
प्रमोद
आज राजनीति एक ऐसी रपटीली राह बन चुकी है जहां भलमनसाहतों के लिए ‘नो एन्ट्री’ है । ऐसा नहीं कि भले लोग खत्म हो गये या कम हो गये, लेकिन वे परिदृश्य से गायब कर दिये गये हैं। गायब हो गये हैं। उनकी मौजूदगी है भी तो दुर्लभ जीवाश्म की तरह! संविधान के जनतांत्रिक मूल्य-समता, स्वतंत्रता, धर्म निरपेक्षता, न्याय, भ्रातृत्व का क्षरण होता जा रहा है। गांधी, अंबेडकर, जयप्रकाश, लोहिया के अनुयायी बाहुबलियों के आगे नतमस्तक होने को विवश हैं, क्योंकि वे ‘अल्पसंख्यक’ हैं इस भरी दुनिया में। पूरा जनतंत्र मानो वोटतंत्र और भीड़तंत्र में समा गया हो!
महाराष्ट्र के ‘नवनिर्माण’ के लिए सेना (मनसे) बनाने वाले राज ठाकरे एक व्यक्ति नहीं बल्कि आधुनिक राजनीतिक संस्कृति का नाम है, जिसमें जो जितना गिरने की होड़ में शामिल होता है, वह उतना ही नायकत्व से लैस होता जाता है। मुंबई हमारे बाप की है, दिल्ली उनके बाप की है, गुवाहाटी उनकी रियासत है और पटना हमारा है, भोपाल, लखनऊ… सिलसिला रूकता नहीं, फिर हिन्दुस्तान किसके बाप का है? भाषा, मराठी मानुष के लिए देश की राजनीति को अपनी तरफ मोड़ देने वाली इस राजनीतिक संस्कृति को बाल गंगाधर तिलक, बाबू राव विष्णु पराडकर से क्या मतलब? शिवसेना और मनसे के इस राजनीतिक कारोबार को महाराष्ट्र की सत्ता का भी समर्थन हासिल है। बिना समर्थन के कानून हाथ में लेना सम्भव ही नहीं। जनसमर्थन चाहे जिस स्तर का हो वह तो हासिल है ही।
एक और बात पर खुली चर्चा होनी चाहिए कि इस तरीके की उपराष्ट्रवाद क्यों पनपती है। नेता और पार्टी अगर नफरत फैलाने वाले है तो उन्हें जनसमर्थन कैसे हासिल हो जाता है? क्षेत्रीयता, भाषावाद, रोजगार में भागीदारी को लेकर एक स्पष्ट और निर्णायक बहस होनी चाहिए तथा देश की एकता और अस्मिता को मजबूती से बरकरार रखने के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक तथा अरूणाचल से गुजरात तक विकास का विकेन्द्रीकरण होना चाहिए। उत्तर भारतीय नेताओं को भी सिर्फ ठाकरे और राज को कोस कर काम चलाने से बचना होगा। उन्हें केन्द्र से उचित हक-हकूक की मांग रखते हुए अपने राज्य में रोजी-रोजगार तथा विकास की धारा फैलानी होगी। इस देश का नागरिक कहीं भी रोजी-रोटी के लिए जा सकता है, से खाना पूर्ति करने की आदत से बचना होगा। नीतीश, लालू, मुलायम, मायावती, शिवराज सभी को अपने-अपने राज्य में हर शिक्षित-अशिक्षित को रोजगार कैसे मिले इस पर चिन्तन-मनन करनी होगी।
फिर क्या किया जाना चाहिए? क्या इस देश में कानून, संविधान, शासन तंत्र को कोई मतलब नहीं रह गया? चुनी हुई चुप्पियां, सुविधाजीवी विरोध के स्वर, लोकतंत्र के ‘गेम’ और व्यर्थता बोध से सिक्त लेखन-प्रसारण! क्या सभी अपना-अपना ‘धंधा’ कर रहे है! सत्ता पक्ष कुछ भी कहे-करे विपक्ष विरोध प्रदर्शन का अपना काम करता है, सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता धरना-प्रदर्शन पुतला फूंकने और जेल जाने का काम करता है, पुलिस प्रशासन अपना काम करता है। कोई लम्पट नायक कहता है- ‘यह हमारा है, वह तुम्हारा है’ और फिर वहीं खों खों, हें हें। संसद से सड़क तक के कवि ‘धूमिल’ के शब्दों में कहे तो पूरा तंत्र ही अपराधियों का संयुक्त परिवार है?
संसदीय बहसें अपनी गरिमा खो रही हैं और संसदीय व्यवहार सड़क छाप गली मार्का हो गयी है। ‘धर्म की राजनिति’ की दुहाई देने वाले ‘राजनीति के धर्म’ की कोई परवाह नहीं करते। जातीय-क्षेत्रीय-सांप्रदायिक क्षत्रप ताल ठोककर अपने निहायत स्वार्थी एजेन्डे पर काम करते हैं। आम नागरिक असुरक्षा, हताशा की मनोवैज्ञानिक ग्रंथी से इस कदर ग्रस्त है कि कोई समाधान नजर नहीं आता। गरीबी, यातना-शोषण को अपने जीवन में ठीक प्रकार से जीने वाले लोग ही ऊंचाई पर पहुंच कर उस वर्ग-संस्कृति को जीने लगते हैं जिसके कि वे कभी शिकार रहे। उनका वर्ग चरित्र, उनकी नैतिकता, उनके हित घुलमिल जाते है उन्हीं सरोकारों के नाम जिसके प्रतिरोध स्वरूप वे ‘नायक’ बने। फिर किससे आशा की जाय?
क्या यह अच्छा नहीं होगा, जैसा कि महान कवि ब्रेख्त अपनी एक कविता में कहते हैं- वे सभी जो जनतंत्र से डरे हुए हैं, वे जनतंत्र को ही भंग कर दें और अपने लिए एक ‘नयी जनता’ चुन लें। युवा पत्रकार-कवि व पटकथा लेखक प्रदीप तिवारी की काव्य-पंक्तियां हैं- जन-भक्षियों की शिनाख्त आसान नहीं/आदमखोर जानवरों को/पालतू बना चुके है जनभक्षी/भूख से मरते हजारों लोगों के/हिस्से का अनाज/वर्षो से उनके गोदामों में बंद है/इसी अनाज की खरीद के लिए/बोलियां लगा रही हैं/बहुराष्ट्रीय कंपनियां/इंटरनेट पर है जनभक्षियों की/पेशेवर मुस्कानें/सूचना पथ पर उनके/खूंरेजी पंजों के निशान हैं।
लेखक प्रमोद कुमार पांडेय पत्रकारिता विषय के शिक्षक हैं.

