बलात्कारी पुलिस अधिकारी को राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजने की घोषणा

Himanshu Kumar : छत्तीसगढ़ के एक और बलात्कारी पुलिस अधिकारी को राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजने की घोषणा करी गई है. इस बलात्कारी पुलिस अधिकारी का नाम है एसआरपी कल्लूरी. लेधा नामक एक आदिवासी महिला के साथ कल्लूरी और उसके सिपाहियों ने एक माह तक बलात्कार किया था. कल्लूरी साहब ने लेधा के गुप्तांगों में मिर्चें भर दी थीं. लेधा ने जिला जज के सामने अपने बयान में यह सब दर्ज करवाया था. लेकिन कल्लूरी ने पीड़ित महिला लेधा और उसके परिवार पर दबाव बनाना शुरू किया तो मानवाधिकार कार्यकर्ता उस बलात्कार के मामले को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में ले गये.

पुलिस अधिकारी कल्लूरी ने पीड़ित महिला के परिवार का अपहरण कर लिया. पीड़ित महिला लेधा ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में कहा कि मैं बलात्कार का अपना केस वापिस लेना चाहती हूं. हाई कोर्ट के जज ने पूछ कि तुम केस क्यों वापिस लेना चाहती हो लेधा? लेधा ने हाथ जोड़ कर रोते रोते कहा- आप मुझ से यह मत पूछिए. जज साहब ने मामला ख़ारिज कर दिया. अब भारत राष्ट्र बलात्कार करने वाले उन कल्लूरी साहब को सम्मान दे रहा है.

सभी देश प्रेमी सज्जनों से प्रार्थना है कि वे लेधा के विरुद्ध और कल्लूरी साहब के सम्मान में अपना सिर फख्र से ऊंचा कर लें. और हां, आदिवासी महिला लेधा की लड़ाई में उसका साथ देने वाले वकील और सामाजिक कार्यकर्ता श्री अमरनाथ पाण्डेय के ऊपर तेरह फर्जी मामले बना दिये हैं. अमरनाथ पाण्डेय साहब के छोटे भाई को हत्या के एक फर्जी मामले में फंसा कर उम्र कैद भी करवा दी गई है. कुछ समय पहले तक लेधा एक चाय की दूकान पर बर्तन मांजती थी. आजकल लेधा का पता ही नहीं चल रहा है.

अरे छोड़िये भी लेधा को. इस देश को लेधा की नहीं, कल्लूरी साहब की ज़रूरत है. कल्लोरी साहब के दम पर ही ज़मीने छीनी जा सकती हैं. ज़मीने छीन कर ही अमीर उस पर अपने उद्योग लगा सकते हैं.  आपको और आपके बच्चों को उन्ही उद्योगों में नौकरी मिलेगी, तभी आप शोपिंग माल में जा सकते हैं, कार खरीद सकते हैं, ऐश कर सकते हैं.

देखिये कल्लूरी साहब आपके लिये वहाँ कितनी मेहनत कर रहे हैं. लेधा से आपको क्या मिलेगा? चिल्ला चिल्ला कर अपना मूंह दुखाओगे बस. चिदम्बरम, मोदी, अंकित गर्ग और कल्लूरी इस देश के विकास के नए और सफल प्रयोग हैं. क्या फायदा भगत सिंह गांधी अम्बेडकर की और समता समाजवाद और न्याय की बकवास करने की? विश्वशक्ति भारत के गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर आप सब को बधाइयां.

हिमांशु कुमार के फेसबुक वॉल से.

उस झूठे और करप्ट आईजी की फर्जी प्रेस रिलीज को किसी पत्रकार ने नहीं छापा

Himanshu Kumar : जब हम दंतेवाड़ा में काम करते थे तब एक बार वहाँ एक आई जी साहब की नियुक्ति हुई. एक बार उन्होंने पत्रकारों को अपने आफिस में बुलाया. अपने एक पत्रकार मित्र के साथ मैं भी वहाँ चला गया. आईजी साहब के कार्यालय में एक आदिवासी लड़का जिसकी उम्र करीब सोलह साल की होगी और साथ में एक आदिवासी लड़की जिसकी उम्र करीब पन्द्रह की रही होगी, सहमे हुए बैठे थे. दोनों ने नक्सलियों वाली एकदम नई हरी वर्दी पहनी हुई थी. मुझे शक हुआ कि जंगल से आने वाले नक्सली के पास एकदम नए साफ़ कपडे कहाँ से आये?

आईजी साहब ने सभी पत्रकारों से इन दोनों का परिचय करवाया और बताया कि ये लड़का लड़की दोनों खूंखार नक्सली कमांडर हैं और इन्होंने आज ही पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया है. आत्म समर्पण के बाद इन्होंने दंतेश्वरी माता के मंदिर में शपथ ली है कि ये लोग अब से कभी देशद्रोहियों का साथ नहीं देंगे.

इसके बाद आईजी साहब ने एक लिखा हुआ प्रेस स्टेटमेंट सभी को बाँट दिया. आईजी साहब ने कहा कि इन दोनों पूर्व नक्सलियों की सुरक्षा के लिहाज़ से पत्रकारों को इनसे कुछ पूछने की इजाज़त नहीं दी जा सकती. और अब आप लोग जा सकते हैं. उन्होंने सभी पत्रकारों से कहा कि इस खबर को प्रमुखता से छापा जाए. सभी पत्रकार उठ कर बाहर आने लगे. मैंने कहा कि एक मिनट रुकिए. सब खड़े रहे. मैंने कहा साहब मुझे बस एक बात पूछनी है. आईजी साहब ने कुछ क्षण सोचा और फिर उन्होंने मुझे बस एक बात पूछने की इजाजत दे दी. मैंने बस्तर की आदिवासी बोली में पूछा 'इव घिसिड मीकिन बेनूर इत्तौर' अर्थात यह कपडे तुम्हें किसने दिये? लड़का तो घबरा गया पर लड़की ने भोलेपन से आईजी साहब की तरफ आँखें घुमा कर कहाँ 'वेर साहब इत्तौर' अर्थात इस साहब ने दी. मैंने कहा बस साहब मुझे अब और कुछ नहीं पूछना है. इसके बाद हम सभी लोग आईजी साहब के आफिस से बाहर आ गये .

दंतेवाड़ा के किसी पत्रकार को तो गोंडी आती नहीं थी. मैंने बाहर आकर सभी पत्रकारों से कहा कि भाइयों इन तथाकथित आत्मसमर्पित नक्सलियों का तो कहना है कि यह वर्दी तो उन्हें पुलिस ने बनवा कर पहनाई है. इसलिए पुलिस के दावे पर कैसे विश्वास किया जाय? इसके बाद किसी भी पत्रकार ने आत्मसमर्पण वाली वह खबर नहीं छापी.

बाद में वो आईजी साहब भ्रष्टाचार के मामले में काफी चर्चित हुए. निलम्बित भी हुए. उनके बारे में कहा जाता था कि वह अक्सर नकली आत्मसमर्पण करवाते थे, और सरकार आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिये जो पैसा भेजती थी वह आई जी साहब हड़प लेते थे. शुभ्रांशु चौधरी ने अभी अपनी नई किताब 'उसका नाम वासु था' में इन्ही आई जी साहब की ईमानदारी के कसीदे काढे हैं और अपने एक काल्पनिक नक्सली पात्र के मूंह से आईजी साहब की ईमानदारी की प्रशंसा करवाई है.

मुझे ठीक से तो नहीं पता की शुभ्रांशु ने आईजी साहब को अपने काल्पनिक नक्सली पात्र से क्यों क्लीन चिट दिलवाई है. लेकिन परिस्थिगत साक्ष्य यह कहते हैं की चूंकि शुभ्रांशु ने यह किताब भोपाल में बैठ कर लिखी थी. और यह वाले आई जी साहब भी भोपाल में ही रहते हैं. किताब लिखते समय अपने तथ्यों को क्रोस चेक करने के लिए शुभ्रांशु को उनके पास जाना पड़ता होगा. इस दोस्ती क्या फायदा आई जी साहब ने उठा लिया. शुभ्रांशु को भी इसमें क्या नुकसान होना था. दो वाक्य लिखने में कौन से हाथ दुखे जाते हैं.

इस किताब में एक जगह लेखक ने लिखा है की सिंगारम गाँव में जो उन्नीस आदिवासी मरे गए थे वे निर्दोष आदिवासी नहीं थे क्योंकि उनमे से सीते नामकी लडकी तो हत्याकांड के मुख्य आरोपी एसपीओ मडकम मुद्राज की पूर्व सहायक थी और यह मद्कम मुद्राज पहले नक्सली था और उस हत्या के समय सीते दरअसल आदिवासियों की मीटिंग कर रही थी .

इस हत्याकांड का मुकदमा हम लोग अभी भी छत्तीसगढ़ के हाई कोर्ट में लड़ रहे हैं . असल में एसपीओ मडकं मुद्राज और उसके साथियों ने गाँव पर हमला बोल कर उन्नीस आदिवासियों को मार डाला था। मरे गए आदिवासियों में चार लडकियां भी थीं .चारों लड़कियों के साथ बलात्कार भी किया गया था. यहाँ शुभ्रांशु कहना चाहते हैं की देखो मार डाली गयी वह लडकी निर्दोष नहीं थी क्योंकि वह तो नक्सलियों की मीटिंग कर रही थी .इस प्रकार का लेखन तो दंतेवाडा के सस्ते पत्रकार भी एसपी से पैसे खाकर नहीं करते परन्तु शुभ्रांशु ने इस किताब के द्वारा सरकार की सारी क्रूर हरकतों को सही ठहराने की भी शरारत पूर्ण कोशिश की है.

इसी प्रकार से एक अन्य जगह पर लेखक ने लिखा है कि गांधीवादी लोगों ने (वह गांधीवादी मैं ही हूँ ) सलवा जुडूम द्वारा जला दिये गये नेन्द्रा नामक गाँव को दोबारा बसाया था . वहां का पूर्व सरपच तमैय्या असल में पहले नक्सलियों के साथ मिल कर एर्राबोर बाज़ार लूटने की वारदात में शामिल था , और इसलिए वह डेढ़ साल जेल में भी रहा . लेखक के अनुसार यह बात तमैय्या ने लेखक को कभी नहीं बताई हांलाकि वह उसके गाँव में उसके साथ कई दिन तक रहा .

हम नेन्द्रा गाँव के आदिवासियों को आंध्र प्रदेश और बस्तर के जंगलों से वापिस लाये थे और दोबारा उनके गाँव में बसाया था. और हमने सरकार को चुनौती दी थी कि अगर सरकार इन आदिवासियों को मारना चाहती है तो सरकार को पहले हमारी हत्या करनी पड़ेगी . सब जानते हैं की नेन्द्रा गाँव में आदिवासियों को सलवा जुडूम और सरकार के ज़ुल्मों से बचाने के लिए किये गए हमारे मानव कवच के प्रयोग से सरकार की कितनी थू थू हुई थी. इसलिए शुभ्रांशु इस किताब के माध्यम से यह कहने की कोशिश करना चाह रहे हैं की देखो गांधीवादी लोग भी असल में नक्सलियों की रक्षा कर रहे थे. इस तरह की मनगढ़ंत बातों से किसको फायदा होगा सभी जानते है.

इस किताब के द्वारा दरअसल शुभ्रांशु ने सरकार के मूंह पर लगे सारे कीचड़ को धोने की कोशिश करी है . और उन सारे लोगों की विश्वसनीयता पर कीचड उछाला है जिनसे सरकार को परेशानी हो रही है . उदहारण के लिये इस किताब में बिनायक सेन के बारे में जो भी लिखा गया है वह तो हूँ- बहु पुलिस की कहानी है. और यह कहानी तो रोज़ छत्तीसगढ़ के अखबारों में छपती थी . इसको जानने के लिये किसी नक्सली से मिलने की ज़रूरत थोड़े ही है . यह कहानी तो रायपुर को कोई भी पुलिस वाला एक डोसा खाकर आपको आराम से सुना देता. जहां तक नक्सलियों का सवाल है हमने भी नक्सली देखे हैं . लेकिन कोई भी नक्सली कभी अपने साथ करने वाले लोगों की सूची किसी पत्रकार को नहीं देता .लेकिन शुभ्रांशु की किताब तो कमाल है, उसमे नक्सली खुद हवाई जहाज में बैठ कर दिल्ली आकर रेस्टोरेन्ट में बैठ कर डोसा खाते हुए अपने साथियों की लिस्ट दिल्ली में रहने वाले शुभ्रांशु नामक एक पत्रकार को बताते हैं .

दूसरी एक समझने वाली बात. शुभ्रांशु सीजी नेट नामक एक इंटरनेट ग्रूप चलाते हैं . उस ग्रूप पर शुभ्रांशु की मदद से बिनायक सेन की रिहाई के लिये ज़ोरदार अभियान चलाया गया. अगर शुभ्रांशु को बिनायक के जेल जाते ही पता चल गया था कि बिनायक नक्सलियों के पत्रवाहक (कूरियर) हैं तो उसी समय शुभ्रांशु को उस अभियान से अपने सी जी नेट को अलग कर लेना चाहिये था .लेकिन अब जाकर शुभ्रांशु चौधरी का ह्रदय परिवर्तन कैसे हो गया? छत्तीसगढ़ में सब जानते हैं कि आजकल शुभ्रांशु चौधरी जी रमन सिंह के साथ मंच साझा करने लगे हैं और अब अचानक शुभ्रांशु को ख्याल आया है कि अरे मुझे तो एक नक्सली ने यह कहा था कि बिनायक सेन तो हमारे कूरियर हैं. और छात्तिसगढ़ में काम कर रहे गांधीवादी भी दरअसल नक्सलियों की रक्षा करने में लगे थे.

इस सब को लिखने से ना तो बस्तर की जनता का फायदा होगा. ना देश में नक्सलवाद को समझना चाह रहे लोगों को इस से कोई नई जानकारी मिलेगी. हाँ पुलिस और छत्तीसगढ़ सरकार के कई मूर्खतापूर्ण दावे जो वह मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बारे में करती थी कि यह लोग तो नक्सलियों के लिये काम करते हैं उन्हें सच साबित करने की नाकाम कोशिश इस किताब में की गयी है.

हिमांशु कुमार के फेसबुक वॉल से.

यूपी पुलिस का हाल – अपहरण किया, खूब पीटा, जुर्म साबित न हुआ तो घर के बाहर पटक गए

यूपी पुलिस किस तरह अपना काम करती है, इसे बताने की जरूरत नहीं. अक्सर इनकी क्रूर, बर्बर, असभ्य और अमानवीय तस्वीर सामने आती रहती है. ताजा मामला आगरा का है. कुछ ऐसी तस्वीरें दिखाते हैं जिससे आगरा पुलिस की बर्बरता साफ नजर आती है….पुलिस ने एक युवक को इतनी बर्बरता से पीटा जिसे देख आपकी रूह कांप जाये… पुलिस इस युवक को चोरी के मामले में पकड़ लायी थी …

मामला आगरा के थाना सदर क्षेत्र का है जहाँ मुस्तफा क्वाटर में  रहने वाले जंगबहादुर के घर पर 14 सितम्बर की रात कुछ पुलिसकर्मी अपने एक वरिष्ठ अधिकारी के साथ घर में  घुस आते हैं और  जंगबहादुर के 24 वर्षीय बेटे श्रीकांत यादव पर चोरी का आरोप बताकर उसे घर से ले जाते हैं ….इस बीच जब घरवालों ने उनको रोकना चाहा और पूछना चाहा कि किस जुर्म में उनके बेटे को ले जा रहे हैं तो उनके साथ भी मारपीट की गयी ….

परिजनों कहना था कि पुलिसकर्मियों के साथ उनके अधिकारी एएसपी दिनेश कुमार भी थे ….   पुलिस उनके बेटे को ले गयी  और पूरी रात पूछताछ के नाम पर उसे करंट व लाठी डंडों से मारपीट करती रही … जब श्रीकांत पर जुर्म साबित नहीं हुआ तो दूसरे दिन उसे घर के बहार पटक गए और धमकी भी दी  कि किसी को भी शिकायत की तो किसी भी अपराध में फंसा  कर जेल भेज देंगे ….. यह सुनकर उस समय तो परिजन शांत हो गए लेकिन जब बेटे श्रीकांत यादव की हालत बिगड़ने लगी तो परिजनों ने न्याय की मांग की और कोर्ट का दरवाजा खटखटाया … जिस पर अब कोर्ट ने ए.एस.पी दिनेश कुमार, सिपाही महेश कुमार, सिपाही लोकेन्द्र, दरोगा जसपाल पवार के खिलाप थाना सदर को मुक़दमे के आदेश दिए और थाना सदर में इन पुलिस कर्मियों के खिलाफ धारा 326,395 के तहत मुकद्दमा भी दर्ज हो गया ……..

श्रीकान्त के परिजनों की मानें तो उस घटना के बाद से उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं है …. इस घटना के बाद कोई भी दोषी पुलिसकर्मी मीडिया के सामने नहीं आ रहा है वहीं दूसरी ओर पीड़ित और उसके परिजनों पर लगातार राजीनामा के लिए दबाव बनाया जा रहा है और धमकाया जा रहा है…. लेकिन पीड़ित परिवार अब सिर्फ न्याय की बात कह रहा है……  जब इस मामले में आईजी जोन आगरा भवेश कुमार से बात की गयी  उन्होंने जांच के बाद उचित कार्यवाही की बात कही…

श्रीकांत यादव, पीड़ित का बयान- सितम्बर की रात को कुछ पुलिस कर्मी दिनेश कुमार ए .एस .पी के साथ आये थे एस .ओ .जी कर्मी भी था उनके साथ उन्होंने किवाड़ में लात मारी और हमें घर से उठाकर ले गए थे… करेंट लगाया, काफी मार-पीट की थी जिसकी सुचना हमारे पिताजी द्वारा मुख्यमंत्री आयोग न्यायालय में दी गई थी ….थाने में गए हम… मुकद्दमा लिखा नहीं गया था… …..दिनेश कुमार बोलते हैं एक डेढ़ लाख रूपए जो चाहिए ले लो, जो तुम्हारा खर्च हो गया है, वो हम तुम्हे दे देंगे, तुम जो करना है कर लो, इसमें राजीनामा होगा….. न्याय नहीं हुआ तो हम आत्महत्या कर लेंगे….

जंग बहादुर यादव, पीड़ित का पिता – मेरे बच्चे को बदमाश के नाम से उठा कर ले गए… उसको इतना मारा -पीटा जिससे बेहाल हो गया… मैंने सभी जगह खबर की… फैक्स दिए.. टेलीग्राम मुख्यमंत्री को भी भेजा… मानवाधिकार को भी भेजा.. मुझे कहीं से कुछ न्याय नहीं मिला …अब वो दबाव डाल रहे हैं.. सदर थाने की पुलिस आती है … रोज आये दिन आते हैं… दबाव डालते हैं… राजीनामा कर लो. तुम कुछ नहीं कर पाओगे …

आगरा से पंकज गुप्ता की रिपोर्ट.

डीआईजी ने रजिस्‍टर पर लिखा यूपी शासन में सब कुछ अवैध

लखनऊ :  उत्तर प्रदेश के डीआईजी (फायर सर्विसेज) देवेंद्र दत्त मिश्र ने शुक्रवार को सनसनी फैला दी। उन्होंने विभाग के कंट्रोल रूम के रजिस्टर पर लिख दिया, शासन एवं सभी कुछ अवैध है। इससे बड़ा घोटाला संभव नहीं है। इसके बाद उन्होंने दैनिक जागरण कार्यालय फोन कर कहा कि वह अपना दर्द बयां करना चाहते हैं। उन्होंने अपने कार्यालय में दैनिक जागरण के साथ बातचीत की। बाद में उन्हें जबरन अस्पताल ले जाया गया। देवेंद्र दत्त मिश्र ने कहा कि शासन में सब भ्रष्ट हैं।

खरीद-फरोख्त की फाइलों पर कल तक मेरे भी हस्ताक्षर हुए हैं, लेकिन मैं जानता हूं कि सब गलत है। आज मुझे होश आया तो रिस्क उठा रहा हूं। मिश्र ने अग्निशमन सेवा में करोड़ों की अवैध खरीद फरोख्त का आरोप लगाते हुए कहा कि 13 वाटर टैंकर की बाडी के अवैध निर्माण में खरीद आदेश पर दस्तखत करने को एडीजी दबाव डाल रहे थे। उन्होंने लड़ाई को आगे ले जाने का एलान किया और यह भी कहा उनकी जान को खतरा है लेकिन सुरक्षा के लिए सरकार से कोई मांग नहीं करेंगे। उन्होंने आरोप भी लगाया कि आइएएस हरमिन्दर राज ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि उनकी हत्या की गई क्योंकि शासन के भ्रष्टाचार के कई सबूत उनके हाथ लग गए थे। मिश्र ने दो टूक कहा कि उनकी इस कदम पर अगर उन्हें निलंबित किया गया तो वह कोर्ट जाएंगे।

अपनी सीट के पीछे लगी महात्मा गांधी की तस्वीर की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि पूरी सेवा में कभी मैंने किसी की मिठाई नहीं खाई। गांधी जी के आदर्शो पर चलते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम बढ़ा रहा हूं। उन्होंने गैलेंट्री अवार्ड के लिए चल रही दो सिपाहियों की फाइल पर भी लिख दिया कि उन्हें बर्खास्त किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि कोर्ट ने भी इन सिपाहियों को अवार्ड देने पर रोक लगा दी है। मिश्र को इस बात का भी गम साल रहा है कि उनको इस सरकार में प्रतिकूल प्रविष्टि मिली है। उल्लेखनीय है कि अभी मिश्र की सेवा अवधि दो साल एक माह बची है। उन्होंने यह भी कहा कि उनका इरादा राजनीति करने का नहीं है। देवेंद्र दत्त मिश्र के कार्यालय के कर्मचारियों का कहना है कि डीआइजी ने सबेरे आते ही फाइलें मांगी और उन पर टिप्पणियां लिखनी शुरू कर दीं।

उधर, एडीजी डॉ. हरिश्चन्द्र सिंह अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से हतप्रभ हैं। उनका कहना है कि खरीद-फरोख्त का निर्णय कोई एक आदमी नहीं करता है। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि वह ऐसा क्यों कह रहे हैं। सिंह ने यह भी कहा कि अभी तो वह 18 अक्टूबर को ही विभाग में आए हैं। अपर पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था से जब डीआइजी देवेन्द्र दत्त मिश्र की टिप्पणी के संदर्भ में पूछा गया तो उन्होंने कहा मुझे इतना पता चला है कि उन्होंने तीन चार पत्रावलियों में कुछ अंकित किया है, लेकिन पूरा मामला क्या है, इस पर एडीजी से रिपोर्ट लूंगा। साभार : जागरण