पत्रकार इरफान शेख की किताब ‘राहुल- एक करिश्मा’ का शिंदे ने किया विमोचन

दिल्ली : केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार ने ''राहुल-एक करिश्मा'' नामक पुस्तक का विमोचन करते हुए राहुल गांधी की तारीफ की। वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद इरफान शेख की पुस्तक के विमोचन के मौके पर गृहमंत्री शिंदे ने कहा कि राहुल गांधी से बड़ी उम्मीदें हैं, वे एक नयी सोच को दिशा देंगे और युवाओं को राजनीति की मुख्यधारा से जोड़ेंगे।

इस पुस्तक में लेखक मो इरफान शेख ने दावा किया है कि दामिनी निर्भय मामले ने राहुल गांधी को बहुत विचलित किया और कांग्रेस संगठन की जिम्मेदारी लेने के पीछे इस घटना का बहुत बड़ा हाथ है। इरफान के मुताबिक जब देश के युवा आंदोलन कर रहे थे तो राहुल लगातार घटनाक्रम पर नज़र रखे हुए थे और यही वजह है कि उन्होंने अपनी मां सोनिया गांधी से रात को जा कर बात की और राजनीति में बड़ी जिम्मेदारी उठाने का फैसला लिया। राहुल गांधी पर लिखी गई इस पुस्तक के हिंदी के अलावा उर्दू संस्करण का भी शिंदे ने विमोचन किया।
 

सहरसा में कोसी क्षेत्र के साहित्यकारों का समागम : प्रसंग- ‘क्रांति गाथा’ का लोकार्पण

: साहित्य का धर्म बड़ा व्यापक है : दामिनी का कलंक इस संसार पर लगता रहेगा, हमारा काम इसे रोकना है : फुकियामा ने कहा था विचार का अंत नहीं हुआ है : जिसमें सृजन की चेतना है वही साहित्यकार है : 23 जनवरी को सहरसा विधि महाविधालय में डा. जी. पी. शर्मा रचित काव्य ग्रंथ ’क्रांति गाथा’ का लोकार्पण करते हुए  डा. रमेन्द्र कु. यादव ’रवि’ (पूर्व सांसद व संस्थापक कुलपति भू.ना.मं. विश्ववि. मधेपुरा )  ने कहा कि विगत चालीस वर्षों में ‘क्रांति गाथा’ जैसी पुस्तक पढ़ने का पहली बार मौका मिला, 1857 से 1947 तक के भारतीय मुक्तिा संघर्ष के इतिहास को काव्यात्मक शैली में पिरोकर कवि डा. जी. पी. शर्मा ने भारतीय जनमानस का बड़ा उपकार किया है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा धर्म साहित्य का सृजन है, जिसमें सृजन की चेतना है वही साहित्यकार है। हम युग को बदलते हैं युगधर्म बदलते हैं। हम क्र्रांति को पालते हैं क्रांति का प्रचार प्रसार करते हैं।

इतिहासकार एवं वरिष्ठ कवि हरिशंकर श्रीवास्तव ’शलभ’ ने कहा कि भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास के प्रमाणिक वृतांतों को बड़ी निष्ठा और परिश्रम से सुंदर, सरल, सुबोध एवं सार्थक काव्यमयी वाणी देकर कवि ने गाथा काव्य परंपरा को आगे बढ़ाने का सारस्वत प्रयास किया है। प्रो. आचार्य धीरज ने कहा कि बदलाव हुआ है क्रांति नहीं! विचार का भावात्मक रूप ही साहित्य है.. वस्तुतः विचार का अंत नहीं हुआ है जैसा कि सोवियत संघ के विघटन पर फ्रेंसिस फुकियामा ने कहा था।

साहित्यिक पत्रिका ‘क्षणदा’ के संपादक सुबोध कुमार सुधाकर ने कहा कि देश और काल के अनुरूप परिभाषाएँ तथा मान्यताएँ बदलती रहती है। वत्र्तमान साहित्य में जब गद्यमय साहित्य सरस कविता हो सकती है, हाइकु विधा साहित्य की कोटि में आ सकती है तो डा0 शर्मा का यह काव्य ग्रन्थ ‘क्रांति गाथा’ शास्त्रीय मतान्यताओं से  किंचित हट कर भी महाकाव्यत्व को क्यो नहीं प्राप्त कर सकता ! निःसंकोच ‘क्रांति गाथा’ की गणना महाकाव्यों की कोटि में की जा सकती है।

स्नात्कोत्तर केन्द्र के प्रो. सी पी सिंह ने इतिहास और साहित्य के संबन्धों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इतिहास साहित्य से भी लिया जाता है..। कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्यकार डा. रमेश चंद्र वर्मा एवं संचालन प्रो. अरविन्द ‘नीरज’ ने किया। समारोह के अन्य वक्ता कथाकार ध्रुव तांती, डा. भूपेन्द्र ना. यादव ‘मधेपुरी,’ सहरसा के वर्तमान विधायक आलोक रंजन, प्रो. विनय चैधरी, प्रो. रतनदीप, अरविन्द श्रीवास्तव, मुख्तार आलम एवं मुर्तजा नरियारवी आदि थे। सहरसा में अर्सा वाद ऐसे आयोजन की बुद्धिजीवियों ने सराहना की।

रवींद्र रंजन की पुस्तक ‘द ग्रेट मीडिया स‌र्कस’ के कुछ रोचक अंश

"तमाशा स‌र्कस के पुराने चीफ की वापसी होने वाली है। वापसी का ऎलान हो चुका है। स‌र्कस के स‌भी छोटे-बड़े कलाकारों को इत्तिला कर दिया गया है। इस खबर स‌े स‌र्कस में मिला-जुला माहौल है। स‌र्कस के पुराने कलाकार खुश हैं। उन्हें इस चीफ की आदत पड़ चुकी है। जब तक चीफ की डांट नहीं खाते पेट ही नहीं भरता। चीफ की डांट खाने के बाद ही वह अच्छा खेल दिखा पाते हैं। लिहाजा उनका खुश होना लाजिमी है। चीफ की इस 'वाइल्ड कार्ड एंट्री' स‌े कुछ कलाकार परेशान भी हैं। ये वो कलाकार हैं, जिनके हाथ-पैर चीफ का नाम स‌ुनते ही कांपने लगते हैं। वह ये स‌ोचकर परेशान हैं कि अब पुराना वाला चीफ हर वक्त रिंग में होगा। जब-तब हंटर फटकारेगा। स‌र्कस में खौफ का माहौल बनाएगा। "

"चीफ ने आते ही हाथ-पांव मारने शुरू कर दिए हैं। इतने दिनों तक खाली बैठे-बैठ जंग लग गया था। इस बार पहले स‌े ज्यादा चुनौतियां हैं। पुराना हिसाब-किताब अब काम नहीं आएगा। दोबारा खुद को स‌ाबित करना होगा। आज स‌र्कस जहां पर है, उससे आगे ले जाना होगा। दिखाना होगा कि नकल के अलावा भी उसे कुछ आता है। वह स‌िर्फ दूसरे स‌र्कसों के शो कॉपी नहीं करता। उसके पास भी आइडिये भी होते हैं।"

"पहले कलाकार ढूंढे नहीं मिलते थे। अब एक ढूंढो हजार मिलते हैं। कम पैसे में भी काम करने को तैयार रहते हैं। इससे स‌र्कस के मालिकान खुश हैं। उन्होंने अपनी कार्यशैली बदल दी है। अब मेहनताना नहीं बढ़ेगा। कलाकार भी कम रखे जाएंगे। काम भी ज्यादा लिया जाएगा। जो ज्यादा पैसा मांगेगा उसे नौकरी ही नहीं मिलेगी। कम पैसे वालों स‌े काम चलाया जाएगा। कुछ नहीं आता होगा तो स‌ीख जाएगा। आर्ट अब 'स‌ीखने' की चीज हो गई है। वह जमाना गया जब खून में आर्ट होती थी। रगों में कला बहती थी। कलाकार जन्मजात होते थे। अब ना तो ऎसे फनकार रहे और ना ही फन के कद्रदान।"

ये कुछ अंश हैं प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली स‌े प्रकाशित पुस्तक 'द ग्रेट मीडिया स‌र्कस' के। लेखक 'रवींद्र रंजन' हैं. मीडिया की हकीकत स‌े एक अलग ही अंदाज में रूबरू कराने वाली ये पुस्तक इसी महीने के आखिर तक आपके हाथों में होगी। रवींद्र रंजन से उनके ईमेल ravindraranjan@hotmail.com और उनके फोन नंबर 9873908854 पर स‌ंपर्क किया जा स‌कता है।