24 सितंबर की आशंकाएं

गिरीश मिश्रा : 92 नहीं हो सकता 2010 : अयोध्या पर 24 सितंबर को आने वाले हाईकोर्ट के फैसले को लेकर भारी आशंकाएं हैं. प्रधानमंत्री से लेकर विभिन्न नेताओं, राजनीतिक पार्टियों, संस्थाओं की ओर से शांति और सद्भाव बनाए रखने की अपील की जा रही है. कुछ के द्वारा कहा जा रहा है कि वे अपना रुख फैसला आने के बाद तय करेंगे. लेकिन, कुल मिलाकर देखें तो किसी के द्वारा ऐसा संकेत नहीं है कि किसी भी रूप में 1992 जैसी स्थिति की पुनरावृत्ति हो सकती है, जब विवादित ढांचा गिरा था और दंगों की श्रृंखला-सी शुरू हो गई थी. निश्चित रूप से इन संकेतों का स्वागत ही होना चाहिए. वैसे भी लगता नहीं कि कोर्ट के फैसले को लेकर कोई आसमान टूटने वाला है. लेकिन, यहीं रुक कर ये भी सोचा जाना चाहिए कि क्या ये भूला जा सकता है कि आखिर छह दिसंबर 1992 के पहले भी तो सभी स्तरों पर ऐसे ही दावे किए गए थे.

सभी आशंकाओं को निर्मूल बताया गया था. उत्तर प्रदेश सरकार ने राष्‍ट्रीय एकीकरण परिषद और सुप्रीम कोर्ट तक को आश्वस्त किया था कि कारसेवा से ढांचे को कुछ नहीं होगा, लेकिन हुआ उल्टा. विवादित बाबरी मस्जिद ध्वस्त कर दी गई. फिर कल्याण सिंह ने गलती मानी और एक दिन के लिए जेल भी हो आए, लेकिन कोई अफसोस नहीं जताया. साफ था कि सरकार की मिलीभगत थी. इसे सभी कम या ज्यादा रूपों में जानते भी थे. लोग कैसे भूल सकते हैं कि ढांचा गिरने के बाद मौके पर मौजूद नेताओं में से किसी ने इसे गर्व कहा, किसी ने गुलामी-अपमान की निशानी का ध्वस्त होना, तो किसी ने बयानबाजी के लिए दुःखद दिन. इसीलिए जब लिब्रहान आयोग ने लालकृष्ण आडवाणी समेत अनेक भाजपा और संघ परिवार के नेताओं के असली चेहरों का ’खुलासा’  किया तो किसी को कोई आश्‍चर्य नहीं हुआ. सभी असलियत से तब तक वाकिफ जो हो चुके थे. लेकिन, इन सबके बीच एकमात्र सच यही था कि यह भारतीय लोकतंत्र का सबसे शर्मनाक दिन था.

तो मूल बात ये है कि आशंकाएं तब भी थीं और आज भी हैं. चूंकि कहावत भी है कि ‘दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है’, इसलिए इस बार की आशंका के साथ कुछ ज्यादा ही सतर्कता भी महसूस हो रही है. अयोध्या ही नहीं, विभिन्न क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की जबर्दस्त तैनाती हो रही है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने पिछली 17 सितंबर के फैसले में कहा कि आगामी 24 सितंबर को आने वाले निर्णय को रोकने या टालने का अब कोई प्रश्न नहीं है. यदि इसे रोका या टाला जाता है तो समस्याएं बढेंगी और ये समस्‍याएं ज्यादा बड़ी होंगी. बातचीत से विवाद के निपटारे के लिए प्रयासरत अयोध्या के निर्मोही अखाड़े के स्थानीय प्रयत्नों के विपरीत हिंदू महासभा और वक्फ बोर्ड तथा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी 24 को निर्णय सुनाने की मांग रखी. फिर भी कोर्ट ने कहा कि अदालत से बाहर यदि सम्बद्ध पक्ष बातचीत और रजामंदी से किसी मान्य नतीजे पर पहुंचें तो ये अच्छी बात होगी. लेकिन, सच्चाई यही है कि तीन पूर्व प्रधानमंत्रियों समेत अनेक स्तरों पर ऐसे प्रयास पहले ही असफल हो चुके हैं.

बहरहाल, इन सारी स्थितियों के बीच सर्वाधिक गौरतलब ये है कि 1992 किसी भी हालात में 2010 नहीं हो सकता. बात सिर्फ बीते 18 साल की ही नहीं है, इस दरम्यान सामाजिक-आर्थिक हालात बदले हैं, सोच और दृष्टि बदली है. सबसे ज्यादा 1980-90 के दशक के विपरीत 2010 दुनिया भर में भारत में सर्वाधिक युवाओं की संख्या का दशक है – यही वो समय है, जब देश में मध्य वर्ग की तादाद भी सबसे ज्यादा बढी है. मोबाइल, कम्प्यूटर जैसे गैजेट्स ही नहीं, वाहनों की संख्या भी तेजी से बढी है. वे विकास चाहते हैं, खान-पान, रहन-सहन के नए तौर-तरीकों पर जोर है. वे दुनिया से कदमताल के मूड में हैं. ऐसे में वे उन सभी विवादों से अलग रहना चाहते हैं, जो किसी भी रूप में प्रतिगामी हो. आखिर उनकी मॉल संस्कृति और तेजी से बदलते आधुनिक परिवेश का उस हिंसा, अराजकता और खून-खराबे से रिश्ता हो भी कैसे सकता है, जिसे या तो उन्होंने खुद बचपन में देखा और महसूस किया है या फिर इनकी जकड़न में छटपटाते समाज की अनुभूतियों को ज्यादा नहीं तो थोडा-बहुत जरूर समझा है.

वैसे भी कहावत है कि ‘काठ की हांडी बार-बार नहीं चढती.’ राम मंदिर के सवाल को भाजपा और उससे जुड़े नेताओं ने बाद में अनेक बार मुद्दा बनाने की कोशिश चुनावी मौकों पर की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उधर, 1992 के बाबरी ध्वंस और उसके बाद के दंगों के बाद गोधरा, गुजरात दंगे और कंधमाल में हिंसा के नंगे नाच हो चुके हैं. इसी बीच अमेरिका के 9/11 की तर्ज पर मुंबई में 26/11 भी हुआ, लेकिन वे अलग रहे, क्‍योंकि उनका स्वरूप आतंकी था – अगर छिटपुट अन्य वारदातों को छोड दिया जाए तो कहा जा सकता है कि इस दरम्यान भारतीय समाज मात्रात्मक ही नहीं, गुणात्मक बदलाव के दौर से भी गुजरा है. आदिवासियों, दलितों, पिछडों में भी नई चेतना का प्रवेश हुआ है. इसे हम 1991 की सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा और बाद की रथयात्रा और ऐसी ही दूसरी यात्राओं के तुलनात्मक अंतर से भी समझ सकते हैं. इसे इस रूप में भी समझा जा सकता है कि 1992 में बाबरी विध्वंस के नायक रहे उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह न केवल अब खुद भाजपा से बाहर हैं, बल्कि कभी विध्वंस को लेकर ‘भाजपा के हनुमान’ कहे जाने वाले कल्याण अब बार-बार अयोध्या आकर उस गुब्बारे में हवा भरने की कोशिश करते हैं, जिसमें अनेक छेद हो चुके हैं. अब उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा को भी समर्थकों की वो भीड नहीं मिलती, जिस पर कभी उनका एकछत्र अधिकार हुआ करता था, और राम मंदिर मुद्दे की सवारी करने वाली भाजपा का ग्राफ उसी प्रदेश में लगातार कमजोर हुआ है, जहां से कभी उसने उछाल ली थी. तो ये हैं समाज के गुणात्मक रुझान में तेजी से आते बदलाव के स्पष्ट संकेत.

थोडा इतिहास में जाएं तो अंग्रेजों की ‘बांटो और राज करो’ की नीति उनके लिए जितनी कारगर थी, उतनी ही हमारे समाज को बांटने वाली और उसमें जहर घोलने वाली भी. 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में हिंदू-मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर लडे थे – इस एकता को तोड़ने के लिए उन्होंने 1905 में बंगाल का विभाजन कराया तो उसके बाद सर आगा खां की अगुवाई में मुस्लिम लीग का निर्माण भी. लेकिन, मुस्लिम सांप्रदायिकता की तरह ही उन्होंने 1920 के दशक में हिंदू सांप्रदायिकता को सिर्फ हवा ही नहीं दी – उसे बढावा भी दिया, वैसे गांधी की अगुवाई में चल रहे स्वतंत्रता संघर्ष के चलते ये तत्व हमेशा हाशिए पर ही रहे, वो अलग बात है कि इन्होंने उसी दरम्यान हिटलर और मुसोलिनी से भी संपर्क साधने की कोशिश की. बंटवारे और आजादी के तीन महीने बाद 12 नवंबर 1947 को दिवाली के दिन सरदार पटेल ने सोमनाथ में मंदिर का शिलान्यास किया था और 1952 को तत्कालीन राष्‍ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने औपचारिक उद्घाटन और मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा. हालांकि प्रधानमंत्री नेहरू न तो ये चाहते थे कि वहां राष्‍ट्रपति जाएं और न ही ये चाहते थे कि उनकी सरकार का गृहमंत्री वहां शरीक हो. लेकिन, आस्था और विचारों के लोकतंत्र का लिहाज था, जिसे नेहरू भी समझते थे. इसीलिए राजेंद्र बाबू ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा भी था कि ‘हम न तो गड़े मुर्दों को उखाड़ना चाहते हैं और न ही किसी की भावनाओं को चोट पहुंचाना. हम तो सिर्फ सांस्कृतिक पक्ष को महत्व देना चाहते हैं.’

लेकिन, जितनी सदाशयता से पटेल और राजेंद्र बाबू सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में लगे थे, बात उतनी सरल भी नहीं थी, उसी दरम्यान 22-23 दिसंबर 1949 की रात अयोध्या के कथित विवादित ढांचे के अंदर मूर्ति रख दी गई. इसका उल्लेख तत्कालीन एफ.आई.आर. में दर्ज है. एक ओर रिपोर्ट में 60-70 लोगों की भीड़ का जिक्र है, जिसने मूर्ति रखी, वहीं दूसरी ओर दूसरे पक्ष ने कहा कि वहां मूर्ति प्रकट हुई. बहरहाल, विवाद चला जो बीच के दशकों में थमा जरूर, लेकिन 1980 के दशक में ताला खुलने के बाद से बढता ही गया. फिर 1991 में 40 साल बाद उसी सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा का श्रीगणेश भी हुआ. आशय यह है कि बीते अतीत के ये उतार-चढ़ाव इतिहास की किताबों में दर्ज हैं, लेकिन आज की दुनिया के मूल्य-मान्यताएं सिर्फ इतिहास से ही तय नहीं हो रहे. वहां मस्जिद के पहले मंदिर था या नहीं या फिर हिंदू मंदिर के पहले भी वहां कभी बौद्ध मंदिर था या नहीं – या फिर ऐसे अनेक सवाल अब उतने महत्वपूर्ण नहीं रहे, जितने बीस साल पहले तक हुआ करते थे.

समझा जाना चाहिए कि कभी नागासाकी-हिरोशिमा में बम गिराने और लाखों लोगों की जान लेने वाला अमेरिका कुछ ही दशकों बाद जापान का मित्र भी हुआ. शीत युद्ध के जमाने में आखिर दो-तीन दशकों पहले अमेरिकी अगुवाई में पश्चिमी खेमा और सोवियत संघ की अगुवाई में समाजवादी खेमा कुत्ते-बिल्ली की तरह ही लड़ कर संतोष नहीं करते थे, बल्कि अपने-अपने स्वार्थों में प्रतिद्वंद्वी दुनिया को पूरी तरह तबाह करने के सारे षडयंत्र भी रचते थे – लेकिन आज बदले हालात में दोनों मित्र हैं, विकास की दौड में हमसफर हैं. तो इतिहास को नए संदर्भों में देखने-समझने की जरूरत है.

वैसे 24 को कोर्ट का फैसला कुछ भी आए, कोई-न-कोई पक्ष ऊपर की अदालत में जाएगा ही. ये तो हुई कानूनी लड़ाई की बात. लेकिन, इस तथ्य को भी समझा जाना चाहिए कि  धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र हमारे संविधान की ही नहीं, भारतीय समाज की भी आत्मा सरीखे हैं. जहां तक राम की बात है तो कहने की जरूरत नहीं कि राम भारतीय संस्कृति और अध्यात्म के साथ सद्भाव और भाईचारे के भी प्रतीक हैं. वो भारतीयता के पर्याय हैं. लेकिन, समझा जाना चाहिए कि तुलसी और वाल्मीकि के राम जहां अपनी विराटता के चलते सभी के आराध्‍य हैं, तो कबीर और गांधी के राम भी उतने ही विराट हैं, जो सभी को बंधुत्व और स्नेह की डोर से जोड़ते ही नहीं, अपना भी बनाते हैं -इसीलिए बापू ईश्वर अल्लाह तेरो नाम कहते हुए सभी को सन्मति देने का आग्रह भी करते हैं. 2010 बदलते समय में आधुनिकता के साथ इन सभी का समन्वय चाहता है. याद रखने की बात ये है कि इसीलिए खुद अयोध्या न तो 1992 में और न ही 2010 में कभी भी न तो आक्रामक हुई और न ही अमर्यादित, अनेक बार दूसरे ही उसके नाम पर सीमा लांघते रहे. सभी को भाईचारा, प्‍यार-मोहब्बत और सहिष्णुता सीखनी चाहिए अयोध्या से.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका यह लिखा ‘लोकमत समाचार’ से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीशजी से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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