भाषा, मजहब, सरहद के नाम पर बंटे लोगों की जितनी जुबानें होती है, उतनी ही मोहब्बत की दास्तानें होती हैं। पर सबसे अहम बात यह है कि मोहब्बत इंसानी होती है और हमेशा इन्सानियत के हक में खड़ी हक होती है। कुछ दास्तानें ऐसी होती हैं, जो अपने ही दौर में भुला दी जाती है, जबकि कुछ दास्तानें ऐसी होती हैं, जिन्हें हर दौर में न सिर्फ शिद्दत के साथ याद करते हैं बल्कि उनसे सीख भी लेते हैं। ऐसी दास्तान हमें ये बताती है कि एक से चलकर अनेक में तब्दील हो जाना ही प्रेम का मूल चरित्र है। प्रेम न तो कोई दिवस है और न ही विशेष पल। यह तो हम सबके जीवन का वह हिस्सा है जो हमें बताता है, जहां अंधेरा है वहा उजाला बन कर जाओ, जहां आसूं है वहां खुशी बनकर जाओ। प्रेम ही है जो हमें महसूस करवाता है कि ‘हर दिल में जो दर्द है वो हमारा है।’और फिर हमसे कहता है भागो नहीं दुनिया को बदलो।
दुनिया के अलग-अलग हिस्से में ऐसी ही कुछ शख्सियतें हुई हैं, जिन्होंने प्रेम, प्यार, मोहब्बत, इश्क को एक नयी उंचाई और नया नजरिया दिया है। हिंसा, अत्याचार और उत्पीड़न, दमन और निर्ममता के खिलाफ लिखने वाले फ्रांस में जन्मे बीसवीं सदी के महान चिन्तक और रचनाकार अल्बेयर कामू से जब पूछा गया कि उन्हें कौन से शब्द सबसे प्रिय हैं – तो उनका जवाब था- मां, धरती, आकाश, सूरज की रोशनी और सम्पर्क में आने वाला आदमी, गरीबी और मानवीय गरिमा। प्रेम के बारे में कामू कहा करते थे, ‘चाहे हमें इससे निराशा मिले, फिर भी प्रेम का अस्तित्व बना रहेगा।’ कामू प्रेम को मनुष्य की मुक्ति का रास्ता मानते थे। वह खुद भी सोचा करते थे, ‘मुक्ति संभव है किन्तु रहस्यात्मकता के माध्यम से नहीं बल्कि आदमी के सम्पर्क में आकर।’ कामू का प्रेम साधारण आदमी का पक्षधर था। कामू कहते थे मृत्यु से ग्रसित इतिहास को नैतिक पोस्टमार्टम की जरूरत है। हम उस अंधेरे जगत में निवास करते हैं, जो हमारी ही करनी का फल है। यदि हम खुद को जानना चाहते हैं तो अपनी असफलताओं को जानें। हमारी सबसे बड़ी असफलता तो यह है कि हम आदमी नहीं हो सके। शताब्दी का इतिहास शायद इसलिए लड़खड़ाता रहा है, क्योंकि इसमें बर्बरता का ही वर्चस्व है। एक साधरण आदमी का कोई स्थान नहीं। इस सच को तो हम भी बखूबी महसूस कर रहे हैं कि आज आदमी को कुछ भी नहीं छू रहा है सिवाय अपनी जरूरतों के। इसलिए शायद आज का आदमी सृजन के बदले संहार पर उतर आया है। ऐसे में जीवन के प्रति आस्था बचाए रखने के लिए क्या प्रेम की जरूरत नहीं है? जरूरत है पर क्या इंसान होने के लिए इंसान से इंसान से प्रेम करने के लिए हमे जाति, मजहब, भाषा, सरहद के खेमों से जुड़ना जरूरी है?
कामू भी यही सवाल पूछते हैं, ‘क्या बिना किसी सन्दर्भ के हमारी अपनी जिदंगी का कोई मूल्य नहीं है? एक जगह वो लिखते है, ‘आखिर इन परियों से हमें क्या लाभ, यदि इनमें मानवीय गुण नहीं है।’ बहरों को सुनाने के लिए तेज धमाके की जरूरत है। असेम्बली में धमाका कर क्रूर ब्रिटिश हुकूमत को हिला देने वाले शहीदे आजम भगत सिंह भी मानते थे कि प्रेम मनुष्य के चरित्र को ऊंचा उठाता है, नीचे नहीं गिराता, बशर्ते प्यार प्यार हो। तेइस साल की उम्र में फांसी पर चढ़ने वाले भगत सिंह ने अपने साथी सुखदेव को लिखे पत्र में प्रेम के बारे में कुछ इस प्रकार लिखा था, ‘जीवन की सुन्दरता को लेकर मेरे अन्दर भी बहुत सी उम्मीदें और उमंगें हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर मैं ये सब छोड़ने को तैयार हूं और यही असली त्याग है। ये चीजें मनुष्य की राह में रोड़ा नहीं बन सकती अगर वह मुनष्य है। व्यक्ति के चरित्र पर चर्चा करते हुए तुमने मुझसे पूछा था कि क्या प्रेम इसमें कभी मददगार साबित हुआ है। मैं आज इसका जवाब देता हूं। हां मैजिनी के बारे में तुमने पढ़ा होगा वह अपने प्रथम विद्रोह की सम्पूर्ण असफलता के दुःख को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। अपने मृत कामरेडों के विचार उसे मथ रहे थे। ऐसे में अगर उस लड़की का खत उसे नहीं मिलता जिसे वह प्यार करता था, तो वह पागल हो जाता या आत्महत्या कर लेता। जहां तक प्रेम में नैतिकता का सवाल है, मैं कह सकता हूं प्रेम मनुष्य के चरित्र को ऊंचा उठाता है नीचे नहीं गिराता, सच्चा प्रेम पैदा नहीं किया जाता, यह अपने आप होता है, मनुष्य को प्रेम की प्रबल भावनाएं रखनी चाहिए, जिन्हें व्यक्तिगत न रखकर सार्वजनिक करना चाहिए। जब इन्सान और इन्सानियत पर जुल्म करने वाली बर्बर ताकतें सरहदों की परवाह किए बगैर इन्सानियत को रौंदती हों तो इन्सान और इन्सानियत से बेपनाह मोहब्बत करने वाले लोग सरहदों की बन्दिशों को क्यों मानें।’
ऐसा ही एक नाम है चे ग्वेवारा का। चे के लिए दुनिया सरहदों में बंटी नहीं थी। इसीलिए 9 अक्टूबर 1967 में बोलीविया के जंगल में पकड़े गये चे से अमेरिकी सैन्य अधिकारी सेलिश ने जब पूछा, ‘तुम क्यूबाई हो या अर्जेण्टीनी तो चे का जवाब भुलाये नहीं भूलता। चे ने कहा, ‘मैं क्यूबाई हूं, अर्जेण्टीनी हूं, मैं पेरू का हूं, इक्वाडोर का हूं दुनिया में जहां कहीं भी साम्राज्यवाद मानवता को रौंद रहा है, मैं वहां-वहां उस मुल्क की सरहद पर हूं।’ चे सम्पूर्ण मानवता के लिए थे, तभी तो पल भर में क्यूबा के मंत्री पद से त्याग देकर अपने चुनिन्दा साथियों के साथ बोलिविया में जबरन हो रही अमेरिकी घुसपैठ को खदेड़ने चल दिए। क्यूबा से जाने से पहले चे ने अपने-अपने संघर्ष के साथी क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रों को जो पत्र लिखा, वो उन लोगों के लिए धरोहर है, जो इंन्सानियत के हक में खड़े हैं या फिर खड़े होने का हौसला बांध रहे हैं। पत्र का एक-एक शब्द प्यार और संवेदनाओं से भरे हैं, चे ने लिखा, ‘फिदेल मेरे दोस्त, अब मेरी विनम्र सेवाओं की विश्व के दूसरे भागों को आवश्यकता है और मैं वह कर सकता हूं। … तुम समझो इस समय मैं सुख-दुःख दोनों का अनुभव कर रहा हूं। आधिकारिक रूप से क्यूबा से मेरा कोई संबंध नहीं है, परन्तु अन्य संबंध जो अलग तरह के है, उनको पदों की तरह से नहीं छोड़ा नहीं जा सकता। मैं उन लोगों से विदा लेता हूं जिन्होंने मुझे अपने बेटे के रूप में स्वीकार किया। इससे मुझे दुःख हो रहा है। मैंने आप लोगों को बहुत चाहा परन्तु इसका दिखावा नहीं कर सका। मैं अपने क्रियाकलापों में बिल्कुल सीधा एवं स्पष्ट हूं। यदि मेरा अंतिम समय आ जाएगा और मैं दूर रहूंगा तो मेरा ख्याल इस देश के लिए और खासकर तुम्हारे लिए होगा। समय-समय पर बीसवीं सदी के इस मामूली सैनिक को याद करते रहिएगा।’
इस पत्र पर फिदेल की टिप्पणी थी- ‘ वे लोग जो क्रान्तिकारियों को हृदय विहीन जड़वत प्राणी समझते हैं। यह पत्र उदाहरण पेश करता है कि एक क्रान्तिकारी के हृदय में कितनी पाकीजगी और प्रेम पाया जा सकता है। लोगों से निश्चल प्रेम करनेवाले चे आज भी करोड़ों दिलों में न सिर्फ जिन्दा हैं बल्कि इन लाखों अनजाने चेहरों की आखों में सपनों की तरह हैं, जो इस पूरी दुनिया को हैवानियत बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।’ भले ही आज प्रेम को बाजार अपने शिकंजे में जकड़कर मुनाफे की शक्ल में ढल रहा हो या फिर प्रेम को स्त्री-पुरुष सबंधों के संर्कीण दायरों में सीमित करने की परिभाषाएं गढ़ी जा रही हों, लेकिन सच तो यह है कि प्रेम बन्धनों और सीमाओं से परे जाकर खुबसूरत दुनिया और खुबसूरत इंसान बनाने का सबसे मजबूत माध्यम है। तो फिर क्यों न प्रेम के इसी स्वरूप को स्थापित करने की कोशिश जारी रखी जाय। ‘चे’ के शब्दों को ले लें तो हम सच में जीने वाले लोग है, हम उसका ख्वाब देखते हैं। किसी ने कहा भी है…
धूप की तरह धरती पर खिल जाना,
और फिर आलिंगन में सिमट जाना,
बारूद की तरह भड़क उठना,
और चारों दिशाओं में गूंज जाना,
जीने का यही सलीका होता है,
प्यार करना और जीना उन्हें कभी नहीं आयेगा,
जिन्होंने जिदंगी को बनिया बना दिया है।
लेखक भास्कर गुहा नियोगी वाराणसी के निवासी हैं तथा हिन्दी दैनिक युनाइटेड भारत से जुड़े हुए हैं.

