यूपी सरकार के एक वर्ष : दंगों-दागियों-दबंगों की रही दहशत

उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 15 मार्च को अपनी सरकार का एक वर्ष पूरा करने जा रहे हैं, लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज भी वह वहीं खड़े हैं जहां एक साल पहले शपथ लेने के समय खड़े थे। तमाम दावों के बाद भी उनकी सरकार को दंगो-दागियो और दबंगों से छुटकारा नहीं मिल रहा है। न तो मुलायम की नसीहतें काम आ रही है न अखिलेश की तेजी से कोई कारनामा हो रहा है।

अखिलेश राज में जनता की सुरक्षा-संरक्षा पर दंगों, दागियों और दबंगों की दहशत भारी पड़ रही हैं। सरकार के लिये अपना दामन बचाना मुश्किल होता जा रहा है। दंगों और दबंगों पर राजनीति भी खूब हो रही है। विपक्ष हमलावर है तो सरकार बैकफुट पर। समाजवादी सरकार का मुखिया कौन है इसको लेकर भी कयासबाजी पूरे वर्ष चलती रही। आजम खॉ, शिवपाल यादव, रामगोपाल यादव और स्वयं मुलायम सिंह यादव कोई अपने को सीएम से कम नहीं समझता है। सभी के लिये अखिलेश सीएम नहीं ‘बच्चा’ बने हुए हैं।यह सच है कि राज्य सरकार करीब-करीब सभी मोर्चे पर नाकाम हो रही है लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि कुछ बेबुनियाद आरोप भी सरकार पर लग रहे हैं। यह आरोप वह लोग लगा रहे हैं जो सरकार पर दबाव बनाकर अपना स्वार्थ पूरा करना चाहते हैं। परंतु इससे सरकार का ‘पाप’ धुल नहीं जाता है। समाजवादी नेताओं की कारगुजारी से सरकार के मुखिया को भी कम शर्मिंदा नहीं होना पड़ता है। सिर ऊंचा करके अपनी बात कहने वाले युवा नेता और मुख्यमंत्री का सिर उनके बेलगाम मंत्रियों और नेताओं ने नीचा कर दिया है।

सरकार के लिये समस्या यह है कि उसे विपक्ष के हमलों से नहीं, अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की ही गुंडागर्दी तथा कारगुजारियों से ज्यादा शर्मसार होना पड़ रहा है। नेता तो नेता मंत्री तक दंबगईं कर रहे हैं तो उसकी वोट बैंक की घिनौनी राजनीति ने प्रदेश को दंगों की आग में झोंक दिया है। सपा सरकार के साल भर के शासनकाल में हुए करीब ढाई दर्जन दंगे यह बताने और जताने के लिये प्रर्याप्त हैं कि सरकार ठीक से नहीं चल रही है। वोट बैंक बचाने के लिये ही दंगाइयों पर हाथ नहीं डाला जाता है। दबंगों को पनाह दी जाती है। पैसा बांट कर पीड़ित पक्ष का मुंह बंद करने का घिनौना प्रयास किया जाता है। यहां तक की मुआवजे की रकम और जांच पड़ताल का काम भी पीड़ित पक्ष की धर्म जाति देखकर तय होती है।

समाजवादी सरकार के पैरोकार भले ही अनाप-शनाप बयानबाजी करके सरकार की छवि को बचाने का प्रयास कर रहे हों लेकिन पिछले एक साल में कई ऐसे मौके आये जब सरकार की छवि उसके अपने के कारण ही विवादों में फंसती रही। यह साया न केवल सत्तारूढ़ दल के लिये मुसीबत का सबब बना रहा बल्कि विरोधी दलों को इससे सरकार पर हमला करने का ‘हथियार’ भी मिल गया। समाजवादी सरकार के बहुमत के साथ जीत कर सरकार बनाने का जश्न जब सपाइयों की उदंडता से शुरू हुआ था, उसी समय अहसास हो गया था कि समाजवादी इतिहास एक बार फिर अपने आप को दोहराने जा रहा है। दंगों-दंबगों और जंगलराज के चलते ही 2007 में मुलायम सरकार को सत्ता से हाथ छोना पड़ा था, यह बात लोग भूले नहीं है। अखिलेश सरकार भी करीब-करीब मुलायम सरकार की परिपाटी पर ही चल रही है। चाहे सरकार बनते ही उत्साह का उदंडता में तब्दील होने की घटना रही हो या फिर जीत के जश्न में फायरिंग करके कानून को ठेंगा दिखाने वाले विधायकों और मंत्रियों के कारनामे। दुखद यह भी रहा कि अखिलेश सरकार भी न्यायसंगत फैसले लेने की बजाये मौके की नजाकत भांप कर निर्णय सुनाती दिखती है।

बात सपा के दामन को दागदार करने वालों की कि जाये तो कई नाम सामने आते हैं। इसमें से खास-खास पर भी ध्यान दिया जाये तो लिस्ट काफी लम्बी हो जाती है। सरकार के साल भर के शासनकाल में कई बार सपा नेताओं ने सरकार और संगठन की छवि को दागदार किया। कुछ माह पूर्व गोंडा में राजस्व राज्य मंत्री विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह का एनआरएचएम घोटालें में आयुष डाक्टरों की नियुक्ति में मसले पर किया गया तांडव किसी से छिपा नहीं है। दबंग मंत्री जी की बात जब सीएमओ ने नहीं सुनी तो उनको बंधक बना लिया गया। पहले तो सरकार मंत्री के पक्ष में खड़ी दिखी लेकिन जब पानी सिर से ऊपर चला गया है तो सरकार बैकफुट पर आ गई। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सरकार की छवि बचाने के लिये पंडित से इस्तीफा लेना पड़ा तो जिलाधिकारी और एसएसपी को हटाना पड़ा। दहशत का आलम यह था कि डर के मारे तत्कालीन सीएमओ ने गोंडा जाने से ही इनकार कर दिया। सरकार ने उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिलाने की बजाये तबादला कर दिया जिससे पंडित को अपनी प्रतिष्ठा बचाने का मौका मिल गया। बाद में विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह  दोबारा राज्यमंत्री के रूप में सरकार में शामिल हो गये। कुछ इसी तरह का रवैया सरकार ने पशु तस्करी में फंसे सपा नेता केसी पांडेय के मामले में उठाया।

सपा के राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य केसी पांडेय और उनके चेले का गोंडा के पुलिस अधीक्षक नवनीत राणा ने स्टिंग आपरेशन कर डाला। केसी पांडेय की आवाज टेप की गई। वह टेप में आशुतोष पांडे की पैरवी करते सुने गये और आशुतोष एसपी को घूस की पेशकश कर रहे थे। सरकार की फजीहत हुई तो पुलिस ने उन्हें आपराधिक षड़यंत्र के तहत नामजद कर लिया। सरकार ने केसी पांडेय के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई करके जनता के बीच गुड गवर्नेंस का मैसेज देने की बजाये गोंडा के एसपी का तबादला कर दिया और जांच सीबीसीआईडी को सौंप कर पल्ला झाड़ लिया। यह कांड केसी पांडेय के उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान के उपाध्यक्ष के तौर पर राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त करने के दूसरे ही दिन हुआ था। आज भी वह अपने पद पर विराजमान है। सपा नेता और राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के उपाध्यक्ष नटवर गोयल लखनऊ में जमीन पर कब्जे बिजली चोरी के विवाद में फंस गये थे, एक प्रेस छायाकार ने विवादित स्थल और वहां चल रहे निर्माण कार्यो की फोटो लेने की कोशिश की तो उसकी पिटाई कर दी गई। बात में नटवर की लाल बत्ती छिन गई और उन्हें जेल भी जाना पड़ा, लेकिन तब तक सरकार के दामन पर दाग तो लग ही चुका था।

बीज प्रमाणीकरण निगम का अध्यक्ष बनने के बाद साहब सिंह सैनी को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला था। वर्षों से गर्दिश से जूझ रही उनकी पहली पत्नी सामने आ गईं और देहरादून में उनके खिलाफ अदालती कार्रवाई पर उतर आईं। साहब सिंह के खिलाफ उत्तराखंड में मुकदमा भी दर्ज हो गया है। विधूना के विधायक प्रमोद गुप्ता का सत्ता नेतृत्व का खासा करीबी माना जाता है। उनके लखनऊ के एक प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ने वाले बेटे ने मर्यादा की सभी हदें पारकर अपनी महिला टीचर के ही तमाचा जड़ दिया। मामला विधान सभा और विधान परिषद दोनों ही सदनों में गूंजा। घटना सत्ता पक्ष के विधायक के बेटे से जुड़ी थी, इसलिये पुलिस मामला रफादफा करने में लग गईं। बमुश्किल टीचर की रिपोर्ट लिखी गई। पुलिस पर जब दबाव पड़ा तो उसने गुपचुप तरीके से विधायक के बेटे के खिलाफ मुकदमा दर्ज करके उसे अदालत में हाजिर कर दिया जहां से उसे जमानत भी मिल गई। इसी प्रकार इलाहाबाद में सपा विधायक विजमा यादव के बेटे के खिलाफ भी एफआईआर हुई है। जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी के करीबी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वसीम अहमद का भ्रष्टाचार के अरोपों के चलते हटाया जाना भी गत दिनों सरकार की किरकिरी की वजह बना था।

उत्तर प्रदेश सरकार में खाद्य मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया प्रकरण ने तो सरकार को कहीं मुंह दिखाने लायक ही नहीं छोड़ा। प्रतापगढ़ के वलीपुर गॉव में सीओ कुंडा जियाउलहक की हत्या से प्रदेश की सियासत में भूचाल ही आ गया। रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया जिनके ऊपर बसपा राज में कई गंभीर आरोप लगे थे और उनकी जांच भी चल रही है, वह समाजवादी सरकार बनते ही एक दम पाक-साफ हो गये। स्वच्छ सरकार का दावा करने वाले युवा नेता और मुख्यमंत्री बने अखिलेश यादव ने जैसे ही राजा भैया को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करने की घोषणा की, राजनैतिक पंडितों ने सरकार की कथनी और करनी पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिये। अखिलेश सरकार में राजा भैया के शामिल होते ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने खाद्यान्न घोटाले का मुद्दा गरमा दिया था। जिसे आज तक ठंडा नहीं किया जा सका। कुंडा के सीओ हत्याकांड ने तो सरकार को पूरी तरह से बेनकाब करके रख दिया। हवा का रूख भांप कर सरकार द्वारा तुरंत ही राजा भैया को मंत्रिमंडल से हटा दिया गया, मामले की सीबीआई जांच का आदेश हो गया, सरकार की छवि बचाने के लिये राजा के गिरफ्तारी तक देने की बात हवा में उछली, लेकिन इससे सरकार की और फजीहत हो सकती है, यही सोच कर ऐन मौके पर राजा की गिरफ्तारी की योजना टाल दी गई, सरकार के ढुलमुल रवैये के चलती ही सीओ हत्याकंाड की आग ठंडी नहीं हो पा रही है। प्रदेश की जनता सीओ हत्याकांड से गमगीन है तो विपक्ष पूरी तरह से हमलावर। वहीं जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी जैसे धर्मगुरू भी अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये सीओ कुंडा की शहादत को भी अल्पसंख्यकों की से जोड़कर लोगों की भावनाएं भड़काने में लगे हैं। सपा नेताओं की कारगुजारी का प्रभाव न केवल सरकार की अच्छी नीतियों और विकास योजनाओं पर पड़ता नजर आ रहा है, बल्कि एक वर्ष के कार्यकाल में विवादों के ये सायें और गहरे होते जा रहे हैं।

बात प्रदेश में फैल रहे साम्प्रदायिक दंगों की कि जाये तो उत्तर प्रदेश में सपा सरकार को सत्तारूढ़ हुए एक साल मुश्किल से हुआ है लेकिन राज्य में करीब तीस जिलों में साम्प्रदायिक दंगे हो चुके है। यह बात न तो हवा में कही जा रही है न ही विपक्षी आरोप लगा रहे हैं। सरकार भी यह बात स्वीकार करती है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गत दिनों विधानसभा में भाजपा के सतीश महाना, पीस पार्टी के मोहम्मद अयूब तथा एक अन्य सदस्य लोकेन्द्र सिंह के सवाल के लिखित जवाब में दी। उन्होंने कहा कि पिछले साल मार्च से दिसम्बर 2012 तक राज्य में 27 दंगे हुए। यादव ने पिछले 15 मार्च  को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। एक तरफ मुख्यमंत्री सदन में कहते हैं कि मथुरा, बरेली और फैजाबाद में बड़े दंगे हुए। बरेली और फैजाबाद में धार्मिक असहिष्णुता के कारण तथा मथुरा में विविध कारणों से दंगे हुए। पांच दंगे यौन संबंधों के कारण हुए। ऐसे दंगे प्रतापगढ़ और बहराइच में हुए। मुजफ्फरनगर को तीन बार ऐसे मामले में दंगों का दर्द सहना पड़ा। गोवध के कारण मेरठ में दंगा हुआ। संत रविदास नगर में जमीन संबंधी विवाद के कारण दंगा हुआ। इसके अलावा गाजियाबाद, संभल, बिजनौर, इलाहाबाद, लखनऊ कुशीनगर और मुरादाबाद में भी दंगे हुए। गाजियाबाद और कुशीनगर को दो-दो बार दंगे देखने पड़े। धार्मिक असहिष्णुता के कारण दस जगहों पर दंगे हुए हैं। साम्प्रदायिक दंगों और इससे जुड़े विवाद की रोकथाम के लिए सभी आयुक्तों को इस साल नौ जनवरी को आवश्यक निर्देश भेजे गये हैं।

एक तरफ मुख्यमंत्री साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने की बात सदन में करते हैं तो ठीक उसी समय अंबेडकर नगर के टांडा में साम्प्रदायिक हिंसा फैल जाती है। हिंदू वाहिनी (युवा) के जिलाध्यक्ष रामबाबू की हत्या के पश्चात अचानक माहौल इतना खराब होता है कि दंगा टांडा में दंगा फैल जाता है। उपद्रवी पुलिस टीम पर हमला करने से भी नहीं चूकते। कर्फ्यू लगाकर देखते ही गोली मारने तक के आदेश हो जाते हैं। मरने वाला यहां कोई ‘जियाउलहक’ नहीं था इस लिये सरकार के माथे पर कोई शिकन नहीं आई। पुलिस और प्रशासन दंगा शांत करने और दंगाइयों पर नियंत्रण करने की बजाये ‘सरकारी’ हवा में बहता दिखता है। इस घटना का उल्लेख इस लिये किया जा रहा है जिससे की सरकार की हनक और धमक वाली बातों से पर्दा हट सके। बहरहाल, समाजवादी सरकार की खराब होती छवि से मुलायम सिंह यादव के प्रधानमंत्री बनने के सितारे गर्दिश में आ सकते है। हालात ऐसे बन गये हैं कि जनता कहने लगी है कि एक बार धोखा खा चुके हैं और खा सकते नहीं।

कौन क्या बोला?

– राजा भैया पर पुलिस अफसर की हत्या के मामले में बसपा प्रमुख मायावती ने दिल्ली में संसद परिसर में संवाददाताओं से कहा यूपी में जंगलराज और गुंडाराज है। मैंने उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की भी मांग की हैं जब पुलिस अधिकारी सुरक्षित नहीं है तो आम आदमी कैसे सुरक्षित महसूस करेगा।

– सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने ‘सूप बोले-बोले, चलनी भी बोले….।’ मुहावरा सुनाते हुए बसपा के शासनकाल में पार्टी के सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों पर सवाल खड़ा किया।    

– प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की मायावती की मांग पर सपा महासचिव रामगोपाल यादव ने कहा वह जो कहना चाहे कहने के लिए स्वतंत्र हैं। सब जानते हैं कि यूपी में उनके शासन में क्या हुआ। रामगोपाल ने कहा कि मुख्यमंत्री अखिलेश बेहतर शासन व्यवस्था में आड़े आने वाले सभी तत्वों को हटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

– बसपा के राष्ट्रीय महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी का कहना था कि प्रतापगढ़ में सीओ की हत्या एक साजिश के तहत हुई हैं।

– उप्र कांग्रेस के अध्यक्ष निर्मल खत्री ने कहा अगर कुण्डा के पुलिस उपाधीक्षक जिया उलहक की हत्याम में शामिल सभी लेागों को 15 दिनों के अंदर गिरफ्तार नहीं किया जाता तो कांग्रेस  घटनास्थल से लखनऊ तक न्याय यात्रा निकालेगी ओर धरना देगी। यूपी में कानून व्यवस्था पूरी तरह से छिन्न भिन्न हो गई है।

– भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मी कांत वाजपेयी का कहना था कि जनता को अपनी गलती का अहसास हो गया है, अखिलेश सरकार समाजवादी पार्टी की आखिरी सरकार साबित होगी।जनता सपा के युवा नेता अखिलेश यादव की बातों में फंस गई थी,जो छलावा था।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

फर्जी मुठभेड़ के आरोपी आईपीएस को जांच की जगह ‘सौगात’

उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिला बरेली के मुकुल गुप्ता फर्जी मुठभेड़ मामले में सीबीआई आईपीएस जे रविंद्र गौड़ समेत 11 पुलिसकर्मियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने जा रही है। लखनऊ के मौजूदा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक गौड़ मुठभेड़ के वक्त बरेली में एएसपी के पद पर  तैनात थे। सीबीआई ने आईपीएस के खिलाफ राज्य सरकार से अभियोजन की स्वीकृति मांगी थी। दो माह से जवाब नहीं मिलने पर सीबीआई तय अवधि के बाद अदालत में चार्जशीट दाखिल करने की तैयारी में है। हालांकि मामले को तूल पकड़ता देख सरकार ने अभियोजन स्वीकृति पर विचार करना शुरू कर दिया हैं और जल्द की उसकी तरफ से हरी झंडी मिल जायेगी।

गौरतलब हो बरेली के फर्जी मुठभेड़ कांड की जांच कर रही सीबीआई ने बीते वर्ष के अंत में 24 दिसंबर को उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार को पत्र भेजकर जे रविंद्र गौड़ के खिलाफ अभियोजन की अनुमति मांगी की थी। सीबीआई ने अनुमति पत्र मुख्य सचिव जावेद उस्मानी को भेजा थ। मुख्य सचिव ने फाइल गृह विभाग को भेज भी, लेकिन वहां से फाइल आगे नहीं बढ़ पाई। पिछले दिनों जब गौड़ को लखनऊ का एसएसपी बनाया गया तब भी गृह विभाग से पूछा गया था कि क्या गौड़ के खिलाफ सीबीआई ने अभियोजन स्वीकृति मांगी हुई है? लेकिन गृह विभाग ने यह कहते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है। इसके बाद गौड़ लखनऊ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बना दिये गये। मामला तूल पकड़ने लगा तो गृह विभाग के हाथ-पांव फूल गये। मौके की नजाकत भांप कर तब बाद प्रमुख सचिव गृह ने यह स्वीकार कर लिया कि फर्जी मुठभेड़  मामले में एसएसपी समेत 11 के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर सीबीआई जांच कर रही है। सीबीआई ने गौड़ के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति मांगी थी और गृह विभाग अभी इस पर विचार कर रहा हैं।

कहा जाता है कि करीब साढ़े पाच वर्ष पूर्व  30 जून 2007 को बरेली-दिल्ली रोड पर कथित मुठभेड़ में बदायूं निवासी मुकुल गुप्ता की बरेली पुलिस की गोली से मौत हो गई थी, जबकि पंकज मिश्रा नाम के युवक को मौके से पकड़ा गया था। पुलिस का दावा था कि दोनों सीबीगंज में बैंक लूटने की नीयत से जा रहे थे। मुकुल के परिजनों ने पुलिस पर मुकुल की हत्या करने का आरोप लगाया था। काफी हो हल्ला मचा तो दबाव में ‘दूध का दूध और पानी का पानी करने’ के नाम पर उक्त मामले की जांच बदायूं पुलिस को सौंपे दी गई। मुकुल के परिजन विभागीय जांच पर अविश्वास जताते हुए अदालत चले गये। असंतुष्ट परिजनों ने उच्च न्यायालय में गुहार लगाई। जहां पीड़ित पक्ष को सुनने के बाद अदालत के आदेश पर सीबीआई ने जून 2010 में जांच शुरू कर दी। उसी वर्ष सीबीआई की विशेष जांच शाखा ने गौड़ के खिलाफ फर्जी मुठभेड़ मामले में केस दर्ज कर लिया। उनके साथ सीबीगंज थाने में तैनात तत्कालीन थानाध्यक्ष विकास सक्सेना, फतेहगंज वेस्ट थाने के प्रभारी डीके शर्मा, उप निरीक्षक भोला सिंह, देवेंद्र कुमार, आरके गुप्ता, अनिल कुमार, कालीचरण समेत कुल 11 पुलिस कर्मियों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज करके उन्हें सहभागी बनाया गया।

करीब दो वर्षों के बाद मई 2012 में गिरफ्तार सिपाही जगबीर ने पुलिस का अपराध स्वीकार करते हुए बयान दिया कि मुकुल को उसकी ही सरकारी रायफल से गोली मारी गई थी। सीबीआई ने गौड़ का भी बयान दर्ज किया था, जिसमें उन्होंने खुद को निर्दोष बताया था। प्रमुख सचिव गृह आरएम श्रीवास्तव का कहना है कि सीबीआई द्वारा जे रविंद्र गौड़ के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति मांगे जाने का पत्र उन्हें मिला है। सीबीआई के आग्रह और आगे के फैसले पर विचार चल रहा है। जल्द ही इस बारे में फैसला ले लिया जायेगा। वैसे जनता जर्नादन हैरान जरूर है कि जो आईपीएस शक के दायरे में है, उसके खिलाफ सरकार जांच दबाये बैठी है और उसे लखनऊ का एसएसपी बना कर सौगात दे दी गई।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

दलित-पिछड़ों का आरक्षण बना सपा-बसपा के लिए सत्‍ता की सीढ़ी

उत्तर प्रदेश में दलितों और पिछड़ों को लुभाने के लिए समाजवादी पार्टी और बसपा के बीच गला काट प्रतियोगिता चल रही है। बसपा सुप्रीमो मायावती जहां दलित वोट बैंक को अपनी जागीर समझती हैं, वहीं सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव अपने को पिछड़े वर्ग का रहनुमा मानते हैं। इसके उलट सर्वजन हिताय की बात करने वाली माया को जहां पिछड़ों से परहजे है तो वहीं समाजवादी सोच रखने वाले मुलायम को दलितों की राजनीति रास नहीं आती है।

बसपा और सपा के बीच दलितों और पिछड़ों को लुभाने का खेल लंबे समय से चल रहा है। यह वोटर दोनों ही दलों के नेताओं के लिए ‘सत्ता की सीढ़ी’ की तरह काम करते हैं। मुलायम सिंह यादव पिछड़ा वोट बैंक के सहारे तो मायावती दलित वोटरों के सहारे कई बार सत्ता की सीढ़ियां चढ़ चुकी हैं। यही वजह है जब बसपा का शासन होता है तो दलितों का पलड़ा भारी हो जाता हैं, वहीं समाजवादी सरकार में पिछड़ा वर्ग के मतदाता ‘शेर’ बन जाते हैं। दोनों ही दलों के नेताओं द्वारा सत्ता हासिल करते ही एक-दूसरे के वोट बैंक को नेस्तानाबूत करने की कोशिश शुरू हो जाती है। इसके लिए इन दलों के नेता नित्य नये-नये पैतरे अजमाते रहते हैं। इन्हीं वोटरों के सहारे सपा-बसपा 2014 में भी अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं।

मुलायम समाजवादी पार्टी को बसपा और अन्य दलों से भिन्न बताते हुए कहते हैं कि हमारी पार्टी लोकतांत्रिक पार्टी है। हमारा विश्वास लोकतांत्रिक समाजवाद में है। यहां “दबी मुठ्ठी, खुली जबान“ की नीति है। यानी अनुशासन के साथ बोलने की आजादी है। पिछले पांच सालों में न तो कोई बसपा नेताओं से मिल सकता था, नहीं उसे पार्टी में भी अपनी बात रखने की आजादी थी। समाजवादी पार्टी में सबको आजादी है। बसपा और सपा के बीच लगातार तलवारें खिंचती जा रही हैं। बीते दिनों प्रोन्नति में आरक्षण के मसले को लेकर जिस तरह से दोनों दलों में टकराव खुलकर समाने आया था वह यह जानने-समझने के लिए काफी था कि प्रदेश में जातिवाद की राजनीति की जड़ें कितनी गहरी हैं।

2014 पर नजर लगाये सपा प्रमुख आजकल पिछड़ों को लुभाने के लिए हर हथकंडा अपना रहे हैं। प्रदेश में शासन और प्रशासन स्तर के महत्वपूर्ण पदों पर योग्य अधिकारी को बैठाने की बजाये अधिकारियों की जाति देख कर पोस्टिंग की जा रही है। इसी के चलते कुछ वर्ग विशेष के अधिकारियों का शासन-प्रशासन में दबदबा हो गया है। सपा नेता लगातार पिछड़ों की दुर्दशा के लिए बसपा को कोस रहे हैं तो दूसरी तरफ सामाजिक न्याय के नाम पर दलितों का हिस्सा मार कर उन्हें (पिछड़ों को) देने की भी साजिश रची जा रही है। जबकि सत्ता से दूर हो चुकी मायावती नहीं चाहती दलितों की श्रेणी में और जातियां शामिल हों, इसी लिये वह दबाब की राजनीति छेड़े हुए हैं।

सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव पिछड़ों का पक्ष लेते हुए कहते घूम रहे हैं कि उनकी पार्टी सामाजिक न्याय के लिए पिछड़ों और वंचितों के लिए विशेष अवसर के सिद्धांत की पोषक है। उनको उनके अधिकार दिलाने के लिए समाजवादी पार्टी बराबर संघर्शशील रही है। समाजवादी पार्टी के चुनाव घोषणापत्र में पिछड़ों और वंचित समाज से किये गये सभी वायदे पूरे किये जाएंगे। मुलायम पिछड़ों की हालत से दुखी हैं, पिछड़ों की दुर्दशा के पीछे उन्हें बसपा सुप्रीमो की साजिश नजर आती है। वह कहते हैं कि बसपा राज में निहित स्वार्थ में पिछड़ों का सबसे अधिक नुकसान हुआ। बसपा से पहले उनकी (मुलायम) सरकार ने इन वर्गों के लिये कई योजनाओं और सुविधाओं की शुरुआत की थी, लेकिन बसपा सरकार बनते ही उसकी सुप्रीमो मायावती ने इन योजनाओं और सुविधाओं को समाप्त कर दिया।

गौरतलब हो वर्ष 2005 में मुलायम के मुख्यमंत्रित्वकाल में 17 पिछड़ी जातियों राजभर, निषाद, मल्लाह, कहार, कश्यप, कुम्हार, धीमर, बिंद, प्रजापति, धीवर, बियार, केवट, बाथम, मछुआ, तुरहा, मॉझी, गौड़ को अनुसूचित जाति को मिलने वाली सभी सुविधाएं देने की अधिसूचना जारी हुई थी। सन् 2007 में बसपा सरकार ने इन जातियों को प्राप्त सुविधाओं से वंचित कर दिया था। तब से ये जातियां लगातार आंदोलन कर रहीं हैं। श्री यादव ने भरोसा दिलाया कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व में बनी समाजवादी पार्टी की प्रदेश सरकार पुनः 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति की सुविधाएं देने का अपना वायदा निभाएगी।

दरअसल, इस समय उत्तर प्रदेश में सामाजिक रूप से पिछड़ी बिरादरियों की श्रेणी में 126 जातियां सम्मलित हैं। इन सभी जातियों को भारतीय संविधान के अनुसार आरक्षण की श्रेणी में रखा गया है। इसमें से 79 जातियां पिछड़ा वर्ग की हैं, जबकि दलित वर्ग में आने वाली जातियों की संख्या भी 47 हैं। संविधान के अनुसार सरकारी नौकरियों और योजनाओं आदि में पिछड़ों को 27 प्रतिशत और दलितों को 22 प्रतिशत तथा सर्वाधिक अनुसूचित, जनजाति को एक प्रतिशत आरक्षण का फायदा मिलता है, ताकि उनका सामाजिक स्तर उठाया जा सके। यहीं से जातिवाद की राजनीति की शुरुआत होती है, मुलायम पिछड़ा वर्ग से आते हैं तो मायावती दलित हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है। इसी का फायदा दोनों दलों के नेता अपने वर्ग के वोटरों के सहारे उठाते रहते हैं। सपा चाहती है कि पिछड़ा वर्ग की सूची से कुछ बिरादरियों को निकाल कर अनुसूचित जातियों में शामिल कर दिया जाये जिससे दलितों में भी समाजवादी पार्टी की भागेदारी ठीकठाक दिखे।

मुलायम की सोच है कि यदि वे पिछड़ों की सूची से 17 जातियों को निकलवा कर दलितों की सूची में जुड़वा दें तो उन्हें यह दावा करना आसान रहेगा कि अब दलितों का एक वर्ग उनकी समाजवादी पार्टी के साथ है। वास्तव में मुलायम सिंह पिछड़े वर्ग की सभी 79 जातियों के एकछत्र नेता कभी नहीं रहे हैं। पिछड़ों में यादव (अहिर) सहित कुछ गिनी चुनी जातियां ही हैं जिन्हें मुलायम समर्थक माना जाता है। पिछड़ों में शामिल कुर्मी तथा वैश्य समाज की अनेक उपजातियां जैसे तेली, हलवाई, कलवार, कलार, कलाल, जायसवाल, गुलहरे, शिवहरे, बाथम, रौनियार या तो कांग्रेस के साथ रहती है या भाजपा के साथ। इसी 16 फरवरी को 17 अति पिछड़ी जातियों (निषाद, राजभर, भर, कश्यप, प्रजापति, कहार, धीमर, धीवर, कुम्हार आदि) के एक सम्मेलन में अखिलेश यादव ने यह घोषणा कर दी कि इन जातियों को एससी (दलित) में शामिल करने का प्रस्ताव केन्द्र को भेज दिया गया है। अब प्रति वर्ष 5 अप्रैल को निषादराज जयन्ती पर सार्वजनिक अवकाश रहेगा। समाजवादी पार्टी का यह दांव पिछड़ों के लिये इसलिये भी फायदेमंद है कि उनकी 79 जातियों की सूची से 17 बाहर हो जाने के कारण अब 62 जातियों में ही 27 प्रतिशत आरक्षण का बंटवारा होगा। जाहिर है सपा का यह एक तीर से दो निशाने साधने वाला दांव है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेई ने 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की सपाई घोषणा को राजनीतिक नाटक बताया है। उनका तर्क है कि किसी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने का अधिकार राज्य सरकार को नहीं है। या अधिकार संसद को है। पहले भी सपा ऐसा नाटक कर चुकी है।

मुलायम भले ही पिछड़ों की दुर्दशा का ठीकरा बसपा सुप्रीमो पर फोड़ रहे हों लेकिन इसके पीछे उनका मकसद शुद्ध रूप राजनैतिक है, वह जानते हैं कि दलित वोटर तो उनके पाले में निर्णायक रूप से आने से रहे। ऐसे में दलितों और पिछड़ों को बांट कर फायदा उठाना बेहतर राजनीति होगी। उनका पूरा ध्यान पिछड़ा वर्ग और मुसलमानों को अपने साथ खड़ा करने पर लगा है। इसी लिये वह मौके-बेमौके पिछड़ों और मुसलमानों की तारीफ में कसीदे भी पढ़ते हुए कहते रहते हैं कि विधान सभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की अकेली बहुमत की सरकार बनना कोई मामूली बात नहीं है। इससे पूरे देश में पार्टी का सम्मान बढ़ा है और सभी लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं कि लोकसभा में भी ऐसी ही शानदार सफलता समाजवादी पार्टी को मिलेगी। इतना ही नहीं मुलायम यह भी जानते हैं कि विधान सभा चुनाव के समय उनके साथ जो बिरादरियां एकजुट थीं उन्हें वोट बैंक में बदलने का काम उनके कार्यकर्ताओं ने ही किया था। लोकसभा चुनाव में भी वह इसे दोहराना चाहते हैं। इसी लिए वह बार-बार कार्यकर्ताओं को आगाह करते रहते हैं कि सरकार आपकी है इसलिए आपके आचरण में विनम्रता और बोली में मधुरता होनी चाहिए। वोट आपके व्यवहार पर मिलता है। समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं को अन्याय का विरोध करना चाहिए पर यदि किसी कारण प्रतिरोध न कर सकें तो भी अन्यायी के साथ नहीं खड़ा होना चाहिए।

वह लोकतंत्र एक बड़ी ताकत बताते हुए कहते हैं कि समाजवादी हमेशा जातिवाद और सांप्रदायिकता के विरोधी रहे हैं। समाजवादी पार्टी त्याग-तपस्या करने वालों की पार्टी है। इसमें गरीबों की तादाद बहुत ज्यादा है। वह माया का नाम लिये बिना उन पर निशाना भी साधते हैं और कहते हैं कि कुछ लोग गरीबों की बात तो करते है परन्तु उनके नेताओं का चरित्र गरीब विरोधी है। ऐसे नेता भ्रष्ट और विकास विरोधी हैं। एक पार्टी में गरीब हैं किन्तु उसकी नेता अरबपति है जो 50-50 लाख के नोटों की माला पहनती हैं। जिनके खाने का इंतजाम नहीं, झोपड़ी में जिन्दगी काट रहे हैं, दोनों वक्त घर में चूल्हा नहीं जलता उनके नाम पर लाखों की चन्दे की रसीदें काटी गई। वस्तुतः यह धन उद्योगपतियों से और डरा धमकाकर व्यापारियों, अधिकारियों, पार्टी के नेताओं से वसूला गया काला धन है। इस सबकी सही तरीके से जांच हो तो उन्हें जेल जाने से कोई बचा नहीं पाएगा। श्री यादव ने इमरजेंसी की याद करते हुए कहते हैं कि आपातकाल लोकतंत्र के खिलाफ षडयंत्र था। उस समय सारी नागरिक स्वतंत्रताएं खत्म हो गई थी। पूरे देश में एक लाख लोग जेल में डाल दिए गए थे, जिनमें 32 हजार लोग उत्तर प्रदेश के थे। लोकतंत्र को बचाने के संघर्ष में समाजवादियों से बढ़-चढ़कर अपनी हिस्सेदारी निभाई थी। लोकतंत्र की यह लड़ाई हमेशा हमें प्रेरणा देती रही है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.