हिंदुस्‍तान विज्ञापन घोटाला : यह रही हाई कोर्ट को दी गई एसपी की जांच रिपोर्ट

मुंगेर। पटना उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति माननीय अंजना प्रकाश ने क्रि. मि. नं. 2951/2012 और क्रि.मि.नं.16763/2012 में 17 दिसंबर 2012 के ऐतिहासिक आदेश के पैरा नं.13 में 200 करोड़ के दैनिक हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला में मुंगेर के वरिष्ठ पुलिस पदाधिकारियों की अनुसंधान रिपोर्ट की भी चर्चा की है। उन्होंने उस पैरा में लिखा है कि -‘‘ जिलाधिकारी (मुंगेर) की भेजी रिपोर्ट में मुंगेर के वरीय पुलिस पदाधिकारियों की अनुसंधान-रिपोर्टों की प्रतियां भी संलग्न की गई हैं। वह अनुसंधान रिपोर्ट घटनास्थल का हिस्सा मुंगेर भी बताती है और रिपोर्ट सुस्पष्ट दर्शाती है कि ‘अनुसंधान‘ पूरी तरह प्रगति की राह पर है।‘‘

वरीय पुलिस पदाधिकारियों की अनुसंधान रिपोर्टों में मुंगेर के पुलिस उपाधीक्षक एके पंचालर की पर्यवेक्षण-टिप्पणी (रिपोर्ट -वन) और पुलिस अधीक्षक पी कन्नन की पर्यवेक्षण टिप्पणी (रिपोर्ट -टू) शामिल हैं। पुलिस अधीक्षक, मुंगेर पी. कन्नन की पर्यवेक्षण-टिप्पणी (प्रतिवेदन -02) दैनिक हिन्दस्तान के करोड़ों के विज्ञापन घोटाला के खेल को उजागर करती है। एसपी की पर्यवेक्षण टिप्पणी बताती है कि किस प्रकार दैनिक हिन्दुस्तान के प्रबंधकों और संपादकों ने भागलपुर और मुंगेर के दैनिक हिन्दुस्तान संस्करणों में प्रिंट लाइनों में पटना का पंजीयन नम्‍बर गलत ढंग से छापकर अवैध ढंग से अखबार का मुद्रण और प्रकाशन किया और फर्जी कागजात प्रस्तुत कर राज्य और केन्द्र सरकारों से विज्ञापन मद में करोड़ों रुपए का सरकारी विज्ञापन प्राप्त किया और सरकारी राजस्व की लूट मचा दी।

एसपी पी. कन्नन की पर्यवेक्षण-टिप्पणी के द्वितीय और तृतीय पृष्ठ के सार को यहां हू-ब-हू प्रस्तुत किया जा रहा है। आशा की जाती है कि पूरे विश्व के ई-पाठक भारत के कारपोरेट प्रिंट मीडिया के आर्थिक भ्रष्टाचार की गहराई को ठीक से समझ सकेंगे। ऐसा ही आर्थिक भ्रष्टाचार दैनिक हिन्दुस्तान देश के अन्य राज्यों में भी धड़ल्ले से करता आ रहा है। दैनिक जागरण भी ऐसे आर्थिक अपराध में पीछे नहीं हैं। कई अंग्रेजी अखबार भी देश के अनेक राज्यों में ऐसा ही आर्थिक अपराध करते आ रहे हैं। देश के अनेक अंग्रेजी अखबार आर्थिक अपराध को छुपाने के लिए अपने प्रिंट लाइन को इतने छोटे अक्षरों में प्रकाशित करते हैं कि देश में आर्थिक अपराध को पता लगाने में जुटी अपराध इकाई के पदाधिकारी प्रिंट लाइन के कंटेन्ट को पढ़ ही नहीं सकें। जब पुलिस  पदाधिकारी प्रिंट लाइन के कंटेन्ट को पढ़ ही नहीं सकेंगें, तो आर्थिक अपराध का खेल किस प्रकार उजागर हो सकेगा?

पुलिस अधीक्षक पी0कन्नन ने अपनी पर्यवेक्षण-टिप्पणी में पृष्ठ संख्या-02 और 03 में लिखा है कि- ‘‘(3) किसी भी समाचार पत्र के प्रकाशन के पूर्व प्रेस एण्ड रजिस्‍ट्रेशशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की विभिन्न धाराओं के अन्तर्गत दिए गए प्रावधानों का अक्षरशः पालन करना समाचार -पत्र के किसी भी प्रकाशन के लिए कानूनी बाध्यता है जिसका उल्लंघन दंडनीय अपराध है।
 
(4) अभियुक्त द्वारा देश के जिन विभिन्न स्थानों से दैनिक हिन्दुस्तान का प्रकाशन किया जा रहा है, वहां विधिवतः कार्यालय का भी संचालन किया जा रहा है। और जिन-जिन नगरों से नगर संस्करण प्रकाशित होता है, वहां के लिए स्थानीय संपादक नियुक्त रहते हैं, जो प्रेस एण्ड रजिस्‍ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट,1867 की धारा 5 (1) के अन्तर्गत है।
 
(5) अभियुक्तगण अपने समाचार पत्र दैनिक हिन्दुस्तान के माध्यम से निजी क्षेत्रों के अतिरिक्त केन्द्र एवं राज्य सरकार से विज्ञापन प्राप्त कर करोड़ों-करोड़ का आर्थिक लाभ प्राप्त किए हैं और करते आ रहे हैं।
 
(6) केन्द्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और उपक्रमों से संबंधित विज्ञापन डीएवीपी के माध्यम से तथा राज्य सरकार के विभिन्न विभागों तथा उपक्रमों से संबंधित विज्ञापन राज्य सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के माध्यम से प्राप्त कराए जाते हैं।
 
(7) बिहार में कुछ साल पूर्व तक राज्य सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा भी सरकारी विज्ञापन सीधे समाचार-पत्रों को दिया जाता रहा है, किन्तु हाल के कुछ वर्षों से सरकार द्वारा केवल सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग द्वारा ही समाचार पत्र को सरकारी विभागों का विज्ञापन प्रसारित किए जाने की व्यवस्था लागू की गई है।
 
(8) सरकार द्वारा प्रसारित विज्ञापनों का भुगतान समाचार पत्र को सरकारी मद से किया जाता है।
 
(9) अभियुक्तों द्वारा वर्ष 2001 से दैनिक हिन्दुस्तान का प्रकाशन भागलपुर के मेसर्स जीवन सागर टाइम्स प्राइवेट लिमिटेड, लोअर नाथनगर रोड,परवत्ती, भागलपुर से प्रारंभ किया गया, जो लगातार जारी है।
 
(10) अभियुक्तों ने भारत के प्रेस रजिस्‍ट्रार की अनुमति प्राप्त किए बिना प्रारंभ कर दिया। भागलपुर से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान समाचार पत्र के संस्करण का प्रकाशन प्रेस एण्ड रजिस्‍ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 के प्रावधानों का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन करते हुए सरकार के समक्ष झूठा तथा फर्जी कागजात प्रस्तुत कर विज्ञापन भी प्राप्त कर लिया तथा विज्ञापन के मद से करोड़ों रुपया सरकारी खजाने से प्राप्त कर लिया गया है।
 
(11) किसी भी प्रकाशन द्वारा समाचार -पत्र के प्रकाशन के नाम का क्लीयरेन्स भारत के समाचार पत्रों के निबंधक कार्यालय से लेना भी अनिवार्य और कानूनी बाध्यता है। यदि समाचार पत्र का नाम ‘‘टाइटिल‘‘ प्रकाशक को उपलब्ध हो गया है, तो नया संस्करण निकालने के लिए भी  समाचार-पत्रों के निबंधक से अनुमति प्राप्त करना भी अनिवार्य है। परन्तु कानूनी बाध्यता पूर्णतः अनदेखी कर मुंगेर संस्करण का भी प्रकाशन किया जा रहा है।
 
(12) अभियुक्तों द्वारा पिछले ग्यारह वर्षों से लगातार अवैध तरीके से विज्ञापन का प्रकाशन करते हुए लगभग दो सौ करोड़ रुपया प्राप्त कर लिया गया है।
 
(13) प्रेस एण्ड रजिस्‍ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धारा 5 और 6 में स्पष्ट प्रावधान है कि बिना जिला दंडाधिकारी, प्रेसिडेन्सी अथवा सब डिविजनल पदाधिकारी द्वारा सत्यापित घोषणा पत्र के  किसी भी रूप में समाचार पत्र प्रकाशित नहीं किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में नियम का उल्लंघन दंडनीय अपराध है।
 
(14) अभियुक्तों द्वारा जिला दंडाधिकारी द्वारा बिना प्रमाणीकृत घोषणा पत्र के दैनिक हिन्दुस्तान के भागलपुर तथा मुंगेर संस्करण का प्रकाशन किया जा रहा है।
 
अनुसंधान एवं पर्यवेक्षण के क्रम में आये तथ्यों से यह बात प्रकाश में आना पाया गया है कि पीआरबी एक्ट,1867 के तहत किसी भी समाचार पत्र के प्रकाशन हेतु निम्नांकित नियमों का पालन किया जाना आवश्यक है।
 
(क) प्रकाशन का कार्य प्रारंभ करने के पूर्व संबंधित जिले के जिला दंडाधिकारी के समक्ष विहित प्रपत्र में घोषणा पत्र समर्पित करना।
 
(ख) तद्नुसार जिला दंडाधिकारी द्वारा प्रमाणीकरण देना।
 
(ग) कंपनी रजिस्‍ट्रार से अनुमति प्राप्त करना।
 
(घ) भारत सरकार के समाचार पत्र पंजीयक से पंजीयन कराना।
 
परन्तु दैनिक हिन्दुस्तान के भागलपुर, मुजफ्फरपुर और मुंगेर संस्करण के मुद्रण/प्रकाशन हेतु उक्त नियमों का पालन नहीं किया गया है, जिसकी पुष्टि पर्यवेक्षण के क्रम में वादी एवं दैनिक हिन्दुस्तान के विभिन्न प्रतिनिधियों द्वारा उपलब्ध कराये गये दस्तावेजों, जिसका वर्णन पर्यवेक्षण टिप्पणी के अनुसंधान में प्रगति नामक कंडिका में किया गया है, के अवलोकन से भी होना पाया गया है।
 
अनुसंधान एवं पर्यवेक्षण के क्रम में यह पाया गया है कि बिहार सरकार वित्त (अंकेक्षण) विभाग के पत्रांक – 178/वि0अं0, दिनांक -09-05-2006 के अनुसार अंकेक्षण (जांच) के दौरान अंकेक्षण (जांच) दल ने यह पाया कि हिन्दुस्तान दैनिक को पटना संस्करण के अतिरिक्त मुजफ्फरपुर तथा भागलपुर  मुद्रण केन्द्रों को स्वतंत्र प्रकाशन दिखाकर उनके विज्ञापन के लिए अलग दर पर वर्ष 2002-03 एवं  03-04 में कुल एक करोड़ 15 हजार 955 रुपया 96 पैसा का अवैध भुगतान किया गया था, जबकि मुजफ्फरपुर और भागलपुर कोई स्वतंत्र प्रकाशन या संस्करण नहीं है, वरन् पटना संस्करण के केवल मुद्रण केन्द्र हैं, इनके लिए अलग से कोई पंजीयन आरएनआई से नहीं प्राप्त था। पटना संस्करण की पंजीयन संख्या – 44348/1986 (पटना) ही इनका पंजीयन के रूप में अंकित था।
 
 मुंगेर से श्रीकृष्‍ण प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मोबाइल नं. -09470400813 के जरिए किया जा सकता है.


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