जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक बेवकूफियों का पर्व

शेष जी : जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री में राजनीतिक समझ है ही नहीं : जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री, उमर अब्दुल्ला के ताज़ा बयानों से  लगता है कि वे अपना दिमागी संतुलन खो बैठे हैं और जम्मू-कश्मीर के बारे में अंट-शंट बोल रहे हैं. उन्होंने विधानसभा में कहा कि जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय एक संधि के तहत था और देश की राजनीतिक पार्टियों ने उस संधि को ख़त्म कर दिया है और कश्मीर के लोग इस से बहुत नाराज़ हैं. विधान सभा में उमर अब्दुल्ला गुस्से में थे और बीजेपी वालों के हल्ले-गुल्ले के जवाब में अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे. गैर ज़िम्मेदार बात को आगे बढाते हुए उमर ने कहा कि हम दोनों से उम्मीद की गयी थी कि हम समझौते का सम्मान करेगें. उन्होंने कहा कि जम्मू- कश्मीर का भारत में विलय नहीं हुआ था, वह एक संधि थी.

अयोध्‍या 14 : चली है रस्म जहां कोई न सर उठा के चले

 

शेष नारायण सिंह बाबरी मस्जिद की ज़मीन के मालिकाना हक के फैसले के बाद संघी बिरादरी खुश है. उन्हें उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली है और अब वे बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के आपराधिक मुक़दमे को भी इसी में लपेट कर पेश करने की  कोशिश कर रहे हैं. शायद इसीलिए जब गृहमंत्री ने कहा कि आपराधिक मुक़दमा अपनी जगह है और यह फैसला अपनी जगह तो संघ की राजनीतिक शाखा के लोग गुस्से में आ गए और बयान देने लगे. टेलीविज़न की कृपा से पत्रकार बने कुछ लोग अखबारों में लेख लिखने लगे कि देश की जनता ने शान्ति को बनाए रखने की दिशा में जो काम किया है वह बहुत ही अहम है. आरएसएस के संगठनों के लोग हर उस लेखक के लिए गालियां बक रहे हैं जो फैसले पर किसी तरह का सवाल उठा रहा है. लेकिन सवाल तो उठ रहे हैं और उम्मीद की जानी चाहिये कि अगले कुछ दिनों में अयोध्या की विवादित ज़मीन के फैसले में जो सूराख हैं, वह सारी दुनिया के सामने आ जायेंगे.

अयोध्‍या 9 : आपके गांव में इसे फैसला कहते हैं!

शेष नारायण सिंहबाबरी मस्जिद की ज़मीन का फैसला आ गया है. इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपना आदेश सुना दिया है. फैसले से एक बात साफ़ है कि जिन लोगों ने एक ऐतिहासिक मस्जिद को साज़िश करके ज़मींदोज़ किया था, उनको इनाम दे दिया गया है. जो टाइटिल का मुख्य मुक़दमा था उसके बाहर के भी बहुत सारे मसलों को मुक़दमे के दायरे में लेकर फैसला सुना दिया गया है. ऐसा लगता है कि ज़मीन का विवाद अदालत में ले जाने वाले हाशिम अंसारी संतुष्ट हैं. हाशिम अंसारी ने पिछले 20 वर्षों में अपने इसी मुक़दमे की बुनियाद पर बहुत सारे झगड़े होते देखे हैं. शायद इसीलिये उनको लगता है कि चलो बहुत हुआ अब और झगड़े नहीं होने चाहिए. लेकिन यह फैसला अगर न्याय की कसौटी पर कसा जाए तो कानून के बहुत सारे जानकारों की समझ में नहीं आ रहा है कि हुआ क्या है.

कामनवेल्थ में दिल्ली के शासकों ने अंग्रेजों की तरह लूट मचाई

शेष नारायण सिंह: मिल बांटकर लूटा गया आयोजन के नाम पर पैसा : दिल्ली दरबार में आजकल बड़े-बड़े खेल हो रहे हैं. सबसे बड़ा खेल तो खेल के मैदानों में होना है लेकिन उसके पहले के खेल भी कम दिलचस्प नहीं हैं. जैसा कि आदि काल से होता रहा है किसी भी आयोजन में राजा के दरबारी अपनी नियमित आमदनी से दो पैसे ज्यादा खींचने के चक्कर में रहते हैं. दिल्ली में आजकल दरबारियों की संख्या में भी खासी वृद्धि हुई है. जवाहरलाल नेहरू के टाइम में तो इंदिरा गाँधी की सहेलियां ही लूटमार के खेल की मुख्य ड्राइविंग फ़ोर्स हुआ करती थीं. वैसे लूटमार होती भी कम थी. दिल्ली में जब 1956 में संयुक्त राष्ट्र की यूनिसेफ की कान्‍फ्रेंस हुई तो एक आलीशान होटल की ज़रूरत थी. जवाहरलाल नेहरू जहां अशोका होटल बन रहा था, उस जगह पर खुद ही अपनी मार्निंग वाक में जाकर खड़े हो जाते थे.

कश्मीर में सकारात्मक पहल की ज़रूरत

शेष नारायण सिंहजम्मू-कश्मीर में भारत के राजनीतिक इकबाल की बुलंदी की कोशिश शुरू हो गयी है. कश्मीर में जाकर वहां के लोगों से मिलने की भारतीय संसद सदस्यों की पहल का चौतरफा असर नज़र आने लगा है. सबसे बड़ा असर तो पाकिस्तान में ही दिख रहा है. पाकिस्तानी हुक्मरान को लगने लगा है कि अगर कश्मीरी अवाम के घरों में घुस कर भारत की जनता उनको गले लगाने की कोशिश शुरू कर देगी तो पाकिस्तान की उस बोगी का क्या होगा जिसमें कश्मीरियों को मुख्य धारा से अलग रखने के लिए तरह तरह की कोशिशें की जाती हैं. पाकिस्तान की घबड़ाहट का ही नतीजा है कि उनकी संसद में भी भारत की पहल के खिलाफ प्रस्ताव पास किया गया और अमरीका की यात्रा पर गए उनके विदेश मंत्री अमरीकियों से गिड़गिड़ाते नज़र आये कि अमरीका किसी तरह से कश्मीर मामले में हस्तक्षेप कर दे, जिससे वे अपने मुल्क वापस जा कर शेखी बघार सकें कि अमरीका अब उनके साथ है.

प्रसार भारती में किसकी हुकूमत है?

शेष नारायण सिंह: सीईओ के सामने बोर्ड की भी नहीं चलती :1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो तय किया गया कि टेलीविज़न और रेडियो की खबरों के प्रसारण से सरकारी कंट्रोल ख़त्म कर दिया जाएगा. क्योंकि 77 के चुनाव के पहले और 1975 में इमरजेंसी लगने के बाद दूरदर्शन और रेडियो ने उस वक़्त की इंदिरा-संजय सरकार के लिए ढिंढोरची का काम किया था और ख़बरों के नाम पर झूठ का एक तामझाम खड़ा किया था. जिन सरकारी अफसरों से उम्मीद थी कि वे राष्ट्रहित और संविधान के हित में अपना काम करेगें, वे फेल हो गए थे. उस वक़्त के सूचनामंत्री विद्याचरण शुक्ल संजय गांधी के हुक्म के गुलाम थे. उन्होंने सरकारी अफसरों को झुकने के लिए कहा था और यह संविधान पालन करने की शपथ खाकर आईएएस में शामिल हुए अफसर रेंगने लगे थे. ऐसी हालत दुबारा न हो, यह सबकी चिंता का विषय था और उसी काम के लिए उस वक़्त की सरकार ने दूरदर्शन और रेडियो को सरकारी कंट्रोल से मुक्त करने की बात की थी.

रांची में मधु कोड़ा के वारिस की ताजपोशी!

शेष नारायण सिंह: गडकरी के करीबी तीन व्‍यापारी शामिल हैं इस पूरे खेल में : झारखंड के खादानों पर है कई लोगों की नजर : झारखण्ड में अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है. उनकी ताजपोशी की जो खबरें आ रही हैं, वे दिल दहला देने वाली हैं. समझ में नहीं आता, कभी साफ़ छवि के नेता रहे अर्जुन मुंडा इस तरह के खेल में शामिल कैसे हो रहे हैं. जहां तक नैतिकता वगैरह का सवाल है, आज की ज़्यादातर राजनीतिक पार्टियों से उसकी उम्मीद करने का कोई मतलब नहीं है. यह कह कर कि झारखण्ड चुनावों के दौरान बीजेपी ने झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और शिबू सोरेन के भ्रष्टाचार से जनता को मुक्ति दिलाने का वायदा किया था, वक़्त बर्बाद करने जैसा है. बीजेपी जैसी पार्टी से किसी नैतिकता की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए, लेकिन जिस तरह की लूट की योजना बनाकर नितिन गडकरी ने अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाने की साज़िश रची है, उससे तो भ्रष्ट से भ्रष्ट आदमी भी शर्म से पानी पानी हो जाएगा. पता चला है कि खदानों के धंधे में शामिल कुछ लोगों के पैसे के बल पर विधायकों की खरीद फरोख्त हुई है, और सब कुछ नितिन गडकरी के निजी हस्तक्षेप की वजह से संभव हो सका है.

‘पद के लिए जज ने सुनाया था मेरे खिलाफ यह फैसला’

शेष नारायण सिंह: फासिस्ट नेता ने लगाया सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज पर गंभीर आरोप : फासिज्म अपेक्षाकृत एक नयी राजनीतिक विचारधारा है लेकिन यूरोप में इसका कई बार सत्ता हथियाने और चलाने में इस्तेमाल हो चुका है. मोटे तौर पर नीत्शे के दर्शन पर आधारित फासिस्ट राजनीति के नारे कमज़ोर दिमाग और कमज़ोर मनोबल के लोगों को खासे लुभावने लगते हैं. नीत्शे खुद ही शारीरिक रूप से बहुत कमज़ोर थे लेकिन ताक़त के बल पर राज करने के दर्शन को राजनीतिक विचारधारा बनाने में सफल रहे. उनके सबसे काबिल अनुयायी, हिटलर भी बहुत ही मामूली ताक़त के इंसान थे, और अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए धौंसपट्टी का सहारा लेते थे. जब उन्हें राजनीतिक सत्ता मिली तो अपनी उसी कमजोरी को उन्होंने राज करने का तरीका बनाया और हिटलर बन गए.

आधी आबादी का संघर्ष और शबाना आजमी

[caption id="attachment_2368" align="alignleft" width="85"]शेष नारायण सिंहशेषजी[/caption]: मुंबई में लोगों की झोपड़ियां उजाड़ी जा रही थी तो शबाना आज़मी भूख हड़ताल पर बैठ गयीं : आज़ादी के 63 साल बाद भी देश में आज़ादी परी तरह से नहीं आई है. शायद इसीलिये आज़ादी का जो सपना हमारे महानायकों ने देखा था वह पूरा नहीं हो रहा है.. सबसे मुश्किल बात यह है कि राज-काज के फैसलों से देश की आधी आबादी को बाहर रखा जा रहा है. अपने देश में आज भी महिलायें मुख्य धारा से बाहर हैं. असंवेदनशीलता की हद तो यह है कि जनगणना में गृहिणी को अनुत्पादक काम में शामिल माना गया है और उन्हें भिखारियों की श्रेणी में रखने की कोशिश की गयी. लेकिन हल्ला-गुल्ला होने के बाद शायद यह मसला तो दब गया लेकिन महिलाओं को सत्ता से बाहर रखने में अभी तक मर्दवादी राजनीति के पैरोकार सफल हैं और उन्हें संसद और विधान मंडलों में बराबर का हक नहीं दे रहे हैं.

हैदराबाद के दंगे प्रापर्टी डीलरों ने करवाए थे

[caption id="attachment_2300" align="alignleft"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]आरएसएस की दंगे फैलाने की योजना बन चुकी है और राष्ट्र को चाहिए कि इससे सावधान रहे : हर दंगे की तरह, मार्च में हैदराबाद में हुआ दंगा भी निहित स्वार्थ वालों ने करवाया था. नागरिक अधिकारों के क्षेत्र में सक्रिय कार्यकर्ताओं ने पता लगाया है कि २३ मार्च से २७ मार्च तक चले दंगे में ज़मीन का कारोबार करने वाले माफिया का हाथ था. यह लोग बीजेपी, मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन और टीडीपी के नगर सेवकों को साथ लेकर दंगों का आयोजन कर रहे थे. सिविल लिबर्टीज़ मानिटरिंग कमेटी, कुला निर्मूलन पुरता समिति, पैट्रियाटिक डेमोक्रेटिक मूवमेंट, चैतन्य समाख्या और विप्लव रचैतुला संगम नाम के संगठनों की एक संयुक्त समिति ने पता लगाया है कि दंगों को शुरू करने में मुकामी आबादी का कोई हाथ नहीं था. शुरुआती पत्थरबाजी उन लोगों ने की जो कहीं से बस में बैठ कर आये थे.

सवा करोड़ की रोटी खा जाते हैं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री

[caption id="attachment_2293" align="alignleft" width="85"]शेषजीशेषजी[/caption]मुंबई : महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री मिल कर साल में सवा करोड़ रुपये का खाना खा जाते हैं और इसका भुगतान उनकी अपनी कमाई से नहीं, सरकारी खजाने से होता है. इसके लिए बाकायदा सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से टेंडर निकाल कर इंतज़ाम किया जाता है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के निवास, ‘वर्षा’ और उप मुख्यमंत्री के निवास ‘रामटेक’ नामक बंगलों में साल भर के खाने का खर्च एक करोड़ पचीस लाख के करीब आता है. यह तो एक सरकारी अंदाज़ पर आधारित है. सच्च्चाई यह है कि इस अनुमान में करीब 10 फीसदी की वृद्धि भी हो सकती है. सरकारी खजाने से खाने का यह खर्च कोई चोरी छुपे नहीं होता.

मुंबई हमलों के अपराधी को बचा रही है सीआईए

[caption id="attachment_2202" align="alignleft"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]अमरीकी नागरिक डेविड कोलमैन हेडली ने 26 नवम्बर 2008 के दिन मुंबई के ताजमहल होटल और उसके आस पास  हुए हमलों में अपने शामिल होने की बात स्वीकार करके यह बात साबित कर दिया है कि अमरीका अभी भारत को अपना शत्रु ही मानता है. यह बात ख़ास तौर से सच होती लगती है कि हेडली अमरीकी सरकार में नौकर है और पिछले कई महीने से अमरीकी की खुफिया एजेंसियां उसे बचाने की जी तोड़ कोशिश कर रही हैं. मुंबई में हमला  करने वाले आतंकवादियों की  डिजाइन  ऐसी थी कि भारत की व्यापारिक राजधानी को दहशत की ज़द में लिया जा सके. हमला लगभग उसी शैली का था जैसा अमरीका के वर्ड ट्रेड टावर पर किया गया था.

हार मानने को मजबूर हुए आरएसएस वाले

[caption id="attachment_2202" align="alignleft"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]राजनीतिक एकजुटता और जन जागरण में सांस्कृतिक हस्तक्षेप की भूमिका : 21 साल पहले सफ़दर हाशमी को दिल्ली के पास एक औद्योगिक इलाके में मार डाला गया था. वे मार्क्सवादी कमुनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता थे. उनको मारने वाला एक मुकामी गुंडा था और किसी लोकल चुनाव में कांग्रेसी उम्मीदवार था. अपनी मौत के समय सफ़दर एक नाटक प्रस्तुत कर रहे थे. सफ़दर हाशमी ने अपनी मौत के कुछ साल पहले से राजनीतिक लामबंदी के लिए सांस्कृतिक हस्तक्षेप की तरकीब पर काम करना शुरू किया था. कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाले बहुत सारे बड़े लोगों को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहे थे वे. सफ़दर की मौत के बाद दिल्ली और फिर पूरे देश में ग़म और गुस्से की एक लहर फूट पड़ी थी. जो काम सफ़दर करना चाहते थे और उन्हें कई साल लगते. पर एकाएक उनकी मौत के बाद वह काम स्वतः स्फूर्त तरीके से बहुत जल्दी हो गया.

बुश और ब्लेयर के झूठ का एजेंट था पश्चिमी मीडिया

[caption id="attachment_2202" align="alignleft"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]जब अमरीका ने इराक पर हमला किया था तो उसकी दुम की तरह एक और प्रधानमंत्री उसके पीछे पीछे लगा हुआ था. वह अमरीकी राष्ट्रपति बुश की हर बात पर हाँ में हाँ मिला रहा था. उस वक़्त के ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर इतनी शेखी में थे कि लगता था कि वे दुनिया बदल देंगे,  इराक के सद्दाम हुसैन को हटाकर इंसानियत को तबाही से बचा लेंगें. झूठ के सहारे मीडिया में ऐसी ऐसी ख़बरें छपवा दी थीं कि लगता  था कि अगर सद्दाम हुसैन को ख़त्म न किया गया तो दुनिया पर पता नहीं क्या दुर्दिन आ जाएगा.  उन्होंने अपने लोगों और पूरी दुनिया को बता रखा था कि इराक के पास सामूहिक संहार के हथियार थे और अगर इराक को फ़ौरन तबाह न किया गया तो सद्दाम हुसैन  ४५ मिनट के अन्दर ब्रिटेन पर हमला कर सकते हैं.

पोल खुलने पर बुरे फंसे चौधरी अजित सिंह

चीनी मिल के शीरे में भी किसान को हिस्सा दो : अजित सिंह बुरे फंस गए हैं. दिल्ली में गन्ना किसानों के बहुत ही बड़े जमावड़े के बाद उनकी राजनीति में कुछ चमक आनी शुरू हुई थी लेकिन अब वह धुन्धलाना शुरू हो गयी है. दिल्ली में आकर किसानों ने सरकार से वह पूंजीपति परस्त गन्ना अध्यादेश तो वापस करवा दिया था जिसे पता नहीं कितनी रिश्वत देकर मिल मालिकों ने बनवाया था. लेकिन गन्ने की प्रति कुंतल कीमत के सवाल पर अजित सिंह गड़बड़ा गए. किसानों की मांग तो २८० रूपये प्रति कुंतल की थी लेकिन सब को पता था कि वह होने वाला नहीं है लेकिन यह उम्मीद सबको थी कि कृषि मंत्री शरद पवार के राज्य के बराबर तो यूपी वालों को मिल ही जाएगा या पड़ोसी राज्य उत्तराखंड के बराबर तो मानकर चल रहे थे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.  २०० से भी कम मिल मालिकों के प्रस्ताव को चौधरी साहब ने मान लिया. अजित सिंह ने हुक्म जारी कर दिया कि गन्ना देना शुरू कर दिया जाए.

परंपरागत दुश्मन को बनाया दोस्त

[caption id="attachment_2202" align="alignleft"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]जलवायु परिवर्तन पर होने वाले कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन में भारत को चीन की अगुवाई मंज़ूर : अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में आजकल सबसे अहम् मुद्दा जलवायु परिवर्तन का है. विकसित देशों में सघन औद्योगिक तंत्र की वजह से वहां प्रदूषण करने वाली गैसें बहुत ज्यादा निकलती हैं. उनकी वजह से पूरी दुनिया को जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान को झेलना पड़ता है. अमरीका सहित विकसित देशों की कोशिश है कि भारत और चीन सहित अन्य विकासशील देशों को इस बात पर राजी कर लिया जाए कि वे अपनी औद्योगीकरण की गति धीमी कर दें जिससे वातावरण पर पड़ने वाला उल्टा असर कम हो जाए. लेकिन जिन विकासशील देशों में विकास की गति ऐसे मुकाम पर है जहां औद्योगीकारण की प्रक्रिया का तेज़ होना लाजिमी है, वे विकसित देशों की इस राजनीति से परेशान हैं.  पिछले कई वर्षों से जलवायु परिवर्तन की कूटनीति दुनिया के देशों के आपसी संबंधों का प्रमुख मुद्दा बन चुकी है.

कुछ महीनों में हिन्दुत्ववादी ताक़तें री-ग्रुप होने जा रहीं

सुषमा स्वराज के बयान में बगावत की बू : गांधियन विरासत की निशानी हिंद स्वराज की हिन्दुत्ववादी व्याख्या की तैयारी : देश के ज़्यादातर गांधीवादी संगठनों पर आरएसएस का कब्जा : बीजेपी को एक बंटा हुआ घर कहकर नए संघ प्रमुख  ने इस बात का ऐलान कर दिया है कि बीजेपी में किसी भी गुट की मनमानी नहीं चलेगी. आरएसएस ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि देश में हिंदुत्व की राजनीति पर केवल उसी का कण्ट्रोल है. दिल्ली में बैठे कॉकटेल सर्किल वालों की किसी भी राय का संघ के फैसलों पर कोई असर नहीं पड़ता. पिछले कई महीनों से चल रहे आतंरिक विवाद का जब कोई हल नहीं निकला तो संघ के मुखिया, मोहन भागवत ने बाकायदा एक न्यूज़ चैनल को इंटरव्यू दिया. इस इंटरव्यू में जो कुछ उन्होंने कहा, उसका भावार्थ यह है कि बीजेपी में अब तक सक्रिय अडवाणी और राजनाथ गुटों को किनारे करने का फैसला हो चुका है. दिल्ली में सक्रिय मौजूदा बीजेपी नेताओं की ऐसी ताक़त है कि वे किसी  भी नेता के सांकेतिक भाषा में दिए गए बयान को अपने हिसाब से मीडिया में व्याख्या करवा देते हैं. लगता है कि नागपुर वालों को भी इस ताक़त का अंदाज़ लग गया है. इसीलिये अबकी बार मोहन भागवत ने हिन्दी के सबसे बड़े टीवी न्यूज़ चैनल को अपनी बात कहने के लिए चुना.

नेता-बाबू गठजोड़ की कृपा से मीडिया का एक वर्ग अरबपति

शेष नारायण सिंहघूस को घूस ही रहने दो कोई नाम न दो : मधु कोड़ा की भ्रष्टाचार कथा की चर्चा चारों तरफ हो रही है. झारखण्ड के इस पूर्व मुख्यमंत्री की दौलत के बारे में जो लोग भी सुन रहे हैं, दांतों तले उंगली दबाने का अभिनय कर रहे हैं. दुनिया के कई देशों में उन्होंने पैसा लगा रखा है, हर बड़े शहर में मकान है, कहीं दुकान है तो कहीं फैक्ट्री है, सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात का कोई हिसाब ही नहीं है. बैंकों में लॉकर हैं, विदेशी बैंकों में खाते हैं. बे-ईमानी के रास्ते अर्जित की गयी मधु कोड़ा की इस संपत्ति का स्रोत सौ फीसदी राजनीतिक भ्रष्टाचार है क्योंकि राजनीति के अलावा, उसने और कोई काम ही नहीं किया. अब इस वर्णन में से मधु कोड़ा का नाम हटाकर पढ़ने की कोशिश करते हैं. अपने मुल्क में ऐसे बहुत सारे नेता हैं जिनके पास इसी तरह की संपत्ति है और जिन्होंने उस संपत्ति को चोरी और घूसखोरी के ज़रिये इकट्ठा किया है. लेकिन जब उनका नाम आता है तो मीडिया इतने चटखारे नहीं लेता. 

भारत बनेगा अमरीका का कारिन्दा!

शेष नारायण सिंहअमरीका अब भारत को एशिया में अपना सामरिक सहयोगी बनाने के चक्कर में है. उनकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने कहा है कि भारत के साथ जो परमाणु समझौता हुआ है वह एक सामरिक संधि की दिशा में अहम क़दम है. जब परमाणु समझौते पर वामपंथियों और केंद्र सरकार के बीच लफड़ा चल रहा था तो बार-बार यह कहा गया था कि अमरीका की मंशा है कि भारत को इस इलाके में अपना सैन्य सहयोगी घोषित कर दे लेकिन सरकार में मौजूद पार्टियां और कांग्रेस के सभी नेता कहते फिर रहे थे कि ऐसी कोई बात नहीं है. लेकिन अब बात खुलने लगी है. अगर ऐसा हो गया तो जवाहरलाल नेहरू का एक सपना हमेशा के लिए दफ़न हो जाएगा. नेहरू का वह सपना, जिसमें भारत को किसी का कारिन्दा नहीं बनना था. 

काबिल पुरखों की तलाश में संघ परिवार

[caption id="attachment_2202" align="alignleft"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]आर.एस.एस. वालों ने एक बार फिर योग्य पूर्वजों की तलाश का काम शुरू कर दिया है। करीब 29 साल पहले गांधी को अपनाने की कोशिश के नाकाम रहने के बाद उस प्रोजेक्ट को दफन कर दिया गया था लेकिन चारों तरफ से नाकाम रहने पर एक बार फिर महात्मा गांधी को अपनाने की जुगत चालू हो गई है। इस बार महात्मा गांधी के व्यक्तित्व पर नहीं उनके सिद्धांतों का अनुयायी होने की योजना है। महात्मा जी की किताब ‘हिंद स्वराज’ के सौ साल पूरे होने पर उसमें बताए गए हिंदू धर्म और गाय की रक्षा वाले मुद्दों पर फोकस करके मुसलमानों को अलग थलग करने की योजना पर काम हो रहा है। इसी सिलसिले में दिल्ली में 10 अक्टूबर को संघ के विचारकों और मित्रों ने मिलकर ‘हिंद स्वराज’ पर एक गोष्ठी का आयोजन किया है। उम्मीद है कि वहां गांधी जी की किताब से वे अधूरी बातें निकालकर संघी व्याख्या करने की कोशिश की जायेगी। इस खेल के सफल होने की कोशिश की जायेगी। इस खेल के सफल होने की संभावना कम है क्योंकि ज्यों ही, वहां आधी अधूरी बात की जायेगी, इंटरनेंट और ब्लाग की दुनिया में सक्रिय नौजवान अगले ही दिन पूरी बात को सबूत सहित प्रकाशित कर देंगे। बहरहाल, बीजेपी वालों की कोशिश जारी है लकिन अभी कोई सफलता नहीं मिली है। पार्टी के पास ऐसा कोई हीरो नहीं है जिसने भारत की आजादी में संघर्ष किया हो।