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हम भी नंगे, तुम भी नंगे : हर-हर गंगे

पता नहीं, हम जो हैं, उसे स्‍वीकारते क्‍यों नहीं हैं? जैसे, मान लीजिए मैं एक चोर हूं, लेकिर मैं यह कभी स्‍वीकार नहीं करूंगा कि मैं चोर हूं. पुलिस-पब्लिक के लात-जूते के कारण भले ही एकाध घंटे के लिए मान लूं कि मैं चोर हूं, लेकिन अदालत में मुकर जाउंगा. न केवर मुकरूंगा बल्कि अपनी ओर से एक विद्वान वकील भी खड़ा कर दूंगा, जो तरह-तरह की दलीलों से यह साबित करने की भरपूर कोशिश करेगा कि मैं चोर नहीं हूं. कल्‍पना कीजिए, सरकार यह ऐलान कर दे कि जो व्‍यक्ति शपथ-पत्र दाखिल कर अदालत में यह कह दे कि वह गुनहगार नहीं है, उसे जेल से तुरंत छोड़ दिया जायेगा. इस काल्‍पनिक ऐलान के बाद कल्‍पना में ही आप महसूस करेंगे कि सारे कैदी छूट गए, अदालतों का बोझ खतम, जेलें खाली, लेकिन ऐसा होता नहीं. ऐसी कल्‍पना भी बेकार है. लेकिन इस कल्‍पना को साकार किया जा सकता है कि हम चोर हैं. बावजूद इसके हम यह साबित करने की कोशिश करते रहेंगे कि हम चोर नहीं हैं. जो चोर नहीं हैं, फिर भी पकड़े जाते हैं, उनको लोअर कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक यह साबित करना होता है कि वे चोर नहीं हैं.

पता नहीं, हम जो हैं, उसे स्‍वीकारते क्‍यों नहीं हैं? जैसे, मान लीजिए मैं एक चोर हूं, लेकिर मैं यह कभी स्‍वीकार नहीं करूंगा कि मैं चोर हूं. पुलिस-पब्लिक के लात-जूते के कारण भले ही एकाध घंटे के लिए मान लूं कि मैं चोर हूं, लेकिन अदालत में मुकर जाउंगा. न केवर मुकरूंगा बल्कि अपनी ओर से एक विद्वान वकील भी खड़ा कर दूंगा, जो तरह-तरह की दलीलों से यह साबित करने की भरपूर कोशिश करेगा कि मैं चोर नहीं हूं. कल्‍पना कीजिए, सरकार यह ऐलान कर दे कि जो व्‍यक्ति शपथ-पत्र दाखिल कर अदालत में यह कह दे कि वह गुनहगार नहीं है, उसे जेल से तुरंत छोड़ दिया जायेगा. इस काल्‍पनिक ऐलान के बाद कल्‍पना में ही आप महसूस करेंगे कि सारे कैदी छूट गए, अदालतों का बोझ खतम, जेलें खाली, लेकिन ऐसा होता नहीं. ऐसी कल्‍पना भी बेकार है. लेकिन इस कल्‍पना को साकार किया जा सकता है कि हम चोर हैं. बावजूद इसके हम यह साबित करने की कोशिश करते रहेंगे कि हम चोर नहीं हैं. जो चोर नहीं हैं, फिर भी पकड़े जाते हैं, उनको लोअर कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक यह साबित करना होता है कि वे चोर नहीं हैं.

मानव अधिकारों के चश्‍मे से अगर देखा जाय तो चोर भी हमारी तरह इन्‍सान होते हैं. चोरी करते हुए पकड़े जाने पर, चोर को पहले हम पीटते हैं, लात-घूंसा, लाठी-डंडा जो मिला, उसी से ले दनादन. मानवाधिकार के नियम और देश का कानून इसकी इजाजत नहीं देता. पिटाई और ठुकाई दोनों कानूनन जुर्म हैं. फिर भी इस जुर्म को रोज अंजाम दिया जा रहा है. कश्‍मीर से लेकर कन्‍याकुमारी तक, रोज कहीं-ना-कहीं पुलिस, पब्लिक को पीटती है और कहती है- नहीं पीटा. एनकाउंटर करती है, कहती है- नहीं किया. पुलिस के लिए हर एनकाउंटर मुठभेड़ होता है, यानी पुलिस जो कहती है, करती उसके उलट है. तो भला एक चोर से यह कैसे उम्‍मीद की जाय कि वह कहे कि – वह चोर है.

अब धर्म को ही ले लीजिए. हमारे देश और समाज में धर्म ही एक ऐसा मुद्दा है जिसमें सड़क से लेकर संसद तक, सभी की आस्‍था है. फिर भी देश धर्म-निरपेक्ष है. ‘गंगा’ शब्‍द ही हमारे धर्म, हमारी आस्‍था से जुड़ा हुआ है, लेकिन हम उसे सरकारी भाषा में ‘गंगा नदी’ के रूप में जानते हैं. हमारी तथाकथित धर्म-निरपेक्ष सरकारों ने मुंह से गंगा को नदी कहा और उसके नेताओं ने दिल ही दिल में ‘गंगा मैया’, यानी जो है उसे स्‍वीकारते नहीं, जो नहीं है उसे ही अंगीकार करते हैं.

मशहूर पत्रकार मधुकर उपाध्‍याय ने अपने ‘भारतनामा’ में लिखा है कि ‘यह देश जितना जटिल है उतना ही सरल है, जितना उदार है उतना ही कट्टर है, जितना गरीब है उतना ही समृद्ध है, जितना प्रगतिशील है, उतना ही पोंगापंथी है. कुल मिलाकर जैसा है, वैसा सिर्फ भारत ही हो सकता है. जिसकी प्रतिभा खिलती तो है, पर गूलर के उस फूल की तरह, जो बाहर से दिखाई नहीं देता, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है.’ भारत भ्रमण के आधार पर एक पत्रकार के अनुभव का यह निष्‍कर्ष हो सकता है कि जो हम दिखते हैं वो हैं नहीं, और जो हैं ही नहीं वही हम दिखते हैं.

हम लिफाफा देखकर मजमून जान लेने में उस्‍ताद हैं, हम हवा का रुख पहचान सकते हैं, हम दूर की कौड़ी ला और भिड़ा सकते है, हम जमीन-आसमान एक कर सकते हैं, हम कुछ भी कर सकते हैं, हम सब कुछ कर सकते हैं लेकिन कुछ नहीं कर सकते. हम सिर्फ एक काम कर सकते हैं- अपना बचाव, आत्‍मरक्षा. जरूरत पड़ी तो वह भी नहीं कर सकते. दुर्योग हुआ तो पिट-पिटा कर अस्‍पताल पहुंच सकते हैं क्‍योंकि हम शरीफ आदमी हैं. देश के सभ्‍य नागरिक. देश और दुनिया में बढ़ती नंगई से खुद को बचाते-बचाते जो बच गए, वे खुद को बचाने में जी-जान से जुटे हुए हैं. कहते हैं- बाहर नंगई बहुत बढ़ गई है.

हम सभ्‍य और शरीफ लोग हैं. अगर नहीं हैं तो कम-से-कम दिखाने की कोशिश तो जरूर करते हैं कि हम शरीफ लोग हैं, जबकि आजकल नंगों का जमाना आ गया है. हर जगह नंगई हो रही है. कॉलेजों में रैगिंग हो रही है. सड़कों पर छेड़खानी हो रही है. बलात्‍कार की घटनाएं ऐसे घट रही हैं जैसे कोई जंग जीती जा रही हो. राह चलते बच्चियों पर एसिड फेंकने की वारदातों में इजाफा हो रहा है. हम कर्ज के बोझ से कुचलकर आत्‍महंता बनने पर इसलिए मजबूर हैं कि महाजन नंगई पर उतारू होकर सरेआम हमारी फजीहत कर रहा है. हम नंगई से से घबरा चुके हैं. दुनिया नंगी और हम शरीफ हैं.

कहते हैं, हर घर के हम्‍माम में आदमी नंगा होता है. हम्‍माम से निकलते ही लोग कपड़े पहन लेते हैं. नंगा भी कपड़ा पहन लेता है और शरीफ भी. नंगर और शरीफ ये दो, आदमी के प्रकार हैं. वैसे तो आदमी और औरत के कई प्रकार हुआ करते हैं लेकिन तफसील में न जाकर मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि आदमी दो प्रकार के ही होते हैं- नंगा और शरीफ. नंगा माने वस्‍त्रहीन. निर्लज्‍ज, लुच्‍चा, पाजी जैसे शब्‍द ‘नंगा’ के पर्याय हैं. ‘नंगा’ एक ऐसा शब्‍द है जिसके अर्थ अगर आपस में जुड़ जायें तो विशेषण से संज्ञा होने का अर्थ ध्‍वनित करेंगे- जैसे नंगा-लुच्‍चा, दुष्‍ट-पापी, लुच्‍चा-लफंगा आदि.

दूसरी ओर ‘शरीफ’ शब्‍द है. नंगर और शरीफ में जमीन-आसमान का अंतर होता है. नंगा हिन्‍दी का शब्‍द है और शरीफ अरबी भाषा का शब्‍द है. नंगा, नंगई करता है और शरीफ शराफत से पेश आता है. नंगर अगर एक चांटा मारता है तो शरीफ आदमी दूसरा गाल पेश करने पर अमादा हो जाता है. अगर न भी होगा तो भी पिटेगा. नंगा दहाड़ता है तो शरीफ मिमियाता है. शरीफों को अपनी इज्‍जत प्‍यारी होती है. नंगों को शरीफों की प्‍यारी-प्‍यारी इज्‍जत से प्‍यार हो जाता है.

कहते हैं, नंगों से भगवान भी डरते हैं- पता नहीं, कब कहां चिपक जाए, आंखें तरेर दे, मुकुट उतार ले,‍ तिजोरी साफ कर दे. नंगा कब क्‍या करेगा, कुछ पता नहीं. शरीफ, भगवान और नंगा दोनों से डरता है. दोनों को दूर से ही प्रणाम करता है. नजदीक पहुंचने या निकट होने का सवाल ही पैदा नहीं होता. शरीफ लोग डरते तो हैं दोनों से, लेकिन भगवान से कम डरते हैं और नंगा एवं उसकी नंगई से ज्‍यादा डरते हैं. शरीफ लोग हमेशा डरते रहते हैं. नंगों की नंगई से, भगवान के कोप से. शरीफ हमेशा डर-डर कर, सिमट-सिकुड़ कर दिन गुजारते हैं जबकि नंगा दहाड़कर, छाती ठोंक कर दिन गुजारता है.

नंगे लोग नाना प्रकार के होते हैं. सभी प्रकार के नंगे अगर चाह लें तो नानी याद करा सकते हैं. इसमें सबसे खतरनाक होता है- सफेदपोश नंगा. यह  सफेदपोश नंगा, नकाबपोश नंगे से ज्‍यादा घातक होता है, आस्‍तीन के सांप की तरह. इसके मुंह में राम होता है और बगल में छुरी. नंगा भी वही-वही काम करता है जो शरीफ करता है. नंगे भी शरीफों की तरह प्रभु-भक्‍त और गुरु-भक्‍त होते हैं. नंगे भी अपने पाप धोने के लिए गंगा में डुबकी लगाते हैं और शरीफ भी. लोग यह भी कहते हैं कि नंगा आदमी कभी सुधर नहीं सकता. वह शरीफ तो बन या दिख सकता है लेकिन शराफत से पेश आने का सलीका उसे नहीं आ सकता. दूसरी ओर यह भी हकीकत है कि अगर शरीफ अपनी शराफत का चोला उतार कर फेंक दे तो अच्‍छे-अच्‍छों की नंगई को दुरुस्‍त कर सकता है. बंद हो सकती है नंगई. बस, शरीफों को शराफत छोड़ने भर की देर है. जिस दिन शरीफों की जमात अपनी शराफत का चोला उतार, नंगों को ललकारेगी, ‘ हम भी नंगे, तुम भी नंगे : हर-हर गंगे’- उसी दिन से देश और समाज से छेड़खानी और बलात्‍कार की घटनाएं काफूर हो सकती हैं और हम या हमारा समाज ‘गंगा नहाकर’, जय-श्री गंगे निनाद कर सकता है.

लेखक भरत सागर वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा हैदराबाद में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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