अगवा बेटी के लिए किसान अब कहां करे फरियाद?

इलाहाबाद। सत्तासीन होने के बाद अखिलेश सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती पटरी से उतरी कानून व्यवस्था को दुरूस्त करना, पुलिस की मनमानी को रोकना था। पर, पुलिस है कि हम नहीं सुधरेंगे की तर्ज पर कार्य करने पर आमादा है। भले ही इसके चलते सरकार को विधानसभा से लेकर सड़क तक बार-बार शर्मिंदगी क्यों न उठानी पड़ रही हो। समाजवादियों को जनता के सामने निरूत्तर होना पड़ रहा हो। कुंडा से देवरिया तक सरकार के मुखिया और पुलिस के मुखिया को तगड़े जनाक्रोश का सामना क्यों न करना पड़ रहा हो। पता नहीं इन घटनाओं से ‘सरकार-बहादुर’ सबक ले भी रही है या नहीं।

सूबे के थानों में आम जनता का रिपोर्ट लिखाना कितना कठिन है, इसे जानना हो तो अखिलेश जी या बड़े अफसर पहचान छिपाकर किसी भी थाने में रिपोर्ट लिखाने की टेस्टिंग कर सकते हैं। अगर किसी तरह रिपोर्ट दर्ज भी हो जाए तो आगे की कार्रवाई टेढ़ी खीर साबित होती है। ताजा मामला इलाहाबाद के गंगापार इलाके के नवाबगंज थाने का है। अर्जुनपुर गांव निवासी एक किसान अपनी अगवा बिटिया की तलाश में महीने भर से भटकने को मजबूर हो रहा है। स्थानीय थाने से लेकर एसएसपी और डीआईजी दफ्तर तक पहुंचकर गुहार लगाई पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

नवाबगंज थाने के अर्जुनपुर गांव का निवासी छेदीलाल लोहार 31 जनवरी को अपनी बीमार पत्नी का इलाज कराने नवाबगंज गया था। साथ में उसकी पत्नी भी थी। चार युवक मार्शल लेकर उसके घर पहुंचे और बेटी को उसके माता-पिता का एक्सीडेंट बताकर मार्शल में बैठा लिया और रफूचक्कर हो गए। शाम को घर पहुंचने के बाद छेदीलाल लोहार को घटना की जानकारी हुई। काफी खोजबीन के बाद भी उसकी नाबालिग बेटी का पता नहीं चला। छेदीलाल की थाने में रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की गई। निराश होकर उसने दो मार्च को एसएसपी मोहित अग्रवाल को दरख्वास्त दी लेकिन फिर भी कार्रवाई नहीं हुई। पांच मार्च को डीआईजी ऑफिस पहुंचकर छेदीलाल ने मामले की शिकायत कर न्याय की गुहार लगाई पर दरख्वास्त लेकर उसे रूखसत कर दिया गया।

सवाल है कि सूबे में पुलिस समाजवाद का कौन सा नया नारा गढ़ रही है। गुंडे-माफियाओं के सामने भीगी बिल्ली बनने और आम नागरिकों के सामने गुर्राने से किसका नुकसान होगा, हे समाजवादियों! अब यह बताने की तो जरूरत नहीं ही है। आखिर यूपी के तमाम ‘छेदीलालों’ को कैसे अहसास होगा कि प्रदेश में सरकार नाम की कोई चीज भी है।

इलाहाबाद से वरिष्‍ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

अखिलेश जी! आवाम के इस गुस्से को समझिए

इलाहाबाद। कुंडा में पुलिस अफसर की हत्या, जिन पर जनता के सुरक्षा की जिम्मेवारी, वे सरेआम मारे जा रहे हैं। डिप्टी एसपी के साथ बलीपुर गांव जा रहे वर्दीधारी सशस्त्र पुलिसकर्मियों का भयवश खेतों में घंटे छिपे रहना। पुलिस अफसर के कत्ल में खून के छींटे सरकार के कैबिनेट मंत्री के दामन पड़ना…आखिर क्या हो रहा है यूपी में। इन घटनाओं से उपजे कई सवाल, जवाब तलाश रहे हैं।

मत भूलिए कि राजनीति के पेशेवर ‘घड़ियालों’ से ऊबकर सूबे की आवाम ने युवा, ऊर्जावान और फ्रेश चेहरे यानी अखिलेश को सत्ता सौंपी थी। आवाम ने यह उम्मीद लगा रखी थी कि राजनीतिक धूर्तता और कांइयापन वाले उन चेहरों से निजात मिलेगी। राजनीतिक दलों का नाम भले ही अलग-अलग हो पर कमोबेश एक जैसी ही प्रवृत्ति लगभग सभी दलों में मिलती है, चाहे वह बसपा, हो या कांग्रेस या फिर चाल चरित्र चेहरा के नारे वाली भाजपा। सत्ता में आते ही बिचौलियों की बढ़ती भागीदारी दलों की पहचान ही नहीं बदलतीं, बल्कि उसकी नस्ल तक बदल डालती हैं। सपा, बसपा, कांग्रेस और भाजपा में पचास फीसदी से ज्यादा बड़े नेता ऐसे हैं जो संगठन में पद और चुनाव में टिकट न मिलने पर जिंदा ही नहीं रह सकते। बेहयाई की हद पार कर दल बदलने में रंचमात्र संकोच नहीं होता। न दल बदलने वालों को कोई शर्म न दलों में शामिल करने वाले बड़े नेताओं को कोई परहेज।

खैर, अब आइए असल मुद्दे पर। जनता ने सन् 2007 के चुनाव में अनिल अंबानी, अमर सिंह, अमिताभ बच्चन, सुब्रत राय सहारा एंड कंपनियों के बीच ता-ता-थैया करते जिन छद्म समाजवादियों को परे धकेल अफसरों के प्रति कड़ा रूख अपनाने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती को सत्ता सौंपी, उसी जनता ने सन् 2012 के विधानसभा चुनाव में सत्ता के नए सारथी अखिलेश यादव पर भरोसा जताया। यह केवल बेरोजगारी भत्ता, लैपटाप और टैबलेट देने की घोषणाओं का ही कमाल नहीं था। चुनावी घोषणाओं का अमल कितना होता है, यह आवाम भलीभांति जानता है। अखिलेश यादव को प्रचंड बहुमत मिलने की एक वजह यह भी रही कि चापलूसी संस्कृति वाली कांग्रेस आक्सीजन पर थी तो भाजपा आपसी द्वंद्व से जूझ रही थी। बाकी बची कसर भ्रष्‍टाचार को मुद्दा बनाकर चुनाव में उतरी भाजपा ने भ्रष्‍टाचार के बड़े सरगना बाबूसिंह कुशवाहा को गले लगाकर यह संदेश देने की कोशिश की थी कि भ्रष्‍टाचारी सरकार बसपा को हटाकर सत्ता हमें सौंपो, हमारे पाले में अब भ्रष्‍टाचार का सबसे बड़ा खिलाड़ी आ गया है। इन सब हालात में सूबे की आवाम ने अखिलेश को पसंद कर सत्ता की चाभी सौंप दी।

पर यह क्या? आवाम का इकबाल एक बार फिर से छला जाने लगा है। मंत्रिमंडल विस्तार में जब कई दागियों को लालबत्ती मिली तभी लोगों को चौंकना पड़ा। मंत्री बनने वाले ये बाहुबली और उनके गुर्गे लालबत्ती की आंड़ में सड़क को खून से लाल करने में कितना पीछे रहेंगे? गोंडा में सीएमओ का अपहरण करने वाले मंत्री विनोद सिंह उर्फ विनोद पंडित को पहले मंत्री पद से बर्खास्त किया गया। कुछ समय बीतने पर मामला बासी हो गया समझकर फिर से दुबारा उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया जाता है। अंतरप्रांतीय पशु तस्करी वाले रैकेट के बड़े खिलाड़ी केसी पांडेय को राज्यमंत्री पद का दर्जा देना और स्टिंग आपरेशन कर के उन्हें सुबूत के साथ पकड़ने वाले जाबांज एसपी नवनीत सिंह राणा को पैदल करना आखिर जनता के बीच क्या संदेश दे रहे हैं। कुंडा में आतंक के पर्याय रहे राजा भैया को कैबिनेट मंत्री बनाना, सूबे के सबसे बड़े माफिया डॉन की पहचान रखने वाले विजय मिश्र को टिकट देकर पहले विधानसभा में दाखिल कराया, फिर उनकी बेटी सीमा मिश्रा को लोकसभा का प्रत्याशी बनाना।

इतना ही नहीं, पिछले महीने विजय मिश्र की बेटी की शादी में कुनबे समेत अखिलेश यादव का शामिल होकर ‘हम सब साथ-साथ हैं’ वाले एपिसोड को दुहराया गया। प्रतापगढ़ जिले के कुंडा में ग्रामप्रधान नन्हे यादव, उनके भाई सुरेश यादव की हत्या के बाद मौके पर जा रहे जांबाज पुलिस अफसर जियाउल हक को मौत के घाट उतारने की दुस्साहसिक घटना। एक दिन में तीन कत्ल। कानून व्यवस्था ही नहीं बल्कि लचर पुलिसिया कार्यशैली पर भी लोगों को अंगुलियां उठाने को मजबूर कर दिया है। उधर, देवरिया में मुख्यमंत्री वापस जाओ, डीजीपी चूड़ियां पहनो, डांस करो जैसे नारों के बीच सीएम का कड़ा विरोध। अखिलेश को रास्ता बदल कर जाने को मजबूर होना पड़ रहा है। इतना ही नहीं, प्रदेश के पुलिस मुखिया से सत्ता के मुखिया के सामने शहीद पुलिस अफसर की पत्नी परवीन के सवालों पर निरूत्तर होकर बगलें झांकना और नजरें चुराना, आखिर क्या संदेश दे रहे हैं? अखिलेश जी मत भूलिए लोकसभा का चुनाव नजदीक है, उसमें ये सब बड़ा पलीता साबित हो रहे हैं। ऐसे में क्या होगा समाजवादियों के ‘मिशन 2012 और लक्ष्य 2014’ वाले नारे का? चेतिए, देखिए, जनता के इस मर्म को कायदे से समझिए।

इलाहाबाद से वरिष्‍ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मोबाइल नम्‍बर 09565694757 के जरिए किया जा सकता है.

इलाहाबाद में गोली मारकर प्रधान पति की हत्‍या

इलाहाबाद। गंगापार के नवाबगंज में अपराध थमने का नाम नहीं ले रहा है। कछार के अकबरपुर उर्फ गंगागंज में दो मार्च को दिनदहाड़े ताबडतोड़ गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया। कत्ल के पीछे पुरानी चुनावी रंजिश बताई जा रही है। मृतक के भाई नौशाद ने थाने में एफआईआर दर्ज कराई है। इसमें उसी गांव के ही तीन लोगों को नामजद कराया गया है। पुलिस अफसरों ने मौके पर पहुंचकर लोगों से पूछताछ की। देर शाम तक किसी भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया जा सका है।

इब्ने अहमद की पत्नी मेहनाज बानो वर्तमान में अकबरपुर उर्फ गंगागंज की प्रधान है। इसके पहले खुद इब्ने अहमद भी ग्रामप्रधान चुना गया था। इब्ने अहमद पर जानलेवा हमला उस समय किया गया जब वह मनरेगा के तहत ग्रामपंचायत के मजरे गंगागंज में खडंजा मार्ग और नाली का निर्माण करा रहा था। दोपहर करीब एक बजे इब्ने अहमद गांव के ही दशाराम पटेल के दरवाजे पर बैठा था तभी तीन युवक वहां आए और रायफल-तमंचा निकाल कर इब्ने पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। फायरिंग होते ही वहां भगदड़ मच गई। घटना को अंजाम देने के बाद हमलावर हवा में फायरिंग करते हुए मौके से भाग निकलने में कामयाब रहे।
 
उधर, फायरिंग की आवाज सुनकर मौके पर ग्रामीण आ जुटे। इब्ने ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया। उसके गले के पीछे और पेट के हिस्से में गोली लगी थी। घटना की सूचना पाकर परिजन भी मौके पर आ गए। पुलिस को जानकारी दी गई। नवाबगंज पुलिस ने लाश का पंचनामा कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। वारदात स्थल पर सोरांव के सीओ राहुल मिश्र, एसपी गंगापार शफीक अहमद कई थाने की फोर्स लेकर मौके पर पहुंचे। मृतक इब्ने अहमद चार भाइयों में दूसरे नंबर पर था। इब्ने के तीन बेटे और तीन बेटियां हैं। इस घटना में उसी गांव के सउद फैसल, शेरे और राशिद को नामजद किया गया है। नवाबगंज एसओ आदित्य कुमार सिंह ने बताया कि घटना की जांच की जा रही है।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट।

फिर मिलने के वादे संग कल्पवासी लौटने लगे घर

इलाहाबाद। संगम की रेती को माथे लगा त्रिवेणी मइया का आशीष मांगा। पड़ोसियों से गले मिले और फिर मिलने का वादा कर लाखों कल्पवासी संगम नगरी से अपने-अपने घरों को विदा हो गए। ना कोई नेवता ना कोई चिट्ठी, बिन बुलाए ही करोड़ों लोगों का हर साल सैकड़ों-हजारों किमी दूर से यहां आना। एक अलौकिक उत्सव… जहां शब्द फीके पड़ जाते हैं। संगम के किनारे बालू की रेती पर आनंद लेना… इसे सिर्फ महसूस ही करके जाना जा सकता है।

घर-गृहस्थी छोड़ एक महीने के लिए संगम के किनारे रेती में सोना, खाना, रहना सब कुछ चला। साथ में पूजा-पाठ, सुबह-शाम घाट पर स्नान करने जाना हो या सत्संग-प्रवचन सुनने, इन सभी में साथ आए-गए। ऐसे में लगाव होना स्वाभाविक था। माघी पूर्णिमा स्नान के बाद कल्पवासियों के विदाई की बेला थी। महीनेभर बाद घर वापस लौटने का समय आया तो त्रिवेणी मइया और पड़ोसी से बिछड़ने का गम चेहरों पर साफ दिखा। थोड़े दिनों का ही सही, स्नेह और लगाव तो हो ही जाता है।

सो, विदा होते कल्पवासियों के चेहरे पर गम साफतौर पर दिखा। गले मिलकर विदा होते समय कई महिलाओं, खासकर बूढ़ी दादी अम्माओं की आंखें भर आईं। भर्राए गले से बामुश्किल आवाज निकली-‘अच्छा! चल रहे हैं दुलहिन। उधर, ‘बहुरियों’ ने भी उन्हें आश्वस्त किया-जाओ अम्मा, अच्छे से रहना। …त्रिवेणी मइया चाहेंगी तो अगले साल फिर यहीं मिलेंगे।’ घर लौटते समय बोरियों में बचे राशन को देकर अन्नदान किया और कपड़े की पोटलियों में गंगा मइया, साधु-संतों का आशीष ले आए।

कुंभ नगरी से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

साले की गुदगुदी से दुल्‍हा बना दुर्वासा, बैरंग लौटी बारात

इलाहाबाद। शादी का मंडप सजा था। बैंड बाजे और डीजे की धुन पर घराती-बाराती दोनों मस्ती में डांस कर रहे थे। सजी-संवरी नई नवेली दुल्हनियां को थोड़ी देर बाद ही मंडप में सात फेरे लेकर सपनों के राजकुमार की हमेशा के लिए हो जाना था। यह तो तैयारी का एक हिस्सा था पर भाग्य में तो कुछ दूसरा ही बदा था। द्वारचार के समय ही ‘तूफान’ आ गया। दूल्हे राजा दुर्वासा बन चुके थे। उनका रौद्र रूप देखने लायक था। आगे-आगे दूल्हे राजा पीछे-पीछे भागता एक किशोर। दोनों चकरघिन्नी बने भाग रहे थे। घराती-बराती के लिए यह सब किसी अजूबा से कम न था। लोग समझ ही ना पा रहे थे कि ये क्या हो रहा है।

काफी हंफाने के बाद दूल्हे राजा किशोर को पकड़ पाए। जमकर कुटम्मस कर दी। पिटने वाला किशोर दूल्हे राजा का साला निकला। बस फिर क्या था, हंगामा मच गया। आनन फानन हालात बदल गए। मंगल, अमगंल का रूप धारण कर चुका था। घराती-बाराती दोनों आमने सामने। वहां जंग-ए-मैदान तैयार। दोनों पक्षों में मारपीट शुरू। महिलाएं और बच्चे जिधर जगह देखी, लगे भागने। अचानक आए इस ‘भूचाल’ से दुल्हन ने बगावत कर दी। संकोच तोड़ सामने आई और बिगड़ैल दूल्हे से शादी करने से इनकार कर दिया। इस हंगामे की वजह थी, जीजाजी से एक साले की चुहलबाजी। दरअसल, दुल्हन के भाई ने दूल्हे राजा से चुहलबाजी करते हुए कमर में गुदगुदी कर दी। यह मजाक ने रिश्ता तोड़ने तक की हालत पैदा कर दी। दोनों पक्षों के पुलिस लॉकअप में बंद होने तक की नौबत आ गई।

प्रतापगढ़ जिले के कुंडा क्षेत्र में पड़ता है नगरियापार। इसी का मजरा है रैयापुर। रैयापुर में शिवानी की शादी का रिश्ता महेशगंज क्षेत्र के मालाधर छत्ता गांव के पुरूषोत्तम पटेल के साथ तय था। 13 फरवरी की शाम रैयापुर बारात आई। गाजा-बाजा, मंगलगीत के बीच द्वारचार शुरू हुआ। थोड़ी ही देर में मंडप में दुल्हन सात फेरे लेने वाली थी। इसी बीच दुल्हन के भाई को अपने जीजू से चुहलबाजी करने की सूझी। उसने मजाक-मजाक में जीजू को गुदगुदी कर दी। बस फिर क्या था, दूल्हे राजा दुर्वासा बन गए। आव देखा न ताव, लगे कूद-फांद करने। किशोर को दौड़ा लिया। अचानक नजारा बदला देख कई घराती-बाराती अवाक रह गए। किशोर को पटक कर धुनने के बाद लोगों ने किशोर को छुड़ाया पर यह बात घरातियों को काफी नागवार गुजरी।

दोनों पक्षों ने इसे आन-बान-शान का विषय बना लिया। हम तुमसे कम नहीं, की तर्ज पर दोनों पक्ष भिड़ गए। घरों से लाठियां निकल आई। मारपीट होने लगी। कई बाराती बंधक बना लिए गए। इसी बीच ग्राम प्रधान लल्लन पटेल ने कुंडा कोतवाली को सूचित कर दिया। मौके पर पहुंची पुलिस दोनों पक्ष के करीब डेढ़ दर्जन लोगों को पकड़ लाई और लॉकअप में बंद कर दिया। उधर, दुल्हन ने भी अपना फैसला सुना दिया-ऐसे बिगड़ैल के साथ वो शादी नहीं कर सकती। कोतवाली में रातभर पंचायत चली पर दोनों पक्ष एक दूसरे के सामने झुकने को तैयार न हुए। ऐसे में बारात को बगैर दुल्हन के ही वापस लौटना पड़ा। कोतवाल सर्वेश मिश्रा के मुताबिक, फलदान, शादी में आए खर्च को वापस करने की शर्त पर दोनों पक्षों के बीच मामला निपटा है।   

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

कुंभमेला में बारिश का खलल, उजड़ा मेला, हजारों घर वापसी को मजबूर

इलाहाबाद। विश्व का सबसे बड़ा मेला प्रयाग का महाकुंभ। तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं वाले इस धार्मिक मेले पर आखिरकार देवराज इंद्र भारी पड़ गए। पैंतीस किमी परिक्षेत्र में फैले इस धार्मिक मेला की अच्छी खासी रौनक बिगड़ गई। दो दिन की मूसलाधार बारिश ने गृहस्थ कल्पवासियों को छोड़िए, संत-महात्मा, मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, दंडी स्वामियों को मेला से वापसी को मजबूर कर दिया है। तीर्थराज प्रयाग के संगम तट पर कई मील दूर तक बसा धर्म का महानगर उजड़ने की ओर है। दो दिन पहले तक लाखों लोगों की भीड़ से गुलजार रहने वाली कुंभ नगरी में राहत कार्य जरूर चल रहे हैं पर वे नाकाफी हैं।

बसंत पंचमी के ही दिन 15 फरवरी को दोपहर बाद से लगातार दो दिन चलने वाली बारिश और हवा के थपेड़ों ने रेत पर खड़े सौ-दो सौ नहीं बल्कि हजारों की तादाद में तंबू के आशियानों को तहस-नहस कर डाला। लाखों-करोड़ रुपए की लागत से बने धर्माचार्यों के सैकड़ों महलनुमा पंडाल धराशायी हो गए हैं। हजारों होर्डिंग्स, कटआउट हवा में लटके अपनी दुर्दशा बयां कर रहे हैं। कीचड़ पानी से सने हजारों टेंट शिविरों में अभी भी पानी जमा है, वहां राहत नहीं पहुंच सकी है। लाखों कल्पवासी जो सैकड़ों किमी दूर से यहां एक महीने रहकर कल्पवास करने आए उन्हें वापस लौटने को मजबूर होना पड़ रहा है, वजह उनके लिए यहां बुनियादी सुविधा तक नहीं बची है। बारिश ने जगह-जगह जलजमाव किया। रही सही कसर तेज हवाओं के थपेड़ों ने पूरी कर दी। तेज हवा ने ज्यादातर शिविर, पंडालों को धराशायी कर दिया। गलन भी बढ़ गई। लाखों कल्पवासी खुले आकाश में दिन रात ठिठुरने को विवश हो गए। उनका सामान असुरक्षित हो गया है। जगह-जगह बिजली के तार टूटे पड़े हैं इसके अलावा बिजली के पोल भी उखड़ गए हैं। डेढ़ दर्जन से ज्यादा प्रमुख मार्गों पर चेकर्ड प्लेट अव्यवस्थित हालत में आ गए हैं।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट।