आधा जोधपुर गहलोत का!

राजनीति में आरोपों का सिलसिला कोई नया नहीं है। लेकिन आरोप जब रिश्तेदारी निभाने को लेकर उछाले जाने लगें, और सामने आदमी का नाम जब अशोक गहलोत हो तो मामला कुछ ज्यादा ही भारी हो जाता है। वैसे, रिश्तेदारी का भी अपना अलग ही मायाजाल है। रिश्तों के बिना जिंदगी आसान नहीं होती। लेकिन लोग रिश्तेदारी को जी का जंजाल भी बना देते हैं। खासकर राजनीति में तो बहुत दूर की रिश्तेदारी भी आफत बनकर उभरती है। हमारे सीएम अशोक गहलोत इस तथ्य को और तथ्य में छुपे सत्य को पता नहीं जीवन के किस मोड़ पर बहुत अच्छी तरह समझ गए थे। इसीलिए रिश्तेदारी और रिश्तेदारों से शुरू से ही वे थोड़ी दूरी पर ही मिलते रहे।

अशोक गहलोत सन 1980 से लगातार किसी न किसी बड़े पद पर हैं। वे 33 साल से कभी सांसद, तो कभी केंद्र सरकार में मंत्री, कभी एआईसीसी के महासचिव तो कभी विपक्ष के नेता, और कभी प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष तो कभी सीएम रहे हैं। लेकिन कभी किसी रिश्तेदार को पास आने तो दूर राजनीति तक में कहीं पसरने नहीं दिया। फिर रिश्तेदार भी जानते हैं कि राजनेता अपनी रिश्तेदारियों को आम तौर बहुत कम ही निभा पाते हैं। खासकर गहलोत जैसे राजनेता अपने रिश्तेदारों से कितनी रिश्तेदारी निभाते हैं, और कितने काम आते हैं, यह अपने से ज्यादा कौन जानता होगा। बीते तीस साल से, जब से अपन ने समझ संभाली है, तब से लगातार अपन देख भी रहे हैं, और भुगत भी रहे हैं। अपन साए की तरह उनके साथ रहे, बरसों तक उनके काम किए, और अब बहुत दूर रहकर भी उनके साथ रहने जैसे ही हैं। पर, उनके अपने होने के बावजूद कभी उनसे किसी फायदे की आस नहीं पाली। वैसे, हर व्यक्ति का अपना स्वभाव होता है, हमारे सीएम गहलोत का यही स्वभाव है, और उसे अपन बदल तो नहीं सकते।

विरोधी होने का धर्म निभाने के लिए गहलोत के विरोधी भले ही उनके खान आवंटन में रिश्तेदारी निभाने की बात कहते हों, पर यह तो उनके विरोधी भी जानते हैं कि गहलोत कभी किसी रिश्तेदार को अपने पास फटकने भी नहीं देते हैं। गहलोत ने कब, कहां, किससे, कैसी रिश्तेदारी निभाई है, यह तो रिश्तेदारों का जी जानता है। और ज्यादा सच जानना हो तो यह भी जान लीजिए कि दूर के रिश्तेदार तो बेचारे सीएम से अपनी रिश्तेदारी सार्वजनिक रूप से जाहिर करने से भी बचते हैं। वजह यही है कि वे सीएम गहलोत का स्वभाव जानते हैं। अब जब, गहलोत को रिश्तेदारों को खान बांटने के बवाल को बहुत बढ़ाया जा रहा है तो अपना भी आपसे कुछ सवाल करने का हक बनता हैं। सवाल यह है कि आपके भांजे के साले का भतीजा कौन है? जरा बताइए तो? आपके भांजे के साले का समधी कौन है? या फिर आपके भांजे के साले के समधी का साला कौन है? या फिर भांजे के साले के समधी का भाई कौन है? आप नहीं बता सकते। क्योंकि दूर के रिश्तेदारों के भी बहुत दूर के रिश्तेदारों को रिश्तेदार तो बेचारे कहने भर के रिश्तेदार होते है।

फिर ऐसी ही रिश्तेदारी तलाशनी है और ऐसी ही पत्थर की खदानों से जुड़े नाम गहलोत के माथे पर चिपकाने हैं, तो फिर करीब आधे से भी ज्यादा जोधपुर की गहलोत से रिश्तेदारी है और उनमें से सारे का सारे या तो पत्थर की खदानों को मालिक हैं या फिर ठेकेदार। कोई पांच साल पहले कोटा में जब अपन ने भी सरकार से पत्थर की खदान ली थी, तब भी भाई लोगों ने खूब कोहराम मचाया। लेकिन कुछ नहीं बिगाड़ पाए। अब चुनाव का मौसम शुरू हो गया है। विरोधियों को अपने भविष्य की चिंता है। ऐसे में कलंक की काजल लेकर गहलोत के पीछे पड़ने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है। लेकिन आप ही बताइए कि राजनेताओं के रिश्तेदार और रिश्तेदारों के रिश्तेदार और उनके भी दूर रिश्तेदार होने की वजह से सारे रिश्तेदार लोग अपना धंधा पानी समेटकर भीख मांगना तो नहीं शुरू कर सकते।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

बजट से मारा, अब पेट्रोल से जलाया, और डीजल अभी बाकी है मेरे दोस्त

महंगाई पता नहीं हमें कहां ले जाएगी। आमदनी घट रही है। महंगी बढ़ रही है। सरकार कह रही है कि हर एक को आधार कार्ड जरूरी है। लेकिन हालात देखकर अपना मानना है कि आधार नहीं उधार कार्ड जरूरी है। आप जब तक यह पढ़ रहे होंगे, महंगाई और बढ़ चुकी होगी। सरकार ने अपने लुभावने लगनेवाले बजट के घाटे को कम करने का इंतजाम कर दिया है। पहले बजट से तेल निकाला। अब वह तेल से कमाई निकालेगी। दो दिन पहले बजट में जो महंगाई बढ़ाई गई थी, उससे भी ज्यादा महंगाई पेट्रोल के भाव बढ़ाकर बढ़ाई है। 

गुरुवार को बजट पेश हुआ। तब सरकार कुछ नहीं बोली। अब शुक्रवार की आधी रात से पेट्रोल के दामों में फिर से इजाफा कर दिया गया है। सीधे एक रुपए 40 पैसे प्रति लीटर बढ़ाने का ऐलान किया गया है। आप रात को सोए थे। और आपके सोते सोते ही पेट्रोल और महंगा हो गया। पेट्रोल के महंगा होने का मतलब बाकी बहुत सारी चीजों का भी महंगा होना है। इससे पहले 16 फरवरी को ही पेट्रोल के दाम में डेढ़ रुपया बढ़ाया था। पंद्रह दिन के भीतर और बढ़ाकर कुल मिलाकर तीन रुपए की बढ़ोतरी हो गई। सरकारी भाषा में कहें तो तेल कंपनियों के लिए कीमत बढ़ानी पड़ रही है। क्योंकि रुपए के मुकाबले डॉलर की कीमत बढ़ने बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का हवाला दिया गया है।

गुरुवार को संसद में पेश बजट से आप और हम पहले से ही परेशान थे। महंगाई का रो रहे थे। सरकार को कोस रहे थे। अब इस पेट्रोल के भावों में बढ़ातरी ने महंगाई का डबल झटका दिया है। चिदंबरम ने बजट में टैक्स स्लैब में भी कोई बदलाव नहीं किया गया। हर हाथ में रहने वाले मोबाइल जैसी छोटी सी चीज पर भी टैक्स लगा दिया। सरकार बहुत खतरनाक तरीके से काम कर रही है। पहले तो टीवी के लिए हर घर में सेट टॉप बॉक्स जरूरी किया। फिर उस पर टैक्स लगा दिया। आम आदमी तो पहले ही महंगाई से परेशान है, उस पर आए दिन पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि करके जले पर नमक छिड़कने का काम कर रही है। कम से कम राज्य सरकारों को चाहिए कि वे पेट्रोल से वैट हटा दे तो लोगों को काफी हद तक राहत मिल सकती है। केंद्र के बाद राज्य सरकारों के बजट आनेवाले हैं। उनको तो कम से कम लोगों को हितों का खयाल करना चाहिए। जिस तरह से बजट के ठीक बाद पेट्रोल के दाम बढ़ाए गए, उससे डीजल के दाम बढ़ने की आशंका और बढ़ गई है।

हमारे देश के माननीय प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह जी कल वित्त मंत्री पी चिदंबरम की पीठ थपथपा रहे थे। कह रहे थे कि बढ़िया बजट पेश किया है। लेकिन आज पूरे देश के लोग उनकी और सरदारजी की पीठ पर लाठी मारने की सोच रहे हैं। हमारा इतिहास गवाह है कि निर्मम से निर्मम राजाओं ने भी अपने देश की प्रजा को इस तरह परेशान नहीं किया। जितना वर्तमान सरकार कर रही है। पता नहीं अपने सरदारजी क्या खाकर जन्मे थे कि इस आदमी को रहम ही नहीं आता। हर साल महंगाई और मुंह फाड़ती ही जा रही है। पेट्रोल के झटके के बाद डीजल का झटका भी लगने ही वाला है। तैयार रहिए। लोकतंत्र के डाकू लोग इसी तरह लूटा करते हैं। अपन ने तो पहले ही कहा था कि बजट आनेवाला है। जेब संभालो। और अब भी कह रहे हैं कि जेब संभालिए, क्योंकि डीजल तो अभी बाकी है मेरे दोस्त।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

आपने तो हमारे अर्थशास्त्र की ऐसी की तैसी कर दी सरदारजी!

हमारे देश का बजट आने वाला है। कहने को भले ही सरदार मनमोहन सिंह पीएम हैं और पी चिदंबरम हमारे वित्त मंत्री। लेकिन सरकार बहुत सारे दलों के बावजूद कांग्रेस की है और श्रीमती सोनिया गांधी उसकी वास्तविक मुखिया है। वह जितना कहती है उतना ही होता है। न उससे कम, न ज्यादा। किसी की औकात नहीं है कि सोनिया गांधी जैसा कहें, वैसा न करे। उनकी बात मानना मजबूरी जैसा है। इसीलिए लोग इंतजार कर रहे हैं कि इस बार के बजट में देश के लिए तो होगा ही, महिलाओं के लिए भी बहुत कुछ होगा।

सरदार मनमोहन सिंह तो खैर मस्ती से जी रहे हैं। पीएम के नाते इस पद के मजे ले रहे हैं। उनके वित्त विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री होने के बावजूद हमारे देश के वित्तीय हालात की मट्टी पलीद हो गई हैं और अर्थ शास्त्र करीब करीब कोकशास्त्र सा हो गया है। किसी को समझ में नहीं रहा है कि क्या हो रहा है। पैसा जितना आता है, उससे भी ज्यादा खर्च बढ़ रहे हैं। महंगाई ने सब कुछ मटियामेट कर रखा है। लोग परेशान हैं। और वित्तमंत्री उलझन में। लेकिन सबसे ज्यादा चिंता घर परिवार संभालने को वाली महिलाओं को है। किसी और को सरदारजी से कोई अपेक्षा हो ना हो, देश की महिलाओं को मनमोहन सिंह की माई बाप सोनिया गांधी से कुछ ज्यादा ही अपेक्षाएं है। क्योंकि वे ही सरकार की असली माई बाप हैं।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भले ही अपने पहले भाषण में संसद को महिलाओं की सुरक्षा के मामले में बहुत कुछ सुना कर आ गए। लेकिन सरदारजी को सोचना चाहिए कि पहली समस्या सिर्फ असुरक्षा की नहीं है। सितारों से आगे जहां और भी है। बहुत कम लोग जानते हैं कि बच्चों को जन्म देते समय महिलाओं की मौत की घटनाएं दुनिया के किसी भी गए गुजरे देश से भी ज्यादा हमारे देश में होती हैं। बजट में उनके स्वास्थ्य को लेकर बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। खासकर गांवों में महिलाओं के लिए ज्यादा अस्पताल बनाने का प्रावधान किया जाना चाहिए। ये सारी बातें अपन तो आज कह रहे हैं। मनमोहन सिंह ने बहुत पहले तब कही थी, जब पहली बार वित्त मंत्री बने थे। उसके बाद खुद कई बार लगातार वित्त मंत्री बने, पर कभी अपना कहा कुछ भी पूरा नहीं किया।

जब पहली बार वित्त मंत्री बने थे, तो आपने तो भारत और इंडिया की दूरी खत्म करना है, ऐसा कहा था सरदारजी…। लेकिन अब तो आप साक्षात प्रधानमंत्री हैं। वह भी दूसरी बार। सवा सौ करोड़ से भी ज्यादा लोगों का यह देश कभी आप पर भरोसा करता था। यह बात अलग है कि आपको खुद पर भरोसा नहीं हैं। पहले राजीव गांधी की तरफ देख कर काम करते थे। फिर नरसिम्हा राव ने आप पर भरोसा किया। और राव साब भले ही सोनिया गांधी को फूटी आंखों नहीं भाते थे, फिर भी सोनियाजी का मौका आया तो उनने भी आप पर ही भरोसा किया। नरसिम्हा राव ने तो आपको वित्तमंत्री ही बनाया था। पर, सोनियाजी ने तो प्रधानमंत्री बना दिया। आप इतने भरोसेमंद आदमी हैं। लेकिन फिर भी यह देश आप पर भरोसा क्यों नहीं करता सरदारजी?

राजनीति के लोग अपने सिवाय किसी भी दूसरे पर कोई भरोसा नहीं करते हैं। लेकिन फिर भी आप उनके भरोसे के काबिल रहे हैं। जब जब आप वित्त मंत्री बने, तो देश ने भी आप पर भरोसा किया था सरदारजी। क्योंकि किसी अर्थशास्त्री से शास्त्रार्थ की उम्मीद भले ही नहीं की जाए पर सामान्य आदमी के सहज घरेलू अर्थशास्त्र को समझने की सामान्य उम्मीद तो की ही जा सकती है। लेकिन आपने तो हर बार पर, हर बजट में हम सबका पूरा अर्थशास्त्र ही उलटकर रख दिया। अपना दावा है सरदारजी कि इस बार भी आप और आपकी सरकार देश का भरोसा तोड़ेंगे। महंगाई बढ़ाएंगे, गरीब को मारेंगे और अमीरों को संवारेंगे। लेकिन अब देश ने आप जैसे सीधे सादे दिखनेवालों पर भी भरोसा करना छोड़ दिया है, यह भी याद रखिएगा।  

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

मकसद हंगामा करने का नहीं था, पर वह तो हो गया बंसल साहब!

रेल बजट पेश हो गया। अपने जीवन का पहला और इस सरकार का अंतिम रेल बजट पेश करते समय रेल मंत्री पवन बंसल ने लोकसभा में कहा तो था कि हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,… पर सरकार को बाहर से समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी तथा विपक्षी दलों ने भारी हंगामा किया। हंगामे के कारण रेल मंत्री अपना बजट भाषण भी पूरा नहीं पढ़ पाए। अब चर्चा होगी। बहसबाजी भी होगी। और पास भी हो जाएगा। लेकिन सवाल ये है कि क्या रेलवे की हालत सुधरेगी।

पवन बंसल राजीव गांधी के कहने पर राजनीति में आए थे। यह दुनिया को बताने के लिए या पता नहीं अपने सहयोगियों को सताने के लिए यह उनने लोकसभा में भी कहा। लेकिन ममता बनर्जी, लालू यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान जैसों ने रेल मंत्रालय का जो भी विकास या कबाड़ा किया था और विकास की योजनाओं से भरी सारी रेलें अपने चुनाव क्षेत्रों की तरफ मोड़ दी थी, वैसा न तो पवन बंसल कर सकते थे और न हुआ। होने की गुंजाइश भी नहीं थी। बंसल चंड़ीगढ़ के हैं। उनका शहर बहुत आधुनिक है और शुक्र है कि चंड़ीगढ़ किसी की दया से उपजे सुविधाओं के संसार का मोहताज नहीं है। फिर ऐसा नहीं है कि बंसल के पूर्वज रेल मंत्रियों के काल में रेल सेवाओं का विकास और विस्तार नहीं हुआ। हुआ। लेकिन जिस तरह से अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब ज्यादा गरीब हो रहा है। उसी तरह जहां रेल विकास की जरूरत है, वहां जरूरतों का अंबार लगातार बढ़ता जा रहा है और जहां पहले से ही बहुत सारी सुविधाएं हैं, वहां और कई तरह तरह की सुविधाओं का संसार सज रहा है। फिर भी हमारे देश में यह एक आम बात सभी के मुंह से सहज कही जाती है कि रेलवे की हालत खस्ता है।

पवन बंसल ने जैसा भी रेल बजट पेश किया है, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्य़ा हमारे देश की खस्ताहाल रेलवे की हालत में में कोई सुधार होगा ? क्या रेल सुविधाओं के विकास और विस्तार के लिए जो धन चाहिए उसके लिए हमारे वित्त मंत्री धन का बंदोबस्त करेंगे? कोई पंद्रह सालों से हमारे देश की रेलवे की हालत ज्यादा खराब लग रही है। खराब पहले भी थी। पर, जब विकास का पहिया तेजी से घूमना शुरू हुआ, तो कमियां भी उतनी ही तेजी से उजागर होने लगी। सरकार चाहे अटल बिहारी वाजपेयी की रही हो या मनमोहन सिंह की। रेलवे की आर्थिक हालत को सुधारने के लिए हर रेल बजट में बड़ी बड़ी घोषणाएं की गईं। राजनीतिक फायदे और जनता की वाहवाही लूटने के लिए करीब पौने दो लाख करोड़ के कई प्रोजेक्ट्स का ऐलान कर दिया गया, लेकिन इनमें से ज्यादातर प्रोजेक्ट या तो शुरू ही नहीं हुए या फिर बीच में ही रुक गए। ऐलान तो कर दिए, लेकिन किसी भी सरकार ने यह योजना नहीं बनाई कि इन प्रोजेक्ट्स के लिए पैसा कहां से आएगा और उनको पूरा कैसे किया जाए।

जानकार मानते हैं कि रेलवे की बदहाली की सबसे बड़ी वजह है उसका लगातार राजनीतिक इस्तेमाल। और अपना मानना है कि सरकार तो सरकार है। वह राजनीति से ही बनती है। सो, सरकार किसी का भी राजनीतिक इस्तेमाल ही करेगी। उसके अलावा क्या करेगी। सरकार कोई ट्रेन में थोड़े ही बैठती है। उसमें तो बैठते हैं आप और हम जैसे लोग। सो, रेल का इस्तेमाल तो हम लोग करेंगे। कांग्रेस तो इसी बात पर खुश है कि कोई 18 साल बाद उसके किसी रेल मंत्री ने बजट पेश किया है। रेल मंत्री ने एक शेर भी पढ़ा –  सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही, मेरी कोशिश है कि सूरत बदलनी चाहिए। तो रेलवे की सूरत बदलिए न साहब, किसने मना किया है। हम भी यही चाहते हैं। लेकिन समाजवादियों ने तो हंगामा करके संसद की ही सूरत बदलने की कोशिश कर डाली उसका क्या?  

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

सैक्सी सिंघवी की सियासत और कुकर्म के कलंक का दाग

बम फटे हैदराबाद में और दिल्ली में दुकान सजाने लग गए अभिषेक मनु सिंघवी। वैसे, सिंघवी खुद तो किस ‘काम’ के काबिल हैं, यह उनके दफ्तर की दीवारें और वहां के सीसीटीवी कैमरे के अलावा, एक बेबस महिला वकील के साथ मुंह काला करते हुए सिंघवी को देखनेवाला सारा देश अच्छी तरह जानता है। लेकिन फिर भी सिंघवी देश के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे की काबिलियत पर सवाल उठा रहे है। हैदराबाद में बम फटने के बाद सिंघवी ने कहा कि जब देश के गृह मंत्री का प्रमोशन उनकी कार्यक्षमता के बजाए वफादारी के बूते पर हुआ है तो ऐसे में उनसे क्या अपेक्षा की जा सकती है।

अरे भैया वकील साहब, आपको भी तो वफादारी के बूते पर ही राज्यसभा का टिकट मिला, और सारे वफादारों ने वोट दिए। इसका मतलब क्या आपसे भी कोई अपेक्षा नहीं की जाए?  वैसे, किसी को भी आपसे कोई अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। दिल्ली की उस महिला वकील ने जज बनने की आपसे अपेक्षा की थी, तो आपने उससे क्या क्या अपेक्षा पाली और पूरी भी की, वह सब सीसीटीवी कैमरे में कैद है। हैदराबाद के बम विस्फोट के सहारे अपनी सैक्सी सियासत की ‘काम’ कहानी पर परदा डालने के लिए अचानक प्रकट होकर सिंघवी ने कहा कि यह एक निंदनीय घटना है। खुद सिंघवी ने तो उस महिला वकील के साथ सारे कपड़े उतार कर अपने दफ्तर की कुर्सी पर बैठकर जो कुछ किया, वैसा भविष्य में फिर किसी के साथ कभी न करने की बात कभी नहीं कही। लेकिन सरकार को सलाह दे रहे हैं कि भविष्य में ऐसे धमाके रोकने के लिए कदम उठाने होंगे। साथ ही सरकार से उम्मीद जताई कि धमाके में मारे गए और घायल हुए लोगों के परिजनों को तुरंत और पर्याप्त राहत दी जाएगी।

अरे वकील साहब, आपने उस महिला वकील के साथ ‘काम’ करके अपनी उम्मीद तो पूरी कर ली, लेकिन उसे जज बनाने की जो उम्मीद बंधाई थी, उसे आज तक पूरा नहीं किया, उसका क्या। बहुत दिनों से बेकार और दरकिनार बैठे थे, सो आपको फिर से खबरों में आने के लिए बम ब्लास्ट का मौका मिल गया। वैसे, राजनीति जानने वाले यह भी जानते हैं कि कांग्रेस में किसी की भी यह औकात नहीं है कि कोई भी मुंह उठाकर किसी के भी खिलाफ कुछ भी बोल दे। उसके लिए बाकायदा रणनीति बनती है। सीमाएं समझाई जाती हैं, साथ ही गलती के अंजाम का अहसास भी करा दिया जाता है। कांग्रेस सही समय पर सही वार करती है। सो, यह भी हो सकता है कि अभिषेक मनु सिंघवी के कोर्ट में किए कुकर्म के कलंक को धोने के लिए कांग्रेस ने बम धमाकों जैसा गंभीर अवसर चुना हो। सोचा हो कि उनकी रीएंट्री इसी तरह से कराई जा सकती है, क्योंकि धमाकों में जब बहुत सारे लोग मारे गए हैं, और उस पर सिंघवी बोलेंगे, तो दर्द के दावानल में कोई भी उनके सैक्स कांड की तो चर्चा नहीं करेगा।

इस राजनीति को सही रास्ते से समझना हो तो जरा इस तरह भी समझिए कि महिपाल मदेरणा और मलखान सिंह विश्नोई के भंवरी देवी के साथ अवैध संबंधों पर, या फिर कुरियन के बलात्कार वाले मामले में सिंघवी से बयान दिलवाकर तो उनकी सैक्सी सिंघवी की छवि और मजबूत ही होती न। माना जाता है कि राजनेता आमतौर पर बेशर्म होते हैं। फिर सिंघवी को तो वैसे भी शर्म है कहां। होती, तो रोजी रोटी देने वाले सुप्रीम कोर्ट स्थित अपने दफ्तर में बुलाकर महिला वकील के साथ कुकर्म नहीं करते। सिंघवी के लिए शुभ संकेत है कि पब्लिक के सामने आने के उनके दरवाजे खुल गए हैं, और कांग्रेस ने भले ही बहुत सोच समझकर यह सब किया हो। लेकिन राजनीति के लिए यह घनघोर अशुभ संकेत हैं कि सैक्स करते हुए कैमरो में कैद होने वाले सांसद अब देश के गृहमंत्री पर उंगली उठाने लगे हैं। भले ही उनको अपने कुकर्मों पर शर्म नहीं आए, पर हमको तो आती है। आपको भी आती ही होगी!

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

कटघरे में काटजू, पद की गरिमा और प्रेस कौंसिल की औकात

जस्टिस मार्कंडेय काटजू एक बार फिर खबरों में हैं। और बीजेपी भड़की हुई है। काटजू ने एक लेख लिखा। उसमें कहा कि गोधरा में क्या हुआ था, अभी भी यह एक रहस्य है। काटजू ने मुसलमानों को निशाना बनाने और लोगों को जान से मारने की कार्रवाई की हिटलर से तुलना की। वे यह मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि दंगों में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई हाथ नहीं था। उन्होंने मोदी के विकास के दावों को भी ख़ारिज किया। लेख में उन्होंने अंत में अपील की थी कि लोग अपने वोट डालते समय ख़्याल रखें नहीं तो वे भी वहीं ग़लती करेंगे जो जर्मनी की जनता ने हिटलर को जिताकर की थी। कांग्रेस और उसके समर्थकों ने काटजू की पीठ थपथपाई और जमकर तारीफ की।

वैसे, काटजू को जो लोग जानते हैं, वे यह भी जानते हैं कि काटजू बड़बोले हैं। बदजुबान भी हैं और बदनीयत भी। होने को तो वे प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन हैं। लेकिन हमारे देश में किसी गली मोहल्ले से छपनेवाले साप्ताहिक – पाक्षिक के संपादक से ज्यादा उनकी औकात नहीं है। काटजू से ज्यादा धाक तो हमारे उन बहुत सारे पत्रकारों की है जो अपने विजिटिंग कार्ड पर ठसके के साथ बड़े से अक्षरों में प्रेस छपवाते हैं और बड़े बड़े अफसरों ही नहीं मंत्रियों तक को धमका कर चले आते हैं। काटजू भले ही कौंसिल के चेयरमैन हैं। पर उनसे डरता कौन है। कोई नहीं। और डरे भी क्यों। लोग सांप से डरते हैं। पर बहुत सारे सांप ऐसे भी होते हैं, जो डस भी ले, तो उसका कोई असर तक नहीं होता।

हमारे काटजू महाराज भी उस प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन हैं, जिसे संवैधानिक दर्जा तो है, लेकिन किसी को वह नुकसान नहीं पहुंचा सकती। प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन की हालत को ज्यादा अच्छी तरह से समझना हो, तो अपने श्रद्धेय सरदार श्री मनमोहन सिंह जी को देख लीजिए। होने को भले ही वे दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के पीएम हैं। लेकिन कोई कांग्रेसी उनसे डरता है? सारे के सारे मंत्री – संत्री, सब डरते हैं श्रीमती सोनिया गांधी से, या फिर राहुल गांधी से। हमारे मनमोहन सिंह के पास पद भी है, प्रतिष्ठा भी है, पर अधिकार नहीं हैं। वे सरदार तो हैं, पर असरदार नहीं है। काटजू भी बिल्कुल ऐसे ही हैं। इसलिए प्रेस की पूरे देश की जिस कौंसिल के काटजू चेयरमैन हैं, उस प्रेस के ही ज्यादातर भाई लोग उन पर पिल पड़े हैं। मोदी पर काटजू की टिप्पणी को लेकर बीजेपी पहले ही भड़की हुई थी। लेकिन काटजू के बचाव में जैसे ही कांग्रेस सामने आई, तो बीजेपी का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। बीजेपी की मांग है कि या तो काटजू खुद इस्तीफा दें या फिर सरकार हटाए। बीजेपी के मुताबिक काटजू कांग्रेस के हाथों में खेल रहे हैं। जुडिशियल पोस्ट पर बैठे आदमी को राजनीतिक टिप्पणियां करने का कोई हक नहीं होता।

हालांकि यह कोई पहला मामला नहीं है जब जस्टिस काटजू अपने किसी बयान से विवाद में रहे हों। उत्तर प्रदेश के सीएम अखिलेश यादव की सरकार की आलोचना को वे गलत बता चुके हैं और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के कामकाज पर उन्होंने खुद ही बहुत अशोभनीय और अजीबो गरीब टिप्पणी की थी। कुछ दिन पहले ही काटजू हमारे हिंदुस्तान के 90 फीसदी लोगों को बेवकूफ कह चुके हैं। कांग्रेस को खुश करने के लिए काटजू गैर कांग्रेसी सरकारों के खिलाफ अकसर बयान इसलिए दिया करते हैं। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के जज से रिटायर होने के पंद्रह दिनों के भीतर ही कांग्रेस ने काटजू को प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया का चेयरमैन बना दिया। सरकार के अहसान का इतना बदला तो चुकाना ही पड़ता है। आप और हम अगर उस पद पर इस तरह आते, तो अपन भी वैसा ही करते, जैसा काटजू कर रहे हैं। वैसे माफ करना जज का काम होता है। लेकिन गलतियां तो मजिस्ट्रेट, जज, जस्टिस और उनके बाप दादा भी करते ही हैं। सो, आप माफ कर दीजिए काटजू को।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

गहलोत की धार, कटारिया की कटार और वसुंधरा के वार

राजस्थान विधानसभा का सत्र शुरू हो गया है। सीएम अशोक गहलोत अदम्य साहस के साथ खड़े हैं। सरकार सधी हुई है। बचाव की मुद्रा में नहीं है, लेकिन हाथ में ढाल है। ढाल इसलिए, क्योंकि सरकारें हमारी माई बाप हुआ करती हैं और लोकतंत्र के माई बापों के हाथों में तलवारें शोभा नहीं देती। मगर, विपक्ष के हाथ में तलवार है और वार भी। बहुत सारे लोगों के हाथों में बहुत सारी तलवारें। एक एक के हाथ में अनेक तलवारें। कहीं आपस में ही न लड़ मरें। हमारे देश में और हर प्रदेश में हर बार, संसद और विधान सभाओं में जैसा भी माहौल होता है, वैसा ही जयपुर में भी है। लेकिन थोड़ा सा अलग। वसुंधरा राजे प्रदेश बीजेपी की मुखिया बन गई है और गुलाब चंद कटारिया विपक्ष के नेता। बाहर से सब कुछ ठीक ठाक। लेकिन अंदर घमासान। फुल। कोई किसी का मुंह भी देखना नहीं चाहता।

राजनीति की सबसे बड़ी मजबूरी यही है कि जिसको आप पसंद नहीं करते, वही सबसे ज्यादा बड़ी तस्वीर बनकर उभरता है। इसीलिए ज्यादा समझदार और सयाने राजनेता यह करते हैं कि वे जिसे पसंद नहीं करते, उसे कभी दर्शाते नहीं हैं। पर, बट्टे में आते ही इस तरह से निपटा देते हैं कि किसी को भनक तक नहीं लगती। लेकिन बहुत सारे बेऔकात और बेवकूफ किस्म के लोग खुद को प्रदेश स्तर के नेताओं की कतार में खड़े दिखाने की कोशिश में सीएम के पद पर बैठे बडे आदमी को भी भरी सभा में बुरा भला कहकर बड़े बनने के बजाय खुद की गली में भी अपनी इज्जत उतरवा लेते हैं। राजनीति में जंग जुबानों से नहीं, तरीकों से लड़ी जाती है। फिर, हमारे विपक्ष की तो कमजोरी भी सबसे बड़ी यह है कि उसे लड़ना तो सरकार से चाहिए, पर आपस में ही भिड़ा हुआ है। इस सबके बावजूद सरकार के होने की अपनी मजबूरियां भी होती हैं। विधानसभा के बजट सत्र में विपक्ष हंगामा कर सकता है। हमारे सीएम अशोक गहलोत ने मजबूत इंतजाम किए है। पहला दिन तो जैसे – तैसे बीत गया। लेकिन विपक्ष भले ही प्रदेश की कानून व्यवस्था को खराब बताकर सरकार को घेरने की कोशिश करेगा।

पर, अपना मानना है कि बजट सत्र में सरकार के सामने विपक्ष की अंदरूनी हालत कोई बहुत अच्छी नहीं रहेगी। गुलाबचन्द कटारिया पहले भी विपक्ष के नेता रहे हैं। तब भी वसुंधरा राजे ही प्रदेश बीजेपी की अध्यक्ष थी। वह मन से कटारिया को कितना भी पसंद नहीं करे, लेकिन विधानसभा के भीतर तो उनके नेता कटारिया ही हैं। आने वाले दिनों में हम सब देखेंगे कि वसुंधरा राजे सरकार पर हावी होने की कोशिश में सबसे पहले अपने नेता गुलाब चंद कटारिया पर ही हावी होगी। विधानसभा में कटारिया को सिर्फ नाम का नेता साबित करने के प्रयास में श्रीमती राजे के चंगू ऐसे – ऐसे खेल करेंगे कि देखने, पढ़ने और सुनने में बहुत मजा आएगा। इस पूरे परिदृश्य से अशोक गहलोत भले ही बहुत आश्वस्त लग रहे हैं कि सरकार के आखरी साल का आखरी बजट सत्र आसानी से निबट जाएगा। लेकिन मामला इतना भी आसान नहीं है। क्योंकि कटारिया पिछली बार जब विपक्ष के नेता थे, तो अंदर, विधानसभा में उन्होंने सरकार की हालत खराब कर रखी थी।

उधर, बाहर मैदान में वसुंधरा राजे ने कांग्रेस को पूरी तरह से लपेटे में ले रखा था। वैसे, कटारिया भी कोई मिट्टी के माधो नहीं है। सन सतत्तर से विधायक हैं। मजबूत हैं। ईमानदार भी हैं और राजनीतिक जीवन के उनके उच्च आदर्शों की तो उनके दुश्मन भी दुहाई देते हैं। सांसद रहे हैं, प्रदेश बीजेपी के मुखिया भी और हर बार मंत्री भी। सरकार को घेरना उनको आता है और अपने लोगों को कब्जे में रखना भी। कटारिया कितने भी सीधे दिखें, पर कोई भी पॉलीटिशियन सीधा कहां होता है। इस बार के विधानसभा अधिवेशन में बहुत मजा आएगा। लोग सरकार में रहकर मजे लेते हैं, पर आप और हम तो घर बैठे ही मजे लेते रहेंगे। ठीक है न…! 

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

अरे कोई इस राहुल भैया को राजनीति सिखाओ भाई… !

हरीश रावत अचानक बहुत खुश हैं। वैसे तो, रावत जितने बड़े आदमी हैं, उत्तराखंड में उससे भी बड़े नेता हैं। केंद्र में मंत्री भी हैं। राहुल गांधी के करीबी हैं और सोनियाजी भी उनको पसंद करती है। कांग्रेस में उनकी चलती है। रावत की जिंदगी में खुश होने के सारे साधन मौजूद हैं। लेकिन फिर भी आजकल अचानक ज्यादा खुश क्यों?

बात ऐसी है हुजूर, कि सहज, सामान्य और सरल जीवन में इंसान को अपनी मेहनत, खुद की हिम्मत और स्वयं की क्षमता के बूते पर जो कुछ हासिल होता है, उस पर उसे संतोष जरूर होता है। लेकिन जीवन में जिसे वह बड़ा मानता है, जिसे वह पसंद करता है और जिसके सपनों के साकार होने में अपनी सफलता के स्वर्णिम सपने संजोता है, उसकी तरफ से मिली छोटी सी खुशी भी जिंदगी की सबसे बड़ी सौगात बन जाती है। रावत को यह सौगात दी है राहुल गांधी ने। वैसे देखा जाए, तो दिखनेवाली चीज के रूप में तो उनको नया कुछ भी नहीं मिला। लेकिन राजनीति में ऐसा होता है हुजूर कि विरोधी को कोई फटकार मिले, तो सबसे ज्यादा खुशी हमें ही होती है। रावत इसीलिए ज्यादा खुश हैं, क्योंकि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उनके विरोधी और उत्तराखंड के सीएम विजय बहुगुणा को डांट दिया। डांट बहुगुणा को पड़ी और लाली रावत के चेहरे पर निखर गई।

दरअसल, हुआ यूं कि देश के सारे प्रदेश कांग्रेस प्रमुखों और विधायक दल के नेताओं की दिल्ली में हुई दो दिवसीय बैठक के समापन पर उत्तराखंड के सीएम विजय बहुगुणा ने राहुल गांधी को पीएम बनाने की मांग की। बहुगुणा के इस सुझाव का अनेक प्रदेश कांग्रेस प्रमुख और विधायक दल के नेताओं ने तत्काल स्वागत किया लेकिन जब सभी ने राहुल गांधी के तेवर देखे, तो सारे के सारे चुप्पी साध गए। गुस्से में राहुल गांधी ने बहुगुणा को झिड़क दिया। राहुल ने याद दिलाया कि समस्या प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर नहीं है बल्कि संगठन से जुड़ी है, जिन्हें पहले निपटाने की जरूरत है। राहुल ने साफ साफ कहा कि वे दोबारा उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने जैसी बातें नहीं सुनना चाहते।

वैसे, संसार का एक नियम है कि जिसे आप पसंद करते हैं, जिसे मन से चाहते हैं और जिसके बारे में आपको पक्का पता है कि उसको तो किसी और का नहीं आपका ही होना है, साथ ही वह फिलहाल अगर किसी और की होकर भी आपकी ही है, फिर भी उसको आपका बनाने की बात जब दूसरे लोग सार्वजनिक रूप से करें, तो किसी को भी इतनी चिढ़ तो मचती ही है। राहुल गांधी इसीलिए चिढ़ गए। वे जानते हैं कि कांग्रेस के राज में जब भी उनको पीएम की कुर्सी पर बैठना होगा, तो सरदारजी को बोलेंगे, कि जरा सरक लो भैया। अपना रास्ता पकड़ो। सरदारजी जाएंगे और राहुल भैया पीएम की कुर्सी पर आएंगे। दुनिया की कोई ताकत उनको रोक नहीं सकती। सो, ऐसे में दूसरे लोग जब उनको वहां बैठने – बिठाने की बात करें, तो उनका गुस्सा जायज माना जा सकता है।  

मगर, राजनीति में ऐसा नहीं होता। कोई दिग्विजय सिंह से कहिए… कि अरे गुरु महाराज हमारे राहुल भैया को थोड़ी राजनीति सिखाओ भाई… ! उनको समझाओ कि राजनीति में कोई कितना भी बड़ा हो, सुनना पड़ता है। यह हमारे बाप दादों की परंपरा है। जवाहर लाल नेहरू के जीते जी, हमारे देश ने इंदिरा गांधी में अपने अगले पीएम की तस्वीर देखी। इंदिराजी के रहते हुए ही लोग राजीव गांधी को उनका उत्तराधिकारी स्वीकार कर चुके थे। राहुल गांधी के बारे में पीएम की बात बहुत साल पहले तब के धुरंधर नेता अर्जुनसिंह ने सबसे पहले कही थी। दिग्विजय सिंह भी सालों से दहाड़ ही रहे हैं। सरदार मनमोहन सिंह भी कह ही चुके हैं। पूरी कांग्रेस और सोनिया गांधी भी चाहती है। नरेंद्र मोदी के मार्केट में आने के बावजूद देश का एक बहुत बड़ा वर्ग भी चाहता है। बहुगुणा को डांटने के दो दिन बाद अजीत जोगी ने भी वही मांग की। इस तरह तो सबको नाराज कर दोगे, राहुल भाई। किस – किस को डांटोगे, चुपचाप सुनते रहो ना…।  

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

दिल्ली आकर देश के दिल में बैठेंगे मोदी?

नरेंद्र मोदी दिल्ली आ रहे हैं। देश ने, आपने–हमने और खासकर कांग्रेस ने मोदी को इस मुकाम पर ला दिया है कि अब उनके पास दिल्ली आने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा है। वक्त आ गया है कि गुजरात से बाहर निकलें। वहीं रहे, तो जितने हैं, उससे बड़े नहीं होंगे। हालांकि देश के पीएम की कुर्सी पर बैठे होने के बावजूद अपने सरदारजी की गुजरात के सीएम मोदी के सामने कोई बहुत बड़ी  राजनीतिक औकात नहीं है। मोदी का कद इतना बड़ा हो गया है कि गुजरात के फ्रेम की साइज से उनकी तस्वीर बाहर निकलने लगी है। अब वे दिल्ली आएंगे। और देश की राजनीति में छाएंगे तो कांग्रेस को डर है कि मोदी बहुत कुछ अपने साथ बहा ले जाएंगे।

बीजेपी भी ऐसा ही मान रही है। इसीलिए मोदी को दिल्ली ला रही है। हालांकि पीएम के रूप में पेश करने से हिचक रही है। तकलीफ साथियों की है। लेकिन मोदी को गुजरात में रखते हुए गुजरात से निकाल कर देश राजनीति में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को लेकर कुछ अहम फैसले होने वाले हैं। अपनी खबर है कि अगले आम चुनाव में उनके ऊपर अहम जिम्मेदारी होगी। बहुत संभव है कि अगले कुछ दिनों में मोदी को देश के स्तर पर बीजेपी में बड़ी पोजिशन पर लाकर बड़ा धमाका किया जाएगा। कद तो उनका बड़ा है ही, पद भी इतना खास होगा कि पूरा का पूरा चुनाव उन्हीं के इर्द – गिर्द घूमता रहे। दो और तीन मार्च को दिल्ली में बीजेपी अध्यक्ष राजनाथसिंह की पहली कार्यकारिणी की बैठक होने वाली है। इसी में उनकी नई टीम की घोषणा होगी।

राजस्थान से ओम प्रकाश माथुर महासचिव हो सकते हैं। ओमजी भाई साहब के राजनीतिक उत्थान से जलनेवालों के बारे में विस्तार से कभी और बात करेंगे। फिलहाल मोदी का मामला निपटा लें। संघ परिवार ने अपनी सहमति दे दी है। राजनाथ सिंह ने खुद भी कहा ही है कि मार्च में होनेवाली पार्टी संसदीय बोर्ड की बैठक में फैसला लिया जाएगा कि बीजेपी का अपना पीएम का उम्मीदवार कब घोषित करेगी। हालांकि, मोदी को पार्टी का सबसे लोकप्रिय चेहरा बताकर राजनाथ सिंह ने इशारों इशारों में वैसे भी बहुत कुछ कह ही दिया है। वैसे, खबर यही है कि मोदी को बीजेपी की इलेक्शन कमेटी का मुखिया मनोनीत किया जा सकता है। ताकि टिकट बांटने में तो उनकी भूमिका रहे ही, दूसरी पार्टियों के साथ गठजोड़ और बीजेपी की हर बैठक में स्थायी रूप से शामिल होने के उनके रास्ते भी खुले रहें।

हालांकि अगर वक्त पर हुए तो लोकसभा के चुनाव 2014 में जून के आस पास होंगे। इसीलिए बीजेपी समझदारी से कदम उठा रही है। इसी साल राजस्थान, दिल्ली, एमपी सहित कुछ राज्यों में विधानसभा के चुनाव भी हैं। वहां भी कोई कम झंझट नहीं हैं। मोदी के सामने कोई बहुत ज्यादा लपड़ – झपड़ नहीं करेगा और इन विधानसभा चुनावों से देश के मामले में मोदी की ट्रेनिंग भी हो जाएगी। दूसरी तरफ देखा जाए, तो कांग्रेस नरेंद्र मोदी के नाम से चिढ़ती है। गुजरात के विकास की बात से कुढ़ती है। और आपस में ही लड़ती है। बीजेपी इसका भी फायदा उठाएगी। अपना मानना है कि मोदी के मामले में कांग्रेस से बहुत बड़ी गलती हो गई है। गलती कोई एकाध नहीं और गलती कोई हाल की भी नहीं। राजनीतिक नजरिए से देखें तो मोदी को उनके राजनीतिक जीवन में यह मुकाम बख्शने में कांग्रेस का ही सबसे बड़ा रोल रहा है। वह जिस तरह, तरीके और तेवर से मोदी का विरोध करती रही, मोदी उन्हीं तरह, तरीकों और तेवर को कांग्रेस को खिलाफ हथियार बनाकर हर बार विजेता बनते रहे। दरअसल, मोदी को आंकने में कांग्रेस ने जो गलती की, उसका भुगतान बहुत भारी हो रहा है। अब, जब वे दिल्ली आ रहे हैं, तो गांधीनगर में बैठकर गांधी परिवार के विरोध के जरिए देश जितने बड़े बननेवाले मोदी दिल्ली आकर देश के दिल में कितनी जगह बना पाते है, यह सबसे बड़ा सवाल है।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

कांग्रेस में कमजोर कड़ियों को कसने की कवायद शुरू

राजस्थान में विधानसभा चुनाव सर पर है। कांग्रेस ने तैयारी कर ली है। सीएम अशोक गहलोत कमर कस चुके हैं। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मिलकर बहुत सारे कामों की इजाजत एक साथ ले ली है। अब थोड़ी सी तेजी आनेवाली है। सवाल सिर्फ राजस्थान में कांग्रेस की सत्ता फिर से लाने का नहीं है। निशाना केंद्र की सरकार में फिर से आने पर भी है। यानी पहले प्रदेश, फिर पूरा देश। इसीलिए हर स्तर पर कांग्रेस की कमजोर कड़ियों को कसने की कवायद शुरू हो गई है। साथ ही ब्लॉक स्तर ही नहीं गांव और बूथ लेवल तक के मैनेजमेंट को भी मजबूत किया जा रहा है। सरकार और संगठन में सामंजस्य की तैयारी है और जो जहां मजबूत है वहां उसे ज्यादा जोरदार बनाने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है।

खास बात यह है कि राहुल गांधी की राय और सोनिया गांधी की सलाह पर राजस्थान में कांग्रेस ने सभी जिलों के अपने उन नेताओं पर भी नजर रखना शुरू कर दिया है, जो बड़े नेताओं के विरोध के बूते पर अपनी गली में ताकतवर बने हुए हैं। वैसे तो अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है। लेकिन ऐसे बहुत सारे शेर बने कुत्ते खुद को मजबूत करने की कोशिश में ज्यादा भौं-भौं करके घर और गली की शांति भंग करते रहते है। कांग्रेस ऐसे शेर बने कार्यकर्ताओं की नाक में नकेल की तैयारी है। तय हो गया है कि सख्ती से निपटा जाए। ज्यादा चूं-चपड़ करें, तो दरवाजा भी दिखाया जा सकता है। चेहरे जाने पहचाने हैं। क्योंकि बदमाशों को गांव, गली और मोहल्ले वाले तो बाद में जानते हैं। सबसे पहले घर के लोग उनकी असलियत पहचानते हैं। सो, कौन बदमाशी कर सकता हैं और कौन किसी भी हालात में बदमाशी करने से नहीं चूकेगा, सबके बारे में कांग्रेस को पता है। सूची बन गई है। नकेल तैयार है, और नाक भी। बस डालने की देर हैं। अपना मानना है कि सख्ती जरूरी है और कारवाई भी। क्योंकि सत्ता में बने रहने के लिए भले ही यह सब जरूरी नहीं हो, पर सत्ता में फिर से आने के लिए यह कुछ ज्यादा ही जरूरी है।

कांग्रेस को सत्ता में फिर से आना है। करो या मरो वाले हालात हैं। अभी नहीं तो कभी नहीं। जरा सी चूक हुई तो, पांच साल के लिए घर बैठना पड़ेगा। इस बार घर बैठना भारी पड़ेगा। क्योंकि मामला सिर्फ प्रदेश की सरकार का नहीं है। विधान सभा चुनावों के तत्काल बाद छह महीनो में ही लोकसभा के चुनाव हैं। विधानसभा हाथ से गई तो लोकसभा में भी सीटें नहीं आएगी। एक सीढ़ी से फिसले, तो दूसरी पर भी फिसलना तय है। विधानसभा तो झांकी है, दिल्ली की सत्ता में फिर से आना अभी बाकी है। कांग्रेस मान रही है कि प्रदेश अगर हाथ से निकल गया तो बाजी बीजेपी के हाथ रहेगी। क्योंकि जो जीता वो सिकंदर। महारानी श्रीमती वसुंधरा राजे वैसे भी कोई कम सिकंदर नहीं हैं। माहौल दमादम मस्त कलंदर वाला है। आक्रामक होकर मैदान में उतरी है। कांग्रेस इसीलिए बहुत सधे हुए कदमों से चल रही है। सबसे पहले घर संभालने की कोशिश है। संभालने के बाद उसे मजबूती देने की कवायद है।

कांग्रेस में भीतरघात की परंपरा पुरानी है। पर, इस बार बहुत सारी नई परंपराओं का निर्माण होगा। राहुल गांधी ने अशोक गहलोत से मिलकर इस बार कई पुराने मानदंडों से बहुत आगे की सोच का सख्त ताना बाना तैयार किया है। घर के गुंडों को औकात में रहने का संदेश दे दिया गया है। बदमाश इसलिए डरने लगे हैं। जिन्होंने अनुशासन तोड़ा है, वे ज्यादा डरे हुए हैं। करतूतें ही ऐसी हैं, तो डरना भी जरूरी है। सो, अनुशासनहीन भाई लोगों, जरा सावधान। दाढ़ी बढ़ाकर दबंगई करने की कोशिश अब नहीं चलेगी। अहसान फरामोश लोगों को इस तथ्य का भी खयाल रखना चाहिए कि कांग्रेस में बिना उस्तरे के हजामत बनाने की परंपरा भी बहुत पुरानी है। 

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.