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प्रसार भारती में किसकी हुकूमत है?

शेष नारायण सिंह: सीईओ के सामने बोर्ड की भी नहीं चलती :1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो तय किया गया कि टेलीविज़न और रेडियो की खबरों के प्रसारण से सरकारी कंट्रोल ख़त्म कर दिया जाएगा. क्योंकि 77 के चुनाव के पहले और 1975 में इमरजेंसी लगने के बाद दूरदर्शन और रेडियो ने उस वक़्त की इंदिरा-संजय सरकार के लिए ढिंढोरची का काम किया था और ख़बरों के नाम पर झूठ का एक तामझाम खड़ा किया था. जिन सरकारी अफसरों से उम्मीद थी कि वे राष्ट्रहित और संविधान के हित में अपना काम करेगें, वे फेल हो गए थे. उस वक़्त के सूचनामंत्री विद्याचरण शुक्ल संजय गांधी के हुक्म के गुलाम थे. उन्होंने सरकारी अफसरों को झुकने के लिए कहा था और यह संविधान पालन करने की शपथ खाकर आईएएस में शामिल हुए अफसर रेंगने लगे थे. ऐसी हालत दुबारा न हो, यह सबकी चिंता का विषय था और उसी काम के लिए उस वक़्त की सरकार ने दूरदर्शन और रेडियो को सरकारी कंट्रोल से मुक्त करने की बात की थी.

शेष नारायण सिंह: सीईओ के सामने बोर्ड की भी नहीं चलती :1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो तय किया गया कि टेलीविज़न और रेडियो की खबरों के प्रसारण से सरकारी कंट्रोल ख़त्म कर दिया जाएगा. क्योंकि 77 के चुनाव के पहले और 1975 में इमरजेंसी लगने के बाद दूरदर्शन और रेडियो ने उस वक़्त की इंदिरा-संजय सरकार के लिए ढिंढोरची का काम किया था और ख़बरों के नाम पर झूठ का एक तामझाम खड़ा किया था. जिन सरकारी अफसरों से उम्मीद थी कि वे राष्ट्रहित और संविधान के हित में अपना काम करेगें, वे फेल हो गए थे. उस वक़्त के सूचनामंत्री विद्याचरण शुक्ल संजय गांधी के हुक्म के गुलाम थे. उन्होंने सरकारी अफसरों को झुकने के लिए कहा था और यह संविधान पालन करने की शपथ खाकर आईएएस में शामिल हुए अफसर रेंगने लगे थे. ऐसी हालत दुबारा न हो, यह सबकी चिंता का विषय था और उसी काम के लिए उस वक़्त की सरकार ने दूरदर्शन और रेडियो को सरकारी कंट्रोल से मुक्त करने की बात की थी.

यह प्रसार भारती की स्थापना का बीज था और आज वह संस्था बन गयी है लेकिन अब उसकी वह उपयोगिता नहीं रही. सूचना क्रान्ति की वजह से आज किसी भी टेलीविज़न कंपनी की हैसियत नहीं है कि झूठ को खबर की तरह पेश करके बच जाए. लेकिन आज भी प्रसार भारती आम आदमी की गाढ़ी कमाई का तीन हज़ार करोड़ रूपया साल में डकार लेता है. पिछले 12 साल में भ्रष्ट नेताओं की कृपा से वहां जमे हुए नौकरशाह खूब मौज कर रहे हैं और रिश्वत की गिज़ा खा रहे हैं. समय-समय पर सरकारी मंत्रियों को भरोसे में लेकर इन अफसरों ने ऐसे नियम कानून बनवा लिए हैं कि प्रसार भारती का बोर्ड इनका कुछ भी नहीं बना बिगाड़ सकता. जबकि कायदे से यह बोर्ड ही प्रसार भारती को चला रहा है, यही प्रसार भारती के सीईओ का बॉस है. लेकिन मौजूदा प्रसार भारती की तो इतनी भी ताक़त नहीं बची है कि वह अपनी मीटिंग का सही मिनट्स लिखवा सके.

देश की एक बहुत बड़ी पत्रकार और मीडिया की जानकार ने प्रसार भारती  की  अंदरूनी कहानी पर नज़र डालने की कोशिश की. उनके पास बहुत सारा ऐसा मसाला था जिसको छापने से प्रसार भारती के वर्तमान सीईओ की प्रतिष्ठा को आंच आ सकती थी लिहाज़ा उन्होंने उस अधिकारी से बात करने के लिए औपचारिक रूप से निवेदन किया. 10 दिन तक इंतज़ार करने के बाद उन्हें मजबूरन हिम्मत छोड़ देनी पड़ी. इसके बाद जो खुलासा हुआ वह हैरतअंगेज़ है. केंद्रीय सतर्कता आयोग की जांच में जो बातें सामने आई हैं, वे इस संस्था में भारी भ्रष्टाचार की कहानी बयान करती हैं. पता चला है कि प्रसार भारती की बैठक में जो भी फैसले लिए जाते हैं, उनको रिकार्ड तक नहीं किया जाता. ऐसा इसलिए होता है कि मीटिंग के मिनट रिकार्ड करने का काम सीईओ का है. अगर सीईओ साहेब को लगता है कि बोर्ड का कोई फैसला ऐसा है जो उनके हित की साधना नहीं करता, तो वे उसे रिकार्ड ही नहीं करते.

जब अगली बैठक में बोर्ड पिछली बैठक के मिनट रिकार्ड का अनुमोदन का समय आता है तो बोर्ड के सदस्य यह देख कर हैरान रह जाते हैं कि मिनट्स तो वे है ही नहीं जो मीटिंग में तय हुए थे. अब नियम यह है कि मिनट्स का रिकार्ड सीईओ साहेब करेगें तो वे अड़ जाते हैं कि यही असली रिकार्ड है. लब्बोलुबाब यह है कि मौजूदा व्यवस्था ऐसी है कि प्रसार भारती में अब वही होता है जो सीईओ चाहते हैं और आजकल यह बोर्ड की मर्जी के खिलाफ होता है. बोर्ड के पिछले अध्यक्ष अरुण भटनागर राजनीतिक रूप से बहुत ही ताक़तवर थे लेकिन मौजूदा अध्यक्ष ने उनकी एक नहीं चलने दी. आजकल तो बोर्ड और सीईओ के बीच ऐलानियाँ ठनी हुई है. मामला बहुत ही दिलचस्प हो गया है. कल्पना कीजिये कि बोर्ड तय करता है कि सीईओ की छुट्टी कर दी जाए. यह फैसला बोर्ड की एक बैठक में होगा लेकिन बैठक बुलाने का अधिकार केवल सीईओ का है. अगर वह बैठक नहीं बुलाता तो उसे कोई नहीं हटा सकता.

इस बीच पता लगा है कि सीईओ के खिलाफ केंद्रीय सतर्कता आयोग ने बहुत सारे आर्थिक हेराफेरी के मामले पकड़े हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो रही है. क्रिकेट के मैच आजकल किसी भी प्रसारण कंपनी के लिए मुनाफे का सौदा होते हैं लेकिन दूरदर्शन ने अपने प्रसारण के बहुत सारे अधिकार बिना किसी फायदे के एक निजी कंपनी को दे दिया. सतर्कता आयोग ने इस पर भी सवाल उठाया है. प्रसार भारती के मुखिया पर आर्थिक हेराफेरी के बहुत सारे आरोपों के मद्देनज़र मामला प्रधानमंत्री कार्यालय के पास भेज दिया गया है. प्रसार भारती के बोर्ड के सदस्यों और अध्यक्ष की नियुक्ति पर भी सरकार नए सिरे से नज़र डाल रही है.

इस बात पर भी सरकार की नज़र है कि क्या उन लोगों को प्रसार भारती के अध्यक्ष पद पर तैनात किया जाना चाहिए, जिनके ऊपर सीईओ के एहसान हों. कुल मिलाकर एक बहुत ही पवित्र उद्देश्य से शुरू किया गया प्रसार भारती संगठन आजकल दिल्ली के सत्ता के गलियारों में सक्रिय लोगों का चरागाह बन गया है और इसमें टैक्स अदा करने वाले लोगों का तीन हज़ार करोड़ रूपया स्वाहा हो रहा है. देखना यह है कि मनमोहन सिंह की सरकार क्या इस विकट परिस्थिति से देश को बचा पायेगी. हालांकि सरकार के लिए भ्रष्ट अधिकारियों को बचा पाने में बहुत मुश्किल पेश आयेगी क्योंकि देश के सबसे आदरणीय अखबार हिन्दू ने भी प्रसार भारती की हेराफेरी के खिलाफ बिगुल बजा दिया है

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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