पश्चिम के ऑक्टोपस और पूरब के तोते के पीछे

यूरोप में अब भी बड़ी जमात ऐसे लोगों की है, जो भारत को सपेरों और जादू-टोनों में यकीन करने वालों का देश कहते हैं, लेकिन जर्मनी के ऑक्टोपस बाबा पॉल की भविष्यवाणियों से जिस तरह पूरा यूरोप सराबोर है और अखबार तथा टीवी लगातार खेल के ज्योतिषीय नतीजों को जिस तरह परोसते जा रहे हैं, वो खुद में अनेक सवाल पैदा कर रहा है. सारा ज्ञान-विज्ञान, प्रगति के बढते ग्राफ, आधुनिकता-तार्किकता – सभी कुछ जैसे भावनात्मक उद्वेग में बहा चला जा रहा है, क्योंकि पॉल बाबा की अब तक की कई भविष्यवाणियां सच हो चुकी हैं और उन्होंने अब फुटबॉल में स्पेन के नंबर एक होने और नीदरलैंड्स के दूसरे स्थान पर आने का संकेत दे दिया है.

नाराज जर्मनों ने दो साल के उस ऑक्टोपस को जान से मारने की धमकी भी दी है, जिसने जर्मनी के हारने की बात कही. शुक्र है कि जब पॉल ने जर्मनी की उरुग्वे पर जीत और उसके तीसरे स्थान पर रहने की भविष्यवाणी की, तो जर्मनवासियों का गुस्सा कुछ शांत हुआ. दिलचस्प तो ये है कि पॉल के एक्वेरियम की सुरक्षा उसको मिली धमकियों के बाद बढा दी गई है और भविष्यवाणी से आह्लादित स्पेन के प्रधानमंत्री ने पॉल बाबा को राज्य अतिथि का दर्जा देते हुए उसकी पूरी सुरक्षा लेने की बात भी कह दी.

भले ही यह बात प्रधानमंत्री ने मजाकिया मूड में कही हो, लेकिन इसे लेकर चर्चा तो जबर्दस्त है ही. उधर, पॉल को चुनौती दी है भारतीय मालिक के सिंगापुरी तोते मनी ने. मनी भारतीय तोतों की तरह पिंजरे से निकलकर भारतीय सड़कों के फुटपाथ पर बिछे कार्ड के जरिए भविष्यवाणी करता होता, तो शायद इतना हंगामा न होता, लेकिन चूंकि वह सिंगापुर में रहता है, लंबी पूंछ के बावजूद दिखता भारतीय तोतों की तरह ही है और उसने पॉल को चुनौती दे दी है कि फुटबॉल में विश्वविजेता तो नीदरलैंड्स होगा, स्पेन नहीं, इसलिए विवाद और बढ़ गया है.

अब लोग स्पेन-नीदरलैंड्स के मैच के बजाय पॉल-मनी द्वंद्व की ओर भी आकर्षित हो रहे हैं – इनकी भविष्यवाणियों के संकेतों पर सट्टे लग रहे हैं. कुल मिलाकर देखें तो सपेरों और जादू-टोनों में यकीन करने वालों की ओर उठती उंगली अब गायब हो चुकी है – सभी, खासकर यूरोपवासी इस विचित्र तमाशे में किसी-न-किसी स्तर पर भागीदार से बने हुए प्रतीत होते हैं. कोई जीत की खुशफहमी में है, तो कोई हार की भविष्यवाणी की आशंका से भारी सदमे में, कोई इस निराशा में कि बाबा हमारी ओर मुखातिब क्यों नहीं हुआ, हमें क्यों नहीं जिताया, कोई इस उत्सुकता में कि ये तमाशा है क्या? क्या ये ऑक्टोपस कल हमें भी शिखर पर बिठा सकता है या फिर इसके जैसा कोई और ऑक्टोपस या लंबी पूंछ वाला कोई विदेशी तोता-मैना भी तो भाग्य बदल सकता है – ऐसी अनगिनत बातें फिलहाल हवा में तैर रही हैं.

दरअसल, यह बाजार, प्रतिस्पर्द्धा और हर हाल में जीत की महत्त्वाकांक्षा के बीच से उभरा मध्यवर्ग का द्वंद्व-अंतर्द्वंद्व है. वो मध्यवर्ग – जो तार्किक है, ज्ञान-विज्ञान को मानने वाला है और आधुनिक तौर-तरीके और सभ्यता में यकीन करने वाला भी, लेकिन इन सबके बीच कई बार आत्मकेंद्रित और शिखर को छूने की अभिलाषा में अनेक बार अंधविश्वासी भी. लगभग सवा दो हजार साल पहले अरस्तू ने इसी मध्यवर्ग को सबसे बेहतर बताते हुए सामाजिक विकास के लिए इसे प्रधानता देने की वकालत की थी, फिर सदियों पहले यूरोप का पुनर्जागरण रहा हो, या धर्म सुधार आंदोलन, औद्योगिक क्रांति रही हो – या फिर पूंजीवादी या लोकतांत्रिक-समाजवादी क्रांतियां, या फिर भारत समेत दुनिया के अनेक देशों के आजादी के आंदोलन – सभी जगह नेतृत्व मध्यवर्ग के ही हाथों में रहा. चाहे वो समाजवादी क्रांति के नायक लेनिन, माओत्से तुंग और हो ची मिह्न हों या फिर लोकतांत्रिक-पूंजीवादी क्रांतियों और स्वातंत्र्य संघर्ष के बीच जॉर्ज वाशिंग्टन, नैपोलियन या नेल्सन मंडेला या फिर गांधी, विनोबा या नेहरू-पटेल-भगत सिंह या सुभाष. ऐसे नायकों ने समाज को समय सापेक्ष हमेशा नई दिशा दी, उसके अंतर्विरोधों के बीच उसका नेतृत्व भी किया. वक्त के साथ मध्यवर्ग का दायरा बढा, इस तबके की संख्या भी बढी, शिक्षा और प्रगति का ग्राफ बढा. लेकिन, इसी के साथ मध्यवर्गीय द्वंद्व भी बढे. ध्यान देने की बात ये है आज ज्यादा तार्किक, बौद्धिक, आधुनिक होने के बाद भी वो भविष्य संवारने की आकांक्षा और संकट निवारण के लिए मूर्ति को दूध पिलाने के लिए हुजूम में भी शामिल होता है. वो मनचाही मुराद की पूर्ति के लिए व्रत भी करता है और किसी मजार या आस्था केंद्र पर फूल भी चढाता है, भले ही वो विज्ञान की किसी आधुनिकतम विधा में नई खोज वाली पीएच.डी. करने वाला हो, परमाणु विज्ञानी हो या फिर लोगों को जीवन बख्शने वाला कोई मशहूर हार्ट सर्जन. तो ये है आज का द्वंद्व-अंतर्द्वंद्व. वो किसी भी कीमत पर हार को जीत में बदलने को बेताब है और इस मामले में वो अधैर्यशाली भी है.

दिलचस्प है कि बेहतर की आकांक्षा में ऐसा करने वालों की हमेशा मुराद पूरी होती हो, ऐसा नहीं है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उसे ऐसा करने से कुछ मिला ही न हो. लोग तो ऐसा भी बताते हैं कि मंदिर, मस्जिद, गिरजे, चर्च, गुरुद्वारे ही नहीं, पेड, नदी, पत्थर, पहाड, गुफा, वायु-सूर्य के साथ ही कोई खास जगह और कुएं-बावडी तक की आराधना से मनोवांछित मुरादें भी पूरी हुई हैं. मैं किसी की आस्था पर चोट नहीं पहुंचाना चाहता, लेकिन सच यही है कि बाजार जनित प्रतिद्वंद्विता और महत्त्वाकांक्षा ने जहां व्यक्ति को संघर्षशील, तार्किक और जुझारू बनाया है, वहीं उसमें कभी-कभी कुछ ऐसे आस्था केंद्र के प्रति समर्पण भी पैदा किया है, जिसका तर्क, विज्ञान और आधुनिकता से प्रायः कोई नाता नहीं दिखता. लेकिन उस व्यक्ति को सुकून और शांति ही वहां नहीं मिलती, निराशा में आशा का संचार केंद्र भी होता है उसका आस्था केंद्र.

लेकिन, सवाल है कि इन सबके बीच उस ऑक्टोपस और तोते का क्या संबंध? शायद भौतिकता की अंधी दौड में सभी कुछ पाने की चाहत अब इतनी प्रभावी हो चुकी है कि भावनाओं का उद्वेग सिर चढकर बोल रहा है, और उसकी पूर्ति के लिए कभी-कभी वो ऐसे माध्यमों का भी सहारा लेता है, जिन्हें बहुत से लोग अंधविश्वास भी कहते हैं. कौन नहीं जानता कि दुनिया के सबसे महंगे फुटबॉलर रोनाल्डो हर मैच से पहले थोड़े बाल कटवाते हैं, ताकि उनके गोल करने का सिलसिला बना रहे. विश्व के नंबर एक टेनिस खिलाडी स्पेन के नडाल मैच के दौरान हर गेम के बाद पानी की बोतल खास अंदाज में जीत की आस को पुख्ता करने के लिए ही उठाते हैं. इसी तरह विश्व की नंबर एक महिला टेनिस खिलाडी अमेरिका की सेरेना ऐसी ही आशा संजोए पूरे टूर्नामेंट के दौरान एक ही जोडी जुराब पहनना पसंद करती हैं और जूतों के फीते एक ही अंदाज में बांधती हैं. दरअसल, यह श्रृंखला काफी लंबी है. मजे की बात है कि खेल ही नहीं, समाज, सियासत, दुनिया में रसूख रखने वाले अनगिनत लोगों के बारे में ऐसे ही किस्से मशहूर हैं.

नैपोलियन की दूसरी शादी के बाद से ही उसके पराभव की शुरुआत की कहानी हो या फिर पश्चिम के पूंजीवादी लेखकों द्वारा लेनिन जैसे क्रांतिकारी के अंतिम समय बोलते वक्त हकलाने को ईश्वरीय दंड मानना या फिर सत्ता शीर्ष पर बैठे लोगों द्वारा और शक्ति की कामना में साधु-संतों-आस्था केंद्रों के चक्कर लगाना – ऐसी अनगिनत बातें नमक-मिर्च के साथ कही-सुनी जाती हैं. लेकिन यूरोप के वैचारिक क्षितिज पर चाहे सार्त्र का अस्तित्ववादी दर्शन हो या ग्रीन, मिल, बेंथम का उपयोगितावाद, 1688 की रक्तहीन क्रांति हो या 1789 की फ्रांसीसी क्रांति या फिर कार्ल मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद- आधुनिकता की ओर बढते समाज का इसे द्वंद्व ही तो कहेंगे, जब ऑक्टोपस बाबा पॉल टीवी और अखबारों की सुर्खियां ही नहीं बनता, पूरे समाज में चर्चा का केंद्र भी बनता है और उसे चुनौती मिलती है पूरब के एक तोते से. कहने वाले कह सकते हैं, इसमें खास क्या है, थोड़े दिनों में सारी चर्चा ठंडी हो जाएगी. लेकिन, इतिहास में जाएं तो यहां हीगेल और मार्क्स का द्वंद्व भी दिखता है.

दुनिया में बदलाव और द्वंद्व का जिक्र करते हुए हीगेल ने जिस द्वंद्वात्मक पद्धति का उल्लेख किया था, उसकी नियामक थी कोई अदृश्य ताकत या प्रकृति या जिसे ईश्वरीय सत्ता भी कह सकते हैं, लेकिन मार्क्स ने हीगेल की द्वंद्वात्मक पद्धति में भौतिकवाद को जोडा और अदृश्य ताकत को हटाकर कहा – ’’मैंने हीगेल के द्वंद्वात्मक सिद्धांत को सिर के बल खड़ा पाया था, उसे अब सीधा पैरों पर खड़ा कर दिया है. तो ये तो रही मार्क्स और हीगेल की बात, आज क्या माना जाए? क्या प्रकृति ने अपना चक्र पूरा कर लिया है और यूरोप फिर से हीगेल के रास्ते पर लौट रहा है? मानने वाले कुछ भी मानें, लोकतंत्र है, सभी को आजादी है, लेकिन मूल बात यही है कि समाज है तो द्वंद्व और अंतर्द्वंद्व तो रहेंगे ही. लेकिन भारत को सपेरों और जादू-टोना करने वालों का देश मानने वाले अपने गिरेबां में भी झांकना सीखें….

लेखक गिरीश मिश्र इन दिनों नागपुर में लोकमत के संपादक हैं. उनका लिखा यह आलेख लोकमत में प्रकाशित हो चुका हैं. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

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