मई में दिल्‍ली से लांच होगा जी समूह का अंग्रेजी अखबार डीएनए

मुंबई बेस्‍ड ज़ी न्यूज समूह का अंग्रेजी अखबार डीएनए अब अपना विस्‍तार करने जा रहा है. अखबार अब अपने चौथे एडिशन के साथ दिल्‍ली में कदम रखने की तैयारी कर रहा है. संभावना है कि इस साल मई तक इस अखबार की लांचिंग दिल्‍ली में कर दी जाएगी. अब तक इस समूह में दैनिक भास्‍कर एवं जी न्‍यूज की आधी-आधी हिस्‍सेदारी थी, परन्‍तु अब जी समूह ने इस अखबार को भास्‍कर से पूरी तरह खरीद लिया है.

बताया जा रहा है कि अभी दिल्‍ली में डीएनए के ब्‍यूराचीफ की भूमिका निभा रहे सैकत दत्‍ता के नेतृत्‍व में इस अखबार की लांचिंग की जाएगी. सैकत ही इस अखबार के स्‍थानीय संपादक की भूमिका निभाएंगे. अभी इस अखबार का प्रकाशन मुंबई, पुणे तथा बंगलुरू से किया जा रहा है. दिल्‍ली इसका चौथा एडिशन होगा. सूत्रों का कहना है कि दिल्‍ली के बाद यह अखबार चेन्‍नई तथा कोलकाता में भी अपना कदम रखने की तैयारी करेगा.

इस अंग्रेजी अखबार के विस्‍तार की जिम्‍मेदारी भास्‍कर दास देखेंगे. भास्‍कर दास कुछ समय पहले ही टाइम्‍स समूह के अखबारों का प्रकाशन करने वाले बेनेट कोलमेन एंड कपनी से इस्‍तीफा देकर डीएनए पहुंचे हैं. उन्‍हें ग्रुप सीईओ बनाया गया है. फिलहाल उनका फोकस दिल्‍ली पर है. दिल्‍ली में जमे जमाए अखबारों के बीच डीएनए अपना स्‍थान कैसे बनाएगा यह देखने वाली बात होगी. संभावना है कि इस अखबार की दिल्‍ली में डेढ़ लाख कॉपियों के साथ लांचिंग की जाएगी.

क्‍या टीम अन्‍ना ने चंदे की रकम से दिया मकान किराया, बिजली का बिल!

: टीम अन्ना की ऑडिट रिपोर्ट का सच : हिसाब फाउंडेशन का है आईएसी का नहीं : इलाहाबाद। कहते हैं ईमानदार होना ही नहीं बल्कि दिखना भी चाहिए। लेकिन टीम अन्ना के कोर कमेटी के दो मूर्धन्य सदस्य अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ईमानदार भले ही हों मगर इंडिया अंगेस्ट करप्शन (आईएसी) का जो हिसाब-किताब आईएसी के वेबसाइट पर डाला है उससे वे कम से कम ‘ईमानदार’ तो नहीं ही दिखते। अब जो ऑडिट किया हुआ हिसाब-किताब एक अप्रैल 2011 से 30 सितम्बर 2011 तक का प्रदर्शित किया गया है वह पब्लिक काज रिसर्च फाउंडेशन का है, जो अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया का है।

इसमें वेतन एवं भत्ते के रूप में 9 लाख 29 हजार का खर्च दिखाया गया है तो क्या यह माना जाये कि फाउंडेशन की आफिस चलाने में 9 लाख 29 हजार रुपये का वेतन भुगतान आईएसी को मिले चंदे से किया गया है। यही नहीं मरम्मत एवं रखरखाव के मद में 88 हजार 465 रुपये दर्शाया गया है तो क्या आईएसी के चंदे से फाउंडेशन के कार्यालय 5/7, सर्वप्रिय विहार, बेसमेंट, नयी दिल्ली की मरम्मत एवं रखरखाव किया जा रहा है।

दरअसल इंडिया अंगेस्ट करप्शन (आईएसी) और पब्लिक काज रिसर्च फाउंडेशन दो अलग-अलग संस्थायें हैं। आईएसी कहीं से भी फाउंडेशन की कोई इकाई या परियोजना नहीं है। दोनों की वेबसाइट भी अलग-अलग हैं। आईएसी की वेबसाइट www.indiaagainstcorruption.org तथा फाउंडेशन की वेबसाइट www.pcrf.in है। आईएसी की वेबसाइट में एबाउट अस पर क्लिक करने से पता चलता है कि कोर कमेटी में अन्ना हजारे, किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल, शांति भूषण, प्रशांत भूषण, जस्टिस संतोष हेगड़े, मनीष सिसोदिया सहित 30 सदस्य हैं और दो विशेष आमंत्रित सदस्य डॉ. सुनीलम एवं राकेश रफीक हैं। इस वेबसाइट पर कहीं भी नहीं लिखा है कि आईएसी पब्लिक काज रिसर्च फाउंडेशन की एक इकाई अथवा परियोजना है।

आईएसी की साइट पर एक बिन्दु है ‘डोनेट’। यहां क्लिक करने पर सभी के प्रति चंदे (डोनेशन) देने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया गया है और कहा गया है कि फिलहाल चंदे की जरूरत नहीं है। लेकिन एक मोबाइल नम्बर और ई मेल पता दिया गया है कि जो लोग चंदा देना चाहते हैं वे अपना पंजीकरण करा सकते हैं। भविष्य में जरूरत पडऩे पर उनसे चंदे के लिए सम्पर्क किया जा सकता है। नीचे टीम अन्ना लिखा हुआ है। इसके बाद ऑडिट रिपोर्ट (अप्रैल 2011 से 30 अप्रैल 2011) दी गयी है और दानदाताओं की सूची भी दी गयी है।

यह ऑडिट रिपोर्ट फाउंडेशनरी है। इसमें किसी भी ‘फंड’ पर आईएसी का नाम नहीं लिखा हुआ है। पूरी ऑडिट रिपोर्ट देखने के बाद यही लगता है कि यह फाउंडेशन की ऑडिट रिपोर्ट है आईएसी की नहीं। सारी आमदनी और खर्च का ब्योरा इस तरह से दिया गया है कि यह अंतर करना असंभव है कि कौन सी आमदनी आईएसी की है और कौन सी फाउंडेशन की। कौन सा खर्च आईएसी के मद में किया गया है और कौन सा खर्च फाउंडेशन के मद में। इसमें प्रशासनिक एवं अन्य खर्चों के मद में एक करोड़ 57 लाख 9 हजार रुपये से अधिक का ब्योरा है। अब इसे देखकर यह नहीं जाना जा सकता कि इसमें आईएसी के लिए कितना खर्च और किस-किस मद में खर्च किया गया है। बिजली का बिल और कार्यालय का किराया भी इस खर्चों में दर्शाया गया है।

इस ब्योरे में जनजागरण खर्चे के रूप में 45 लाख 50 हजार रुपये से अधिक का खर्च दर्शाया गया है। वैसे भी यदि यह खर्च जनलोकपाल बिल के लिए किया गया है तो यह गंभीर सवाल खड़े करता है। वैसे भी जनलोकपाल आंदोलन को इलेक्ट्रानिक मीडिया की उपज बताया जा रहा है। तो क्या इलेक्ट्रानिक मीडिया पर जनलोकपाल आंदोलन का जो कवरेज हुआ या फिर टीम अन्ना की कोर कमेटी के कतिपय चुनिंदा सदस्यों के साक्षात्कार आये दिन अलग-अलग चैनलों पर दिखाये गये क्या वे ‘पेड कवरेज’ थे। यदि नहीं तो 45 लाख से अधिक रुपया जनजागरण में किस पक्ष में खर्च हुआ यह टीम अन्ना को बताना चाहिए।

आईएसी के कोड ऑफ कंडक्ट में स्पष्ट कहा गया है कि आईएसी कोई संगठन अथवा एनजीओ अथवा कोई संस्था नहीं है। यह जनता का आंदोलन है। भ्रष्टाचार के विरुद्घ तथा एक बेहतर भविष्य के लिए यह भारत की जनता की सामूहिक अभिव्यक्ति है। इस आंदोलन की कोई शाखा नहीं है। बिना किसी सांगठनिक ढांचे के यह विचारों के आदान-प्रदान के लिए एक प्रभावी संचारतंत्र विकसित करना चाहेगी। इस आंदोलन में शामिल होने वाला प्रत्येक व्यक्ति भारत का नागरिक होने के नाते देश के लिए यदि कुछ करना चाहता है तो ऐसा कर सकता है। कोई व्यक्ति अन्ना हजारे का प्रतिनिधि नहीं है।

अब प्रश्न यह है कि जब आईएसी कोई संगठन या एनजीओ नहीं है तो उसका पैसा कैसे केजरीवाल मनीष सिसादिया के फाउंडेशन में जमा किया जा रहा है फिर जो आडिट किया हुआ हिसाब-किताब जारी किया गया है उसमें आईएसी की आमदनी और आईएसी के कार्य में खर्च का ब्योरा क्यों नहीं अलग से दर्शाया गया है।

लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट में इलाहाबाद के संपादक जेपी सिंह के नाम से यह बाइलाइन खबर प्रकाशित हुई है. वहीं से साभार लेकर खबर को यहां प्रकाशित किया गया है.