नेता जी के सख्त तेवरों के चलते सरकार ने लिया ‘यू-टर्न’

सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के बीच चली जुबानी जंग की ‘गाज’ महिला सुरक्षा विधेयक के कुछ प्रावधानों पर गिर गई है। वर्मा के तीखे बयानों से नाराज मुलायम आर-पार के फैसले की मानसिकता में आते लगे, तो सरकार के रणनीतिकारों ने उनकी मनुहार शुरू कर दी। इसी के चलते प्रस्तावित महिला सुरक्षा विधेयक के वे प्रावधान हटाए जा रहे हैं, जिनको लेकर सपा सुप्रीमो एकदम गरजने-बरसने लगे थे। अब सरकार विवादित प्रावधानों को बदलकर ही इसे संसद में पेश करने जा रही है। सरकार की इस ‘फुर्ती’ के पीछे सपा की नाराजगी एक बड़ी वजह मानी जा रही है।

इस विधेयक के विवादित प्रावधान संशोधित कर लिए गए हैं। नए संशोधन पर कैबिनेट की मुहर भी लग रही है। मुकम्मल तैयारी है कि संशोधित विधेयक को आज लोकसभा में प्रस्तुत कर दिया जाए। सरकार के रणनीतिकार चाहते हैं कि इस विधेयक पर बुधवार तक लोकसभा की मुहर लग जाए। अगले दिन इसे राज्यसभा में रखा जाएगा। कोशिश हो ही है कि राज्यसभा से भी इसे शुक्रवार को पास करा लिया जाए। यदि सरकार अपनी इस कार्ययोजना में सफल रहती है, तो उसे एक बड़ी राजनीतिक राहत मिल जाएगी।

कल सुबह यहां प्रस्तावित विधेयक पर आम सहमति बनाने के लिए एक सर्वदलीय बैठक सरकार ने बुलाई थी। लेकिन, कई वजहों से नाराज चल रहे सपा नेतृत्व ने इस दौरान तीखे तेवर अपना लिए। यही कहा गया कि आम सहमति से सेक्स की उम्र 18 से घटाकर 16 करने का प्रस्ताव हर दृष्टि से अनुचित है। ऐसा करके सरकार शादी से पहले सेक्स के लिए बढ़ावा देने जा रही है। इस तरह की बात पूरे समाज के लिए शर्मसार करने वाली होगी। मुख्य विपक्षी दल भाजपा, तृणमूल कांग्रेस और अन्नाद्रुमक के नेताओं ने भी सपा के विरोध को जायज ठहराया। भाजपा नेताओं ने तो यहां तक कह दिया कि इस तरह का प्रस्ताव लाकर सरकार भारतीय संस्कृति के साथ बलात्कार करने जा रही है।

भाजपा प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी कहते हैं कि उनकी पार्टी महिलाओं के प्रति होने वाले यौन-अपराधों के खिलाफ कड़ी सजा के प्रावधानों की हिमायती है। लेकिन, उसे प्रस्तावित विधेयक के उम्र वाले बिंदु पर खास ऐतराज है। यदि सरकार ने अड़ियल रुख अपनाया, तो संसद में विधेयक का पास कराना मुश्किल हो जाएगा। जबकि, वामदलों के नेताओं ने यही तर्क दिया कि युवाओं में शादी के पहले सेक्स एक हकीकत है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता। सहमति से रिश्ते के लिए उम्र-सीमा 18 रखने से बलात्कार के फर्जी मामलों की बाढ़ आ रही है। ऐसे में, सरकार का प्रस्ताव उनकी नजर में व्यवहारिक है।

सीपीएम के नेताओं ने भले उम्र के विवाद पर सरकार का समर्थन दिया हो, लेकिन इन लोगों ने कई और मुद्दों पर अपनी जोरदार आपत्ति जता दी। सीपीएम के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी कहते हैं कि प्रस्तावित विधेयक में बलात्कार के कुछ मामलों में फांसी की सजा का प्रस्ताव है। उनकी पार्टी इसे व्यवहारिक नहीं मानती। ऐसे में, जरूरी है कि सरकार संसद में इसे पेश करने के पहले, जरूर बदल ले।
वामदलों ने फांसी की सजा पर ऐतराज दर्ज कराया, तो भाजपा नेताओं को लगा कि इसमें ऐतराज करने लायक कुछ नहीं है। क्योंकि, देश में जिस तरह से यौन-हमले और गैंगरेप के मामले बढ़ रहे हैं, ऐसे में जरूरी हो गया है कि कड़ा कानून बना दिया जाए। यह मामला पूरे देश की भावनाओं से जुड़ा हुआ है। ऐेसे में, इस मामले में दलगत राजनीति के हथकंडे नहीं अपनाए जाने चाहिए। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय राजधानी में पिछले वर्ष 16 दिसंबर को एक छात्रा के साथ गैंगरेप की बर्बर घटना हुई थी। इसको लेकर देशव्यापी आंदोलन खड़ा हुआ था। जन-आक्रोश को देखते हुए सरकार ने कड़े कानून के लिए एक अध्यादेश जारी कर दिया था। यह अध्यादेश 3 फरवरी से लागू है। इसकी अवधि 4 अप्रैल तक है। इसके तहत यौन-अपराध के मामलों में तमाम कड़ी सजाओं का प्रावधान किया गया है।

सरकार की कोशिश है कि अध्यादेश की अवधि खत्म होने के पहले ही नया कानून उसकी जगह ले ले। ऐसे में जरूरी हो गया है कि सरकार इस मुद्दे पर विपक्ष को भरोसे में ले। 22 मार्च के बाद संसद सत्र का मध्यावकाश होने जा रहा है। 22 अप्रैल से बजट सत्र का दूसरा दौर शुरू होना है। ऐसे में, विधेयक को पास कराने के लिए सरकार के पास केवल चार दिन का समय है। सपा और भाजपा के तेवरों को देखकर सरकार ने बगैर देरी के कई प्रावधानों पर ‘यू-टर्न’ ले लिया है। अब सहमति से सेक्स की उम्र पहले की तरह 18 वर्ष ही रहेगी। महिलाओं को घूरने और उनका पीछा करने जैसे मामलों में भी संशोधन किया गया है। पहले इन अपराधों को गैर-जमानती श्रेणी में रखा गया था। लेकिन, सपा की नाराजगी के चलते अब इन मामलों को जमानती श्रेणी में रख दिया गया है। क्योंकि, सपा का ऐतराज था कि ऐसे कानून से फर्जी मामलों की बाढ़ आ जाएगी। यहां तक कि राजनीतिक रंजिश में भी लोग महिलाओं को ‘हथियार’ बनाने लगेंगे। यह डर बसपा नेतृत्व ने भी जताया था। लेकिन, उसने सरकार के प्रस्तावों का समर्थन ही किया था।

केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने रविवार को एक विवादित बयान देकर सपा नेतृत्व को नाराज कर दिया है। बेनी प्रसाद ने एक जनसभा में कह दिया था कि मुलायम सिंह के आतंकवादियों से करीबी रिश्ते हैं। केंद्रीय मंत्री ने सपा सप्रीमो को भ्रष्ट और गुंडा भी करार किया था। इसको लेकर सपा कार्यकर्ताओं ने भारी विरोध प्रदर्शन शुरू किए। कल संसद में भी इस मुद्दे पर भारी हंगामा रहा। मुलायम ने बेनी को बर्खास्त करने की मांग कर डाली। संकेत दिए कि यदि कांग्रेस नेतृत्व ने उनके सम्मान की रक्षा नहीं की, तो वे सरकार से समर्थन वापस लेने में नहीं हिचकेंगे।

उल्लेखनीय है कि मनमोहन सरकार को सपा बाहर से समर्थन दे रही है। मौजूदा स्थितियों में सपा का समर्थन सरकार के लिए काफी अहम है। भाजपा सहित पूरा विपक्ष वैसे ही आक्रामक मुद्रा में है, ऐसे में कांग्रेस रणनीतिकार नहीं चाहते कि ‘संकटमोचक’ मुलायम कांग्रेस से ज्यादा दूरियां बना लें। इसी के चलते प्रधानमंत्री ने बेनी प्रसाद पर माफी मांग लेने के लिए दबाव भी बढ़ाया है। सपा सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री ने खुद मुलायम से खेद जता दिया है। लेकिन, सपा नेतृत्व का गुस्सा पूरी तरह से खत्म नहीं हो पाया है। माना जा रहा है कि मनुहार के पहले कदम के तौर पर महिला सुरक्षा विधेयक के मामले में वे संशोधन कर दिए गए हैं, जिनके लिए मुलायम का खास जोर था।

सूत्रों के अनुसार, अलग से हुई मुलाकात में प्रधानमंत्री ने कल शाम सपा सुप्रीमो को बता दिया था कि सरकार ने उनकी भावनाओं का कद्र करते हुए विधेयक में जरूरी संशोधन करने तय कर दिए हैं। इसके बाद संसदीय कार्य मामलों के मंत्री कमलनाथ ने ऐलान भी कर दिया कि लोकसभा में विधेयक का जो प्रारूप रखा जाएगा, वह संशोधित ही होगा। इसके लिए फटाफट कैबिनेट की मंजूरी भी ले ली गई। सूत्रों के अनुसार, सपा नेतृत्व को खुश करने के लिए वित्तमंत्री पी. चिदंबरम उत्तर प्रदेश सरकार को जल्द ही कुछ बडेÞ आर्थिक पैकैज दे सकते हैं। इस आशय के भी संकेत सपा सप्रीमो के पास भेज दिए गए हैं।

मुश्किल यही है कि इस बार मुलायम सिंह ने बेनी बाबू को लेकर कुछ-कुछ जिद्दी रवैया अपना लिया है। वे इस बात से जरूर खुश हैं कि सरकार ने महिला सुरक्षा विधेयक मामले में उन लोगों के विरोध के बाद प्रारूप संशोधित कर लिया है। मुलायम अपने लोगों से कह रहे हैं कि अभी तो उनका यह ‘ट्रेलर’ भर है, पूरी ‘फिल्म’ तो अभी बाकी है। देखते जाओ, यह सरकार कदम-कदम पर उनके सामने घुटने टेकेगी। नेता जी का यह खांटी अंदाज, पार्टी कार्यकर्ताओं को बहुत भाने लगा है। महिला सुरक्षा विधेयक पर संशोधन का फैसला सपा अपनी राजनीतिक जीत के रूप में देख रही है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

आपराधिक कानून संशोधन विधेयक पर ‘पंगा’ बरकरार!

लंबी जद्दोजहद के बाद आखिर आपराधिक कानून संशोधन विधेयक पर कैबिनेट की मुहर लग गई है। इस विधेयक के कई मसौदों पर मंत्रिमंडल के बीच मतभेद चले आ रहे थे। इसी के चलते विधेयक के मसौदे पर कैबिनेट की मंजूरी नहीं मिल पा रही थी। मंगलवार को कैबिनेट की विशेष बैठक बुलाई गई थी। लेकिन, इसमें भी मतभेद बरकरार रहे थे।

ऐसे में, सहमति बनाने के लिए मंत्रिसमूह (जीओएम) का गठन किया गया था। इस मंत्रिसमूह ने विवादित मुद्दों पर बुधवार को फैसला कर लिया था। इसकी रिपोर्ट को ही कैबिनेट ने मंजूर कर लिया है। हालांकि, इस विधेयक के कई प्रावधानों पर सपा, बसपा और भाजपा जैसे दलों को घोर आपत्तियां हैं। ये दल इस मुद्दे पर बड़ा राजनीतिक पंगा करने के लिए तैयार समझे जाते हैं।

इस विधेयक से जुड़े विवादित मुद्दों पर सहमति बनाने के लिए सरकार ने एक सर्वदलीय बैठक बुलाई है। यह बैठक सोमवार को होने जा रही है। सरकार की कोशिश है कि इसी बैठक में सर्वदलीय सहमति किसी न किसी तरह बनवा ली जाए। ताकि, इस विधेयक को मंगलवार को ही संसद में चर्चा के लिए रख दिया जाए। तैयारी चल रही है कि 20 मार्च तक इस विधेयक को संसद में पास करा लिया जाए।

लेकिन, भाजपा नेतृत्व प्रस्तावित विधेयक के एक-दो प्रावधानों को लेकर सहमत नहीं है। सपा नेतृत्व ने भी कह दिया है कि इस प्रस्तावित कानून के कई प्रावधानों का भारी दुरुपयोग हो सकता है। ऐसे में, यह कानून समाज में एक नए तरह की जटिलता पैदा कर देगा। इस खतरे को देखते हुए सपा दबाव बनाएगी कि कुछ प्रस्तावित प्रावधानों को बदला जाए। यदि सरकार ने उनके सुझाव को दरकिनार किया, तो इस पर राजनीतिक सहमति नहीं बन सकती है। भाजपा नेतृत्व को खास तौर पर सहमति से सेक्स के नए प्रावधान पर गहरी आपत्ति है। कैबिनेट ने जिस प्रस्ताव को कल मंजूर कर लिया है, उसमें सहमति से सेक्स के लिए उम्र-सीमा 18 से घटाकर 16 कर दी गई है।

कई महिला संगठनों ने भी इस नए प्रावधान को लेकर तीखे सवाल उठाए हैं। भाजपा को भी उम्र के प्रावधान का बदलाव रास नहीं आया। पार्टी की सांसद स्मृति ईरानी ने कहा है कि पूरा देश महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। लोग उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार महिलाओं के विरुद्ध होने वाले यौन-अपराधों के मामले में कड़े कानून बनाएगी। लेकिन, सरकार ने तो सहमति से सेक्स के मुद्दे पर उम्र घटाने का ही खेल कर दिया है। भला, इससे बलात्कारों की बाढ़ में कैसे रोक लगेगी?

भाजपा सूत्रों के अनुसार, इस मुद्दे पर पार्टी का नेतृत्व सर्वदलीय बैठक में अपनी आपत्तियां दर्ज कराएगा। जबकि, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अपने लोगों से यही कहा है कि प्रस्तावित कानून में जिस तरह से महिलाओं को घूरने और उनका पीछा करने के मामलों को भी गैर-जमानती बना दिया गया है, इसका भारी दुरुपयोग होने की आशंका है। इस नए कानून के सहारे गांव में फर्जी मुकदमेबाजी का सिलसिला बढ़ जाएगा। क्योंकि, किसी के लिए यह आरोप लगाना आसान हो जाएगा कि फलां शख्स, फलां महिला को बुरी नजर से घूर रहा था। पुलिस तंत्र भी इस प्रावधान का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग कर सकता है।

सूत्रों के अनुसार, इस प्रावधान को लेकर बसपा का नेतृत्व भी चिंतित है। उसे आशंका है कि इस प्रावधान के जरिए उत्तर प्रदेश में बसपा कार्यकर्ताओं को फर्जी मामलों में फंसाया जा सकता है। इसीलिए सर्वदलीय बैठक में बसपा भी इन प्रावधानों पर सवाल उठाएगी। उल्लेखनीय है कि पिछले साल 16 दिसंबर को दिल्ली में एक पैरा मेडिकल छात्रा के साथ चलती बस में गैंगरेप हुआ था। इस घटना को लेकर देशव्यापी गुस्सा फूट पड़ा था। लोगों की व्यापक नाराजगी को देखकर केंद्र सरकार ने संकल्प लिया था कि बलात्कार जैसे मामलों में और कड़ी सजा का प्रावधान किया जाएगा।

गैंगरेप के मामले से उमड़े गुस्से को शांत कराने के लिए केंद्र सरकार ने आपराधिक कानून संशोधन संबंधी एक अध्यादेश भी 2 फरवरी को जारी कर दिया था। इसके तहत रेप जैसे जघन्य मामलों में दोषियों को आजीवन कारावास से लेकर मृत्युदंड तक का प्रावधान किया गया है। दरअसल, दिल्ली गैंगरेप हादसे के बाद सरकार ने यौन-अपराधों के लिए कड़े प्रावधान के तहत एक न्यायिक समिति बना दी थी। यह समिति सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जेएस वर्मा के नेतृत्व में बनी थी। इसने एक महीने के अंदर ही अपनी रिपोर्ट सरकार को दे दी थी। वर्मा समिति ने सिफारिश की थी कि महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में कमी के लिए कड़े कानूनी प्रावधान बहुत जरूरी हैं। सरकार ने वर्मा समिति की रिपोर्ट मंजूर कर ली थी।

केंद्र सरकार की कोशिश रही है कि 22 मार्च के पहले आपराधिक कानून संशोधन विधेयक पर संसद की मुहर लगवा ली जाए। क्योंकि, इसी के बाद संसद सत्र में लंबा अवकाश हो जाएगा। जबकि, 4 अप्रैल तक ही यह आपराधिक संशोधन कानून अध्यादेश वैध है। यदि तय समय-सीमा में विधेयक पास नहीं हो पाया, तो अध्यादेश अपने आप निरस्त हो जाएगा। ऐसी किसी स्थिति में सरकार की ज्यादा किरकिरी हो सकती है। इस राजनीतिक जोखिम को देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व कोशिश कर रहा है कि प्रस्तावित विधेयक पर सर्वदलीय सहमति बन जाए। ताकि, संसद के दोनों सदनों में दो दिन के अंदर ही विधेयक पास हो जाए।

बलात्कार विरोधी नए प्रस्तावित कानून के कई प्रावधानों पर गृह मंत्रालय, कानून मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के बीच गंभीर मतभेद रहे हैं। कानून मंत्री अश्विनी कुमार पहले यही तर्क देते रहे हैं कि यदि सहमति से सेक्स के लिए उम्र-सीमा 18 से कम नहीं की गई, तो बलात्कार के फर्जी मामलों की बाढ़ आने का खतरा है। कानून मंत्रालय इस बात पर डटा था कि बलात्कार शब्द की जगह यौन हिंसा शब्द का प्रयोग किया जाए। लेकिन, महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ यही तर्क देती रहीं कि बलात्कार की जगह यौन हिंसा करार करने से अपराध की गंभीरता कम होने का खतरा है।

कृष्णा तीरथ सहमति से सेक्स के मुद्दे पर भी कानून मंत्रालय के तर्कों को खारिज करती आई थीं। वे यही कहती रहीं कि 18 की जगह 16 की उम्र कर देने से बाल यौन शोषण का खतरा और बढ़ सकता है। गृह मंत्रालय को भी कई प्रावधानों पर ऐतराज रहा था। इसी के चलते कैबिनेट में यह मामला तय नहीं हो पा रहा था। यहां तक कि यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी की फटकार के बाद भी कैबिनेट में पंगा बना रहा था। मंगलवार को इसी मुद्दे पर कैबिनेट की विशेष बैठक बुला भी ली गई थी। लेकिन, कृष्णा तीरथ और अश्विनी कुमार के बीच तीखे मतभेदों के चलते बात नहीं बन पाई थी।

बाद में, विवादित मुद्दों पर सहमति बनाने के लिए वित्तमंत्री पी. चिदंबरम की अध्यक्षता में एक जीओएम का गठन कर दिया गया था। बुधवार को इस जीओएम की बैठक हुई। करीब दो घंटे चली मंत्रणा के बाद विवादित मुद्दों पर सहमति बन पाई। इसके बाद ही जीओएम की रिपोर्ट के आधार पर कल कैबिनेट की मुहर लग गई। पहले यह प्रस्तावित किया गया था कि यौन अपराध के मामले में फर्जी शिकायत करने वाली महिला के खिलाफ दो साल की जेल तक का प्रावधान रहे। लेकिन, इस मामले में कृष्णा तीरथ ने जोरदार विरोध दर्ज कराया था। उन्होंने यही कहा था कि ऐसा करने से पीड़ित महिलाएं डरकर चुप्पी साध सकती हैं।

कई महिला संगठनों ने भी इस प्रावधान पर सख्त ऐतराज जाहिर किया था। इसे देखते हुए जीओएम ने फैसला किया कि इस तरह के कानूनी प्रावधान की जरूरत नहीं है। गृह मंत्रालय चाहता था कि किसी महिला को बुरी नजर से घूरने और पीछा करने जैसे मामलों को गैर-जमानती न बनाया जाए। लेकिन, बाल विकास मंत्रालय इसके लिए अड़ गया था। जीओएम ने इन अपराधों को गैर-जमानती श्रेणी में ही रखने का सुझाव दिया था। जिस पर कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। अब सर्वदलीय बैठक में इन विवादित मुद्दों पर सरकार के रणनीतिकार कैसे सपा जैसे दलों को मना पाते हैं? ये देखने लायक जरूर होगा।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

भारतीय हौंसले की अग्नि परीक्षा!

मामला सीधे तौर पर मुल्क के स्वाभिमान से जुड़ जाए, तो छोटी-सी बात बहुत बड़ी बन जाती है। ऐसा ही कुछ दो इतालवी नौसैनिकों के मामले को लेकर हो रहा है। इटली सरकार भारत के कानून को ठेंगा दिखाने पर उतारू हो गई है। उसने दिल्ली के तमाम राजनीतिक और  कूटनीतिक दबाव के बाद भी अपना रवैया बदलने के संकेत नहीं दिए। जबकि इस मुद्दे को लेकर भारतीय संसद में बड़ा बवेला मच गया है।

सभी दलों की चिंता यही हो गई है कि आखिर इटली जैसे देश जब चाहे अपनी सुविधा को देखते हुए हमें ठेंगा दिखाने की हिम्मत कैसे कर लेते हैं? यूं तो प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने हुंकार भरी है कि यदि आरोपी नौसैनिकों को भारत वापस नहीं भेजा गया, तो हठधर्मिता का यह रवैया इटली को बहुत महंगा साबित होगा।  

अब अहम सवाल यह बन गया है कि भारत सरकार ने इटली के प्रति जो कड़ा रवैया अपनाया है, वह वाकई में कितना दमदार है? क्योंकि, पहले भी कई मौकों पर यूरोप के इस छोटे से देश ने भारत सरकार की जरूरतों की ज्यादा परवाह नहीं की। इस वजह से कई बार कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकारों को अपने यहां भारी राजनीतिक किरकिरी झेलनी पड़ी है। ‘इटली कनेक्शन’ की बात करके विपक्षी दल कांग्रेस नेतृत्व के रवैए पर वैसे भी तीखे कटाक्ष करने से बाज नहीं आते। पिछले दिनों वीवीआईपी हेलीकॉप्टर खरीद के सौदे में भारी रिश्वतखोरी का मामला उछला है। इसके भी तार इटली से जुड़े हुए हैं। क्योंकि, इटली की कंपनी फिनमैक्कनिका ने 12 हेलीकॉप्टर आपूर्ति का ठेका लिया था। फरवरी 2010 में यह सौदा किया गया था। आरोप है कि यह टेंडर हासिल करने के लिए इटली की कंपनी ने करीब 362 करोड़ रुपए की रिश्वत भारत भेजी थी।

इस मामले में भी यहां भारी राजनीतिक सरगर्मी शुरू हो गई है। इस प्रकरण की जांच के लिए सीबीआई को लगा दिया गया है। पिछले दिनों सीबीआई की एक जांच टीम इटली भेजी गई थी। लेकिन, वहां पर अदालत और सरकार का रवैया सहयोग का नहीं रहा। तमाम अनुरोध के बावजूद इटली का प्रशासन सीबीआई को घोटाले के प्रमाण दिलवाने में मदद नहीं कर रहा। सीबीआई के आलाधिकारियों ने इटली के रवैए की शिकायत भी की है।

विवाद का ताजा मामला दो इतालवी नौसैनिकों का है। पिछले साल फरवरी में इतालवी पोत ‘एनारिका लैक्सी’ के दो पोत रक्षकों ने केरल के तट पर दो भारतीय मछुआरों को गोली मार दी थी। दोनों की मौत भी हो गई थी। दरअसल, इतालवी नौसैनिकों ने भारतीय मछुआरों को समुद्री डाकू समझ लिया था। इस हादसे के चार दिन बाद इतालवी पोत के उन दो नौसैनिकों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिनकी गोलियों से मछुआरे मारे गए थे। इन दोनों पर केरल की एक स्थानीय अदालत में हत्या का मुकदमा शुरु हुआ। इतालवी नौसैनिकों के नाम मैसीमिलयानो लैटोर और शैलवाटोर गिरोन हैं।

गरीब मछुआरों की हत्या को लेकर केरल में बड़ा असंतोष भड़कने लगा था। इसको देखते हुए केरल सरकार ने इटली के नौसैनिकों को कोई रियायत न देने का पक्का आश्वासन दिया था। इसके बाद ही मछुआ समाज का गुस्सा कुछ थमा था। पिछले साल क्रिसमस के मौके पर इटली सरकार ने अनुरोध किया था कि त्यौहार मनाने के लिए इन दोनों को पैरोल पर इटली आने की इजाजत दे दी जाए। केरल हाईकोर्ट के निर्देश के बाद इन दोनों को अपने देश में क्रिसमस मनाने के लिए भेज भी दिया गया था। वायदे के अनुरूप ये लोग इटली से लौट भी आए थे।

इस साल 24-25 फरवरी को इटली में आम चुनाव हो रहे थे। ऐसे में, इटली सरकार ने अनुरोध किया था कि उनके दोनों नौसैनिकों को मतदान में हिस्सा लेने के लिए पैरोल पर आने की इजाजत दी जाए। इटली के दिल्ली स्थित राजदूत डेनिली मेनसिनी ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा भी इस बावत दिया था। इसमें उन्होंने गारंटी ली थी कि चार सप्ताह के अंदर दोनों लोग भारतीय न्यायालय का सामना करने के लिए लौट आएंगे। इस वायदे के अनुरूप उन्हें 23 मार्च तक इटली से लौट आना चाहिए। इसी बीच इटली सरकार ने इस मामले में एकदम पैंतरा बदल डाला। 6 मार्च को भारतीय विदेश मंत्रालय को इटली सरकार ने खबर दी कि अब आरोपी नौसैनिकों को भारत वापस नहीं भेजा जाएगा। क्योंकि, इन लोगों ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा में मछुआरों को डाकू समझकर गोली मारी थी। ऐसे में, संयुक्त राष्ट्र संधि 1982 के तहत इन पर मुकदमा अंतरराष्ट्रीय अदालत में ही चलाया जा सकता है।
   
जबकि, केरल सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि गोली बारी की घटना केरल के पास भारतीय समुद्री सीमा में हुई है। ऐसे में, आपराधिक मामला भारतीय अदालतों के आधीन ही चलेगा। इटली सरकार की तरफ से भारत में इस मुकदमे की पैरवी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे करते आए हैं। साल्वे भी इटली सरकार के हठधर्मी रवैए से हैरान हो गए हैं। उन्होंने कह दिया है कि नौसैनिकों को वापस भेजने से इनकार करके इटली ने सरासर विश्वासघात किया है। जबकि, इस सरकार की ओर से उनके राजदूत ने वापसी गारंटी का हलफनामा दिया था। इससे मुकरना भारत की अदालत का सरासर अपमान जैसा है। उन्होंने नाराजगी में अपने को इस मुकदमे से अलग कर लिया है।

मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने यह मामला दोनों सदनों में उठा दिया है। आरोप लगाया कि इटली सरकार के प्रति भारत इस मामले में दब्बूपन का रवैया दिखा रहा है। इस पर विपक्ष के सभी दलों ने तीखे तेवर अपनाए तो प्रधानमंत्री को भी कड़ा रुख अपनाना पड़ा। उन्होंने ऐलान किया कि इटली का रुख भारत सरकार को मंजूर नहीं है। बुधवार को भी संसद के दोनों सदनों में यह मामला उठा। इस पर प्रधानमंत्री ने यहां तक कह दिया कि यदि इटली वायदे के अनुरूप तय समय सीमा में दोनों आरोपियों को वापस नहीं भेजता, तो इसका उसे बड़ा खामियाजा उठाना पड़ सकता है।

दरअसल, यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी का मायका इटली में है। ऐसे में, आरोप लगता है कि सरकार का रुख इटली के प्रति लचीला रहता है। याद कीजिए, बहुचर्चित बोफोर्स तोप घोटाले में इटली के व्यापारी क्वात्रोची का नाम आया था। सीबीआई ने इस मामले में उनकी मुख्य भूमिका भी मानी थी। लेकिन, भारत सरकार की लापरवाही के चलते क्वात्रोची को भारत से इटली भाग जाने दिया गया। इसको लेकर विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि सोनिया गांधी परिवार से क्वोत्रोची के निजी रिश्तों के चलते उसे जानबूझकर राहत दी गई।

संसद के सत्र में हेलीकॉप्टर घोटाले में भी ‘इटली कनेक्शन’ को लेकर विपक्ष ने कांग्रेस नेतृत्व पर तीखे कटाक्ष किए हैं। नौसैनिकों वाले मामले में शांत स्वभाव वाले प्रधानमंत्री ने जिस तरह से हुंकार लगाई है, वह भी दुर्लभ किस्म की है। अहम सवाल यह है कि क्या मनमोहन सरकार वाकई में इटली सरकार को सबक सिखाने का हौसला दिखा सकती है? क्योंकि, इटली के रवैए में अभी तक किसी बदलाव के संकेत नहीं मिले। भारत की राजनीति ने इस मामले को सीधे तौर पर देश की राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ लिया है। वैसे भी एकदम से भारत को ठेंगा दिखाने की नीति दादागीरी की ही मानी जाएगी।

इस संदर्भ में लोग लतीनी-अमेरिकी देश वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज की दमदारी की याद करते हैं। शावेज का पिछले दिनों ही निधन हुआ है। वे 15 साल तक लगातार अमेरिका जैसे बलशाली देश को ललकारते रहे थे। यही कहते थे कि उनका मुल्क छोटा जरूर है, लेकिन उसका स्वाभिमान अमेरिका से कमतर नहीं है। सवाल है कि क्या भारत का नेतृत्व वाकई में इटली को सबक सिखाने की हिम्मत भी कर पायेगा?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

किसान कर्ज घोटाले पर कांग्रेसी सांसदों को भी आया गुस्सा!

संसद के इस बजट सत्र में भी घोटालों के चलते लग रहे राजनीतिक निशानों से यूपीए सरकार हलकान हो गई है। पिछले वर्षों से यह सिलसिला चला आ रहा है कि संसद के लगभग हर सत्र में सरकार नए-नए घोटालों की चपेट में आ जाती है। मंगलवार को संसद में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की एक रिपोर्ट रखी गई। किसान कर्ज माफी की योजना में अरबों रुपए के घोटाले की आशंका जाहिर की गई है। क्योंकि इस योजना के बहाने तमाम फर्जीवाड़ा किया गया है। कैग ने कुछ मामलों को नमूनों के तौर पर परखा था, परीक्षण में पाया गया है कि करीब 20-22 प्रतिशत मामलों में भारी गड़बड़ी हुई है।

इसको लेकर विपक्ष ने दोनों सदनों में खूब हंगामा किया है। इस नए घोटाले ने मनमोहन सरकार की राजनीतिक किरकिरी एक बार फिर से बढ़ा दी है। सत्तारूढ़ कांग्रेसी सांसदों में भी इस मामले को लेकर काफी गुस्सा दिखाई पड़ा। संसद के सेंट्रल हॉल में कल कई सांसदों ने अनौपचारिक संवाद में वरिष्ठ मंत्रियों से अपनी नाराजगी दर्ज करा दी है। कहा है कि घोटालों का यही सिलसिला चलता रहा, तो वे किस मुंह से चुनाव में जाएंगे?

मुख्य विपक्षी दल भाजपा को सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने का एक नया हथियार मिल गया है। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज यही कहती हैं कि मनमोहन सरकार के कार्यकाल में कोई भी योजना बगैर घोटाले के पूरी नहीं होती। सरकार के कामकाज की शैली इतनी खराब हो गई है कि इसके चलते नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया है। पूरे तंत्र में सड़न होने लगी है। पिछले वर्षों में एक से बढ़कर एक घोटाले सामने आए हैं। चाहे मामला राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन का हो या 2जी स्पेक्ट्रम का। बहुचर्चित कोयला घोटाले में भी सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों की भूमिका शक के घेरे में रही है। लेकिन, सरकार का रुख इस मामले में अब तक लीपा-पोती का ही लग रहा है।

भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं कि यूपीए-2 सरकार ने घोटालों का नया रिकॉर्ड बना लिया है। इनकी हर योजना में कोई न कोई घोटाला जरूर पलता है। किसान कर्ज घोटाले में कुल कितने अरब रुपए की रकम डकारी गई है, अभी इसका ठीक-ठीक आकलन नहीं हो पाया है। जरूरत है कि सरकार इस मामले की जिम्मेदारी स्वीकार करे। इस फर्जीवाड़े के खेल में जो बैंक दोषी हैं, उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं। जिन पात्र किसानों को कर्ज माफी योजना का लाभ नहीं मिला, उन्हें चिन्हित किया जाए। जरूरत है कि ऐसे किसानों को कर्ज माफी का लाभ दिया जाए। वैसे भी देश के विभिन्न हिस्सों में तमाम किसान कर्ज से दबे होने के कारण मौत को अपने गले लगा लेते हैं।

उल्लेखनीय है कि 2008 में यूपीए की पहली सरकार ने किसानों की कर्ज माफी योजना का ऐलान किया था। उद्देश्य यही था कि सीमांत श्रेणी वाले किसानों के 50 हजार रुपए तक के बैंक कर्ज माफ कर दिए जाएं। व्यवस्था यह की गई थी कि बैंकों को इस कर्ज की भरपाई केंद्र सरकार की तरफ से की जाएगी। बैंकों को ही पात्र कर्जदारों को चिन्हित करने की जिम्मेदारी दे दी गई थी। मार्च, 2012 तक करीब 52 हजार करोड़ रुपए की कर्ज माफी की गई है। दावा किया गया है कि इस योजना के तहत 3.69 करोड़ छोटे एवं सीमांत किसानों को योजना का लाभ मिला है। जबकि 60 लाख दूसरी श्रेणियों के किसानों को भी लाभ दिया गया है। लेकिन, कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उसने नमूनों के तौर पर 9,334 खाता धारकों के मामलों का परीक्षण अपने स्तर पर कराया था। इनमें काफी फर्जीवाड़े के मामले पाए गए थे। इसके बाद उसने 80,299 अन्य खाता धारकों के मामलों का परीक्षण कराया। परिणाम यही रहा कि करीब 20 प्रतिशत मामलों में बड़ी गड़बड़ियां पाई गई हैं।

कैग की रिपोर्ट में जानकारी दी गई है कि बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से कर्ज माफी योजना का लाभ कई जगह कारोबारियों ने उठा लिया है। कई लोगों ने फर्जीवाड़े के जरिए अपने लाखों के कर्ज माफ करा लिए हैं। जबकि हजारों पात्र किसानों के प्रार्थना पत्र लंबित ही पड़े रहे। कैग की रिपोर्ट आने के बाद बुधवार को संसद के दोनों सदनों में भारी हंगामा हुआ था। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने यही सफाई देने की कोशिश की है कि यदि इस मामले में कोई घोटाला वाकई में हुआ होगा, तो किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। सरकार मामले की पूरी जांच करा लेगी।

इस मामले में भारी राजनीतिक हंगामा होने के बाद रिजर्व बैंक ने अपनी कार्रवाई तेज कर दी है। उसने कर्ज माफी योजना से जुड़े बैंकों से 15 दिन के अंदर तमाम ब्यौरा तलब किया है। वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी हैरान हैं कि रिजर्व बैंक की कड़ी निगरानी के बाद भी इतने बड़े पैमाने पर चूक कैसे हो गई? संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ ने तो कैग रिपोर्ट के संदर्भ में कह दिया है कि यह मामला सरकार के लिए बड़े शर्म की बात है। क्योंकि, गरीब किसानों की योजना का लाभ कई जगह फर्जीवाड़े का शिकार हो गया है। जबकि, सरकार ने इस योजना के जरिए गरीब किसानों को राहत देने का बड़ा प्रयास किया था।

दरअसल, 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने मनरेगा के साथ किसान कर्ज माफी योजना को राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश की थी। चुनाव प्रचार में उसे इन योजनाओं के चलते भारी राजनीतिक लाभ भी हुआ था। भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन सवाल करते हैं कि अब जनता कैसे विश्वास करेगी कि यूपीए सरकार आम आदमी के कल्याण के लिए वाकई में कुछ करती है? कर्ज माफी योजना के बहाने अरबों रुपए ‘अपात्रों’ की जेब में चले गए। अब सरकार के लोग जांच कराने का स्वांगभर कर रहे हैं। सवाल यह है कि यूपीए सरकार के दौर में ही इतने घोटाले क्यों होते हैं?
केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार का मानना है कि कर्ज माफी योजना में ज्यादा गड़बड़ियां नहीं हुई हैं। उन्होंने कैग के जांच तरीकों पर ही सवाल उठा दिए हैं। पवार ने कह दिया है कि कैग ने नमूने के तौर पर महज 0.25 प्रतिशत मामलों का परीक्षण कराया है। इतने कम परीक्षणों के आधार पर अरबों रुपए के घोटालों की आशंका खड़ी करना उचित नहीं लगता। प्रधानमंत्री ने पहले ही कह दिया है कि संसदीय परंपराओं के हिसाब से कैग की इस रिपोर्ट को भी संसद की लोक लेखा समिति को परीक्षण के लिए भेज दिया जाएगा।

किसानों से जुड़े इस मामले को लेकर वोट बैंक की राजनीति भी गरम हो गई है। विपक्षी दलों के साथ सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले सपा और बसपा जैसे दलों ने भी संसद में आक्रामक रुख अपना लिया है। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह ने संसद में भी काफी तीखे तेवर दिखाए थे। उन्होंने कहा कि इस फर्जीवाड़े में जिन अधिकारियों की भूमिका हो, उन्हें जेल में डाल देना चाहिए। बसपा सुप्रीमो मायावती ने तो नाराज होकर सरकार की नीयत पर ही सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार, गरीब किसानों और कामगारों को कभी भी वास्तविक लाभ नहीं लेने देती। सरकारी तंत्र साजिश करके कोई न कोई खेल कर देता है। इस मामले में भी सरकार की जिम्मेदारी बनती है। यही कहना काफी नहीं है कि सरकार मामले की जांच कराएगी।

जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने दावा किया है कि संसद से सड़क तक एनडीए नेतृत्व इस मामले को उठाएगा। गांव-गांव में यह बताया जाएगा कि मनमोहन सरकार के कार्यकाल में बस अरबों-खरबों रुपए के घोटालों का इतिहास ही बना है। ऐसे में, जरूरी हो गया है कि जनता वोट के जरिए ऐसी सरकार को उखाड़ फेंके। वैसे भी इस सरकार की खराब आर्थिक नीतियों के चलते आम आदमी का जीवन बहुत कठिन हो गया है। राजद सुप्रीमो लालू यादव भी किसान कर्ज माफी योजना के घोटाले को लेकर काफी गुस्से में आ गए हैं। अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने कहा कि यूपीए-1 की जिस सरकार में यह योजना बनी थी, उसमें वे भी मंत्री थे। किसानों को बड़ी राहत दिलाने के लिए यह योजना लागू कराई गई थी। उन्हें कैग की रिपोर्ट से यह जानकार हैरानी हुई है कि कर्ज माफी योजना में इतना फर्जीवाड़ा हो गया है। जबकि कर्ज में दबे होने के कारण लाखों किसान हर साल आत्महत्याएं करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। जरूरी हो गया है कि घोटालेबाजों को जेल भिजवाया जाए। सरकार का फर्ज है कि कम से कम इस मामले में वह लीपा-पोती न करे। वरना, गरीब किसानों की बहुत ‘हाय’ लग जाएगी।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, विपक्ष के आक्रामक रवैए से तल्ख तेवर अपनाने लगे हैं। बुधवार को उन्होंने संसद में अपनी नाराजगी जता दी थी। आम तौर पर प्रधानमंत्री गुस्सैल टिप्पणियां नहीं करते। बहुत कम ऐसे मौके आए हैं, जब उन्होंने विपक्ष को खुलकर कोसा हो। लेकिन, प्रधानमंत्री ने नाराजगी में भाजपा नेतृत्व के लिए काफी कुछ कह दिया है। वे यहां तक बोले थे कि भाजपा नेताओं को ज्यादा घमंड हो गया है। ऐसे में, उनकी सरकार की तमाम बड़ी उपलब्धियों को भी ये लोग हवा में उड़ाने की राजनीति कर रहे हैं। यदि इनका यही रवैया रहा, तो 2009 की तरह 2014 में इनके हाथ से सत्ता फिसल जाएगी। राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि ऐसी टिप्पणी करके मानो प्रधानमंत्री ने भाजपा को ‘शाप’ दे दिया हो। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह कहते हैं कि इस तरह की टिप्पणियां सरकार के मुखिया की घोर निराशा के ही संकेत माने जाने चाहिए। लेकिन, सरकार देश को यह तो बताए कि आखिर गरीब किसानों के वाजिब हिस्से को कौन लील गया है?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

शायद युवा पुलिस अधिकारी ने यह ‘दुस्साहस’ किया था?

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की चर्चा आजकल नकारात्मक वजहों से ज्यादा होने लगी है। यह सिलसिला लंबे समय से चलता आ रहा है। कई बार इसकी भौंड़ी राजनीतिक तस्वीर सड़क से चलकर संसद तक पहुंच जाती है। राज्य में सपा और बसपा दो प्रमुख ताकतवर दल हैं। इनके बीच अक्सर तूफानी मोर्चों की रार खड़ी हो जाती है। प्रतापगढ़ जिले में हुए एक ताजा आपराधिक हादसे को लेकर सियासी तमाशे का तमाम नंगा नाच शुरू हो गया है।

पिछले दिनों कुंडा के पास एक गांव बलीपुर में दो लोगों की हत्या कर दी गई थी। फायरिंग की खबर पर जब पुलिस के एक युवा उपाधीक्षक मौके पर पहुंचे, तो उनकी भी बेरहमी से हत्या हो गई। खास तौर पर इस मुस्लिम युवा अधिकारी की मौत को लेकर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा तूफान पैदा करने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। इस मुद्दे पर वोट बैंक की राजनीति ने बहुत बेशर्मी से अपना रंग जमाना भी शुरू कर दिया है।

2 मार्च को कुंडा कस्बे के पास बलीपुर गांव में ग्राम प्रधान नन्हे यादव और उनके भाई की हत्या गोली मारकर कर दी गई थी। यह खबर जब पुलिस तक पहुंची, तो कुंडा के युवा पुलिस उपाधीक्षक जिया उल हक बगैर समय गंवाए घटनास्थल पर पहुंच गए थे। जिन लोगों की हत्या हुई थी, उनके परिजन बदला लेने के लिए हथियार लेकर निकल आए थे। पुलिस अधिकारी ने इन्हें शांत कराने की कोशिश की थी। लेकिन, हमलावर भीड़ ने अधिकारी को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया। खतरे को भांपकर पुलिस की बाकी टीम जान बचाकर मौके से भाग गई थी। लेकिन, वह कर्तव्यनिष्ठ अफसर मौके पर डटा रहा था। इसकी कीमत उसे जान देकर चुकानी पड़ी।

अब तक जानकारी यही मिली है कि इस अधिकारी को पहले तमाम यातनाएं दी गईं, फिर गोली मार दी गई। इस तिहरे हत्याकांड को लेकर प्रदेश की सपा सरकार के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। क्योंकि, शहीद अफसर की पत्नी परवीन आजाद लगातार यही कह रही हैं कि उनके पति की जान जाने के पीछे बाहुबली नेता राजा भैया की साजिश रही है। घटना के अगले दिन ही परवीन ने इस आशय की पुलिस में शिकायत भी दर्ज करा दी थी। रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, कुंडा के एक चर्चित नेता हैं। वे यहां की पुरानी रियासत के वारिस हैं। आरोप यही रहा है कि इस इलाके में राजा भैया के दरबार का ‘हुक्म’ ही सबसे बड़ा कानून है। ऐसे में, इस क्षेत्र में तैनात अधिकारियों को भी इस ‘दरबार’ में हाजिरी देना जरूरी हो जाता है। जो लोग किन्हीं कारणों से इस ‘परंपरा’ को नहीं निभाते, वे मुसीबतों का न्यौता ले लेते हैं। शायद युवा पुलिस अधिकारी ने यह ‘दुस्साहस’ किया था?

राजा भैया, 1993 में सिर्फ 26 साल की उम्र में पहली बार विधायक बने थे। वे हमेशा निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ते हैं। वे पांच बार लगातार विधायकी का चुनाव जीत चुके हैं। इन दिनों सपा के पाले में हैं। पूर्वांचल की राजपूत बिरादरी में उनकी राजनीतिक पकड़ मजबूत मानी जाती है। ऐसे में, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की उन पर खास ‘कृपा’ रहती है। शायद इसी वजह से युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार में भी वे कैबिनेट मंत्री बना दिए गए थे। जबकि, सपा अकेले अपने बूते पर भारी बहुमत से जीतकर आई थी। ऐसे में, सपा नेतृत्व की कोई मजबूरी नहीं थी कि वह राजा भैया जैसे विवादित निर्दलीय विधायक को सरकार में ऊंचा ओहदा दे। इस दौर में सपा नेतृत्व से यही सवाल जोरों से पूछा जा रहा है।

बाहुबली छवि वाले राजा भैया लंबे समय से विवादों में रहे हैं। वे खास तौर पर बसपा सुप्रीमो मायावती के निशाने पर भी रहे हैं। मायावती ने अपने शासनकाल में राजा भैया को 2002 में पहली बार जेल भिजवा दिया था। इन पर कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज करा दिए गए थे। माया, जब दोबारा सत्ता में आईं, तो 2007 में भी राजा भैया को जेल जाना पड़ा था। लेकिन, उनके लिए सबसे बड़े मददगार बन गए थे सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह। पिछले वर्ष मार्च में अखिलेश सरकार ने राजा भैया को जेल और खाद्य एवं रसद मंत्रालयों की जिम्मेदारी सौंप दी थी। यह अलग बात है कि अनजाने कारणों से पिछले महीने राजा भैया से जेल मंत्रालय का प्रभार हटा लिया गया था। इससे संकेत यही गए थे कि अब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव शायद उनकी कार्यक्षमता पर पहले जैसा विश्वास नहीं कर पा रहे हैं।

भाजपा के कल्याण सिंह की सरकार में भी राजा भैया मंत्री बने थे। ये वही कल्याण सिंह थे, जो कि ‘कुंडा का गुंडा’ जैसे जुमले उछालकर अपनी राजनीतिक शेखी बघारते रहे थे। राजनाथ सिंह की सरकार में भी राजा भैया माननीय मंत्री की कुर्सी पर थे। सपा से चर्चित नेता अमर सिंह की विदाई काफी पहले हो चुकी है। इस तरह की धारणा रही है कि अमर सिंह के चलते सपा के पास राजपूत वोट बैंक टिकाऊ रहा है। लेकिन, अमर सिंह की गैर-हाजिरी में रणनीतिकार इस वोट बैंक के लिए राजा भैया की ओर देखने लगे थे। हालांकि, यह एक अलग बहस का विषय है कि राजा भैया जैसे बाहुबली नेताओं के बारे में इस तरह का आकलन कितना जमीनी होता है या कितना मनगढ़ंत होता है?

आइये, फिलहाल कुंडा घटना चक्र की ही बात करें। पुलिस अफसर की मौत के मामले ने तूल पकड़ लिया है। इस प्रकरण में राजा भैया आरोपी बने, तो उनकी मंत्री पद की कुर्सी चली गई है। अखिलेश यादव ने उन्हें तलब करके इस्तीफा ले लिया था। अब दबाव है कि राजा भैया को हत्या की साजिश के मामले में गिरफ्तार किया जाए। परवीन आजाद, लगातार यही मांग कर रही हैं। उन्होंने अपने पति की पोस्टमार्टम रिपोर्ट को भी विश्वसनीय नहीं माना। मांग कर दी है कि बड़े मेडीकल पैनल के सामने दोबारा पोस्टमार्टम कराया जाए। उन्होंने आशंका जताई है कि इस मामले में षड़यंत्रकारियों को बचाने की कोशिश हो रही है।

हालांकि, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव शहीद पुलिस अफसर के पैतृक गांव में जाकर परिजनों से मुलाकात कर चुके हैं। वादा कर आए हैं कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने संकेतों में कह दिया है कि यदि राजा भैया जांच में दोषी पाए गए, तो उनके साथ भी कोई रियायत नहीं होगी। यह अलग बात है कि सपा के कुछ रणनीतिकार राजा भैया के मामले में वोट बैंक की राजनीति का भी ध्यान रखने की जरूरत महसूस कर रहे हैं। दूसरी तरफ, बसपा ने इस हत्याकांड को भुनाने के लिए तमाम राजनीतिक हथकंडों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। मंगलवार को पार्टी के सांसदों ने संसद में भी भारी हंगामा किया था। चूंकि, मरने वाला पुलिस अधिकारी मुस्लिम है। ऐसे में, कई सियासी ताकतें वोट बैंक की राजनीति का खेल करने में जुट गई हैं।

इस मामले में तरह-तरह के सियासी रंग भरने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। सहज रूप में यह मामला किसी तरह से हिंदू-मुस्लिम राजनीति का नहीं है। लेकिन, कुछ सियासतदां अपनी ओछी राजनीति से बाज नहीं आ रहे। जामा मस्जिद के चर्चित शाही इमाम अहमद बुखारी तो अक्सर अपने विवादित तेवरों के लिए मशहूर रहते हैं। उन्होंने इस मामले में शुरू से ही भड़कऊ तेवर दिखाए हैं। राजा भैया की गिरफ्तारी को लेकर दबाव बढ़ गया है। सपा नेतृत्व का सबसे बड़ा ऐतराज यही है कि बसपा किस मुंह से कह रही है कि प्रदेश में गुंडाराज है? जबकि, माया सरकार में तो इससे भी ज्यादा हालात खराब थे। सपा-बसपा की इस राजनीतिक धींगामुश्ती को दौर में प्रदेश के बुनियादी सकारात्मक मुद्दों की बहस कोसों दूर चली गई है। क्या यह स्थिति किसी राजनीतिक त्रासदी से कम कही जाएगी?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

मात्र पांच हजार रुपये में अपना खर्च चलाता है यह मुख्‍यमंत्री

क्या आप एक ऐसे मुख्यमंत्री की कल्पना कर सकते हैं? जिसके पास न बैंक बैलेंस हो, न रहने के लिए चमक-दमक वाली कोठी हो और न ही खास बात करने के लिए मोबाइल तक हो। निजी संपत्ति के नाम पर उनके पास 400 वर्ग फुट में बना एक टिन का टप्परभर है। यह ठौर-ठिकाना भी इन्हें अपनी मां से विरासत में मिला है। वे चौथी बार मुख्यमंत्री बने हैं। लेकिन, उनके निजी जीवन की खांटी सादगी में कोई अंतर नहीं आया।

मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें जो वेतन मिलता है, उसे वे अपनी पार्टी के कोष में दे देते हैं। पार्टी की तरफ से हर महीने उन्हें महज 5 हजार रुपए मिलते हैं। इसी में ‘कामरेड’ मुख्यमंत्री अपना खर्चा आराम से चला लेते हैं। कहते हैं कि इतनी रकम में जीवन मजे से चल जाता है। उन्हें कभी अपनी ‘गरीबी’ नहीं सताती। बस, उनकी चिंता यही रहती है कि केंद्र से भरपूर आर्थिक मदद मिलती रहे, तो राज्य के विकास की गाड़ी और आगे बढ़ जाए। माणिक दा के जीवन में एक ही ‘लग्जरी’ आदत है। वे सिगरेट पीते हैं। बड़ी पुरानी लत है। हर दिन एक पैकेट सिगरेट पी जाते हैं। इसके लिए भी वे कई बार जनता से माफी मांग चुके हैं।

हम यहां बात कर रहे हैं कि त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार की। पिछले दिनों विधानसभा के चुनाव परिणाम आए थे। यहां पर चौथी बार माणिक सरकार सत्ता में लौट आए हैं। 1998 से वे लगातार सत्ता में हैं। पूर्वोत्तर में बसा त्रिपुरा, देश का तीसरा सबसे छोटा प्रदेश है। इसका कुल क्षेत्रफल 10,491 वर्ग किमी का है। इसके उत्तर, दक्षिण और पश्चिम की सीमाएं बांग्लादेश से लगी हुई हैं। जबकि, पूर्व में यह प्रदेश असम और मिजोरम से जुड़ा है। इस प्रदेश में जनजातियों का बाहुल्य है। आधी से ज्यादा आबादी आज भी कृषि से जुड़ी अर्थव्यवस्था से ही चल रही है। उद्योग के नाम पर आजादी के इतने वर्षों बाद भी यहां कोई बड़ा संस्थान नहीं है। महज एक ही राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-44) से ही त्रिपुरा जुड़ा हुआ है। यहां के लोग बांस से बनाए जानी वाली तमाम कलात्मक वस्तुओं का निर्माण करते हैं। इनकी खपत दिल्ली और मुंबई महानगरों तक होती है।

कृषि योग्य जमीन में यहां पर मुख्य तौर पर धान की खेती होती है। केरल के बाद यहां पर प्राकृतिक रबड़ का सबसे ज्यादा उत्पादन होता है। जमीन के आधे हिस्से में आज भी यहां पर हरे-भरे वन हैं। माणिक सरकार, ऐसे गरीब और सुदूर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, जहां के दुख-दर्द की आवाज जल्दी से दिल्ली को नहीं सुनाई पड़ती। 64 वर्षीय माणिक सरकार, बंगाली हिंदू हैं। उन्होंने बीकॉम तक पढ़ाई की है। एक बेहद साधारण परिवार में उनका जन्म हुआ था। उनके पिता दर्जी थे। जबकि मां एक सरकारी कार्यालय में चतुर्थ श्रेणी की कर्मचारी थीं।

जाहिर है ऐसे में स्नातक स्तर तक पढ़ाई कर लेने के बाद माणिक सरकार का लक्ष्य एक साधारण नौकरी हासिल करके परिवार की रोजी-रोटी के जुगाड़ करने का ही था। लेकिन, 1967 में सीपीएम ने खाद्यान के मुद्दे पर एक बड़ा आंदोलन शरू किया था। इसका खास असर पूर्वोत्तर राज्यों में था। क्योंकि इस दौर में खाद्यान संकट के चलते त्रिपुरा सहित कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई थी। चूंकि, राजनीतिक रूप से इन छोटे प्रदेशों गुहार केंद्र की नींद नहीं तोड़ पाती थी, संकट बढ़ता जा रहा था। इस आंदोलन में माणिक सरकार भी कूद पड़े थे। इसी दौरान वे वामपंथी नेताओं के संपर्क में आए थे। धीरे-धीरे वे सीपीएम की राजनीति में ही रस-बस गए।

त्रिपुरा में, नृपेन चक्रवर्ती सबसे लोकप्रिय वामपंथी नेता रहे हैं। उनके बाद माणिक सरकार ने लगभग उतनी ही लोकप्रियता हासिल कर ली है। अपनी सादगी और खांटीपन में माणिक सरकार ने नृपेन दादा को भी पीछे छोड़ दिया है। किसी को यह जानकर हैरानी हो सकती है कि मुख्यमंत्री के तौर पर भी वे अपनी कार में ‘लालबत्ती’ लगवाना तक पसंद नहीं करते। सुरक्षा के नाम पर उनके निवास में कोई ताम-झाम नहीं रहता। यहां तक कि अब उनके निवास में गेट तक नहीं है। जनता का आदमी जब चाहे तब माणिक दादा से मिल सकता है। वे तो जनता के ‘राजा’ हैं।

पिछले दिनों एक मीडिया इंटरव्यू में उन्होंने यह कहा था कि यह सादगी भरा जीवन जीकर वे राज्य की जनता पर कोई अहसान नहीं कर रहे। हकीकत तो यह है कि राज्य की आधी से ज्यादा जनता गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है। लेकिन, यहां के लोग इतनी शांत-प्रकृति के हैं कि थोड़े संसाधनों में ही खुश रहते हैं। वाममोर्चा सरकार की कार्यशैली के चलते राज्य में आतंकवाद की समस्या भी नहीं रही है। कभी-कभार जनजातियों के कुनबों में आपसी झगड़े की वारदातें हो जाती हैं। लेकिन, पिछले सालों में इनमें भी काफी कमी आ गई है।

वे चौथी बार मुख्यमंत्री जरूर बन गए हैं। लेकिन, सरकारी कार का उपयोग अपने घरेलू काम के लिए कभी नहीं करते। राजधानी अगरतला में अपने घर के पास उन्हें देर शाम को फुटपाथ से सब्जी खरीदते देखा जा सकता है। उनके कंधे में सब्जियों का झोला लटका होता है। वे दो किमी तक पैदल ही जाना पसंद करते हैं। सुरक्षा के नाम पर कभी-कभी उनके पीछे दो होमगार्ड दिखाई पड़ जाते हैं। उनके हाथों में राइफलों की जगह डंडे होते हैं। अपनों के बीच माणिक सरकार को ‘माणिक दा’ कहा जाता है। कभी बार वे सब्जी लेते वक्त मोल-तोल करते भी देखे जाते हैं।

पिछले दिनों उन्होंने एक विदेशी पत्रकार को ‘मोल-तोल’ की वजह भी बता दी थी। कहा था कि सब्जी वाले समझते हैं कि बड़े नेता हैं, कुछ भी भाव लगा दो, मोलभाव नहीं करेंगे। लेकिन, उन्हें पता नहीं है कि वे देश के सबसे गरीब नेताओं में एक को सब्जी बेच रहे हैं। कम से कम सभी मुख्यमंत्रियों में वे गरीब तो जरूर होंगे। उन्होंने कहा था कि अपनी इस गरीबी पर उन्हें बहुत खुशी होती है। क्योंकि इसके चलते ही वे आम आदमी की जिंदगी ही जीते हैं। विरोधी भी राजनीतिक जीवन में कभी उनकी ईमानदारी पर अंगुली नहीं उठा पाए हैं। कम से कम इसका संतोष तो है।

हमेशा सफेद कुर्ता-पायजामा पहनने वाले माणिक दा को शायद ही कभी किसी और ड्रेस में देखा जा सकता हो। उनके पास चार-पांच जोड़ी कुर्ता-पायजामा रहते हैं। इनकी धुलाई वे देर रात खुद करते हैं। समय नहीं मिलता, तो बगैर प्रेस के ही कपड़े पहनने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती। उनकी पत्नी पांचाली भट्टाचार्य एक रिटायर अधिकारी हैं। केंद्र सरकार के एक विभाग में कार्यरत रही हैं। पांचाली, राजधानी अगरतला में अक्सर रिक्शे से यात्रा करती हैं। कहीं दूर जाना हुआ, तो वे ‘शेयरिंग टैंपो’ में सफर करती हैं। चूंकि, पति की कार सरकारी होती है। ऐसे में, मुख्यमंत्री उन्हें कार की सवारी करने की अनुमति भी नहीं देते।

यह जरूर है कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें पीएफ इत्यादि के फंड से काफी रकम मिल गई है। करीब 25 लाख रुपए उनके एफडी खाते में जमा हैं। उनके पास करीब 20 तोले सोने के गहने भी हैं। इस तरह से वे अपने पति मुख्यमंत्री की मुकाबले ज्यादा ‘धनी’ हैं। पांचाली कहती हैं कि उन्हें अपने खांटी ईमानदार पति पर गर्व है। उन्हें घरेलू सुख-सुविधाओं की कभी दरकार नहीं रही। विधानसभा चुनाव में पर्चा भरने के दौरान माणिक सरकार ने जानकारी दी थी कि उनके बैंक खाते में महज एक हजार रुपए के करीब नकदी है। जबकि चल-अचल संपत्ति के नाम पर उनके पास कुछ नहीं है। उन्होंने मीडिया को मुस्कुराते हुए यह जानकारी भी दे दी है कि पार्टी की तरफ से उन्हें जो गुजारा भत्ता मिलता है, उसमें से वे कुछ पैसे बचाकर जरूरतमंदों की भी मदद करते हैं।

माणिक दा के करीबी रहे सीपीएम के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान दादा के पास खर्च करने के लिए कुछ होता ही नहीं है। महज, वोट देने की अपील देने वाले पर्चे बंटवा दिए जाते हैं। कई बार चुनाव प्रचार में कुल खर्चा 10 हजार रुपए के आस-पास ही आता है। इतना भी खर्चा हो जाता है, तो दादा अपने सहयोगियों से उलहना देते हैं कि भाई, कुछ किफायत से काम लो। हम लोग एक गरीब प्रदेश में राजनीति कर रहे हैं।

बड़े उद्योग के नाम पर यहां कुछ चाय-बागान भर हैं। वे केंद्र सरकार से लगातार मांग करते आए हैं कि कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार की खुलकर मदद करें। लेकिन, माणिक दा का दुख यह है कि दिल्ली की सरकार, त्रिपुरा जैसे छोटे राज्यों का दुख-दर्द जल्दी से नहीं सुनती। वह आम आदमी का नारा सड़क से संसद तक उछालती है, लेकिन आदिवासी प्रदेश के सबसे जरूरतमंदों की आवाज सुनना पसंद नहीं करती। त्रिपुरा बिजली उत्पादन के मामले में जरूर ‘धनी’ है। यहां के तीन पावर स्टेशनों में करीब 105 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है। जबकि राज्य में मांग 50-60 मेगावाट की ही रहती है।

मुख्यमंत्री ने कई बार मांग की है कि केंद्र मदद करे, तो पन बिजली योजनाओं के जरिए यहां पर 500 मेगावाट का उत्पादन आराम से हो सकता है। ऐसे में, बिजली बेचकर राज्य की आर्थिक सेहत एकदम से ठीक की जा सकती है। लेकिन, केंद्र महज उतना ही देना चाहता है, जितने से कि भुखमरी न रहे। इसके लिए माणिक दा अब ज्यादा लंबी राजनीतिक लड़ाई के लिए तैयार हैं। उन्होंने सीपीएम के शीर्ष नेतृत्व से भी केंद्र पर दबाव बनाने की गुहार की है।

केंद्रीय योजना आयोग ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में यह स्वीकार किया है कि पिछले वर्षों में त्रिपुरा सरकार ने कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए अभूतपूर्व कदम उठाए हैं। इससे राज्य में शांति की बहाली भी हुई है। यहां पर साक्षरता की दर राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है। राज्य में 90 प्रतिशत से ज्यादा आबादी साक्षर है। लिंगानुपात हरियाणा और पंजाब जैसे प्रदेशों के मुकाबले काफी बेहतर है। यहां पर बालिकाओं का औसत 1000 के मुकाबले 961 का है। जो कि 940 के राष्ट्रीय औसत से बेहतर आंकड़ा है। 2011 के जनसंख्या आंकड़े के अनुसार, त्रिपुरा की जनसंख्या करीब 37 लाख की है। माणिक दा ने पिछले दिनों कहा था कि उन्हें उसी रात भरपूर नींद आती है, जब यह खबर आ जाती है कि राज्य में आज पूरा अमन-चैन रहा है। वे विश्वास जताते हैं कि दिल्ली की ‘बेदर्दी’ के बावजूद त्रिपुरा की मेहनतकश जनता एक ना एक दिन बेमिसाल विकास की गाथा जरूर रच डालगी। अब जनता के इस ‘राजा’ का यह सपना कब पूरा होता है? यह कहना तो मुश्किल है। लेकिन, इतना जरूर कहा जा सकता है कि त्रिपुरा के पास ही इतना खांटी और सहज मुख्यमंत्री है, जो कि देश-दुनिया में शायद बेमिसाल है।

जबकि, इन दिनों राजनीति के भ्रष्टाचार को लेकर देशभर में बहस तेज है। हम जानते हैं कि नेता जी एक बार भी विधायक रह लेते हैं, तो उनके वारे-न्यारे हो जाते हैं। उनके पास बड़ी-बड़ी गाड़ियां आ जाती हैं। यह भी इसी देश में होता है और इसी देश के एक हिस्से में माणिक दा जैसे मुख्यमंत्री भी हैं। जो कि झोला लटकाकर सब्जी खरीदने निकलते हैं, जिनकी बीवी बुढ़ापे में भी रिक्शे में चलती हैं। सड़क चलते लोग उनसे पति की सरकार के प्रति नाराजगी भी जता देते हैं। पत्नी भी सिर झुकाकर सरकार की शिकायतें सुन लेती हैं और शाम को श्रीमान मुख्यमंत्री को जनता की राय बता देती हैं। कई बार मुख्यमंत्री शिकायतकर्ता को सफाई देने उसके घर भी पहुंच जाते हैं और बदले में एक कप गरम चाय की फरमाइश कर देते हैं। कह देते हैं कि इतनी सेवा के बदले भई एक कप का हक तो बनता है। शिकायतकर्ता माणिक दा की इस सहजता पर बाग-बाग हो जाता है। कुछ ऐसे हैं त्रिपुरा के माणिका दा…

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

बजट में चिदंबरम ने ‘संतुलन’ साधने की कर दी है सर्कस!

वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने 2013-14 के प्रस्तुत किए गए बजट में काफी चतुराई दिखाने की कोशिश की है। उन्होंने तमाम बजट पूर्वानुमानों को खासे झटके दिए हैं। सत्तारूढ़ कांग्रेस के हलकों में पक्के तौर पर उम्मीद की जा रही थी कि वित्तमंत्री इनकम टैक्स में कर छूट का दायरा जरूर बढ़ाएंगे। ताकि चुनावी वर्ष में पार्टी की राजनीति को ज्यादा चमकदार बनाया जा सके। लेकिन वित्तमंत्री ने इन उम्मीदों पर पूरी तरह से पानी फेर दिया। इनकम टैक्स के स्लैब में भी कोई बदलाव नहीं किया गया। इतना जरूर हुआ कि उन्होंने एक करोड़ रुपए से अधिक की आय वाले अमीरों पर दस प्रतिशत का सरचार्ज ठोंक दिया है। मध्यवर्ग को वित्तमंत्री ने कोई राहत तो नहीं दी। यदि यह वर्ग चाहे, तो अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगने से अपने मन को कुछ तसल्ली दे ले।

कांग्रेस के राष्‍ट्रीय महासचिव चौधरी बीरेंद्र सिंह कहते भी हैं कि कांग्रेस की नीतियां हमेशा सच्चे समाजवाद से प्रेरित रहती हैं। वित्तमंत्री ने अगर अमीरों पर टैक्स बढ़ाया है, तो यह हर तरह से उचित कहा जा सकता है। उन्होंने यही कहा है कि वैश्विक मंदी के इस दौर में यूपीए सरकार ने बहुत अच्छे ढंग से भारत को बड़ी आर्थिक चपेट से बचा लिया है। तमाम खराब स्थितियों में भी वित्तमंत्री ने बजट में किसी वर्ग पर ज्यादा बोझ नहीं डाला। इसकी सराहना तो विपक्ष को करनी चाहिए। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज का सवाल है कि कांग्रेस के नेता इस बजट के ‘कीर्तन’ गाकर भला देश के लोगोंं को और कितना चिढ़ाएंगे? सुषमा कहती हैं कि बात-बात में आम आदमी की दुहाई देने वाली कांग्रेस के वित्तमंत्री ने 100 मिनट के बजट भाषण में एक बार भी आम आदमी का जिक्र नहीं किया। शायद इसीलिए कि उनके वित्तीय एजेंडे में कहीं आम आदमी के लिए कोई गुंजाइश भी नहीं है।

चिदंबरम ने माना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। ऐसे में प्रत्यक्ष करों में वे किसी बड़ी छूट का तोहफा नहीं दे पाए। यदि वे ऐसा कुछ करते, तो इसके परिणाम सेहतमंद नहीं हो सकते थे। आर्थिक और राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ यही कयास लगा रहे थे कि चिदंबरम का यह बजट चुनावी ज्यादा होगा। लेकिन बजट को देखकर सीधे तौर पर यह कहना मुश्किल है कि वित्तमंत्री ने पार्टी की राजनीतिक जरूरतों को ही तरजीह दी है। यह जरूर है कि उन्होंने बड़ी बारीकी से कुछ ऐसी कारीगरी दिखाई है, जिससे कि पार्टी के वोट बैंक की राजनीति को सीधे तौर पर कोई झटका न लगे।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) को बजट में विशेष विकास के लिए 100 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, तो राजनीतिक संतुलन साधने के लिए बनारस हिंदू विश्व विद्यालय (बीएचयू) को भी इतनी ही रकम आवंटित करने की व्यवस्था है। क्योंकि चिदंबरम की पार्टी अपनी झोली में हर समुदाय का वोट बैंक देखना चाहती है। सीपीआई के वरिष्ठ नेता अतुल कुमार अनजान का मानना है कि कांग्रेस की धर्म निरपेक्षता में राजनीतिक स्वांग ज्यादा होता है। उसकी चिंता सही मायने में गरीब अल्पसंख्यक वर्ग के कल्याण की नहीं होती। ये लोग तो सरकारी रेवड़ियां बांटकर वोट बैंक की चिंता में लगे रहते हैं। बजट को कांग्रेसी अक्सर वोट बैंक की राजनीति का हथियार ही बनाते हैं। इस बार भी कुछ-कुछ ऐसी ही कोशिश हुई है।

अतुल अनजान का मानना है कि वित्तमंत्री ने किसानों और समाज के कमजोर वर्गों के साथ धोखा ही किया है। ऐसे कोई प्रावधान नहीं किए गए जिससे कि कृषि की अर्थ व्यवस्था को और मजबूती मिलती। सच तो यह है कि वित्त मंत्री चिदंबरम की अर्थिक नीतियों से विदेशी पूंजी वाले मस्त हो रहे हैं। जबकि देश की कामगार जनता पस्त हो रही है। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चिंता आम आदमी की आर्थिक सेहत पर नहीं रहती। उन्हें तो यही चिंता सताती है कि ऐसा सब कुछ कर दो, जिससे कि विदेशी निवेशक खुश हो जाएं। भले ही ये लोग देश का कितना माल यहां से उड़ा कर ले जाएं? यह शायद उनकी चिंता का विषय नहीं है। यदि यही अर्थिक नीतियां लंबे समय तक चलीं, तो देश को बहुत बुरे दिन देखने पड़ सकते हैं।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता चौधरी बीरेंद्र सिंह कहते हैं कि आज के दौर में वामदालों को भी अपना घिसापिटा आर्थिक दर्शन बदल लेना चाहिए। क्योंकि दुनिया तेजी से बदल रही है। ऐसे में हम चार दशक पहले वाले आर्थिक सोच के साथ जकड़े नहीं रह सकते। वित्तमंत्री ने टैक्सों के जरिए करदाताओं से 18 हजार करोड़ का अतिरिक्त कर वसूलने का प्रावधान किया है। उनका दावा तो यही है कि ये प्रावधान बहुत सोच समझकर किए गए हैं। इससे किसी वर्ग को ज्यादा तकलीफ नहीं होनी चाहिए। बजट में स्वास्थ्य बीमा का दायरा बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इस प्रावधान से यह जताने की कोशिश हुई है कि सरकार हेल्थ सेक्टर के विकास को लेकर खास पहल कर रही है। इससे लोगों के जीवन स्तर में भी बेहतरी जरूर आएगी।

घर बनाने के लिए अब 25 लाख की रकम का कर्ज लेने वालों को भी कर में रियायत का प्रावधान है। उन्हें इस मद में अब एक लाख रुपए तक की छूट मिल जाएगी। खाद्य सुरक्षा गारंटी विधेयक को संसद के इसी सत्र में पारित कराने की तैयारी है। क्योंकि इसकी पहल खास तौर पर कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने की है। पार्टी के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि ‘मनरेगा’ की तरह खाद्य सुरक्षा गारंटी कानून अगले चुनाव में यूपीए के लिए राजनीतिक वरदान बन सकता है। क्योंकि 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने ‘मनरेगा’ को खूब भुना लिया था। खाद्य सुरक्षा विधेयक अभी लंबित है, लेकिन वित्तमंत्री ने इस मद के लिए 10 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान कर दिया है। इसके जरिए खास राजनीतिक संदेश देने की कोशिश जरूर दिखाई पड़ती है। पिछले वर्ष 16 दिसंबर को दिल्ली में एक पैरामेडिकल छात्रा के साथ दुष्कर्म की वारदात हुई थी। इसको लेकर पूरे देश में महिला सुरक्षा के मुद्दे पर बहस छिड़ गई है। यहां तक कि महिलाओं से जुड़े अपराधों पर और ज्यादा सख्त सजा का कानूनी प्रावधान किया गया है। नए कानून के लिए इसी सत्र में एक विधेयक भी पारित होने जा रहा है।

दिल्ली में हुए बहुचर्चित गैंगरेप की पीड़िता का नाम कई मीडिया संस्थानों ने ‘निर्भया’ दिया था। क्योंकि इस लड़की ने बलात्कारियों से जूझने में अभूतपूर्व बहादुरी का परिचय दिया था। वित्तमंत्री ने महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने के लिए विशेष बजट का प्रावधान किया है। इसके लिए 1 हजार करोड़ रुपए से ‘निर्भया फंड’ बनेगा। जाहिर है कि इस प्रावधान से आधी आबादी को खुश करने की कोशिश हुई है। हालांकि, कोई भी वित्तमंत्री के इस कदम पर शायद ही ऊं गली उठा पाए? विपक्ष ने यही कहा है कि सरकार ने अभी तय ही नहीं किया है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए क्या-क्या कदम उठाने हैं, ऐसे में बजट के प्रावधान से ही क्या हो जाएगा?

तमाम विकास परियोजनाओं के लिए सरकार को जमीन अधिग्रहित करनी होती है। कई सालों से यह आवाज उठती आ रही है कि किसानों से मुआवजे की राशि पर टैक्स न वसूला जाए। इस बार चिदंबरम ने साफ तौर पर प्रावधान किया है कि खेती की जमीन खरीदने और बेचने पार कोई टैक्स नहीं रहेगा। वित्तमंत्री ने इस बार कुछ नायाब कदम भी उठाए हैं। अब सरकार ‘महिला बैंक’ खोलेगी, जिसमें सारा स्टाफ महिलाओं का होगा। अक्टूबर में पहला महिला बैंक खोलने का लक्ष्य भी रखा गया है। अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की कोशिश है कि अल्पसंख्यकों का एक मुश्त वोट बैंक उसकी ही झोली में आ जाए। शायद इसी कोशिश में अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए जोरशोर से तमाम योजनाएं चलाई जा रही हैं। इस बार बजट में अल्पसंख्यक विकास के लिए 3511 करोड़ रुपए की भारी रकम का प्रावधान किया गया है। अल्पसंख्यकों के विकास के लिए चिदंबरम ने इतनी बड़ी रकम की व्यवस्था की है, कायदे से इस प्रावधान से मुलायम सिंह जैसे नेताओं को खुश होना चाहिए। क्योंकि ये भी अल्पसंख्यकों के बड़े हिमायती हैं।

लेकिन राजनीति की लकीर हमेशा सीधी नहीं चलती। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह ने कह दिया है कि यह बजट किसान और गरीब विरोधी है। अल्पसंख्यकों के विकास के लिए कांग्रेस की नीतियों में ईमानदारी ही नहीं है, तो बजट देने से ही क्या हो जाएगा? कांग्रेस के नेता यही ढिंढोरा पीटने में लगे हैं कि वैश्विक मंदी के दौर में भला इससे बढ़िया बजट और क्या होता? वित्तमंत्री ने कहा भी है कि इस दौर में सकल विकास दर में कुछ गिरावट जरूर है, लेकिन इससे वे चिंतित नहीं हैं। क्योंकि जीडीपी के मामले में चीन और इंडोनेशिया ही हमसे कुछ आगे हैं। ऐसे में अपनी इसी विकास दर पर खुश होने के हमारे पास पर्याप्त कारण हैं। अच्छा यही रहेगा कि आर्थिक विकास के मामले में संकीर्ण दलगत राजनीति से ज्यादा से ज्यादा परहेज हो। शायद यही देश की आर्थिक सेहत के लिए ठीक है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्कvirendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

जांच की जद में फंसा जांबाज हीरो!

वायुसेना के पूर्व प्रमुख एसपी त्यागी एक जांबाज योद्धा रहे हैं। अपने लंबे करियर में उन्होंने बहादुरी और हुनर के कई कमाल दिखाए हैं। इसके चलते उन्हें कई विशिष्ट सम्मान भी मिल चुके हैं। 2007 में रिटायर होने के बाद वे आराम से अपनी जिंदगी व्यतीत कर रहे थे। लेकिन, इसी बीच उनके जीवन में भारी उथल-पुथल मच गया। क्योंकि एयरचीफ मार्शल (रि.) त्यागी और उनके करीबी परिजन बहुचर्चित हेलीकॉप्टर सौदे की दलाली के आरोप में फंस गए हैं।

आरोप काफी संगीन है। इस कांड को लेकर राजनीतिक हलकों में खासी सनसनी फैल गई है। मामले की जांच सीबीआई ने शुरू कर दी है। उसने इस प्रकरण की प्राथमिक जांच (पीई) अपने यहां दर्ज कर ली है। इसमें पूर्व वायुसेना प्रमुख सहित दस लोगों के नाम हैं। इसी के साथ चार कंपनियां भी जांच के दायरे में आ गई हैं।

शशींद्र पाल त्यागी का जन्म 14 मार्च, 1945 को इंदौर में हुआ था। इनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई जयपुर के सेंट जेवियर स्कूल में हुई थी। स्कूली दौर में हुई खेल-कूद की प्रतियोगिताओं में हमेशा अव्वल रहते थे। 31 दिसंबर, 1963 को वायुसेना में कमीशन कैडेट के रूप में शामिल हो गए थे। 1965 और 1971 में हुए भारत-पाक युद्धों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई थी। 1971 में तो उन्होंने अपनी जांबाजी के चलते वायुसेना में काफी शोहरत पा ली थी। 1980 में भारतीय सेना में जगुआर विमान आया था। वायुसेना ने इस विशिष्ट लड़ाकू विमान को उड़ाने के लिए जो आठ पायलट चिन्हित किए थे, उनमें एक एसपी त्यागी भी थे। बाद में, इसी उड़ान से जुड़े एक विशेष कोर्स के लिए दो पायलटों का चयन हुआ, तो एक नाम त्यागी का भी था।

एसपी त्यागी ने जल्द ही फाइटर विमान से पलटवार करने की सभी बारीकियां सीख ली थीं। उन्होंने एक अमेरिकी सैन्य कॉलेज से एक सर्टीफिकेट भी हासिल किया था। 1985 में उन्हें विशिष्ट सेवाओं के लिए वायुसेना मेडल (वीएम) भी मिला। एयर कमोडोर के रूप में उन्होंने जामनगर स्थित 33 विंग सेंटर की कमान संभाली थी। कुछ समय तक वे डिफेंस अटैची के रूप में सऊदी अरब के दूतावास में सलाहकार के रूप में कुछ समय तक पदस्थ रहे। 1994 में उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल (एवीएसएम) मिला था। एओसी के रूप में वे सेंट्रल, साउथ-वेस्टर्न और वेस्टर्न एयर कमांड संभाल चुके हैं। ऐसे बहुत कम उदाहरण हैं कि जब किसी ने अपने करियर में तीन कमांड की जिम्मेदारी संभालने का रिकॉर्ड बनाया हो। उनकी कार्य कुशलता को देखते हुए एयर मार्शल के रूप में उन्हें परम विशिष्ट सेवा मेडल (पीवीएसएम) 2003 में मिल गया था।

20वें वायुसेना प्रमुख के रूप में उनकी नियुक्ति 31 दिसंबर 2004 को हुई थी। वे 2007 तक इस पद पर रहे। रिटायरमेंट के पांच सालों बाद वे हेलीकॉप्टर खरीद सौदे के रिश्वतकांड की आंच में झुलसने लगे हैं। करीब एक साल पहले अंग्रेजी अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपनी खास रिपोर्ट में यह दावा किया था कि अति विशिष्ट लोगों के उपयोग के लिए हेलीकॉप्टर खरीद का जो सौदा रक्षा मंत्रालय ने किया है, उसमें अरबों रुपए की दलाली का खेल हुआ है। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद राजनीतिक हलकों में थोड़ा शोर-शराबा जरूर हुआ था। लेकिन, रक्षा मंत्री एके एंटनी ने यही कह दिया था कि अभी उनके मंत्रालय के पास ऐसी कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। यदि कुछ गड़बड़ पाया गया, तो सख्त से सख्त कार्रवाई जरूर होगी।

खांटी ईमानदार छवि वाले रक्षा मंत्री एंटनी ने जब यह आश्वासन दिया, तो बात आई-गई हो गई। लेकिन, इटली की कंपनी अपने देश में शक के दायरे में आ गई थी। ऐसे में, वहां पड़ताल तेज होती गई। दरअसल, फरवरी 2010 में इटली की कंपनी ‘फिनमैक्कनिका’ और रक्षा मंत्रालय के बीच एडब्ल्यू 101 हेलीकॉप्टर खरीद का सौदा हुआ था। 12 हेलीकॉप्टर खरीदे जाने थे। इनकी कीमत करीब 3600 करोड़ रुपए बैठी थी। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसे विशिष्ट व्यक्तियों के लिए सुरक्षित एवं आधुनिक तकनीक वाले हेलीकॉप्टरों की जरूरत वर्ष 2000 में ही महसूस की गई थी। उसी दौर से खरीद की शुरुआती प्रक्रिया भी एनडीए सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई थी।

लेकिन, अंतिम रूप से सौदा 2010 में हो पाया। ये खास किस्म के हेलीकॉप्टर ‘फिनमैक्कनिका’ की एक सहायक कंपनी ‘अगस्टा वेस्टलैंड’ बनाती है। इनका निर्माण ब्रिटेन में किया जाता है। लेकिन,   इस कंपनी का प्रशासनिक नियंत्रण फिनमैक्कनिका के पास ही रहता है। 12 में से 3 हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी भी हो चुकी है। ये सभी दिल्ली स्थित पालम हवाई अड्डे पर खड़े हैं। दलाली की गड़बड़ी की सुगबुगाहट के चलते इनका प्रयोग नहीं शुरू किया गया है। पिछले दिनों ‘फिनमैक्कनिका’ कंपनी के प्रमुख जी. ओरसी की गिरफ्तारी इटली में हो गई थी। उन पर आरोप लगा कि हेलीकॉप्टर सौदे के लिए उन्होंने कई भारतीयों को करीब 362 करोड़ रुपए की रिश्वत भिजवाई थी। दरअसल, इस मामले की पड़ताल इटली की जांच एजेंसियां काफी पहले से कर रही थीं।

यह कंपनी इटली सरकार का एक उपक्रम है। लेकिन, इसके प्रबंधन ने किसी तरह भारतीय सौदे को हासिल करने के लिए तमाम गलत हथकंडे अपनाने से परहेज नहीं किया था। रिश्वत की रकम का ब्यौरा ‘प्रमोशन एक्सपेंसेज’ के नाम पर दिखाया गया था। आॅडिट के दौरान इतनी बड़ी रकम का खेल पकड़ में आ गया। जब वहां की जांच एजेंसियों को पुख्ता प्रमाण मिल गए, तो उन्होंने कंपनी के प्रमुख पर हाथ डाल दिया। इस गिरफ्तारी के बाद ही भारत में सनसनी फैल गई। इस बात की तलाश शुरू हुई कि भारत में किन लोगों ने इतनी बड़ी दलाली की रकम को हजम किया है?

इटली की जांच एजेंसियों ने दाखिल आरोप पत्र में दावा किया कि पूर्व वायुसेना प्रमुख त्यागी और उनके तीन-चार परिजनों के माध्यम से रिश्वत की मोटी रकम एक छद्म इंजीनियरिंग सौदे के नाम पर ट्यूनीशिया और मॉरीशस की बोगस फर्मों के जरिए भेजी गई। इस आशय की खबर आई तो भारत के राजनीतिक हलकों में विवाद ने तूल पकड़ना शुरू कर दिया। यूपीए सरकार को आशंका हो गई कि कहीं विपक्ष इस रक्षा सौदे की दलाली के मामले को दूसरा ‘बोफोर्स’ बनाने की कोशिश न कर दे। उल्लेखनीय है कि 1990 के दौर में बहुचर्चित ‘बोफोर्स’ तोप की दलाली के मामले में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार हिल गई थी। इस सौदे में 64 करोड़ रुपए की दलाली का आरोप लगा था। राजीव सरकार तमाम सफाई देती रही थी, लेकिन राजनीतिक तस्वीर ऐसी बदली कि कई सालों तक कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से बाहर रहना पड़ा था।

इस राजनीतिक खतरे को भांपकर रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने बगैर किसी देरी के मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का ऐलान किया। सीबीआई ने फटाफट पड़ताल का काम भी शुरू कर दिया। पिछले दिनों एक संयुक्त जांच दल पड़ताल के लिए इटली गया था। इस जांच टीम में रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी और विदेश मंत्रालय के भी एक अधिकारी सीबीआई जांच दल के साथ गए थे। इस जांच दल ने वहां वकीलों आदि से मिलकर दलाली के कई सबूत इकट्ठे किए हैं। इनसे यह जाहिर होता है कि इतालवी कंपनी ने 362 करोड़ रुपए की दलाली तो भारत जरूर भेजी थी। इसके प्रमाण भी हैं। अब जांच एजेंसी को यह पता करना है कि इतनी बड़ी रकम यहां किन-किन लोगों ने हजम की है?

पिछले दिनों ही इटली से जांच टीम लौटी है। इसमें शुरुआती पड़ताल के बाद अपने यहां प्रारंभिक जांच (पीई) दर्ज कर ली है। जांच दायरे में एसपी त्यागी के अलावा अन्य 10 लोग हैं। जांच के दायरे में चार कंपनियां भी हैं। पीई रिपोर्ट के बाद सीबीआई ने इन लोगों को जांच के दायरे में ले लिया है। अब उसे अधिकार मिल गया है कि इनमें से किसी को पूछताछ के लिए वह बुला सकती है। लेकिन, जांच एजेंसी को इतने पुख्ता सबूत नहीं मिल पाए कि वह इनमें से किसी के खिलाफ  एफआईआर दर्ज करा सके।

जांच एजेंसी ने प्राथमिक जांच रिपोर्ट दर्ज करने के बाद एसपी त्यागी के अलावा उनके परिजन जूली, डॉक्सा और संदीप त्यागी को जांच के दायरे में लिया है। जबकि इस घेरे में यूरोपियन दलाल कार्लो गरोसा, क्रिस्ट्रीयल माइकल, गोडो होस्को व एरोमाइटिक्स कंपनी के कानूनी सलाहकार गौतम खेतान के नाम भी शामिल हैं। इस दायरे में एरोमाइटिक्स के पूर्व सीईओ प्रवीण बख्शी, फिनमैक्कनिका के पूर्व अध्यक्ष जी. ओरसी, अगस्टा वैस्टलैंड के पूर्व सीईओ ब्रूनो एडनोनली भी नामजद किए गए हैं। इतालवी कंपनी फिनमैक्कनिका, अगस्टा वेस्टलैंड, आईडीएम इंफोटेक व एरोमैटिक्स कंपनियां सीबीआई के जांच दायरे में आ गई हैं।

हालांकि, पूर्व वायुसेना प्रमुख त्यागी ने लगातार यही कहना शुरू कर दिया है कि उन्हें कुछ लोग साजिश के तहत फंसाने में लगे हैं। उन्हें आशंका है कि कुछ बड़े लोगों को बचाने के लिए उन्हें बलि का बकरा बनाने की कोशिश हो रही है। वे दावा करते हैं कि उन्होंने एक रुपए की भी दलाली नहीं ली। उन्हें लगता है कि उनके भतीजों को भी गलत ढंग से फंसाया जा रहा है। सीबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी अनौपचारिक बातचीत में कहते हैं कि जांच का काम खास प्रगति पर है। जल्द ही वे लोग कुछ भारतीयों के लिए ‘लुक आउट’ नोटिस जारी करने की तैयारी कर रहे हैं। ताकि, रक्षा दलाल देश के बाहर न भाग जाएं। जांच एजेंसी रक्षा मंत्रालय के कई वरिष्ठ अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगने जा रही है। कई अधिकारियों के कॉल डिटेल्स भी खंगालने की तैयारी चल रही है। जो लोग शक के दायरे में हैं, उनके बैंक खातों की पड़ताल भी शुरू हो गई है। सूत्रों के अनुसार, एजेंसी को इस बात से खास हैरानी हो रही है कि पूर्व वायुसेना प्रमुख के निजी खातों में कभी भी कोई मोटी रकम नहीं जमा हुई। देश में उनकी ऐसी संपत्तियां भी नहीं है, जिन्हें इस दलाली कांड से जोड़ा जा सके। लेकिन, इनके दो भतीजे पूरी तौर पर   शक के दायरे में हैं। इनमें से एक के घर में तत्कालीन वायुसेना प्रमुख त्यागी ने एक विदेशी दलाल से मुलाकात भी की थी। इसे त्यागी स्वीकार भी कर चुके हैं। बस, इतना ही कह रहे हैं कि उन्हें नहीं मालूम था कि सामने बैठा शख्स कोई रक्षा दलाल है?

एसपी त्यागी यही सफाई दे रहे हैं कि हेलीकॉप्टर खरीद का सौदा 2010 में हुआ। जबकि वे तीन साल पहले ही रिटायर हो गए थे। ऐसे में, सौदे को प्रभावित करने की उनकी हैसियत नहीं थी। जबकि, जांच एजेंसी का मानना है कि वायुसेना प्रमुख के रूप में हेलीकॉप्टर खरीद के लिए त्यागी ने खरीद सौदे की शर्तों में ऐसे बदलाव करा दिए थे, जिनसे कि वेस्टलैंड कंपनी को निर्णायक फायदा हुआ। जबकि, त्यागी सबूत दे रहे हैं कि शर्तों में बदलाव अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौर में तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा के निर्देश पर हुए थे।
    
मंत्रालय के पास इस आशय के प्रमाण भी मौजूद हैं। फिर भी, उन्हें फंसाया जा रहा है। जबकि, सीबीआई को इटली से इस आशय की जानकारी मिली है कि ट्यूनीशिया और मॉरीशस की दो बोगस कंपनियों के जरिए करीब 170 करोड़ रुपए की रकम, त्यागी बंधुओं को ही भेजी गई थी। अब पता यह करना है कि इस रकम का बंटरबांट और कहां-कहां हुआ है? शानदार रक्षा करियर वाले त्यागी पूरी तरह से कटघरे में आते दिखाई पड़ रहे हैं। वे ऐसे दूसरे पूर्व रक्षा प्रमुख हैं, जो रिश्वत कांड के मामले में सीबीआई जांच के दायरे में आ गए हैं। करीब 12 साल पहले नेवी के पूर्व प्रमुख एडमिरल सुशील कुमार, बराक मिसाइल्स खरीद के दलाली सौदे में आरोपित किए गए थे। अब एयरचीफ मार्शल त्यागी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही कि वे बताएं कि पाक साफ हैं, तो आखिर कैसे?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्कvirendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।