐसे वैसे थोड़े ही हैं, हम तो विश्वकप विजेता हैं. दू-दू गो विश्वकप जीते हैं, दू-दू गो.” बाकी दुनिया भर की बातों के लिए बहुत समय है, अभी जीत की खुशियों में कृपया कोई व्यवधान मत डालें.
लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अफसर हैं. यूपी के कई जिलों में पुलिस अधीक्षक रहे. दो वर्ष तक अवकाश लेकर एमबीए किया. इन दिनों मेरठ में आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा के प्रमुख के बतौर पदस्थ हैं. कई अखबारों, मैग्जीनों और पोर्टलों में विभिन्न विषयों पर लेखन.

