उस गिरोह में चैनल मालिकान भी शामिल हैं, जिनकी चाकरी हमारे ‘सरोकारी पत्रकार’ बजा रहे हैं

: बनाना चैनलों के मैंगो पिपुल कौन हैं? : अच्छा हुआ कि डेविड कैमरन ने कह दिया कि जलियाँवाला बाग वाली घटना शर्मनाक थी। शर्म  उन्हें सचमुच में आयी या नहीं पता नहीं, पर अपने टीवी एंकरों के कपोलों पर लाली साफ नजर आयी। 'हाय! मैं शर्म से लाल हुई' की तर्ज पर बताने लगे कि हमारे पुराने आका को अपने करतूतों पर शरम आ रही है। जितना कैमरन शर्माये उससे ज्यादा अपने चैनल शर्माये।

किसी ने खबर चलायी, किसी ने पट्टी चलायी। शर्माते-शर्माते हड़ताल की खबर भी गायब कर दी या बताने लगे कि देखो ये हड़ताली कितने हुड़दंगी हैं और इन हुड़दंगियों के साथ सख्ती से निपटना चाहिये। रवीश ने तो प्राइम-टाइम में बाकायदा अपनी दुकान सजा ली। मुझे लग रहा थे कि जब सारे चैनल हाथ धोकर मजदूरों के पीछे पड़े हैं तो कम से वे मजदूरों के जीवन की कुछ सचाइयों को उजागर करेंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। रवीश को भी कैमरन के शर्म पर गर्व करना ज्यादा भला लगा।

जिन्हें दो सौ सालों तक इस देश को लूटने में कोई शर्म नहीं आयी और जब वे फिर से नवउदारवाद के नाम पर इस देश को नये सिरे से लूटने की योजना बना रहे हों तब उनका शर्म उस भेड़िये के 'संकोच' जैसा है जो मेमने को निहायत बेशर्मी के साथ खा जाने के बाद डकार लेने की विनम्र भूमिका बना रहा हो, जिसकी न तो कोई प्रासंगिकता है न कोई जरूरत। ऐसा भी नहीं है कि कैमरन के इरादों को हिंदुस्तान के स्वार्थी नेता, पूंजीपति और उनके पिछलग्गु पत्रकार समझते न हों।

सब समझते हैं पर राम नाम की लूट में वे भी शामिल हैं, इसलिये देश की जनता को बता रहे हैं कि देखो हमारे पुराने मालिक को अपनी करतूत पर शरम आ रही है। शरमाने के लिये कोकाकोला और ‘अंबानी प्रायोजित सत्यमेवजयते’ वाले आमिर खान को भी साथ लेकर चल रहे हैं। मालिक हैं, फिर भी बेचारे इतना शरम कर रहे हैं! और क्या चाहिये? जान ले लोगो किसी की? इसलिये अपने गिले-शिकवे भूल जाओ और हड़ताल-फड़ताल का नाटक छोड़कर फिर से अपने गोरे-काले आकाओं की सेवा में जुट जाओ।

तो शर्माने के इस खेल में हमारे टीवी पत्रकारों को उस बात पर शर्म नहीं आयी जिस पर उन्हें सचमुच ही शर्म आनी चाहिये थी। 'आगे आती थी हाले-दिल पर हँसी, अब किसी बात पर नहीं आती' की तर्ज पर अब इन्हें किसी बात पर शर्म नहीं आती। खबरों को बेचने में शर्म नहीं आती। मालिक के लिये ब्लैकमेलिंग करने में शर्म नहीं आती। फर्जी स्टिंग करने में शर्म नहीं आती। भूत-प्रेत-नाग-नागिन-भगवान सचिन-देवी राखी सावंत- मटुकनाथ-जूली वगैरह के किस्से-कहानी बनाने में शर्म नहीं आती। हत्यारों के परिवार वाले चैनलों की नौकरी बजाने में शर्म नहीं आती।

पर कम से कम इस बात पर तो शर्म आनी चाहिये थी कि जब देश के सारे मजदूर संगठन अपनी पार्टी लाइन को तोड़कर एकजुटता प्रदर्शित कर रहे हैं तो कुछ तो उनकी मांगों-बातों में दम होगा, जिस पर गंभीर चर्चा कर ली जाये। लेकिन नहीं। सारे चैनल यही भोंपू बजा रहे थे कि हड़ताल से आम आदमी को बड़ी परेशानी हो रही है। पता नहीं इन बनाना चैनलों का मैंगो पिपुल कौन है जो पेट्रोल के दाम बढ़ाये जाने, गैस सिलिण्डरों को नियंत्रित करने, कमरतोड़ महंगाई बढ़ाये जाने, रोजगार के अवसर न मिलने, नौकरी में गुलामी जैसे हालात बना दिये जाने और सरकार की बेशर्म जन-विरोधी नीतियों से पूरे साल परेशान नहीं होता पर एक दिन स्टेशन पर आटोरिक्शा नहीं मिलने से परेशान हो जाता है।

यह खेल आज का नहीं है। 1991 में नरसिंहा राव की सरकार के आने के बाद से ही यह माहौल बनाने का खेल शुरू हो गया था कि मजदूर हड़तालें देश विरोधी होती हैं। तब इलेक्ट्रानिक मीडिया इतना शक्तिशाली नहीं था तो प्रिंट में यह खेल चल रहा था। घुमा-फिराकर हड़ताल में होने वाले नुकसान की बात तो बतायी जाती थी लेकिन कभी भी यह नहीं बताया जाता था कि हड़ताल करना किसी मजदूर का शौक नहीं होता, बहुत मजबूरी में यह कदम उठाया जाता है। मालिक का तो महज मुनाफे का नुकसान होता है, मजदूर के घर चुल्हा नहीं जलता।

पर यह सब आज के जमाने में कहने में नुकसान यह है कि इसे सत्तर की दशक की -या इससे भी पहले की – ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों की कहानी समझा जायेगा, जबकि हकीकत में हालात इससे भी बदतर हैं क्योंकि तब कम से कम लोगों के पास रोजगार तो होता था। आज के हालात इतने भयावह हैं कि सामाजिक सुरक्षा या जीने के अधिकार की रत्तीभर भी गारंटी नहीं है और देश को ऐसा बनाने में जिन लोगों का 'अमूल्य योगदान' है, उनमें चैनल मालिकान भी शामिल हैं, जिनकी चाकरी हमारे 'सरोकारी पत्रकार' बजा रहे हैं। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि 'हे प्रभु! इन नालायकों को कभी क्षमा मत करना। ये कमबख्त जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं।'

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष हैं. सरकारी नौकरी से कुछ समय पहले रिटायर हुए. उनसे संपर्क iptadgg@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. दिनेश के लिखे से साक्षात्कार के लिए यहां क्लिक करें- भड़ास पर दिनेश


 

”हड़ताल से धनपशुओं का नुकसान… होने दीजिए… रोज़ फायदा ही कमाएंगे हरामखोर?”

Abhishek Srivastava : गुरदास दासगुप्‍ता कुछ दिनों से इस बात को लेकर परेशान थे कि हड़ताल सम्‍बन्‍धी बयान कोई नहीं छाप रहा/दिखा रहा है। दस दिन पहले तक स्थिति यह थी कि भाषा के एक रिपोर्टर दीपक रंजन ने जब उनका एक साक्षात्‍कार लिया, तब जाकर खबर चल सकी। प्रधानमंत्री के परसों अपील करते ही हालांकि खबर अचानक बड़ी बन गई। और चैनलों की स्‍वामिभक्ति देखिए कि आज सब जगह लिखा आ रहा है: … हज़ार करोड़ की हड़ताल/देश को नुकसान, आदि।

लाखों करोड़ का नुकसान किसका है भाई? जनता का? मजदूर का? किसान का? नहीं न! लुटेरी-सटोरी आवारा पूंजी का नुकसान है, धनपशुओं का नुकसान है ये। तो होने दीजिए न। रोज़ फायदा ही कमाएंगे हरामखोर?

युवा व जनपक्षधर पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

‘हड़ताल पर पुण्य प्रसून बाजपेयी का भ्रम आजतक चैनल पर साफ दिखा’

Abhishek Srivastava : ‎'आज तक' चैनल के रिपोर्टर पुण्‍य प्रसून वाजपेयी हमेशा की तरह आज भी पटरी से उतरे हुए हैं। हड़ताल पर उनका भ्रम साफ दिख रहा है, न निगल पा रहे हैं, न उगल पा रहे हैं और जबरन डबल विंडो में बीजेपी की रैली के साथ उसका घालमेल कर के खिचड़ी पकाए दे रहे हैं। अचानक कभी स्‍वदेशी जागरण मंच के किसी नेता का प्रोफाइल बताने लगते हैं, तो कभी अहमदाबाद के बस स्‍टैंड पहुंच जाते हैं। उधर उनकी सहयोगी महिला रिपोर्टराएं नई दिल्‍ली स्‍टेशन पर भारी भीड़ बता रही हैं, लेकिन फ्रेम में सामान्‍य दिनों से कम भीड़ दिख रही है।

अंजना कश्‍यप रेलवे स्‍टेशन पर खड़ी होकर हिंदू आतंकवाद पर बात करते हुए थूक घोंट रही हैं, तो एक पुरुष रिपोर्टर श्रम मंत्री से ही पूछ बैठा है कि बताइए देश में क्‍या हाल है। इसी आपाधापी में प्रसून के मुंह से निकल गया है, ''… बीजेपी हिंदुत्‍व आतंकवाद के ज़रिये राजनैतिक अलख जगाने में लगी है…।'' अरे बाप! बीजेपी, आंदोलन, रैली, हड़ताल, श्रम मंत्री, जनता, बस स्‍टेशन, हिंदू आतंकवाद, बस, टैक्‍सी, रेलवे, अस्‍पताल, शिंदे, खड़गे… जाहिर है… जाहिर है… जाहिर है… और अचानक छोटा सा ब्रेक, ब्रेक के बाद आकर बताएंगे कि राजनाथ सिंह के भाषण के बाद यहां से मार्च निकलेगा (&^%$*#$@)… रे भाई, पहले ही बता दिया, अब लौट कर क्‍या बताओगे? अरे, कोई इन्‍हें बताओ कि जंतर-मंतर पर एनडीएमसी का एक शौचालय भी है जहां प्रेशर रिलीज़ किया जा सकता है। मइकवा दाएं से बाएं और बाएं से दाएं हाथ में लउकाने से कुछ नहीं होगा…..

Atul Chaurasia प्रसून की सनातन उलझाऊ भाषणबाजी को इससे बेहतर समझाया नहीं जा सकता. कहें तो घचर-पचर कर देते हैं मुद्दे की… इसके अलावा रिपोर्टराएं से अप्सराएं का जो पुट आ रहा है वह दुर्लभ है. शब्द ईजादी के लिए शुक्रिया

Inder Jeet Singh confusion hi confusion hai…mamla kya hai PATA NAHI…
 
Jitendra Narayan लगता है एंकर् और संवादाता लोग अपने-आपको मजदूर नहीं मालिक समझते हैं.
 
Akbar Rizvi सब टीवी पर फोकस करें… वहां पर अच्छी ख़बरें हैं।
 
Amit Singh Virat sir ji mazdoor ka dard maloom ho to baat bhi kar paayein sabki chamdi moti ho gai. ye log bhi rajnik partion ki tarah hi apni zuban chalate hain.
 
Raunak Singh bht aache….bht jagruk malum padte hai…media ko aap jaise logon ki jarurt hai…….kahan hai aap????

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

जब भी हड़ताल होती है तब सारे चैनल सरकार और पूंजीपतियों के रनिंग डॉग हो जाते हैं

Himanshu Kumar : समाज के अन्याय के मामलों में कानून का बहाना बनाने वालों को ये भी स्वीकार कर लेना चाहिये कि जनरल डायर का गोली चलाना भी कानूनी था. भगत सिंह की फांसी भी कानूनी थी. सुक़रात को ज़हर पिलाना कानूनी था. जीसस की सूली की सज़ा कानूनी थी. गैलीलियो की सज़ा कानूनी थी. भारत का आपातकाल कानूनी था. गरीबों की झोपडियों पर बुलडोजर चलाना कानूनी है. आज की हड़ताल गैरकानूनी है. अंग्रेज़ी राज का विरोध गैरकानूनी था. सुकरात का सच बोलना गैरकानूनी था. कानून और गैरकानूनी तो ताकत से निर्धारित होते हैं महाराज. आज तुम्हारे पास ताकत है इसलिये हम गैर-कानूनी है. कल जब हमारे हाथ में ताकत होगी तब ये मुनाफाखोरी और अमीरी गैरकानूनी मानी जायेगी..

Jagadishwar Chaturvedi : एबीपी न्यूज चैनल बहस करने जा रहा है जनता की परेशानी के लिए जिम्मेदार कौन ? ये चैनलवाले यह विषय बनाते तो बेहतर होता कि मजदूरों की परेशानी के लिए जिम्मेदार कौन?

दिनेशराय द्विवेदी : ये कुछ भी नहीं है। जब भी हड़ताल होती है तब सारे चैनल सरकार और पूंजीपतियों के रनिंग डॉग हो जाते हैं। आम जनता तो हड़ताल में या उस के साथ है। ये परेशान आम आदमी और जनता पता नहीं कौन है। जी टीवी ने तो हद कर दी है, वह तो हड़ताल होने से पहले ही बता रहा है कि हड़ताल से लोगों को यह परेशानी तो होनी ही है। वाचक बाहर निकल कर जरूर अपने मालिकों को गाली देते होंगे। कितना झूठ बुलवाता है।

Umesh Chandra Dhangar : सब एक्सक्लूसिव के चक्कर मेँ लगे हैँ, आम आदमी से सच मेँ इनका कोई लेना देना नहीँ, बस अपने आपको सबसे आगे दिखाकर श्रेष्ठ साबित करना चाहते हैँ, आम आदमी की दिनचर्या यही है कि आज हड़ताल के चलते काम नहीँ मिला, चलो आज दूध, पानी पीकर काम चला लो?

Harshvardhan Tripathi: ''Rs 20,000 cr of GDP will be lost due to strike: Assocham'' देर शाम तक सारे उद्योग संगठन इसी तरह का अनुमान दे देंगे और मीडिया में इसे देश का नुकसान बताकर हेलाइन चलाया जाएगा। लेकिन, सवाल ये है कि ये किसकी GDP का नुकसान है। ये क्या कारोबारी, उद्योगपति के मुनाफे का नुकसान है या सचमुच देश की GDP का नुकसान है। क्या इस GDP में हम भारत के लोग की भी कोई हिस्सेदारी है। मुझे तो लगता है कि ये सिर्फ कारोबार के नुकसान के आंकड़े हैं।

Pankaj Srivastava : मैं शुक्रगुजार हूं उन मित्रों का जिन्होंने वक्त रहते बता दिया कि हड़ताल करने पर सुप्रीम कोर्ट की रोक है। गैरकानूनी काम करने से बाल-बाल बचा, वरना महंगाई से हलकान-परेशान मैं, हड़ताल का समर्थन करने के मूड में था। खैर, मित्रों की दयानतदारी पर सिर झुकाया तो ये भी याद आया कि सुप्रीम कोर्ट का संविधान पीठ इमरजेंसी को भी जायज ठहरा चुका है। बदन में सिहरन सी दौड़ गई..इतने दिनों तक इमरजेंसी के खिलाफ सोचता-बोलता रहा, ये भूलकर कि सुप्रीम कोर्ट की अवमानना हो रही है। ….दुहाई मी लार्ड…हो सके तो माफ कर दीजिए…आगे से सोचने की गलती नहीं करूंगा। आपसे अपील है कि देश मे इमरजेंसी लगाने के लिए सरकार को तुरंत निर्देश दें….कोई दिक्कत नहीं होगी। देश जान गया है कि इमरजेंसी कानूनी है और हड़ताल गैरकानूनी।

SK Chaudhary Sonu : क्या गजब का इत्तेफाक है… मजदूरों के खिलाफ दिन भर भागदौड़ करके मीडिया मजदूर बनाते रहे खबर। आज के भारत बंद में शामिल मजदूरों को मीडिया ने चंद लोगों की तोड़फोड़ की वजह से विलेन (गुंडा) बना दिय औऱ कंपनी के मालिक और मैनेजरों (मोटी तनख्वाह) को पीड़ित। क्या इसलिए कि मीडिया कंपनीयों में काम करने वाले मजदूरों को मजदूर कैटगरी से अलग किया जा सके। कुछ मीडिया कंपनियों को छोड़ दें तो सभी मीडिया घरानों के (न्यूज चैनल या अखबार) मजदूरों (कर्मचारियों) की हालत, किसी फैक्ट्री के मजदूरों से भी बदतर है। यहां भी न्यूनतम मजदूरी 5 हजार से लेकर 7 हजार तक है, जबकि लुटे-पिटे कंपनी के अधिकारियों की सैलरी लाख के आसपास है और कंपनी में 10 हजार से नीचे काम करने वालों की संख्या लगभग आधी है। इन बेचारों मजदूरों की हालत तो इतनी खराब है कि ये ना तो हड़ताल कर सकते हैं और ना ही कोई मांग… आखिर पत्रकार जो कहलाना है इन्हें, इसलिए अपने आपको उन मजदूरों की कैटेगरी से अगल रखते हैं।

फेसबुक से.

”कोई भी समाचार चैनल लगाइये और देखि‍ए, कैसे ये चवन्‍नी चोर पत्रकार सपनों की हत्‍या करते हैं”

Jagadishwar Chaturvedi : दो दिन की हड़ताल के बाद मीडिया में जनता बनाम मजदूरवर्ग के हितों के सवाल को खड़ा किया जा रहा है। बार-बार यह दिखाया जा रहा है हड़ताल के कारण बीमार को अस्पताल पहुँचने में तकलीफ हुई, बच्चे स्कूल नहीं जा पाए, आदि सामान्य जीवन के त्रासद दृश्यों को मजदूरों की हड़ताल को जनविरोधी साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। सच यह है कि अपनी मांगों की सुनवाई के लिए मजदूर सालों-साल इंतजार करते रहे हैं, कोई उनकी बात नहीं सुन रहा। औने-पौने मेहनताने पर काम कर रहे हैं। अधिकांश मजदूर अकल्पनीय शारीरिक कष्ट में रहकर काम कर रहे हैं। मीडिया में मजदूरों के कष्टों को न बताना मजदूरों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है। यह उल्लंघन हमारा तथाकथित लोकप्रिय मीडिया रोज करता है। वे साल में एक भी दिन मजदूर की बस्ती में नहीं जाते।

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मजेदार बात यह है कि प.बंगाल की ममता सरकार और केरल की कांग्रेस के नेतृत्ववाली राज्य सरकार ने हड़ताल करने के अधिकार पर सीधे हमला बोला है। दोनों राज्यों में सरकारों ने बंद विरोधी फैसला लिया और हड़ताल को अवैध घोषित किया है।


Rising Rahul : वाकई ये समय बरबरता और सपनों की हत्‍या का ही समय है। समाचार चैनलों की सुबह की चीख सिर्फ सुबह घर से नि‍कलकर टैक्‍सी या ऑटो का महंगा भाड़ा चुकाने वालों के लि‍ए तेज हो रही है। और अब शाम को काम से सीधे घर लौटकर जाने वालों के लि‍ए। क्‍या फर्क पड़ता है अगर हड़ताल में शामि‍ल लोग अपने सपनों को बचाने की गंभीर जद्दोजहद में लगे हैं। क्‍या फर्क पड़ता है अगर कर्मचारी वि‍देशी नि‍वेश का वि‍रोध कर रहे हैं। क्‍या फर्क पड़ता है कि हड़ताल में शामि‍ल 10 करोड़ से भी ज्‍यादा लोगों ने आज दि‍न का खाना नहीं खाया है। क्‍या फर्क पड़ता है कि उनमें से कई ऐसे थे, जो दो दि‍न बाद कमाएंगे, तब खाएंगे। महत्‍वपूर्ण तो बरबरता और क्रूरता है। कोई भी समाचार चैनल लगाइये और देखि‍ए, कैसे ये चवन्‍नी चोर पत्रकार सपनों की हत्‍या करते हैं। न न, ये मत कहि‍ए कि हाथ बंधे हैं। दम नहीं है आपमें लत्‍तरकार ब्ंधुओं।

जगदीश्वर चतुर्वेदी और राहुल पांडेय के फेसबुक वॉल से.

भारत बंद की एकतरफा नकरात्मक रिपोर्टिंग हो रही

Mayank Saxena : भारत बंद की एकतरफा नकरात्मक रिपोर्टिंग क्या ये साफ करने के लिए काफी नहीं कि देश और मीडिया को कौन चला रहा है…मीडिया के जन-सरोकारों के दावे सुनते वक़्त आगे से ग़ौर कीजिएगा…आदिवासियों पर बंदूकें तान, गोलियां चला कर और रेप कर के विस्थापन करवाने के नज़ारों को ब्लैक आउट कर देने वाली मीडिया को मजदूरों की हिंसा तो दिखती है…पूंजीपतियों का हज़ारों करोड़ का नुकसान दिखता है…लेकिन सत्ता और पूंजीपतियों की हिंसा से परहेज़ किया जाता है…ज़ाहिर है कुछ तो गड़बड़ है…अगली बार जब कोई बड़ा पत्रकार किसी मंच से कहे कि इस देश में मीडिया ही है जो काफी कुछ बचाए हुए है, तो हंसते हुए उनके मुंह पर निकल जाइएगा…

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कुछ लोगों की ग़ैर ज़िम्मेदाराना हरक़तों की निंदा करते हुए, अगले दिन भी हड़ताल के साथ खड़े रहिए…बकने दीजिए सरकार और तथाकथित स्वयंभू चौथे खम्भे को…

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इन्हीं लोगों ने ब्रह्मेश्वर मुखिया की अंतिम यात्रा में हुए हुड़दंग, तोड़फोड़, आगजनी और हिंसा को जनता का आक्रोश बताया था…

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वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति।

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    Saroj Arora Nahi nahi unke muh mai saunf dal dijiyega… Kon kahta hai ki media bikau nahi hai?
 
    Manish Sachan अभी अभी एक संपादक जी का आदेश आया है हडताल को बहुत बडावा ना िदया जाए, खबरें दबाई जाएं
 
    Adhinath Jha मीडिया में सब तो गरीब, पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक के मसीहा ही बैठे हैं फिर उनके उपर स्वर्ण मुकुटधारी कौन है?
 
    Mayank Saxena मीडिया भयंकर सवर्णवादी है Adhinath Jha
   
    Adhinath Jha हां, पर छाती पीटना भी हमारे मीडिया को खूब आता है। मजदूर आधारित व्यवस्था होती तो यही मीडिया…
 
    Mayank Saxena सही कहा….
 
    Abhishek Suman मीडिया का हमेशा से यह कहना है कि वो जन-जन से जुड़ी है वो समाज की हर कुरीतियोँ का पर्दाफास करती है। पर अभसोस ये सब बातेँ सिर्फ कहने तक ही सीमित है। आज मीडिया बिकाऊ हो चुकी है। प्रायः देखता हूँ कि देश के किसी बड़े नेता या फिर किसी सेलिब्रिटी के साथ कोई मामूली सी बातेँ हो जाती है तो वो मीडिया की सबसे बड़ी खबर बन जाती है वहीँ यदि देश का आम आदमी या फिर मजदूर वर्ग अगर अपने हक की लड़ाई भी लड़े तो इसे दबा दिया जाता है। मीडिया कि ऐसी दोहरी निती देखकर उसकी आजादी पर हँसी आती है।
   
    Ved Prakash Is media is biased ? : undoubtedly. Whether Govt. has failed miserably? Yes. Will strike solve the prob? : No. Will it harm the already crippled situation?: yes.Is there a single benefit of strike?: No. I fail to understand how can some one, who don't have any political motive, can support strike. If 48 hrs of strike solve the problem then I'll be in forefront to support a week long strike.

    Anurag Shukla media ne kuch galat nhi kiya sarkari mulazimo ne khud apne pairo pe kulahdi maari hai sir..unhone ne sabse badi bewkoofi ki hinsa ki…jiske karan unki maange bhi aagjani ka shikar ho gaye ..wo ye bhool gaye ki 1 negative aspect is bigger than 99 positice aspects …negative attract people… and media shows those news or things whivh attract people.. therefore media did what the laws and ethics of media says… but yes somewhere down we cannot ignore that media is buiased !!

मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.

आम आदमी पार्टी इस हड़ताल को एतिहासिक मानती है और इसका समर्थन करती है

Aam Aadmi Party : देश के 11 केन्द्रीय मजदूर संगठन हड़ताल पर हैं। साथ ही आटो, टैक्सी बस और कई राज्यों में सरकारी कर्मचारी भी हड़ताल पर हैं। हड़ताली कर्मचारियों की प्रमुख मांगें हैं – 1)महंगाई के लिए जिम्मेदार सरकारी नीतियों में बदलाव 2)महंगाई को देखते हुए न्यूनतम भत्ता बढ़ाया जाए 3)सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी प्राइवेट कंपनियों को न बेची जाए 4)आउटसोर्सिंग के बजाए रेग्युलर कर्मचारियों की भर्तियां हो…

ये सब मांगें देश की आम जनता की ज़रूरतें हैं। सरकार हमेशा की तरह इन मुद्दों को और मांगों को टालती रही है। सरकार चाहती तो संगठनों से बात कर हड़ताल को टाल सकती थी लेकिन शुरू से चुप्पी रखने के बाद उसने अंतिम समय में बातचीत का नाटक भर किया है। इसके उलट सरकार अपने बयानों से यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि इस हड़ताल से देश को 20 हज़ार करोड़ का नुकसान होगा।

हम पूछना चाहते हैं कि यह नुकसान किसे होगा? जहाँ तक जनता के कष्ट का प्रश्न है तो एक भी दिन ऐसा नहीं होता जिस दिन यह सरकार जनता को कोई न कोई भारी मानसिक, शारीरिक व आर्थिक कष्ट न दे रही हो? न वह महंगाई कम कर पा रही है न वेतन बढ़वा रही है। आम आदमी पार्टी इस हड़ताल को एतिहासिक मानती है और इसका समर्थन करती है।

आम आदमी पार्टी की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति