एक काम क्‍यों नहीं करते, इस मुल्‍क को आप हिंदू, सवर्ण, मर्द राष्ट्र घोषित कर दीजिए

‎"मैं पिछले दस सालों से घर से दूर अकेले रह रही हूं। लेकिन मेरी मां को आज भी लगता है कि मैं घर वापस आ जाऊं। लड़की के अकेले रहने, अकेले घर से बाहर निकलने के ख्‍याल से उन्‍हें बार-बार इलाहाबाद की उस महिला डॉक्‍टर का ख्‍याल आता है, जिसे कुछ लोगों ने रेप करके मार डाला था। दिल्‍ली गैंग रेप के बाद उनका डर और गहरा हो गया है। वो जानती हैं, रहना तो पड़ेगा लेकिन उनके दिल को सुकून नहीं है। उन्‍हें कतई भरोसा नहीं है कि कभी कुछ बुरा नहीं हो सकता। इस मुल्‍क में उन्‍हें अपनी बच्‍ची की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं लगती। वो डर में जीती हैं।"

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"मेरा एक मुसलमान दोस्‍त मुंबई में रहता है। शहर में जब-जब बम फटता है, उससे बहुत दूर बिजनौर में बैठी उसकी मां डर जाती है। वो नास्तिक है। खुदा से उसका कभी याराना नहीं रहा। वो न नमाज पढ़ता है, न रोजे रखता है। लेकिन उसे याद है कि हर नौकरी में लोगों ने उसके नाम के कारण उसे तिरछी निगाहों से देखा है। जब-जब बम फटे, उससे उसकी देशभक्ति का सबूत मांगा है। वो जिस मुल्‍क में पैदा हुआ, उसके दादा, परदादा, दादा के दादा, जिस मुल्‍क में जन्‍मे और जिसकी मिट्टी में दफन हो गए, वो मुल्‍क उससे रोज उसकी देशभक्ति का सबूत मांगता है। दूर देश बैठी उसकी मां रोज डर में जीती है। मां को भरोसा नहीं इस मुल्‍क पर कि वो उसके बच्‍चे की हिफाजत करेगा। इस मुल्‍क ने मां को वो भरोसा कभी नहीं ही दिया।

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मेरा एक और दोस्‍त है। बहुत गरीब दलित परिवार से आता है। उसकी विधवा मां ने लोगों के घरों में झाडू-बर्तन करके उसे पढ़ाया। आज वो पीसीएस ऑफीसर है। लेकिन अब भी वो कभी-कभी उदास होता है क्‍योंकि उसकी सारी पढ़ाई, मेहनत, पोजीशन और पावर के बावजूद लोग उसे आज भी पीठ पीछे चमार का लड़का कहकर बुलाते हैं। उसकी सारी उपलब्धियों का ठीकरा रिजर्वेशन के सिर फोड़ देते हैं। मां अपनी धुंधलाई आंखों से बेटे को देखती है और सोचती है कि इतना पढ़-लिखकर भी आखिर बदला क्‍या। उसकी मां को भी इस मुल्‍क पर भरोसा नहीं। क्‍या चाहिए था जिंदगी में। इज्‍जत और स्‍वाभिमान की दो रोटी। रोटी तो मिली लेकिन इज्‍जत और स्‍वाभिमान नहीं।

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ये सारी माएं तुम्‍हारे महान लोकतांत्रिक मुल्‍क में आज भी डर में जीती हैं। वो मुल्‍क पर भरोसा कर न सकीं, मुल्‍क उन्‍हें भरोसा करा न सका। क्‍योंकि ये मुल्‍क औरतों के, दलितों के, मुसलमानों के स्‍वाभिमान का घर है ही नहीं। एक काम क्‍यों नहीं करते। अपने मुल्‍क को आप हिंदू, सवर्ण, मर्द राष्ट्र घोषित कर दीजिए।

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मेरे मुसलमान दोस्‍त से ये मुल्‍क बार-बार देशभक्ति का सबूत मांगता है। एक औरत से उसका पति उसके शरीर की पवित्रता का सबूत मांगता है। बलात्‍कार की शिकार महिला से पुलिस, कानून, न्‍यायालय तक अच्‍छे चरित्र का सबूत मांगते मनीषा पांडेयहैं। एक दलित से उसकी खून की श्रेष्‍ठता का सबूत मांगते हैं। नौकरी और प्रमोशन में योग्‍यता का सबूत मांगते हैं।
तुम्‍हारे मुल्‍क में हम सब हर क्षण संदेह के घेरे में हैं। तुम्‍हारे हिंदू, सवर्ण, मर्द राष्ट्र में हमारे लिए न इज्‍जत है, न स्‍वाभिमान।

इंडिया टुडे की फीचर एडिटर मनीषा पांडेय Manisha Pandey के फेसबुक वॉल से.

किसी से प्रेम कर बैठे तो ये न सोचना कि अब उसी से शादी करनी पड़ेगी

दो दिन पहले पुणे से मेरी दोस्‍त अनु आई थी। हम दोनों अलग-अलग शरीरों में जैसे एक-दूसरे की कार्बन कॉपी हैं। हमारे दिल-दिमाग एक, हमारे सपने एक, यहां तक कि हमारी लड़ाइयां और हमारी गालियां भी एक। लेकिन अभी मैं अनु नहीं, उसके पापा के बारे में कुछ बताना चाहती हूं। वो एक गर्ल्‍स इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल हैं और हरियाणा के एक गांव में रहते हैं। पता है, वो अपनी दोनों बेटियों से, अपने स्‍कूल और अपने गांव की लड़कियों से क्‍या कहते हैं –

1- अपने बापू से दहेज न मांग। उनसे आधा खेत मांग। आधा खेत भाई का तो आधा तेरा। अब कौन हल चलाना है। अब तो ट्रैक्‍टर से खेत जोतने हैं और लड़की भी ट्रैक्‍टर चला सकती है। अपना खेत खुद जोत और अपनी रोटी खुद कमा। अपना घर खुद बना।

2- भाई को राखी न बांध, न उससे पैसे ले। किसी से अपनी रक्षा करवाने की जरूरत नहीं। तू अपनी रक्षा खुद कर।

3- अपनी मर्जी से प्रेम कर, अपनी मर्जी से शादी कर। तेरा साथी कोई और नहीं ढूंढेगा। तू अपना साथी खुद ढूंढ।

4- तूने ससुराल नहीं जाना। न ही लड़के को घर जमाई बनाना है। दो लोग शादी करके अपना नया घर बनाओ।

5- प्रेम करने में कोई बुराई नहीं। प्रेम हो जाए तो किसी डर में न जीना। मेरी बच्‍ची, अगर प्रेम करने से लड़के का कुछ नहीं बिगड़ा तो तेरा भी कुछ नहीं बिगड़ा। किसी से प्रेम कर बैठे तो ये न सोचना कि अब उसी से शादी करनी पड़ेगी। वो अच्‍छा न लगे, तो उसे छोड़कर आगे बढ़ जाना।

6- घर से बाहर निकल, दुनिया देख। तू बाहर निकलकर मर भी जाएगी तो मुझे अफसोस नहीं होगा। लेकिन अगर तू दुनिया से डरकर इसलिए घर में बैठी रहेगी कि तू लड़की है, तो मुझे बहुत अफसोस होगा।

7- मेरे घर की इज्‍जत तेरे कंधों पर नहीं है। तू मेरी इज्‍जत नहीं, इसलिए इज्‍जत का ख्‍याल न करना। तू मेरा प्‍यार है, मेरा गुरूर है, अपना ख्‍याल करना।

ये अनु के पापा हैं। वो न कॉमरेड हैं, न कोई राजनीतिक चिंतक, विचारक। स्‍कूल में पढ़ाने और आज भी अपने खेत जोतने वाले एक साधारण इंसान। यह उनकी सहज बुद्धि से उपजी बातें हैं।

आप समझ रहे हैं न पढ़े-लिखे, शहरी, सो कॉल्‍ड मॉडर्न पापा लोगों, जो बेटे को प्रॉपर्टी देते हैं और बेटी को अपनी जाति में ढूढकर ससुराल।

इंडिया टुडे की फीचर एडिटर मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से.

We are not virgin and we feel proud to not to be

Manisha Pandey : कल्पना कीजिए, आज से 50-100 साल बाद इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ में हिंदुस्तानी समाज में महिलाओं की स्थिति का इतिहास लिखा जा रहा है और जानकारी के स्रोत के तौर पर फेसबुक अपडेट्स और कमेंट्स उपलब्ध हैं। तो इतिहासकार सौ साल बाद आज के समय के बारे में क्या लिखेंगे…

1- जब विकसित समाजों में नारीवादी आंदोलन, चिंतन और विचार एक उम्र जी चुका था, तब तक हिंदुस्तान में महिलाओं को महज इतना कहने के लिए भी काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी कि वर्जिनिटी उनके लिए एक पुरानी, पिछड़ी, सामंती और मर्दवादी अवधारणा है और स्त्रियां उसे रिजेक्टस करना चाहती हैं।

2- बहुसंख्यक हिंदुस्तान 21वीं सदी में भी काफी सामंती, रूढि़वादी और पुरातनपंथी था क्योंकि कुछ महिलाओं के 19वीं सदी में फ्रांस की महिलाओं द्वारा जारी Manifesto of the 343 Sluts की तर्ज पर ये घोषणा करने पर कि "We are not virgin and we feel proud to not to be" 21वीं सदी के अधिकांश पुरुषों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। लोग 21वीं सदी में भी रामायण, राम-सीता और प्राचीन धर्मग्रंथों के उदाहरण दिया करते थे।

3- हिंदुस्तान 21वीं सदी में भी काफी जातिवादी और जातीय श्रेष्ठता के अहंकार में जीने वाला मुल्क था, क्योंकि वर्जिनिटी को नकारने वाली लड़कियों के ऊंची जाति से ताल्लुक रखने की स्थिति में उन्हें जबर्दस्त‍ उलाहना दी जाती थी। हालांकि जाति में विश्‍वास न करने के मामले में उन स्‍त्रीवादियों का स्‍टैंड बिलकुल साफ था।

4- 21वीं सदी के हिंदुस्‍तान में सिनेमा में लड़कियां काफी कम कपड़े पहनती थीं, स्‍वीमिंग पूल में डांस करती थीं, लेकिन वर्जिनिटी को तब भी बचाकर ही रखती थीं।

5- वर्जिनिटी का संबंध और महत्‍व सिर्फ स्त्रियों से ही जुड़ा था क्‍योंकि मर्दों के अरमान पूरे करने के लिए सस्‍ते चकलाघरों से लेकर महंगी कॉल गर्ल्‍स तक सब बहुतायत में उपलब्‍ध थे और उस पर किसी को कोई नैतिक आपत्ति भी नहीं थी। इन्‍हें खत्‍म करने के लिए उस दौर में हुए किसी आंदोलन का कोई संकेत फेसबुक पर नहीं मिलता।

6- लेकिन अच्‍छे, शरीफ घरों की लड़कियों के वर्जिन न होने का दावा करने पर इसे नंगापन और बेशर्मी कहकर पुरुष फेसबुक पर बवाल मचाने लगते थे।

7- मार्क जुकेरबर्ग का यह प्‍लेटफॉर्म 21वीं सदी में स्‍त्री मुक्ति के विचारों को फैलाने के लिए एक बड़े प्‍लेटफॉर्म के रूप में उभरा।

इंडिया टुडे की फीचर एडिटर मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से.

‘Because chastity is very important for Indian women’

बचपन में मेरी जिन आदतों और हरकतों से दादी की जान जलती थी, उनमें से एक था मेरा घुमक्‍कड़ी स्‍वभाव। घर में मेरे पैर कभी टिके नहीं। मुझे हर समय घूमने को चाहिए। अब जितना मौका था, उतना ही घूमती थी। ऐसा तो नहीं कि मुंह उठाया और इलाहाबाद से बनारस पहुंच गई, बनारस से मुंह उठाया और लखीमपुर खीरी पहुंच गई। एक मुहल्‍ले से दूसरे मुहल्‍ले में ही तो जाती थी। फिर भी इतनी तकलीफ। दादी समेत तकरीबन सभी पारंपरिक परिवारों को इतिहास, मनुस्‍मृति और धर्मग्रंथों से मिला ज्ञान ये कहता है, जिसे वह पैदा होने के साथ ही पोलियो के टीके की तरह अपनी लड़कियों के खून में इंजेक्‍ट कर देते हैं कि-

 1- लड़कियों को ज्‍यादा घूमना-फिरना नहीं चाहिए।
2- उन्‍हें घर में रहना चाहिए और सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, पाक कला आदि में महारत हासिल करनी चाहिए।
3- ज्‍यादा घूमने-फिरने की इच्‍छा करना अच्‍छी लड़की के लक्षण नहीं हैं।
4- जिस स्‍त्री के पांव घर में न टिकें, उसका चरित्र ठीक नहीं है।
5- अच्‍छी लड़कियां घूमने तो खैर नहीं ही जातीं, घर की छत पर, खिड़की-दरवाजे पर भी ज्‍यादा नहीं जातीं। (इसका विरोध कृपया न करें। हिंदुस्‍तान के छोटे शहरों के बहुसंख्‍यक परिवारों में आज भी यही होता है।)

हर संभव तरीके से ये बताने की कोशिश कि लड़कियों के लिए घूमना-फिरना अच्‍छी बात नहीं है और ऐसा करने वाली लड़कियों का चरित्र शक के दायरे में रहता है।

अब इस आइडिया के बड़े निहितार्थ क्‍या हैं ?

बेसिकली मूवमेंट को सिर्फ घर तक सीमित करने और घूमने-फिरने पर रोक लगाने का अर्थ है एक बड़ी दुनिया, अनुभव, एक्‍सपोजर, ज्ञान, विचार आदि से लड़कियों को पूरी तरह काट देना और उन्‍हें डंब बना देना।

किसी भी प्रजाति को सिर्फ दस साल तक घर के अंदर बंद करके देखिए। उसके मानसिक विकास का क्‍या होता है। स्त्रियां तो हजारों साल से बंद हैं। उनका मानसिक विकास तो जनरेशंस से अवरुद्ध हो गया है।

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पूरी मानव सभ्‍यता की शुरुआत में ज्ञान हासिल करने के टूल और स्रोत क्‍या क्‍या थे। कोई किताब नहीं, कोई सिनेमा नहीं। सिर्फ घुमक्‍कड़ी और उससे अर्जित अनुभवों और ज्ञान ने किताब, दर्शन, विज्ञान आदि की शक्‍ल अख्तियार की। मनुष्‍य ने ऐसे ही ज्ञान हासिल किया। एक घुमक्‍कड़ अपना जहाज तैयार कर निकला हिंदुस्‍तान की खोज में। उसे पता नहीं था कि ग्‍लोब में नॉर्थ अमेरिका भी कोई चीज है। वह इंडिया समझकर उस जमीन पर उतरा और अमेरिका की खोज कर ली। वह कोलंबस था।

एक और घुमक्‍कड़ पुर्तगाल से चला और समुद्री रास्‍ते से खोजता हुआ हिंदुस्‍तान पहुंच गया। हमने बचपन में उसके बारे में किताबों में पढ़ाया गया। वह वास्‍कोडिगामा था। और भी ऐसे जाने कितने थे घुमक्‍कड़, यायावर, संसार की खोज करने वाले। भूगोल, इतिहास, विज्ञान, दर्शन के दरवाजे खोलने वाले। मार्को पोलो, मेगस्‍थनीज, फाह्यान, इब्‍नबतूता वगैरह-वगैरह।

लेकिन संसार के अब तक के समूचे इतिहास में अब तक कोई स्‍त्री घुमक्‍कड़, Traveller नहीं हुई। वह कभी इस तरह अपना जहाज बांधकर बस किसी भी दिशा में संसार की खोज में नहीं निकली। उसने पूरे ग्‍लोब पर जमीन कोई नया टुकड़ा नहीं ढूंढा। आखिर क्‍यों औरतें कभी भी Traveller नहीं हुईं। एक समूची प्रजाति को Travelling से काट देने का अर्थ था, उसे ज्ञान और अनुभवों के स्रोत से काट देना। ज्ञान और अनुभव के बुनियादी स्रोत से कट जाने के कारण स्त्रियों का मानसिक, बौद्धिक और व्‍यक्तित्‍वगत विकास अवरुद्ध हो गया।

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घूमने का अर्थ है ज्ञान हासिल करना। घूमने का अर्थ है अनुभवों का विस्‍तार। घूमने का अर्थ है आजादी। घूमने का अर्थ है अपने दिल-दिमाग और अपने शरीर पर हक। घूमने का अर्थ है एक तयशुदा घेरे से आजाद हो जाना और फिर अपनी मर्जी, खुशी और आजादी से विभिन्‍न तरह के समाजों, संस्‍कृतियों, लोगों और परिस्थितियों के बीच रहना, जीना और व्‍यवहार करना। घूमने का अर्थ है नियंत्रणों से मुक्‍त होना। घूमने का अर्थ है जो अच्‍छा लगे, उससे प्रेम करना और इच्‍छा हो तो उसके साथ सोना भी। घमने का अर्थ है हमेशा नई जिज्ञासाओं और सवालों से भरे रहना। उनके उत्‍तर तलाशना। घूमने का अर्थ है अपने अस्तित्‍व को संसार और प्रकृति के बड़े समूह के साथ जोड़कर देखना।

घूमने के ये बहुत सारे अर्थ है। और इन सारे अर्थों से समूचे इतिहास में स्त्रियों का जीवन हमेशा कटा रहा। उनके पास न ज्ञान था, न अनुभव, न अपनी देह पर हक। अपनी मर्जी का पुरुष चुनने और उसके साथ सोने की आजादी नहीं। वो एक पुरुष विशेष की निजी संपत्ति थीं। और उन्‍हें अपना जहाज बांधकर हिंदुस्‍तान की खोज करने के लिए छोड़ देने का मतलब था उनकी देह को आजाद कर देना। औरत के शरीर पर से आदमी का Control खत्‍म। इसलिए इतिहास में औरतें कभी घुमक्‍कड़ नहीं हुईं। कोई कोलंबस नहीं, कोई वास्‍कोडिगामा नहीं।

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एक नए पैदा हुए बच्‍चे को लगता है कि मां की गोद ही पूरा संसार है। फिर जब वह गोद से उतरकर घर में चलने-फिरने लगता है तो उसे पता चलता है कि संसार ये चार कमरे, रसोई, आंगन, बगीचा, बालकनी और छत भी है। फिर जब वह स्‍कूल जाना शुरू करता है कि समझता है कि संसार में स्‍कूल है, स्‍कूल के ढेर सारे बच्‍चे हैं, टीचर हैं, मोहल्‍ले के दोस्‍त हैं, स्‍कूल के रास्‍ते में दिखने वाले लोग हैं, मकान हैं, दुकानें हैं। फिर बच्‍चा बड़ा होता जाता है और पता चलता है कि संसार एक बहुत बड़ा सा शहर है, जहां तरह-तरह की चीजें हैं। फिर वो सारे शहर उसके संसार का हिस्‍सा होते जाते हैं, जहां नानी, चाची, बुआ, ताऊ और तमाम रिश्‍तेदारों के यहां शादी-ब्‍याह, जन्‍म और मरण में जाना होता है। या वो शहर, जहां वह नौकरी करने जाता है। जीवन आगे बढ़ता है और अपनी जाति, अपने धर्म, अपने कुटुंब के वही परिचित, दोस्‍त, रिश्‍तेदार और पट्टीदार ही एक मनुष्‍य का सारा संसार होकर रह जाते हैं। बाकी की दुनिया सिर्फ ग्‍लोब पर बारीक अक्षरों में लिखा हुआ कोई नाम भर है।

– अब अपनी जाति, अपने धर्म, अपने कुटुंब, अपने परिवार और रिश्‍तेदार के संकरे कुएं में पूरा जीवन बिता देने वाला इंसान ये कैसे जानेगा कि संसार बहुत बड़ा है, संस्‍कृतियां बहुत सारी। अनगिनत लोग, विचार, जीवन और अनुभवों का विराट संसार। और जीवन का मकसद दुबेजी-तिवारी-चौबेजी की दुनिया में सुरक्षित होकर रहना नहीं, जीवन का मकसद अनुभवों के उस विराट संसार की सैर है।

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मुझे अकसर दिल्‍ली Metro में ऐसी लड़कियां मिलती हैं, जो हिंदुस्‍तान घूमने आई हैं। 18 साल से लेकर 22-25 साल तक की लड़कियां अपने कंधे पर एक बैग टांगकर दुनिया देखने निकल पड़ती हैं। एक बार जयपुर में एक डच लड़की मिली, जो 25 दिनों से अपने ब्‍वॉयफ्रेंड के साथ इंडिया घूम रही थी। वो क्‍यों घूमती है, का सीधा सा जवाब उसके पास था, "I want to see the world." उसका ऑब्‍जर्वेशन कहता था कि हिंदुस्‍तानी लड़कियों को एक निश्चित दायरे के बाहर अकेले घूमने की इजाजत नहीं है। और इसकी वजह जो उसकी समझ में आई, वो तो और भी कमाल थी, "Because chastity is very important for Indian women." घूमने-फिरने पर नियंत्रण के पीछे ये चेस्टिटी ही है। शरीर की पवित्रता, शुद्धता और कौमार्य की रक्षा।

इंडिया टुडे की फीचर एडिटर मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से साभार.


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