सोनभद्र के जिला निर्वाचन अधिकारी की मुख्य निर्वाचन आयुक्त से शिकायत

पेड न्यूज पर अंकुश लगाने की भारतीय प्रेस परिषद और चुनाव आयोग की कोशिश पर सोनभद्र के जिला निर्वाचन अधिकारी पानी फेर रहे हैं। चुनाव आयोग शिकायत का संज्ञान ले चुका है लेकिन जिला निर्वाचन अधिकारी अखबार मालिक को पेड न्यूज मॉनिटरिंग कमिटी के सदस्य पद से हटाने के लिए तैयार नहीं हैं जबकि यह अखबार ना ही सोनभद्र से प्रकाशित होता है और ना ही इसका मालिक और संपादक सोनभद्र जिले का पत्रकार है। सोनभद्र में ‘पेड न्यूज मॉनिटरिंग कमेटी’ के सदस्य के रूप में स्वंतत्र नागरिक/पत्रकार की श्रेणी में योग्य व्यक्ति का चयन नहीं करने की शिकायत पर जिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा उचित कार्रवाई नहीं किए जाने के संबंध में भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को लिखा गया पत्रः

प्रेषक,

शिव दास प्रजापति,                                                                                                                   पत्रकार,
ग्राम-तिनताली, पोस्ट- तेन्दू,
जिला- सोनभद्र, राज्य- उत्तर प्रदेश-231216
मोबाईल- 9198383943/9910410365
ई-मेलः thepublicleader@gmail.com  

सेवा में,
मुख्य निर्वाचन आयुक्त

भारत निर्वाचन आयोग, निर्वाचन सदन,
अशोका रोड, नई दिल्ली-110001

विषयः सोनभद्र में ‘पेड न्यूज मॉनिटरिंग कमेटी’ के सदस्य के रूप में स्वंतत्र नागरिक/पत्रकार की श्रेणी में योग्य व्यक्ति का चयन नहीं करने की शिकायत पर जिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा उचित कार्रवाई नहीं किए जाने के संबंध में।

महोदय,
             अवगत
कराना है कि भारत निर्वाचन आयोग और भारतीय प्रेस परिषद के निर्देशानुसार लोकसभा चुनाव-2014 के दौरान सभी जिलों में ‘मीडिया सर्टिफिकेशन ऐण्ड मॉनिटरिंग कमिटी ऑन सर्टिफिकेशन ऐण्ड पेड न्यूज (एमसीएमसी)’ का गठन किया जाना अनिवार्य है। इसके गठन के संदर्भ में भारत निर्वाचन आयोग ने 26 फरवरी 2014 को पत्रांक संख्या-491/पैड न्यूज/2014 के माध्यम सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को दिशा-निर्देश जारी किया था लेकिन जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र ने अपने यहां इस कमिटी का गठन 17 फरवरी, 2014 को ही कर दिया था। भारत निर्वाचन आयोग के पत्रांक संख्या-491/पैड न्यूज/2014 के मुताबिक पेड न्यूज की जांच के लिए जिला निर्वाचन अधिकारी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय कमिटी (एमसीएमसी) का गठन किया जाएगा जिसमें डीपीआरओ/जिला सूचना अधिकारी/समकक्ष सदस्य सचिव होंगे (संलग्नक-1)। इसके अलावा कमिटी में एआरओ, जो एसडीएम स्तर के नीचे न हों, भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का एक अधिकारी तथा स्वतंत्र नागरिक/पत्रकार बतौर सदस्य शामिल होंगे। अगर भारतीय प्रेस परिषद ने पत्रकार की संस्तुति नहीं की है तो जिला निर्वाचन अधिकारी जिले के किसी पत्रकार अथवा स्वतंत्र नागरिक को बतौर सदस्य नामित कर सकते हैं। जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र ने उक्त आदेश का उल्लंघन करते हुए एमसीएमसी कमिटी का गठन उप जिला निर्वाचन अधिकारी मनी लाल यादव की अध्यक्षता में गठित कर दिया जबकि वह प्रभारी जिला सूचना अधिकारी के रूप में भी कार्यरत हैं। इस वजह से कमिटी में सदस्य सचिव का पद ही नहीं है। इतना ही नहीं जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र ने भारत निर्वाचन आयोग के निर्देशानुसार पांच सदस्यीय कमिटी की जगह छह सदस्यीय कमिटी का गठन कर दिया जिसमें रॉबर्ट्सगंज तहसील के उप-जिलाधिकारी राजेंद्र प्रसाद तिवारी, आकाशवाणी ओबरा के कार्यक्रम अधिकारी/कार्यक्रम प्रमुख, सहायक मनोरंजन कर आयुक्त रामजीत पांडेय, हिन्दी न्यायाधीश, सोनभद्र के संपादक (वास्तव में हिन्दी दैनिक ‘न्यायाधीश’ का प्रकाशन सोनभद्र जिले से नहीं होता है। इस अखबार का प्रकाशन इलाहाबाद से होता है और इसके स्वामी, मुद्रक, प्रकाशक और संपादक रघुवीर चंद जिंदल हैं। वह सोनभद्र में संपादक/जिला प्रतिनिधि/तहसील प्रतिनिधि/मान्यता प्राप्त पत्रकार आदि के तौर पर एक पत्रकार के रूप में भी पंजीकृत नहीं हैं।), पी0ओ0 डूडा, सोनभद्र बी.के. निगम बतौर सदस्य चयनित किए गए हैं (संलग्नक-2)। सबसे गौर करने वाली बात यह है कि जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र ने एमसीएमसी में सदस्य के रूप में चयनित किए जाने वाले स्वतंत्र नागरिक/पत्रकार श्रेणी में भारतीय प्रेस परिषद और भारत निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देशों को नजरअंदाज कर दिया। भारतीय प्रेस परिषद ने 7 मार्च 2014 को जारी अपने प्रेस रिलीज संख्या-पीआर/15/13-14-पीसीआई में पेड न्यूज और संपादकीय नीति को स्पष्ट किया है कि संपादकीय और प्रबंधकीय विभागों में काम करने वाले कर्मचारियों का स्पष्ट विभाजन होना चाहिए। साथ ही संपादक की स्वतंत्रता बनी रहनी चाहिए (संलग्नक-3)। इसके बावजूद जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र ने पत्रकार/स्वतंत्र नागरिक की श्रेणी में इलाहाबाद से प्रकाशित हिन्दी दैनिक ‘न्यायाधीश’ के स्वामी, मुद्रक, प्रकाशक और संपादक रघुवीर चंद जिंदल को सदस्य के रूप में चयनित किया। संपादकीय सामग्रियों और अखबार के प्रतियों के प्रसार को लेकर रघुवीर चंद जिंदल हमेशा सवालों के घेरे में रहे हैं। इसके लिए एक महीने में प्रकाशित उनके अखबार की प्रतियों का अवलोकन भी किया जा सकता है। इसके अलावा रघुवीर चंद जिंदल सोनभद्र में बतौर पत्रकार कार्य भी नहीं करते हैं। इन हालातों में उनका चयन भारतीय प्रेस परिषद के दिशानिर्देशों का खुलेआम उल्लंघन है। इस संबंध में मैंने 22 मार्च 2014 को ई-मेल के माध्यम से जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, उत्तर प्रदेश, मुख्य चुनाव आयुक्त, नई दिल्ली आदि को अवगत कराया था (संलग्नक-4)। इसका संज्ञान लेते हुए मुख्य निर्वाचन अधिकारी, उत्तर प्रदेश ने जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र को मामले की जांच करने और सही व्यक्ति का चयन करने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे लेकिन अभी तक जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र ने रघुवीर चंद जिंदल को एमसीएमसी से नहीं हटाया है। इसके लिए वह विधानसभा चुनाव-2012 में एमसीएमसी के गठन को आधार बना रहे हैं जबकि प्रार्थी ने 10 फरवरी, 2012 को भी रघुवीर चंद जिंदल के गैर-वैधानिक चयन की शिकायत आयोग से की थी लेकिन उस समय उसपर कोई कार्रवाई नहीं की गई (संलग्नक-5)। इसका नतीजा यह रहा कि विधानसभा चुनाव-2012 के दौरान जिले में पेड न्यूज का एक भी मामला सामने नहीं आया। वास्तव में पत्रकार/स्वतंत्र नागरिक के रूप में जिस व्यक्ति का चयन पेड न्यूज की निगरानी के लिए किया जा रहा है, उसे पेड न्यूज के मामले से कोई लेना देना नहीं है। इससे यह प्रतीत होता है कि जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र जानबूझकर पूर्व में की गई गलती को दोहरा रहे हैं। साथ ही वह भारत निर्वाचन आयोग तथा भारतीय प्रेस परिषद के दिशा-निर्देशों की अवहेलना कर रहे हैं। असल में यह सब जिले में जिला सूचना अधिकारी की नियुक्ति पिछले करीब 10 सालों से नहीं होने की वजह से हो रहा है। इस विभाग में पूर्ण रूप से लिपिक की तैनाती भी नहीं है। विभाग के सभी कार्यों की देखरेख उर्दू अनुवादक सह लिपिक नेसार अहमद करते हैं जिसकी वजह से पत्रकारों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वह प्रशासन की नीतियों के प्रचार-प्रसार में रुचि लेने की जगह लाइजनिंग में ज्यादा समय जाया करते हैं (संलग्नक-6 का अवलोकन करें जिसमें दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर में विभाग के एक कर्मचारी द्वारा लाइजनिंग किए जाने का आरोप है)। इससे पत्रकारों को चुनाव प्रक्रिया की समुचित जानकारी नहीं हो पाती है। इसे लेकर पत्रकार संगठन जिला सूचना अधिकारी की नियुक्ति किए जाने की मांग भी कई बार कर चुके हैं। इसके बावजूद जिला प्रशासन पूर्व की गलतियों को सुधारने के लिए तैयार नहीं है। अगर जिला निर्वाचन अधिकारियों और चुनाव आयोग द्वारा इसी प्रकार से स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने का वादा किया जाता है तो फिर जनता के लाखों रुपये पेड न्यूज मॉनिटरिंग के नाम पर क्यों खर्च किए जा रहे हैं? क्या चुनाव आयोग और उसके प्रतिनिधि के रूप में काम करने वाले जिला निर्वाचन अधिकारी भारतीय संविधान और उसके तहत निर्मित विधियों के ऊपर हैं? अगर ऐसा ही है तो फिर वे जनता के बेशकीमती समय और धन को क्यों बर्बाद किया जा रहा है?

अतः श्रीमान् जी से निवेदन है कि जनहित में उक्त प्रकरण की जांच भारतीय प्रेस परिषद और चुनाव आयोग के प्रतिनिधि खुद करें और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी अथवा कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई कर उपयुक्त व्यक्ति का चयन एमसीएमसी में करने की कृपा करें जिससे स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा साकार हो सके।

दिनांकः   26-04-2014                                                                                                                                                                           
शिव दास प्रजापति

प्रतिलिपिः

(1) अध्यक्ष, भारतीय प्रेस परिषद, नई दिल्ली।
(2) मुख्य निर्वाचन अधिकारी, उत्तर प्रदेश।
(3) जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र।
(4) प्रेक्षक, रॉबर्ट्सगंज लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र।
(5) श्री अनिल चमड़िया, प्रमुख, मीडिया स्टडीज ग्रुप, नई दिल्ली।
(6) निदेशक, इलेक्शन वॉच, नई दिल्ली।
(7) संपादक, भड़ास4मीडिया.कॉम।
(8)
संपादक, द हूट.कॉम।
(9) संपादक, जनसत्ताएक्सप्रेस.नेट।
(10) संपादक, हस्तक्षेप.कॉम।
(11) अध्यक्ष, प्रेस क्लब, नई दिल्ली।
(12) ओमर राशिद, संवाददाता, द हिन्दू।
(13) सभी राजनीतिक पार्टियों के प्रमुख।
(14) अन्य

आजमगढ़ः संप्रदायिकता नहीं, जातीय वर्चस्व की जंग में मुलायम

मुलायम सिंह यादव आजमगढ़ से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी हो सकते हैं, समाचार माध्यमों में इस इस तरह की अटकलें पहले से ही थीं परन्तु हर बार पार्टी की ओर से इसका खण्डन किया जाता रहा। मंथन इस बात पर चल रहा था कि सपा के इस क्षेत्र में खिसकते जातीय आधार पर कैसे काबू पाया जाए? ऐसे में सपा द्वारा यह कहना कि सांप्रदायिकता के खिलाफ आजमगढ़ में मुलायम सिंह चुनाव मैदान में हैं, यह महज एक शिगूफा है, जिसे क्षेत्र का मुसलमान समझ रहा है।

 
गौरतलब है कि आजमगढ़ में कभी मुलायम के सिपहसालार रहे रमाकांत यादव पिछली लोकसभा में भाजपा के टिकट पर निर्वाचित हुए थे और यह साबित कर दिया था कि स्थानीय यादव मतदाताओं का बड़ा वर्ग उनके साथ है। इससे पहले भी दो बार सपा के कद्दावर यादव नतोओं को इस मामले में उनके सामने मुंह की खानी पड़ी थी। अपने इस जातीय आधार को पार्टी में वापस लाने का सपा नेताओं का हर प्रयास विफल साबित हो रहा था। अब यह समस्या मात्र आजमगढ़ तक सीमित नहीं रह गई थी। इसी राह पर चलते हुए एक तरफ गाजीपूर में एकता मंच गठबंधन की तरफ से प्रत्याशी बन कर आए डीपी यादव और दूसरी तरफ जौनपूर में पार्टी से बगावत करके चुनावी रण में कूद पड़ने वाले केपी यादव ने भी सपा की मुश्किलें बढ़ा दी थीं। कुल मिला कर सपा के लिए यह पूरा इलाका ’चिन्ता क्षेत्र’ में तबदील होने लगा था।

जातिवाद की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी को उसके उसी हथियार से सपा के इन पूर्व यादव क्षत्रपों ने इस चुनाव में पार्टी के घोषित और अघोषित भावी प्रत्याशियों को हाशिए पहुंचा दिया था। इन परिस्थितियों में अवश्यकता थी इस क्षेत्र में किसी ऐसे बड़े नेता की, जो इन चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो और आसपास के क्षेत्रों को भी प्रभावित कर सके। जाहिर सी बात है इसके लिए सपा प्रमुख से ज्यादा उपयुक्त और कौन हो सकता था।

दूसरी तरफ सपा शासन में होने वाले दंगों और अखिलेश सरकार द्वारा उससे निपटने के संदिग्ध तौर तरीकों से मुसलमान वोटर भी नाराज है। इस स्थिति में मुसलमानों को साथ लाने का एक ही मंत्र बचा था और वह था-अपने आपको भाजपा का विकल्प बना कर पेश करना, जिसका इस पूरे क्षेत्र में सपा दूर से भी कोई संकेत नहीं दे पा रही थी। मोदी के वाराणसी से प्रत्याशी बनते ही सपा के रणतीतिकारों को लगा कि उनकी यह समस्या भी हल हो गई। मुलायम सिंह के आजमगढ़ से चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ यह प्रचारित किया जाने लगा कि पूर्वांचल में मोदी के प्रभाव को खत्म करने के लिए यह कदम उठाया गया है, लेकिन शायद समाजवादी पार्टी और उसके मुखिया के लिए यह राह उतनी आसान साबित न हो।

आजमगढ़ में बसपा बनाम भाजपा की जंग अब मुलायम सिंह के प्रत्याशी बनने के बाद बसपा बनाम सपा तो होती दिखाई दे रही है, लेकिन ’मुसलमान सपा के साथ नहीं आया तो भाजपा जीत सकती है’ वाली सपा की पसंदीदा स्थिति यहां अभी नहीं है और उसके उत्पन्न होने की कोई संभावना भी कम है। वैसे तो पूरे प्रदेश में जातियों के राजनीतीकरण पर आधारित राजनीति स्थापित हो चुकी है, लेकिन पूर्वांचल की जलवायु इसके लिए अधिक अनुकूल साबित हुई है। इस क्षेत्र में पिछड़ी तथा अनुसूचित जातियों के राजनीतिकरण ने छोटे-छोटे राजनीतिक दलों की संख्या हर चुनाव में बढ़ाई है। आजमगढ़ लोकसभा में यादव मतदाता का अनुपात सबसे अधिक लगभग 21 प्रतिशत है जबकि मुसलमान 19 प्रतिशत, हरिजन लगभग 16 प्रतिशत और क्षत्रिय वोटों की संख्या 8 प्रतिशत है। बाकी मतदाताओं में बड़ी संख्या अति पिछड़ा वर्ग और अन्य दलितों की है, जिनकी पहचान किसी एक दल के वोटर के रूप में नहीं है। ऐसे में इस चुनाव में मुसलमान मतदाताओं की भूमिका निर्णायक हो सकती है। लेकिन यह स्थिति भी किसी भी तरह समाजवादी पार्टी सुप्रीमों के पक्ष में जाती नजर नहीं आती।
 
यदि यह मान लिया जाए कि भाजपा हार जीत की लड़ाई से बाहर हो गई है तो मुसलमानों को कई टुकड़ों में बंटने से रोक पाना मुश्किल हो जाएगा। अगर भाजपा की जीत की दावेदारी बरकरार रहती है तो यह उसी हालत में सम्भव होगी जब यादव मतदाताओं का एक वर्ग अपने क्षेत्रीय क्षत्रप के साथ खड़ा हो। इसका दूसरा अर्थ होगा मुलायम सिंह की दावेदारी का कमजोर होना। ऐसी हालत में मुसलमान इस आशंका के बावजूद कि चुनाव पश्चात सपा के मुकाबले में बसपा की राजग के साथ चले जाने की सम्भावना अधिक है, लामबंद होकर बसपा के साथ जा सकता है। कुल मिला कर जहां तक मुस्लिम मतदाताओं का सवाल है, यह दोनों ही परिस्थितियां मुलायम के खिलाफ जाती नजर आती हैं। इस प्रकार की किसी प्रतिकूल स्थिति से बाहर निकलने के लिए अति पिछड़ों और गैर हरिजन दलितों का एक बड़ा भाग शेष रह जाता है, जिस पर सभी पार्टियों साथ साथ प्रदेश के सत्ताधारी दल की निगाह भी अवश्य होगी। चनावी दंगल के अंतिम चरण में आजमगढ़ एक बड़ा अखाड़ा बनने वाला है यह तो निश्चित है, लेकिन सपा रणनीतिकारों की योजना कितनी सफल होती है इसमें राजनीतिक विश्लेषकों दिलचस्पी जरूर रहेगी।

मसीहुद्दीन संजरी
ग्राम व पोस्ट-संजरपुर
जिला आजमगढ़
उत्तर प्रदेश
मोबाइल नम्बर-8090696449

 

लाख रुपए दीजिए, न्यूज़ चैनल आईडी और जिले की कमान लीजिए

देहरादून में मीडिया की अड्डेबाज़ी अब भू माफियाओं ने सम्हाल ली है। कलम को गिरवी रखने का खेल तो काफी समय से चल रहा था लेकिन अब न्यूज़ चैनल की आईडी बेच कर लाखों में पत्रकार बनाने का खेल भी शुरु हो गया है। इसके चलते ईमानदारी से पत्रकारिता करने वाले खुद को अपमानित महसूस कर रहे हैं। ख़बर है कि देहरादून में कुछ दिनों पूर्व शुरू हुए न्यूज़ चैनल राष्ट्र ख़बर ने जिस तेज़ी से ग्राउंड बनाना शुरु किया था उसी तेज़ी से चैनल ने कमाई करने की छूट भी अपने यहां के पत्रकारों को देनी शुरु कर दी। लोकसभा चुनाव का मौसम था तो लगे हाथ कुछ लोगो ने मीडिया का चोला पहन कर धन उगाही का सपना देख लिया था। लेकिन सपना पूरा होने से पहले ही इस न्यूज़ चैनल की हकीकत लोगों के सामने आ गयी।

रुद्रपुर निवासी अर्पित राज कक्कड़ ने देहरादून पुलिस को दी गयी अपनी शिकायत में कहा है की रुद्रपुर में राष्ट्र खबर न्यूज़ चैनल का ब्यूरो चीफ बनाने के लिए, खुद को चैनल का मालिक बताने वाले जयपाल चौधरी, गौरव शर्मा, मुकेश शर्मा ने उससे एक लाख रूपए की मांग की थी जिसको उसने पूरा भी किया। फिर देहरादून में उसे बताया गया कि अब राष्ट्र ख़बर ने देहरादून के न्यूज़ चैनल वॉइस ऑफ़ नेशन को खरीद लिया है। इसलिए अब उसे नई शर्तों को अनुसार कार्य करना होगा जो अर्पित को स्वीकार नहीं था। अर्पित राज का कहना है की न्यूज़ चैनल हर महा एक लाख रूपया मांग रहा था और देहरादून में कई जगह पर अवैध कारोबार को अंजाम दे रहा है। अर्पित ने उक्त तीनों लोगों पर ऑफिस बुला कर उससे मारपीट करने, सादे कागज़ पर दस्तख़त लेने, लैपटॉप और सोने की चैन छीनने का आरोप भी लगाया है।

वहीं वॉयस ऑफ नेशन के मनीष वर्मा का कहना है की उनके न्यूज़ चैनल का किसी भी अन्य चैनल से कोई समझौता नहीं हुआ है। कुछ लोग न्यूज़ चैनल को खरीद लेने की बात कह रहे है जो पूरी तरह गलत है। जयपाल चौधरी से फ़ोन पर बात की गयी तो उन्होंने कहा की उनके द्वारा न्यूज़ चैनल वॉयस ऑफ नेशन की नयी ज़िमेदारी संभाली गयी है और उनका राष्ट्र खबर से कोई लेना देना नहीं है। उनके द्वारा अर्पित राज के खिलाफ पुलिस में शिकयत की गयी है।

कुल मिलाकर देहरादून में न्यूज़ चैनल की आड़ में जिलों में रिपोर्टर बनने का खेल लगातार जारी है। जिन लोगों को न्यूज़ चैनल का रिपोर्टर बनाया जा रहा है उनको मीडिया की कोई जानकारी नहीं है। इस कारण मीडिया बदनाम हो रहा है और इस तरह के मामले पुलिस के लिए भी सिरदर्द बने हुए है।

 

देहरादून से नारायण परगईं की रिपोर्ट

पलवल में पत्रकार और उसके परिजनों को हत्या के प्रयास में फंसाने की साज़िश का पर्दाफाश

पलवल में व्यापारी पर हुए जानलेवा हमले के मामले का खुलासा जिला पुलिस कप्तान राकेश कुमार आर्य ने पत्रकार वार्ता के दौरान किया। घटना की साजिश रचने और अंजाम देने वालों को भी पत्रकारों के समक्ष पेश किया गया। पुलिस ने इस मामले में व्यापारी के तीन साथियों को भी गिरफ्तार किया है, जबकि व्यापारी को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। एसपी ने कहा की व्यापारी ने योजना के तहत दूसरे लोगों को फंसाने के लिए चाक़ू मारने की साजिश रचि थी। इसमें और भी लोगों का हाथ होने की सम्भावना बतायी गई है। मामले में आरोपी बने वैश्य समाज के प्रधान और पत्रकार ओमप्रकाश गुप्ता, उनके बेटे और भाई को निर्दोष बताया गया है। इस तरह का झूठा मामला पलवल में पहली बार उजागर हुआ है। यह मामला हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा और युपीए अध्यक्षा श्रीमति सोनिया गांधी और राहुल गांधी की चौखट तक पहुंच भी पहुँच गया था।

पलवल में गत 17 अप्रैल को थाना पुलिस कैम्प में मोहित बजाज के बयान पर संजय गुप्ता के खिलाफ मारपीट का मामला दर्ज किया गया था। इस मामले में संजय गुप्ता को पुलिस ने अदालत में पेश किया गया था। एसपी राकेश आर्य ने बताया की अदालत ने उन्हें जमानत दे दी लेकिन यह जमानत मोहित बजाज को हजम नहीं हुई और इसने अपने साथियों के साथ मिलकर वैश्य समाज के प्रधान ओमप्रकाश, उनके बेटे संजय गुप्ता और उनके भाई चंदीराम गुप्ता को फंसाने की साजिस रची और 18 अप्रैल को शाम 7 से 8 बजे के बीच दोबारा मोहित को चाकू मारने का मामला बनाया गया। इन्होंने हंगामा करना शुरु कर दिया और इसका विरोध करके बाजार को बंद करा दिया गया। एसपी राकेश आर्य ने खुलासा करते हुए कहा की इस विरोध से पुलिस पर दबाब बनाया गया और पुलिस को बदनाम करने की कोशिश की गई। मोहित बजाज को षडयंत्र के तहत एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया जिसको डाक्टरों ने जायदा सीरियस कहते हुए आईसीयु में वार्ड में रखा गया और किसी भी पुलिस अधिकारी और इससे नहीं मिलने दिया गया। पुलिस ने इन लोगों द्वारा की गई शिकायत पर इस मामले में संजय गुप्ता, ओमप्रकाश गुप्ता व चन्दीराम गुप्ता सहित 5 लोगों के खिलाफ 19 अप्रैल को सुशील उर्फ रिंकू पुत्र रामलाल बजाज के बयान पर एफआईआर नंबर 176 को आईपीसी की धारा 148-149-323-324-307-506-195ए-120बी के तहत हत्या करने के प्रयास के साथ मारपीट का मामला दर्ज किया गया। इस मामले में पुलिस ने संजय गुप्ता को गत 22 अप्रैल को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया। अदालत ने उन्हें नीमका जेल भेज दिया। और पुलिस ने मामले की गहनता से जाँच में जुट गई।

जिला पुलिस कप्तान राकेश कुमार आर्य ने पत्रकार वार्ता के दौरान बताया कि गत 18 अप्रैल को सरकारी अस्पताल में कुछ युवक मोबाइल पर फोन पर बात कर लोगों को एकत्र कर रहे थे। वे बात करते समय जिस तरह की भाषा का प्रयोग रहे थे उसे लेकर पुलिस उनके पीछे लगी हुई थी। कुछ युवकों की कॉल डिटेल और जवाहर नगर मार्किट के दुकानदारों द्वारा दी गई जानकारी पर पुलिस ने कुछ युवकों को हिरासत में लिया। हिरासत में की गई पूछताछ के दौरान पुलिस ठोस नतीजे पर पहुंची। एसपी राकेश कुमार आर्य ने बताया कि गत 17 अप्रैल को हई वारदात में संजय गुप्ता को जमानत मिल गई। जमानत मिलने के बाद मोहित बजाज आशीष गौतम महेन्द्र सिंह व विकास ग्रोवर ने साजिश रची।

साजिश के तहत मैडिकल स्टोर संचालक विकास ग्रोवर ने सर्जीकल ब्लेड दिया। महेन्द्र ने मोहित बजाज को पकड़ा और आशीष गौतम ने ब्लेड से कट मार दिया। कट मारने के बाद अफवाह फैला दी की मोहित बजाज को संजय गुप्ता आदि ने चाकू घोंप दिया है। और मोहित को पलवल के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन अस्पताल के डॉक्टर पर राजनेताओं ने दबाब बनाकर मेडिको-लीगल-रिपोर्ट को बदलवाया गया। बजाज की कॉल डिटेल के आधार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। षडयंत्र रचने वाले मोहित बजाज से और भी खुलासे होने की सम्भावना है। एसपी राकेश आर्य ने कहा की इस साजिश को रचने में कुछ पुलिसकर्मियों औऱ पत्रकारों का भी हाथ होने की सम्भावना है। उन्होनें कहा कि साजिश में शामिल किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। पलवल में इस तरह के सैकड़ों झूठे मामलों में पहली बार इस तरह का मामला उजागर हुआ है।

 

पलवल से पत्रकार ऋषि भारद्वाज (इण्डिया न्यूज चैनल) की रिपोर्ट।

दलित बहन-बेटियों पर की गई टिप्पणी से उजागर हुआ रामदेव का कुलषित चरित्र

रामदेव नाम का ढोंगी बाबा असल में घिनौने चरित्र का और रुग्ण मानसिकता का शिकार है जो दूसरों का उपचार करने की बात करता है लेकिन उसका स्वयं का मस्तिष्क विकृत हो चुका है। जिसे दलित समाज की बहन-बेटियों की इज्जत को तार-तार करने में शर्म नहीं आती, उसे इंसान कहना ही इंसान को गाली देना है। जो पुरुष एक औरत की इज्जत लूटता है तो उसको फांसी की सजा की मांग की जाती है। रामदेव ने तो देश की करोड़ों दलित बहन-बेटियों की इज्जत को तार-तार कर दिया है, अब रामदेव को कितनी बार फांसी पर लटकाया जाना चाहिये, इस बारे में भी देश के लोगों को सोचना होगा। अन्यथा ये भी साफ कर देना चाहिये कि इस देश में दलित स्त्रियों की इज्जत का कोई मूल्य नहीं है!

बाबा के नाम से अपने आप को सबसे बड़ा देशभक्त, ईमानदार और संत घोषित करने वाले स्वयंभू योग गुरू रामदेव का कालाधन, भ्रष्टाचार और हिन्दुत्व के बारे में असली चेहरा सारे संसार के सामने प्रकट हो गया है। राजस्थान के अलवर लोकसभा प्रत्याशी महन्त चॉंदनाथ को कालाधन के बारे में मंच पर बात करने से रोकने का बयान सारा संसार देख चुका है। जिससे उनकी काले धन की मुहिम के नाटक का पर्दाफाश हो चुका है। यदि रामदेव में जरा भी शर्म होती तो इस घटना के बाद वे जनता के सामने मुंह भी नहीं दिखाते, लेकिन जिन लोगों का काम देश के भोले-भाले लोगों को मूर्ख बनाना हो, उनको शर्म कहां आने वाली है? जो व्यक्ति शुरू से ही योग और प्राणायाम के नाम पर जनता के धन को लूटकर अपने नाम से ट्रस्ट बनाकर उद्योगपति बनने का लक्ष्य लेकर घर से बाहर निकला हो उससे इससे अधिक आशा भी क्या की जा सकती?

काले धन को विदेशों से देश में लाने की बढ़ चढ़कर बात करने वाला स्वयं काले धन के बारे में छुप-छुपकर बात करने की सलाह देता हो और फिर भी खुद को बाबा और देशभक्त कहलवाना चाहता हो, इससे अधिक निन्दनीय और शर्मनाक कुछ भी नहीं हो सकता।

काले धन के साथ रामदेवा का काला चेहरा सामने आये कुछ ही दिन बीते हैं कि रामदेव का कलुषित चारित्रिक भी देश ने देख लिया है। अब तो सारी हदें पार करते हुए रामदेव ने सम्पूर्ण दलित समाज की बहन-बेटियों की इज्जत को तार तार कर दिया है। रामदेव का कहना है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी दलित बस्तियों में हनीमून मनाने जाते हैं। इससे पता चलता है कि रामदेव नाम का ढोंगी बाबा असल में कितने घिनौने चरित्र का और कितनी घटिया रुग्ण मानसिकता का शिकार है। जो दूसरों का उपचार करने की बात करता है, उसका स्वयं का मस्तिष्क कितना विकृत हो चुका है। जिसे दलित समाज की बहन-बेटियों की इज्जत को तार-तार करने में शर्म नहीं आती, उसे इंसान कहना ही इंसान को गाली देना है।

जो पुरुष एक औरत की इज्जत लूटता है तो उसको फांसी की सजा की मांग की जाती है। रामदेव ने तो देश की करोड़ों दलित बहन-बेटियों की इज्जत को तार-तार कर दिया है, अब रामदेव को कितनी बार फांसी पर लटकाया जाना चाहिये, इस बारे में भी देश के लोगों को सोचना होगा। अन्यथा ये भी साफ कर देना चाहिये कि इस देश में दलित स्त्रियों की इज्जत का कोई मूल्य नहीं है!

रामदेव कितना बड़ा जालसाज है, इस बात का केवल एक ही बात से परीक्षण हो चुका है कि पांच वर्ष पहले तक रामदेव हर बीमारी का इलाज योग के जरिये करने की बात करता था और आज वही रामदेव हर बीमारी का इलाज करने हेतु खुद ही दवा बनाकर बेच रहा है। लेकिन यह इस देश का दुर्भाग्य है कि इस देश के भोले-भाले लोग ऐसे चालाक ढोंगी बाबाओं के चंगुल से आसानी से खुद को मुक्त नहीं कर पा रहे हैं।

आसाराम का सच बहुत पहले ही देश और दुनिया के सामने आ चुका है। अब रामदेव का कलुषित चेहरा भी सबके सामने आ ही चुका है। दलितों की बहन-बेटियों की इज्जत को तार-तार करने वाला रामदेव आज भी सार्वजनिक रूप से बाबा बनकर घूम रहा है तो ये दलितों की सदाशयता है। अन्यथा तो ऐसे व्यक्ति का अंजाम तो कुछ और ही होना चाहिये था। दलितों की बहन-बेटियों और औरतों को रामदेव ने क्या वैश्या समझ रखा है कि कोई भी उनके साथ कभी भी आकर हनीमून मनाने को आजाद हो? रामदेव को ऐसी घटिया गाली देने से पहले हजार बार सोचना चाहिये था, लेकिन सोचते वहीं हैं, जिनकी कोई सदाशयी सोच हो। जिस रामदेव का एकमात्र लक्ष्य लोगों को मूर्ख बनाना हो उसे सोचने और शर्म करने की कहां जरूरत है?

इतनी घटिया टिप्पणी के बाद भी दलित समाज आश्‍चर्यजनक रूप से चुप है, ये भी दलितों के लिये अपने आप में शर्म की बात है। अन्यथा ऐसे घटिया व्यक्तव्य के बाद तो रामदेव नाम के ढोंगी का ढोंग सदैव को नेस्तनाबूद हो जाना चाहिये था। अभी तक तो रामदेव को जेल में होना चाहिये। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि देश के स्वघोषित भावी प्रधानमंत्री से गलबहियां लड़ाने वाले रामदेव को कोई भी छूने की कोशिश कैसे कर सकता है, आखिर सारे मनुवादियों का साथ जो उनके पीछे है। अन्यथा रामदेव की खुद की औकात ही क्या है? रामदेव का मनुवादी, कलुषित और कुरूप चेहरा देश और दुनिया के सामने है। अब इस देश से सहिष्णु, निष्पक्ष और सामाजिक न्याय की व्यवस्था में विश्‍वास रखने वाले देश के बुद्धिजीवियों, स्त्री हकों के लिये सड़कों पर आन्दोलन करने वालों, दलित नेताओं, स्त्रियों के हकों के लिये बढ़चढ़कर लड़ने वाले और लड़ने वालियों सहित, देश के कथित स्वतन्त्र एवं समभावी मीडिया के लिये भी यह परीक्षा की सबसे बड़ी घड़ी है कि वे रामदेव को जेल की काल कोठरी तक पहुंचाने में अपनी-अपनी भूमिकाएं किस प्रकार से अदा करते हैं! अब देखना यह भी होगा कि इस देश में दलित अस्मिता की खुलेआम धज्जियां उड़ाने वाले अपराधी रामदेव का अन्तिम हश्र क्या होता है?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
#09875066111

बनारस, धर्म निरपेक्षता और वामपंथ

बनारस से भाजपा प्रत्याशी के रूप में नरेन्द्र मोदी के चुनाव लड़ने की बात के सामने आते ही धर्म निरपेक्ष बौद्धिकों के द्वारा प्रतिरोध का उठना स्वाभाविक था। नरेन्द्र मोदी का बनारस से चुनाव लड़ने के पीछे भाजपा का मकसद अयोध्या के बाद बनारस को आधार बनाकर उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिकीकरण की प्रक्रिया को तेज करना, हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण तथा देश में सांप्रदायिकता की राजनीति को आगे बढ़ाना था। उसी वक्त से ही धर्म निरपेक्ष व प्रगतिशील समाज के बीच इस विचार का जोर पकड़ना शुरू हो गया कि मोदी को शिकस्त देने के लिए उनके खिलाफ धर्म निरपेक्ष दलों को एकजुट होकर लड़ना चाहिए।

 
इस दौरान आप के नेता अरविन्द केजरीवाल ने यह घोषित किया कि यदि नरेन्द्र मोदी बनारस से चुनाव लड़ते हैं तो वे स्वयं बनारस से उनके विरुद्ध लड़ना पसन्द करेंगे और गुजरात के कॉरपोरेटपरस्त ‘मोदी मॉडल’ की असलियत से लोगों को परिचित करायेंगे। अपनी इसी योजना के तहत केजरीवाल 25 मार्च को बनारस आये। मीडिया की उपेक्षा के बावजूद बेनियाबाग की उनकी सभा को सफल कहा जाएगा क्योंकि अरसे बाद उस मैदान में इतनी भीड़ जुटी थी। दूसरी बात केजरीवाल का बनारस में मोदी समर्थकों द्वारा जिस अलोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया गया, स्याही व अण्डे फेके गये, उससे साफ था कि भाजपा ने केजरीवाल को अपने लिए चुनौती माना था। इसी सभा में केजरीवाल ने बनारस से चुनाव लड़ने की घोषणा की।
 
धर्म निरपेक्ष बौद्धिकों तथा प्रगतिशील लेखकों व संस्कृतिकर्मियों की ओर से अरविन्द केजरीवाल की इस घोषणा का आमतौर पर समर्थन किया गया और फेसबुक तथा अन्य माध्यमों से जो विचार सामने आये उसका निचोड़ यही था कि अपने को धर्म निरपेक्ष कहने वाले दल यदि बनारस में मोदी को हराना चाहते हैं तथा फासीवादी खतरे के प्रति उनकी चिन्ता वाजिब है तो उन्हें अपनी दलीय महत्वकांक्षाओं से ऊपर उठकर केजरीवाल का समर्थन करना चाहिए या सेकुलर दलों की ओर से संयुक्त प्रत्याशी उतारा जाना चाहिए ताकि बनारस फासीवाद का नहीं सेकुलरवाद की जीत का गवाह बने। इस संबंध में हिन्दी लेखकों व संस्कृतिकर्मियों के संगठनों-प्रलेस, जलेस, जसम व इप्टा की पहल की चर्चा करना प्रासंगिक होगा जिन्होंने इसी मकसद से अप्रैल के आरंभ में बनारस में बैठक की तथा इस संबंध का प्रस्ताव पारित किया। साहित्यकारों के संगठनों की सांप्रदायिक फासीवाद के विरुद्ध यह सांस्कृतिक पहल वाम व लोकतांत्रिक दलों को मशाल दिखाने वाली थी।
 
लेकिन बनारस में ऐसा संभव नहीं हो पाया और कथित धर्म निरपेक्ष दलों के ‘भाजपा विरोध’ और ‘सेकुलरवाद’ की पोल खुल गई। देखते ही देखते दलों ने अपने प्रत्याशी घोषित करने शुरू कर दिये। ज्ञात हो कि सीपीएम ने कांग्रेस व भाजपा के खिलाफ ग्यारह दलों के जिस तीसरे मोर्चे की रचना की थी, उसकी ओर से भी बनारस में सेकुलर प्रत्याशी को लेकर कोई गंभीर कोशिश नहीं दिखाई दी। तीसरा मोर्चा भी अपना संयुक्त प्रत्याशी उतारने में असफल रहा। सीपीएम भी उसी राह पर बढ़ चली और उसने भी अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ता हीरालाल यादव बनारस से पार्टी के उम्मीदवार बनाये गये। इस तरह बनारस में मोदी के खिलाफ धर्म निरपेक्ष व वाम दलों द्वारा गैरकांग्रेसी संयुक्त प्रत्याशी उतरे, इस जन भावना को गहरा धक्का लगा और मोदी को इस तरह की संयुक्त चुनौती नहीं दी जा सकी। इसने यह भी प्रमाणित कर दिया कि फासीवाद के विरुद्ध धर्म निरपेक्ष व वाम दलों की एकता की बुनियाद कितनी कमजोर तथा संकीर्ण हितों पर आधारित है।
 
कभी बनारस में वामपंथी दलों का मजदूरों, किसानों, गरीब-गुरबा वर्गों के बीच अच्छा काम काज व इन पर खासा प्रभाव था। 1967 के चौथे राष्ट्रीय आम चुनाव में बनारस लोकसभा सीट से सीपीएम प्रत्याशी सत्यनारायण सिंह ने जीत हासिल की थीं। उदल सीपीआई के लोकप्रिय नेता थे। उन्होंने कोलअसला विधानसभा सीट से अपनी जीत का कीर्तिमान स्थापित किया था। लेकिन यह सब गुजरे जमाने की बात है। तब से गंगा में बहुत पानी बह चुका है। आज वामपंथ का वह जन आधार खिसक चुका है। 60 व 70 के दशक में बनारस में वामपंथ की जो प्रतिष्ठा थी, वह बरकरार नहीं रही।
 
ऐसे में सीपीएम द्वारा कामरेड हीरालाल यादव मोदी को कितनी चुनौती दे पायेंगे, यह प्रश्न बना रह जाता है। यहां कामरेड यादव की क्षमता, कर्मठता और जन समर्पण की भावना पर किसी किस्म के संदेह की जरूरत नहीं है। मूल बात सेकुलर मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की है क्योंकि बनारस में कामरेड यादव की अधिकतम निर्भरता अपनी पार्टी के कैडर वोट पर है। इस वोट से मोदी को कोई चुनौती नहीं दी जा सकती। इसीलिए सीपीएम द्वारा प्रत्याशी चयन को भी प्रश्नांकित किया जा रहा है। इस संदर्भ में आलोचक वीरेन्द्र यादव का यह विचार उचित जान पड़ता है कि बनारस से सीपीएम को अपने प्रत्याशी बदलने के बारे में विचार करना चाहिए और उसे ऐसा प्रत्याशी देना चाहिए जिसकी राष्टीय छवि हो। उनके विचार से यहां से सीताराम येचुरी या वृंदा करात या सुभाषिनी सहगल को पार्टी द्वारा प्रत्याशी बनाया जाता जो सेकुलर मतदाताओं के धु्रवीकरण में ज्यादा सफल होते।
 
अब सीपीएम द्वारा बनारस में अपने इस कदम को फासीवाद के विरुद्ध वाम एकता का प्रतीक तथा वामपंथ की स्वतंत्र राजनीतिक पहल व दावेदारी कहा जा रहा है। उनकी अपेक्षा है कि सारे वामपंथी संगठन, धर्म निरपेक्ष समाज व प्रगतिशील बुंद्धिजीवी उनका समर्थन करे। सुनने में यह अच्छा लग रहा है। उनकी अपेक्षा भी उचित प्रतीत होती है। लेकिन कई सवाल भी उठ रहे हैं। वे जिस वाम एकता व वामपथ की स्वतंत्र दावेदारी की बात कर रहे हैं, वह अवसरवाद और परिणामवाद से संपूर्ण संबंध विच्छेद की मांग करती है। देखने में यही आ रहा है कि स्वतंत्र दावेदारी की बात करने वाले वामपंथी अवसरवाद से वैचारिक संघर्ष के लिए तैयार नही है। बनारस में भी वे अपने अवसरवाद को ही विस्तार दे रहे हैं। यह उनका अवसरवाद ही है कि भले उत्तर प्रदेश में वामपंथियों के बीच एकता न हो लेकिन बनारस में यह एकता जरूर बन जाए।
 
जहां तक मेरी जानकारी है भाकपा, माकपा, माले व अन्य वामपंथियों के बीच उत्तर प्रदेश में एकता के लिए कोई गंभीर कोशिश नहीं हुई। उत्तर प्रदेश में सारी ताकत मुलायम सिंह के साथ मोर्चा बनाने, उनसे तालमेल में गया। सारा पसीना  धर्म निरपेक्ष मोर्चे के लिए बहाया और हासिल के नाम पर शून्य। वे तो ऐसे तीसरे मोर्चे के रचनाकार रहे है जिसकी ड्राइविंग सीट पर वे मुलायम या जयललिता या नीतीश को बिठाते रहे और स्वयं महज पीछे से गाड़ी ढकेलने वाले बने रहना चाहते हैं। जैसे पिछले चुनाव में मायावती को बिठाया था। आखिरकार क्या हुआ उनके तीसरे मार्चे का? चुनाव आते आते उनके इस मोर्चे की हवा ही निकल गई। सारा कुछ बिखर गया।
 
यह सही है कि सरकार की नव उदारवादी नीतियों और सांप्रदायिकता के खिलाफ वामपंथ के नेतृत्व में ही संघर्ष हुआ है, हो रहा है। पिछले साल 21 व 22 फरवरी को आजादी के बाद की सबसे बड़ी हड़ताल का नेतृत्व वामपंथियों ने ही किया। सवाल है कि वह एकता जो नवउदारवादी नीतियों के विरुद्ध बनी, वह एकता चुनाव जैसे राजनीतिक संघर्ष में क्यों बिखर गई ? क्या ‘वामपंथ’ इस पर विचार करने को तैयार है? उत्तर प्रदेश जहां वामपंथ अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है, ऐसे में क्या यह जरूरी नहीं कि वामपंथी दल अन्य संघर्षशील लोकतांत्रिक ताकतों के साथ एकताबद्ध होते। कम से कम बिहार व उत्तर प्रदेश में तो वे एक साथ मिलकर कांग्रेस व भाजपा का मुकाबला करते। संभव है चुनाव में उन्हें कामयाबी नहीं मिलती लेकिन इससे वामपंथी कतारों व संघर्षशील जनसमुदाय में अच्छा संदेश जाता, वहं नवउदारवाद और फासीवाद से लड़ने का ही नहीं बल्कि वामपंथ के पुनर्जीवन का भी आधार बनता। लेकिन हमारे ‘वामपंथ’ की सारी ताकत अवसरवादियों के साथ एकता बनाने में गई। ऐसे में बनारस में वामपंथ की एकता और उसकी स्वतंत्र दावेदारी का राग बेसुरा सा लगता है।

 

कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच
लखनऊ

पत्रिका ने छह संपादकों को जबरन मैनेजर बनाया, अन्य 15 नामों की सूची तैयार

पत्रिका ने अपने ही छह पत्रकारों के हाथ की कलम छीन ली है। उनके हाथ काट दिए हैं। उन्हें जबरन मैनेजर बनाया जा रहा है, जबकि उनकी इस तरह के काम की ना तो मंशा है और ना ही वे इसे करना चाहते हैं। पत्रिका ने बीकानेर के संपादक सुनील जैन और अजमेर के संपादक दौलत सिंह चौहान को कुछ दिन पहले ही संपादक के पद से हटा कर इन शाखाओं का मैनेजर बना दिया था। नौकरी करनी थी, इसलिए मजबूरी में वे प्रबंधन के इस फैसले पर चुप रहे। इसके बाद पत्रिका ने गत २४ मार्च को भीलवाडा के संपादक जयप्रकाश सिंह, कोटा के संपादक संदीप राठौड और पाली के संपादक राकेश गांधी को उनके पदों से हटा दिया और उन्हें एक महीने तक भोपाल में मैनेजर बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। अब इन्हें पत्रिका में कहा गया है कि किसी भी सूरत में संपादक का काम नहीं करना है। पत्रकारिता को मार दो और मैनेजर बन जाओ, सर्कुलेशन बढ़ाओ, विज्ञापन लाओ।

कहा जाता है कि पत्रिका के संस्थापक श्री कर्पूर चंद कुलिश पत्रकारों की बड़ी इज्जत करते थे। वर्तमान संपादक गुलाब कोठारी के लिए भी अभी तक यही कहा जाता था। लेकिन गुलाब जी के होते हुए भी पत्रकारों का खतना कर जबरन उन्हें मैनेजर बनाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि ऐसे 15 संपादकों की सूची तैयार है, जिनकों जबरन मैनेजर बनाया जाना तय है। यह काम लोकसभा चुनाव के बाद होगा। जिन लोगों को संपादकों से मैनेजर बनाया है उन्हें अभी तो राजस्थान में ही पोस्टिंग देने का आश्वासन दिया है। शायद अन्य किसी अखबार में आज तक ऐसा नहीं हुआ होगा। कि पत्रकारों को मैनेजर बनाया जा रहा है। नौकरी जाने के डर से सब चुप हैं।

 

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।

सूचना आयुक्त ने वरिष्ठ आरटीआई कार्यकर्ता को जेल भिजवाया

सूचना का अधिकार कानून के इतिहास में सम्भवतः यह पहली घटना होगी जब सूचना आयुक्त ने आरटीआई कार्यकर्ता को अपने कक्ष से धक्के मार कर न केवल बाहर निकलवा दिया बल्कि पुलिस द्वारा पिटवाया और रिपोर्ट दर्ज करा कर रात के 10 बजे घर से गिरफ्तार भी करवा दिया।

दिनाकं 25 अप्रैल को सूचना आयोग में माननीय अरविन्द बिष्ट (टाइम्स आफ इंडिया के संपादक, मान्यता प्राप्त पत्रकार) के कक्ष में अशोक कुमार गोयल की अपील पर सुनवाई की तारिख थी जिसमें अशोक कुमार गोयल स्वयं उपस्थित हुए। मामले में पुनः तारिख दिये जाने का विरोध श्री गोयल ने यह कहते हुए किया कि मामला सन् 2011 से लम्बित चल रहा है और सम्बन्धित विभाग लगातार टालमटाले कर रहे हैं। अतः सम्बन्धित जन सूचना अधिकारी के खिलाफ अधिनियम में प्रदत्त प्रावधानों के मुताबिक दण्डात्मक आदेश पारित किया जाए। लेकिन माननीय आयुक्त महोदय केवल तारिख देकर मामले को टरकाना चाहते थे। जिसका श्री गोयल ने विरोध किया।

वॉयस ऑफ मूवमेंट में छपी खबर
वॉयस ऑफ मूवमेंट में छपी खबर

श्री गोयल की यही हरकत माननीय विष्ट साहब को बुरी लग गर्इ और उन्होने बाहर बैठे एसआई कमला कांत त्रिपाठी को बुला कर श्री गोयल को धक्के मार कर बाहर निकालने का आदेश दिया। साहब का आदेश पाते ही एसआई कमला कांत त्रिपाठी अपने पुलिसिया रौद्र रूप में आ गये और ब्लड प्रेशर, शुगर के मरीज 60 वर्षीय अशाके कुमार गोयल को घसीटते हुए चेम्बर से बाहर ले गये और जमकर ठोंक पीट डाला तथा तलाशी के नाम पर जेब में रखे हजारों रूपयों को कब्जे में ले लिए। मार खाकर श्री गोयल घर आ गये और जरिए ईमले शासन-प्रशासन को अपनी शिकायत भेजते हुए रपट दर्ज कर कार्यवाही करने की गुहार लगाई।

खबर है कि इसकी भनक लगते ही रात में ही माननीय विष्ट साहब ने पुलिस को खटखटा दिया और रात 10.00 बजे हजरतगंज की पुलिस श्री गोयल के चिनहट के गणेशपुर-रहमानपुर स्थित घर पर धमक गई। बताते हैं कि लगभग आधा दजर्न पुलिस ने घर में घुस कर न केवल उनकी पत्नि से अभद्रता की बल्कि श्री गोयल को उनके लड़के सहित हजरतगजं कोतवाली लाकर लॉकअप में डाल दिया। सबेरे श्री गोयल की तबीयत खराब होने पर पुलिस उन्हें पास के अस्पताल ले गई जहां डॉक्टरों ने आईसीसीयू में ले जाकर एक्सपर्ट डाक्टर को दिखाने को कहा लेकिन पुलिस ने उन्हें एक्सपर्ट डाक्टरों को दिखाने के बजाय पनु: लॉकअप में डाल दिया।

माननीय चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रटे की अदालत में पुलिस द्वारा पेश किये जाने पर श्री गोयल के अधिवक्ता ने उनके स्वास्थ्य, उम्र आदि का हवाला देकर जमानत पर रिहा करने का अनुरोध किया। लेकिन माननीय न्यायाधीश महोदय ने श्री गोयल शनिवार को पेश करने कर आदेश देते हुए जेल भेज दिया। बताया जा रहा है कि जहां माननीय श्री अरविन्द विष्ट साहब प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के मुखिया माननीय मुलायम सिहं यादव के समधि हैं तो वहीं पूरी पुलिसिया कार्यवाही को अंजाम देने वाले हजरतगंज कोतवाली प्रभारी अशोक कुमार वर्मा जी माननीय युवा मुख्यमंत्री अखिलेश जी के करीबी दोस्त हैं। सम्भवतः इसी कारण देर रात तक एसएसपी साहब को इस वारदात की कोई जानकारी नहीं होने पाई। वाकई में इस प्रकरण में पुलिस की तत्परता को देख कर आश्चर्य होता है कि आखिर इतनी काबिल पुलिस के रहते प्रदेश में क्यों लगातार काननू -व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती जा रही है? शायद इसका जबाव यही होगा कि हल्लाबोल राज में पुलिस का नहीं गुंडे बदमाशों का शासन चलता हैं जिसकी रखवाली पुलिस करती है।

 

महेन्द्र अग्रवाल। संपर्कः newskootchakra@gmail.com

कलयुग के महाभारत में काशी कैसे कुरुक्षेत्र बन गयी

गंगा और बुनकर। एक काशी के आस्तित्व की पहचान तो दूसरा प्रतीक और रोजी रोटी। नरेन्द्र मोदी ने बनारस में पर्चा भरते वक्त इन्ही दो मुद्दों को उठाया। लेकिन इन दोनों मुद्दों के साए में अगर बनारस का जिक्र होगा और वह भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर तो फिर आने वाले वक्त में काशी के भाग्य बदलेंगे या काशी देश की सत्ता परिवर्तन भर का प्रतीक बनकर रह जायेगा। हो जो भी लेकिन सच यही है कि बुनकर मजदूर बन चुका है और गंगा किसी बरसाती नाले में तब्दील हो चली है। दरअसल, गंगा की अविरल धारा अब गंगोत्री से काशी तक सिर्फ लोगों के जहन में ही बहती है। शहर दर शहर, गांव दर गांव। सौ पचास नहीं बल्कि ढाई हजार गांव इसी गंगा पर पूरी तरह आश्रित है और गंगा सिर्फ मां नहीं बल्कि आधुनिक दौर में जिन्दगी भी है। रोजगार है। कारखाना है। उद्योग है। सरकारी योजनाओं को समेटे है गंगा। लेकिन बिगड़े बच्चों की तरह गंगा को मां मानकर भी किसी ने गंगा के उस सच को नहीं देखा जिसके दायरे में गंगा का पानी पीने लायक नहीं बचा और सैंट्रल पौल्यूशन कन्ट्रोल बोर्ड को कहना पड़ा कि कन्नौज, कानपुर, इलाहबाद और काशी में तो गंगा नहाने लायक तक नहीं है।

 
गंगोत्री
से बंगाल की खाड़ी तक देश के 42 सासंद गंगा किनारे के क्षेत्र से ही चुने जाते हैं। अपने सासंद को चुनने वाले इन 42 लोकसभा क्षेत्रों के करोड़ों वोटरों के लिये सब कुछ गंगा ही है। लेकिन गंगा किसी के लिये कभी मुद्दा नहीं बनी। ऐसा भी नहीं है कि राजनेताओं या सरकारों के पास पैसे की कमी है। 1985 में गंगा एक्शन प्लान शुरु हुआ तो विश्व बैंक से लेकर गंगा के लिये काम करने वाले एनजीओ ने अपनी थैली खोल दी। 2011 में 7 हजार करोड़ तो विश्व बैंक से आ गया। करीब 10 हजार करोड़ की मदद पर सहमति दुनिया भर के एनजीओ और सामाजिक सांस्कृतिक संगठनों से आ गयी। लेकिन काम सिर्फ कागज़ों पर ही रेंगता रहा। 896 करोड़ रुपये सीवेज के लिये दिये गये। कानपुर में बहते कूड़े को गंगा में गिरने से रोकने के लिये 145 करोड़ रुपये दिये गये। लेकिन सिवाय संसद से विधानसभा में गंगा सफाई को लेकर गूंज और निराशा के आगे बात कभी बढ़ी नहीं।

गंगा के पानी को टिहरी में पठारो से रोक कर भविष्य के गर्भ में प्रकृतिक से खिलवाड़ का रोना भी रोया गया। लेकिन मुनाफे और गंगा तक से कमाई के लोभ ने कभी राजनेताओ के दिल को डिगाया नहीं। लेकिन पहली बार कोई पीएम पद का उम्मीदवार काशी पहुंचकर जब इस भावुकता से बोला कि गंगा ने बुलाया है तो ही काशी आना हुआ तो शाय़द पहली बार राजनीति भी गंगा नहा गई। तो क्या गंगा की तस्वीर मोदी के सत्ता में आने के बादल सकती है। यकीनन कोई भी ठान लें तो गंगा फिर उसी अविरल धारा के साथ जिन्दगी का गीत सुनाती हुई बह सकती है। तो पहला सवाल क्या साबरमति के लाल ने आजादी दिलायी और अब काशी को गंगा लौटाकर मोदी भी गंगा के लाल तो हो ही सकते है। वही बुनकरों को लेकर जिस तरह नरेन्द्र मोदी ने मार्केटिंग का सवाल उठाया उसने झटके में बनारस के करीब डेढ़ लाख बुनकरो की दुखती रग पर हाथ रख दिया। क्योंकि बनारस की पहचान सिल्क साड़ी भी है।

मुगलिया सल्तनत तक बनारस के बुनकरों के हुनर पर रश्क करती थी। लेकिन ऐसा क्या हो गया कि मुगलिया सल्तनत की तरह हुनरमंद बुनकर भी अस्त हो गये। अग्रेजों ने मुगलों को खोखला बना दिया तो चीन के सिल्क ने बुनकरो की कमर तोड़ी। बीते 10 बरस में बनारस के 175 से ज्यादा बुनकरों से आत्महत्या कर ली। बुनकरों के हुनर को चुनौती मशीन ने दी। फिर मशीन भी बिजली की किल्लत में बैठ गई। हथेलियो पर रेंगते हुनर पर पेट की भूख भारी पड़ी और देखते देखते सिर्फ बनारस में 20 हजार से ज्यादा परिवार मजदूरी में लग गए। खेती से लेकर शहर में बड़ी-बड़ी अट्टलिकाओ की चमक दमक बरकरार रखने के लिये ईंट और सीमेंट की बोलिया उठाते मजदूरो को रोक कर आज भी पूछ लीजिये हर पांच में एक बुनकर ही निकलेगा। बनारस के जिस राजा तालाब पार बस्ती में एक वक्त करघो का संगीत दिन रात चलता रहता था। वही बस्ती अब सुबह होते ही मजदूरी के लिये निकलती दिखायी पड़ती है। कैसे हुनर लौटेंगे। कैसे पुश्तैनी काम दुबारा बनारस की गलियो में बिखरी पड़ी बस्तियों के आसरे दुबारा पुरानी रंगत में लौटेगा। भरोसा अब भी किसी को नहीं होता ।
 
ढाई बरस पहले राहुल गांधी ने सरकारी पैकेज देकर बुनकरो की भूख मिटायी थी। लेकिन चुनाव जीता समाजवादी पार्टी ने और सीएम होकर भी बुनकरों के जख्म में मलहम ना लगा सके अखिलेश यादव। अब पीएम पद के दावेदार मोदी ने हुनरमंद हाथों को दोबारा संवारने के लिये आंखो में सपने जगाये है। सवाल सिर्फ इतना है कि सत्ता की होड़ के साथ ही सपनो को जोड़ा गया है। जिसे बनाना या तोड़ना सिर्फ बनारस के हाथ में नहीं। तय देश को करना है। क्योंकि समूचे देश में ही हर हुनरमंद सियासी चालों तले बार बार ठगा गया है। और मजदूर बनकर जीने को अभिशप्त हो चला है। सपना टूटें नहीं उम्मीद तो की ही जा सकती है। लेकिन जिस तरह पर्चा भरने को ही सियासी ताकत का प्रतीक बना दिया गया । उसमें अगले 18 दिन तक यह मुद्दे मायने रहेंगे भी या नहीं यह देखना भी दिलचस्प होगा। क्योंकि महाभारत 18 दिन ही चला था। और जब युद्द खत्म हुआ तो युद्दभूमि में मौत से भी भयावह सन्नाटा था। घायल और मरे लोगों से पटे पडे युद्द भूमि के आसमान पर चील कौवे मंडरा रहे थे।

लेकिन बनारस की राजनीति के अक्स में क्या काशी 2014 के चुनाव का एक ऐसा युद्द स्थल बन रहा है जो महाभारत से कम नहीं है तो फिर मौजूदा वक्त में देश की राजनीतिक सत्ता की दौड़ में जिस जुनुन के साथ बनारस की गलियों में जन सैलाब उमड़ा। केजरीवाल के साथ सफेद टोपिया और लहराते सफेद झंडो के बाद मोदी के साथ केसरिया रंग से बनारस पटा गया। गगन भेदी नारों के बीच जनसैलाब लोकतंत्र की उस राजनीति को ही हड़पने को बेताब दिखा। जिसमें कोई मुद्दा मायने भी रखता हो या बहस की भी गुंजाइश हो। और अगर मोदी को ताकत जनसैलाब से मिली तो भी गंगा या बुनकर की त्रासदी चुनावी तंत्र में क्या मायने रखती है। हर किसी को चुनावी जीत के लिये अगर भीड़ ही चाहिये तो फिर जीतने के लिये हर हथकंथे को न्याय युद्द ही मान कर लड़ा जा रहा होगा । उसमें केजरीवाल इमानदारी या व्यवस्था परिवर्तन का नारा लगाये और मोदी गंगा की सौगन्ध खाने लगे तो फर्क किसे पड़ता है।
 
हां, लोकतंत्र का पर्व झटके में बनारस को एक ऐसे सियासी कुरुक्षेत्र में तब्दील करने को आमादा है, जहां महाभारत की आहट दिखायी देने लगी है। मोदी के पर्चा दाखिल करने के ठीक 18 दिन बाद वोटिंग होनी है। और 18 दिन चले महाभारत के बाद के दृश्य को अंधा युग ने बाखूबी खींचा है- टुकडे टुकडे हो बिखर चुकी मर्यादा/ उसको दोनो ही पक्षों ने तोड़ा/ पांड्व ने कुछ कम..कौरव ने कुछ ज्यादा / यह रक्तपात अब समाप्त होना है/ यह अजब युद्द है। नहीं किसी की भी जीत/ दोनो पक्षों को खोना ही खोना है।
 
लेकिन वह अंधा युग था। अब कलयुग है। जहा हर किसी को कुछ पाना ही पाना है। तो इंतजार कीजिये अगले 18 दिन के महाभारत का जिसकी मुनादी काशी में हो चुकी है।

 

वरिष्ठ पत्रकार पु्ण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लॉग से साभार।
 

भारत सरकार का दावा- रक्षा सौदों में हो रहे आत्मनिर्भरता के गंभीर प्रयास

भारत सरकार ने यह दावा किया है कि वह रक्षा सौदों में पूर्ण आत्म-निर्भरता के लिए गंभीरता से कार्य कर रही है। आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा अपने पीआईएल में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा दिए आदेश के सन्दर्भ में भेजे सुझावों के जवाब में रक्षा मंत्रालय ने उन्हें अवगत कराया है कि नवीनतम रक्षा अधिप्राप्ति प्रक्रिया (डीपीपी)-2013 में बाई (इंडियन) तथा बाई एंड मेक (इंडियन) श्रेणी को बाई (ग्लोबल) श्रेणी से प्राथमिकता दी गयी है। इसी प्रकार बाई एंड मेक (इंडियन) श्रेणी को सरल बनाया गया है ताकि रक्षा उत्पादों के अवांछनीय आयात पर रोक लगाई जा सके।

मेंटेनेंस ट्रांसफर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (एमटीओटी) का काम अब सार्वजनिक उपक्रम की जगह किसी भी भारतीय कंपनी को सौंपा जा सकता है।

डॉ. ठाकुर द्वारा एक स्वतंत्र आयोग बनाए जाने के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए हाल में रक्षा राज्य मंत्री की अध्यक्षता में रक्षा मंत्री उत्पादन कमिटी (आरएमसीपी) का गठन किया गया है जिसमे डिफेन्स सेवा, डीआरडीओ, सार्वजनिक उपक्रम तथा सम्बंधित उद्योग के प्रतिनिधियों को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के पुनरीक्षण तथा देश में रक्षा उत्पादन बढाने के उपयोगों के बारे में सुझाव देने का दायित्व सौंपा गया है। साथ ही मंत्रालय द्वारा पूर्व में इस सम्बन्ध में सौंपे रिपोर्ट का भी अध्ययन किया जा रहा है।

 

प्रेस नोट

सूचनाः ओमेक्स बिल्डर वापस नहीं कर रहा आरडब्लूए को आईएफएमएस मनी

ओमेक्स बिल्डर ने अपनी ओमेक्स हाईट विभूति खण्ड योजना में काफी धांधली की है। बिल्डर यहां की रेजीडेण्ट वेलफेयर एसोसियेशन को आईएफएमएस मनी वापस नहीं कर रहा है। मार्च 2010 से जून 2011 तक उसने मेसर्स सानवी को मेन्टीनेन्स एजेन्सी नियुक्ति किया था। जुलाई 2012 से एसोसियेशन को मेन्टीनेन्स का कार्य सौंप दिया गया था लेकिन आईएफएमएस मनी रूपये 4.5 करोड़ नहीं वापस किये। जुलाई 2012 से अबतक करीब दो वर्ष होने जा रहा है लेकिन ओमेक्स आईएफएमएस मनी वापस करने का नाम नहीं ले रहा है। पहले बिल्डर ने कई शर्तें रखी ऐसोसियेशन ने सारी शर्तें मान ली, एफीडेविट भी साइन कर दिया अब बिल्डर द्वारा नियुक्त एजेन्सी सानवी कम्पनी द्वारा फ्लैटों में गलत पुराने मेन्टीनेन्स बिल भेजे जा रहे हैं। मेसर्स सानवी के श्री अमित बन्सल का मो0नं0 09711800560 है।

    
ओमेक्स हाईट गोमती नगर योजना में 540 फ्लैट है। कई वर्षों से लोग इसमें रह रहे हैं। फ्लैट में रहने वाले लोगों ने ओमेक्स हाईट एपार्टमेन्ट ओनर्स एसोसियेशन के नाम से सोसायटी बना रखी है। फ्लैट खरीदते समय बिल्डर ने लोगों से 85 से 90 हजार रूपये प्रति फ्लैट आईएफएमएस मनी जमा कराया था। एसोसियेशन को मेन्टीनेन्स हैण्डओवर करते समय आईएफएमएस मनी वापस होनी थी।

एसोसियेशन के सचिव डीसी दीक्षित ने बताया कि आईएफएमएस मनी के ब्याज का इस्तेमाल लिफ्टों की एएमसी, फायर फाईटिंग सुरक्षा, ट्रांसफार्मर तथा जेनेरेटर के मेन्टीनेन्स इत्यादि में खर्च किया जाना होता है जिसका बजट सालाना करीब 20 लाख है। रुटीन मेन्टीनेन्स जैसे सफाई, सुरक्षा, जिम, स्वीमिंग पूल, क्लब, हॉर्टीकल्चर इत्यादि के लिए प्रत्येक फ्लैट मालिक एक रूपये प्रति वर्ग फुट के हिसाब से आरडब्लूए को जमा करता है जिससे यह खर्च चलतें हैं। किशोर गोयल जो कि ओमेक्स के रिजलन हेड हैं का फोन नं0 9935092314 है।

बिल्डर ने एसोसियेशन को बिना बताये एपार्टमेन्ट का कई बार नक्शा बदलवाया। यह एपार्टमेन्ट एक्ट 2010 का उल्लंघन है।

डीसी दीक्षित
सचिव,

ओमेक्स हाईट एपार्टमेन्ट ओनर्स एसोसियेशन,
मो. 09918324373, 09415900950
ईमेलः erdcdixit@yahoo.in

 

प्रेस विज्ञप्ति (दिनाकः 23-04-2014)

रॉबर्ट बढेरा की संपत्ती पर अमेरिकी अखबार के खुलासे के निहितार्थ

पिछले कई दशकों में देखा गया है कि किस तरह दुनिया भर में अमेरिकी हितों की रक्षा करने के लिए अमेरिकी सरकार, प्रेस और पूरा समाज एकजुट होता रहा है। लोकतंत्र का झंडाबरदार बना घूमने वाला अमेरिका शेष विश्व में कैसे अपनी कठपुतली सरकारें बनवाता है, यह देखा-सुना सच है। सच को झूठ और झूठ को सच में बदलने में माहिर अमेरिकी समाज के दोहरे मानक हैं, अपने लिए कुछ और तथा दूसरों के लिए कुछ और। उनका अपना मतलब हल हो जाना चाहिए, बाकी दुनिया जाये भाड़ में। मानवता, नैतिकता, आदर्श, सिद्धांत आदि सब का प्रयोग सिर्फ और सिर्फ वे अपने ही हित में किस तरह करते हैं, या फिर महज कागजी चीज के तौर पर इनकी अनदेखी-अनसुनी कर इन्हें हाशिये पर डाल दिया जाता है, इसका अनुभव पूरी दुनिया आये दिन करती रहती है।

 
विगत दस वर्षों में भारत में कांग्रेसनीत सरकार से यथासंभव लाभ कमाने के बाद अब नरेन्द्र मोदी के रूप में नये चेहरे को अपने देशवासी धन्नासेठों की तिजोरियां भरने को मुफीद मानने वाले अमेरिकी प्रेस ने इधर भारतीय लोकसभा चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस की ही बधिया उधेड़ डाली है। ताकि उसके इस नये प्रहार का लाभ मोदी और भाजपा को मिल सके।
 
ताजा
घटनाक्रम के अनुसार अमेरिकी अखबार ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ द्वारा सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट बढेरा की संपत्ति के बारे में किये गये सनसनीखेज प्रहार ने कांग्रेस के लिए असहज स्थित में पैदा कर दी है। फलस्वरूप कांग्रेस को फजीहत से बचने और भाजपा को घेरने की नीयत से गुजरात में उद्योगपति अडाणी को नरेंद्र मोदी की ओर से कौड़ियों के भाव कथित तौर पर जमीन देने के मामले को अपनी ढाल बनाना पड़ा है।

हालांकि बढेरा की संपत्ति की बहुत ही कम समय में हुई बेतहाशा वृद्धि को लेकर भारत में बहुत पहले ही काफी हो-हल्ला मच चुका है, फिर भी इस अमेरिकी अखबार ने ठीक लोकसभा चुनावों के दौरान एक बार फिर से लोगों की याद ताजा करने के इरादे से लिखा है कि सोनिया गाँधी के दामाद ने पिछले एक दशक में रियल एस्टेट का साम्राज्य खड़ा कर लिया है, जबकि उनके पास इसका कोई अनुभव भी नहीं था। वॉल स्ट्रीट जर्नल की बढेरा को लेकर चर्चित खबर में कहा गया है कि पिछले दस सालों के दौरान कांग्रेस की सरकार केंद्र में रही, इस दौरान बढेरा ने व्यापक पैमाने पर जमीन खरीदी। अखबार का कहना है कि उनके पास हाइस्कूल तक की योग्यता भी नहीं थी और न ही प्रॉपर्टी कारोबार का कोई अनुभव।

खबर विदेशी अखबार में होने की वजह से मीडिया में छाई रही। कांग्रेस हाइकमान के निकट सम्बंधी का मसला होने के कारण पार्टी के लिए इसका जवाब देना भी आसान नहीं रहा। इसलिए पार्टी की तरफ से मैदान में उतरे कानून मंत्री तथा वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने रॉबर्ट बढेरा कुछ ही समय में करोड़ों-अरबों में कैसे खेलने लगे इसके तथ्यों पर स्पष्टीकरण देने के बजाय सिर्फ इतना भर कहा कि कानून अपना काम करेगा और यदि किसी के पास कोई सबूत है तो वह सामने लाये। इसके साथ ही उन्होंने आक्रमण को बचाव का बेहतर विकल्प मानने की नीति पर चलते हुए यह भी कहा कि गुजरात में उद्योगपति अडाणी को मोदी ने कौड़ियों के दाम जो जमीन दी है, उसके सारे सबूत हमारे पास हैं।

सिब्बल ने आरोप लगाया कि गुजरात में जमीन और शराब का अवैध कारोबार वैसे हो रहा है, जैसे कर्नाटक में खदान का काला धंधा हो रहा है। उन्होंने कहा कि गुजरात में कुल हानि 30 हजार करोड़ की है जिसमें अवैध शराब के कारण तीन हजार करोड़ के राजस्व का नुकसान भी शामिल है। उन्होंने मोदी से पूछा कि क्या अवैध शराब मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी। अखबार के खुलासे पर ज्यादा बोलने से परहेज करते हुए कांग्रेस ने मोदी और अडाणी के व्यापारिक रिश्तों को ज्यादा उछालकर अपना बचाव करने की कोशिश भर की है। पार्टी के डेमेज कन्ट्रोल मैनेजरों का कहना है कि भाजपा अगर इस मामले को आगे भी तूल देना जारी रखती है तो इसके बाद ही पार्टी के दिग्गज मैदान में उतरेंगे। फिलहाल उसकी तरफ से बढेरा पर ज्यादा नहीं बोलने की रणनीति बनी है।

सिर्फ दसवीं पास रॉबर्ट बढेरा कैसे खेलने लगे करोड़ों-अरबों में, 42 मिलियन डॉलर की है कुल संपत्ति; राजस्थान के कोलायत में 2,000 एकड़ जमीन 7 करोड़ में खरीदी, कैसे रचा गया गोरखधंधा

‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट बढेरा के बारे में एक सनसनीखेज खबर राजस्थान के कोलायत इलाके से प्रकाशित करते हुए खुलासा किया है कि कैसे दसवीं पास बढेरा ने सत्ता में संपर्क का फायदा उठाकर अरबों रुपये का रियल एस्टेट का साम्राज्य खड़ा कर लिया, जबकि उन्हें इस काम का कोई तजुर्बा तक नहीं था। अखबार के अनुसार, वर्ष 2004 से 2007 तक बढेरा का व्यवसाय बेहद मामूली था और वह सस्ती ज्वैलरी का निर्यात करते थे। इसके बाद 2007 में उन्होंने 2,000 डॉलर (लगभग एक लाख रुपये) के बहुत मामूली निवेश से स्काइलाइट हॉस्पिटेलिटी प्राइवेट लिमिटेड नामक एक कंपनी बनाई। केवल एक वर्ष बाद ही 2008 में कंपनी ने गुड़गाँव में 3.5 एकड़ कृषि भूमि 1.3 मिलियन डॉलर में खरीदी (!) हरियाणा की कांग्रेस सरकार ने आनन-फानन 18 दिन के अंदर ही इसको कृषि से व्यावसायिक भूमि उपयोग की अनुमति दे दी, फलस्वरूप जमीन बेशकीमती हो गई। अगले चार साल में रियल एस्टेट की दिग्गज कंपनी डीएलएफ. ने बढेरा को खासी रकम दी और कंपनी की बैलेंस शीट में इसे एडवांस बताया।

अखबार लिखता है कि पाकिस्तान की सीमा से सटे राजस्थान के कोलायत इलाके के ग्रामीणों को साल 2009 अब भी याद है, जब काले रंग की स्कॉर्पियो गाड़ी में सवार दरमियाने कद का एक शख्स वहाँ पहुँच कर ग्रामीणों से जमीन का मोलभाव करता है। यह शख्स बिना किसी हीला-हवाली के गाँववालों को उनकी जमीन के मुँहमाँगे दाम का हाथोंहाथ नगद भुगतान कर देता है। भू-राजस्व के रिकॉर्ड के अनुसार सैकड़ों एकड़ जमीन की खरीदारी करने वाला यह शख्स कोई और नहीं बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद और प्रियंका गाँधी के पति रॉबर्ट बढेरा हैं। जमीन की खरीदारी के दौरान ही केंद्र सरकार ने घोषणा कर दी कि सौर ऊर्जा को प्रोत्साहन दिया जायेगा। जबकि 2011 में राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेस की राज्य सरकार ने भी ऐसा ही ऐलान कर दिया।

भू-राजस्व के दस्तावेज बताते हैं कि तीन साल के अल्पकाल में ही इस जमीन की कीमत में छह गुना की अप्रत्याशित वृद्धि हो गई। बढेरा ने तब 2,000 एकड़ जमीन लगभग सात करोड़ रुपये में खरीदी थी। अखबार ने अपनी जाँच में पाया कि 44 वर्षीय बढेरा को रियल एस्टेट का पहले कोई अनुभव नहीं था। वर्ष 2012 में उन्होंने 12 मिलियन डॉलर की रियल एस्टेट संपत्ति बेची। अब भी उनके पास 42 मिलियन डॉलर की संपत्ति है। इस पर मचे बवाल पर सावधानी बरतते हुए राज्य सरकार के अधिकारी बस इतना ही कहते हैं कि वे जाँच कर रहे हैं कि कहीं जमीन खरीद में कोई गड़बड़झाला तो नहीं है।

मामले पर बढेरा के प्रवक्ता का कहना है कि चुनाव के समय इस तरह की हायतौबा मचती ही है, जमीन की खरीदारी में कोई गड़बड़ नहीं है लेकिन चुनाव में यह मुद्दा जरूर है। हालांकि बढेरा अभी तक किसी सरकारी जाँच में दोषी नहीं पाये गये हैं। हरियाणा सरकार ने एक भूमि सौदे की जाँच के बाद उन्हें क्लीन चिट भी दे दी है लेकिन इंडिया अगेंस्ट करप्शन की राय है कि मामले की जाँच फिर से होनी चाहिए। हालांकि मुद्दा जरूर महत्वपूर्ण है परन्तु यह भी विचारणीय है कि अमेरिकी अखबार ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने इसे ठीक चुनावों के समय ही क्यों उजागर किया। पिछले दो-तीन सालों से वह चुप्पी साधे रहा और जैसे ही भारत में लोकसभा चुनाव की सरगर्मियाँ न केवल तीव्र हुईं बल्कि दो चरण का मतदान हो भी चुका तब अखबार को सोनिया गाँधी के दामाद राबर्ट बढेरा के जमीन से जुड़े प्रकरण की यक-ब-यक याद आ गई। अखबार ने ‘स्टोरी’ के लिए जो समय चुना उससे उसकी मंशा साफ झलकती है।

 

श्याम सिंह रावत। संपर्कः ssrawat.nt@gmail.com
 

इतनी आसान नहीं दलित वोटों में सेंधमारी

नरेन्द्र मोदी के अम्बेडकर प्रेम के निहितार्थ

अखिल हिन्दूवादी मजबूत राष्ट्र के निर्माण का सपना दिखाकर भारतीय जनता पार्टी सदैव बहुसंख्यक हिन्दूओं के भावात्मक मुद्दों की राजनीति करती रही है। लेकिन इस राजनैतिक एजेंडे के बल पर लगभग 27 दलों के गठबंधन के सहारे पहले 13 दिनों और बाद में 13 महिनों के लिए अपना राज्याभिषेक करवाकर वह पिछले दस सालों से केन्द्र की सत्ता से वनवास भोग रही है। कुर्सी से दूरी की पीड़ाएँ एवं सत्ता पाने की भाजपा की छटपटाहट अब पूरी शिद्दत से सामने आ रही है। इसी के चलते नेतृत्व के स्तर पर इस बार उसने सवर्ण हिन्दू कैंडिडेट के स्थान पर अन्य पिछड़ा वर्ग से सम्बद्ध नरेन्द्र मोदी को आगे किया है। जाति के आधार पर अन्य पिछड़ा लेकिन वफादारी के स्तर पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संध का कट्टर हिन्दूवादी सच्चा सिपाही।

सत्ता प्राप्ति के लिए ब्राह्मणवादी संघ और भाजपा ने अपनी आंतरिक कलह के बावजूद भी अपनी नजरों से सही हीरे की खोज कर ली है। प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के तुरन्त बाद ही इस नायाब हीरे ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। जनता को भावनात्मक मुद्दो के आधार पर उकसाकर, अवसर के अनुकूल उनके प्रतीकों का राजनैतिक इस्तेमाल मोदी की जानी-पहचानी प्रविधि है। इसकी शुरूआत मोदी ने सरदार पटेल की सबसे बड़ी लौह-प्रतिमा बनवाने की घोषणा के साथ की।

गौरतलब है कि कॉरपोरेट घरानों द्वारा संरक्षित एवं पोषित श्री नरेन्द्र मोदी चाहते तो इस प्रतिमा का निर्माण सोना-चाँदी जैसी बहुमूल्य धातु से भी करवा सकते थे। या मूर्ति-निर्माण में अधिकांशतः प्रयुक्त कांस्य धातु का भी प्रयोग किया जा सकता था। लेकिन ऐसा करके वह राजनीतिक ध्रुवीकरण किया जाना सम्भव नहीं था जो संघ और भाजपा अपने विश्वस्त सिपाही मोदी से चाहते थे। मोदी ने इस भव्य प्रतिमा के निर्माण के लिए उन तमाम मेहनतकश हाथों में चलने वाले औजारों का एक घिसा हुआ लौह का टुकड़ा दान देने की अपील की ताकि एकीकृत भारत के निर्माता लौह पुरूष सरदार पटेल की सर्वाधिक ऊँची लौह-प्रतिमा बन सके। प्रतिमा निर्माण के लिए मेहनतकश हाथों के लौह का एक टुकड़ा वस्तुतः मेहनतकश ओ.बी.सी. वर्ग का एक वोट था जिसके आधार पर भाजपा सत्ता पर काबिज होना चाहती थी। खैर प्रतिमा निर्माण की मोदी की यह महत्वाकांक्षी परियोजना अभी शुरू नहीं हो पाई है इसलिए ओ.बी.सी. वोट-बैंक भी उनके खाते में आ गया होगा उसे भाजपा का अधूरा व असंगत सपना ही समझा जाना चाहिए।

भावनात्मक मुद्दों की राजनीति करने वाली कोई भी पार्टी या व्यक्ति अपना प्रायोजित ईमानदार एवं नैतिकतावादी ऐजेंडा ही सामने लाती है जिसमें खुद के अलावा तमाम दूसरे लोगों के पापी होने का अभियोजन पत्र भी शामिल रहता है। 14 अप्रैल को बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की 123वीं जयन्ती पर नरेन्द्र मोदी ने ऐसा ही फरमाया। बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर को उन्होंने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का प्रतीक पुरूष बताते हुए कहा कि "कांग्रेस विगत 60 वर्षों से बाबा साहब का अपमान करती आ रही है। कांग्रेस ने हमें कोई कानून नहीं दिया है। सारे कानून हमारे संविधान निर्माता बाबा साहब की देन है। यदि एक चाय बेचने वाला आज प्रधानमंत्री बनता है तो यह बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की देन है। ऐसे महान व्यक्ति को कांग्रेस ने भारत रत्न नहीं दिया। उनको भारत रत्न उनकी पार्टी की सरकार ने दिया है।’’

श्री नरेन्द्र मोदी की इस बात से कोई प्रतिबद्ध दलित-चिंतक भी असहमत नहीं हो सकता कि दलितों और पिछड़ों को मानवोचित जरूरी कानूनी अधिकार दिलाने का श्रेय केवल और केवल बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर और उनके संघर्ष को है। लेकिन सवाल उठता है कि बाबा साहब का संघर्ष किसके विरोध में था? आज दलित और पिछड़ा समाज किस व्यवस्था या विचारधारा के कारण शोषित, पीड़ित एवं अपमानित है? जाहिर है कि दलितों व पिछड़ों के शोषण और अपमान के लिए हिन्दूवादी वर्ण व्यवस्था जिम्मेदार है और बाबा साहब का समूचा संघर्ष इसी व्यवस्था व विचार के विरोध में खड़ा है। वर्तमान भारत की दलित राजनीति में इस हिन्दूवादी वर्णव्यवस्था की घोषित नुमाइंदगी विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ समर्थित भाजपा करती है। जिसके प्रतिनिधि चेहरे नरेन्द्र मोदी है। तब नरेन्द्र मोदी किस मुँह बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की प्रशंसा कर दलित वोट-बैंक को पाने की अपेक्षा रखते है? बाबा साहब अम्बेडकर का संसद एवं सार्वजनिक राजनीति में घोर विरोध करने वाले नरेन्द्र मोदी के आदरणीय श्यामा प्रसाद मुखर्जी किस दल के सदस्य थें? दलितों और पिछड़ों को जरूरी मानवाधिकार एवं प्रतिनिधित्व देने का प्रयास करने वाले मण्डल आयोग के खिलाफ कमण्डल की राजनीति करके दंगे फैलाने वाले लोग किस दल या विचारधारा के सदस्य थे? क्यों भाजपा के घोषण पत्र में मजबूत हिन्दूवादी राष्ट्र का नाम देखकर ही दलित समुदाय की रूह काँप जाती है?

14 अप्रैल को ही मोदी की सजातीय विचाराधारा के अरविन्द केजरीवाल को भी बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की याद आ गई। उन्होंने भी 65 वर्ष बाद अम्बेडकर के संविधान के फॉलो न होने की स्थिति पर अपना अफसोस जाहिर किया। उनसे भी पूछे जाने ही जरूरत है कि जब दलितों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देकर उनका जरूरी प्रतिनिधित्व एवं न्यूनतम जीवन स्तर को सुनिश्चित करने के प्रयास हो रहे थे तब आप ’आर्ट ऑफ लिविंग’ के संस्थापक श्री रविशंकर के साथ ’यूथ फॉर इक्वलिटी’ की मुहिम चलाकर क्या अम्बेडकरवाद को ही मजबूत कर रहे थे? आम-आदमी के नाम पर राजनीति करने वालों के यहाँ आम-आदमी कौन है और किसी दलित, पिछड़े या स्त्री को उनकी पार्टी में क्या स्पेस है इस पर अधिक कहने की जरूरत नहीं है।

नरेन्द्र मोदी जहाँ अपने भाषणों में लच्छेदार और अलोकतांत्रिक भाषा प्रयोग के लिए कुख्यात हैं उतने ही ऐतिहासिक तथ्यों के विकृतिकरण और उनकी असंगत प्रस्तुती के लिए भी। मुझे लगता है कि भाषा-प्रयोग कि दृष्टि से यह चुनाव आज तक का सर्वाधिक भ्रष्ट और लिजलिजा चुनाव है। स्थान और अवसर विशेष की जरूरतों के अनुसार नरेन्द्र मोदी अपनी लच्छेदार भाषा में अपने परिष्कृत इतिहास ज्ञान का परिचय भी देते रहते है। कभी वे तक्षशिला को बिहार में बताते है तो कभी श्यामा प्रसाद मुखर्जी को 1930 में लंदन में मरा हुआ बताते है। कभी चन्द्रगुप्त मौर्य को गुप्त वंश का मशहूर शासक बताते हैं तो कभी सिकन्दर को गंगा नदी के किनारे से भगा दिया गया बताते है और भगत सिंह को अण्डमान जेल में फाँसी दिया गया कहते है। ऐसी ही गलती उन्होंने 14 अप्रैल को भी कर दी। उन्होंने खुद की पार्टी की सरकार द्वारा अम्बेडकर को 'भारत रत्न’देने की बात कह दी। इतना सच अवश्य है कि वी.पी. सिंह की सरकार को भाजपा का समर्थन था। लेकिन अम्बेडकर को भारत-रत्न देने वाली वहीं वी.पी. सिंह सरकार जब दलितों को मजबूत कर रही थी तो कमण्डल और रथयात्रा के साथ वी.पी. सिंह की सरकार गिराने वाले भी तो मोदी ही की पार्टी के थे।

प्रसंगवश एन.डी.टी.वी. के कार्यक्रम ’प्राइम टाईम’ में उत्तर-प्रदेश की बसपा रैली का रविश का एक कवरेज मुझे याद आ रहा है। जिसमें दलित महिलायें दिन में कठोर मजदूरी करने के बाद शाम को रैली में शामिल होते हुए अपने घरों से थैले में खाना लाना नहीं भूलती है। वे जानती हैं कि जिस पार्टी की रैली में वे शामिल होने जा रही है उसे कॉरपोरेट घरानों का समर्थन हासिल नहीं है। जिसकी बदौलत रैलियों में बिसलेरी का पानी व पाँच सितारा होटलों का खाना उपलब्ध होता है। रविश द्वारा मोदी की लहर के बारे में पूछे जाने पर वे स्पष्ट जबाव देती है कि 'उनका व उनके वर्ग का कल्याण केवल बहन जी से ही सम्भव है।’ आज के दिन दलित वोटर इतना सजग है कि वह अपना हित और राजनीतिक ताकत समझता है। केवल अम्बेडकर जयन्ती पर बाबा साहब का नाम ले लेने वालों के साथ वह नहीं जाने वाला है। यह बात नरेन्द्र मोदी व केजरीवाल को समझ लेनी चाहिए। उदित राज और रामविलास पासवान के साथ आ जाने से यह समझने की भूल मोदी को नहीं करनी चाहिए कि उन्होंने दलित वोटर को भी साथ लिया है। उदित राज और पासवान रास्ता भूले हुए लोग है जिनकी शीघ्र घर-वापसी की प्रतिक्षा आज भी उनके दलित बन्धुओं को है।

अनिता सिंह
मो- 8447787065
ई-मेलः-singhdharmveeranita1981@gmail.com

 

‘येन केन प्रकारेण’ चुनाव जीतने की लालसा, खर्चीले चुनावों की जनक है

एक टी वी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन के दौरान यह पता चला कि चुनावों में पैसे का कितना योगदान है और इसके दम पर क्या कुछ नहीं किया जा सकता। डमी प्रत्याशी खड़ा करके किसी जीतने वाले प्रत्याशी के वोट किस तरह काटे जा सकते हैं। इसमें निर्दलीयों और छोटी -छोटी पार्टियों की क्या भूमिका होती है, यह तथ्य सामने आता है। कॉर्पोरेट लॉबिंग का क्या मतलब है और बड़ी पार्टियां किसके इशारों पर चलती हैं, यह भी स्पष्ट हो जाता है। अतः यह अनुमान लगन कठिन नहीं कि भारत में, भ्रष्टाचार का मुख्य सूत्र, भारत की राजनीतिक व्यवस्था के भीतर है। यदि यहां भ्रष्टाचार को समाप्त करने की कोई भी सार्थक पहल की जाती है तो उसमें अवश्य ही राजनीतिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव एक अत्यावश्यक आधार होगा।

किसी भी राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। राजनीतिक दलों की 'येन केन प्रकारेण' चुनाव जीतने की लालसा, खर्चीले चुनावों की जनक है। एक अनुमान के अनुसार आज विधानसभा की एक सीट के लिए 1 से 5 करोड़ रुपए तक की राशि खर्च करनी पड़ती है। लोकसभा की एक सीट के लिए 5 से 25 करोड़ तक के खर्च का अनुमान है। यह अनुमान ग्रामीण, अर्द्धशहरी तथा बड़े शहरों के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है। यह पैसा कहाँ से आता है और कौन देता है, वह क्यों देता है यह गंभीर चिंता का विषय है। इतना चुनावी खर्च आखिर किसलिए? भ्रष्टाचार की तह में बस यही एक पहेली है जो इस तरह के कर्मों का पर्दाफाश कराती है।
 
हाल में राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली को सूचना का अधिकार, कानून के दायरे में लाने की आवाज उठी तो सभी राजनीतिक दल अपने सारे मतभेद भुलाकर इस बात पर एकजुट हो गए कि ऐसा नहीं होना चाहिए। स्पष्ट था कि राजनीतिक दल अपनी कार्यप्रणाली को विशेष रूप से वित्तीय लेन-देन को जनता के समक्ष नहीं लाने देना चाहते थे। तब इन पर कैसे अंकुश लगाया जाये? ऐसे राजनीतिक दलों पर अंकुश लगाने का एक अति साधारण उपाय है कि इनके वित्तीय लेन-देन को चुनाव आयोग के समक्ष प्रत्येक तिमाही अथवा छमाही अवधि के बाद प्रस्तुत करना अनिवार्य बना दिया जाए और ऐसा न करने वाले राजनीतिक दलों के मुख्य अधिकारियों को दंडात्मक प्रावधान का सामना करना पड़े।

कम्पनियों के गठन और संचालन पर जिस प्रकार कम्पनी कानून के प्रावधान प्रत्येक कम्पनी के लिए वित्तीय खातों को कम्पनी बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य बनाते हैं और न करने वाली कम्पनी के डायरैक्टरों पर दंडात्मक कार्रवाई की तलवार लटकी रहती है, हालांकि कॉर्पोरेट-राजनीतिक गठजोड़ इसे कमजोर करने में अपनी भूमिका निभाता है फिर भी राजनीतिक दलों के अपकृत्यों को नियंत्रित करने के लिए चुनाव आयोग को भी ऐसे ही अधिकार दिए जाने चाहिए। भारत में राजनीतिक दलों की व्यवस्था, चुनाव आयोग के कितने नियंत्रण में है इसका आकलन जन प्रतिनिधित्व कानून की केवल एक धारा-29 से लगाया जा सकता है।

इस धारा-29 में नया राजनीतिक दल गठित करने के लिए चुनाव आयोग को पूर्ण विवरण सहित एक आवेदन दिया जाता है जिसमें मुख्य कार्यालय तथा पदाधिकारियों और सदस्यों की संख्या का विवरण दिया जाना होता है। इसी धारा में यह प्रावधान है कि कोई भी राजनीतिक दल व्यक्तिगत नागरिकों या कम्पनियों से दान स्वीकार कर सकता है। इसी धारा में यह प्रावधान है कि हर राजनीतिक दल का कोषाध्यक्ष चुनाव आयोग को अपने दल की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा जिसमें उन व्यक्तियों या कम्पनियों के नाम शामिल करने आवश्यक होंगे जिन्होंने क्रमश: 20,000 और 25,000 रुपए से अधिक दान विगत वर्ष में दिया हो। इस धारा-29 में ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं है जिसमें राजनीतिक दल द्वारा वित्त के संबंध में अनियमितता बरते जाने पर सजा या जुर्माने आदि की कोई आपराधिक व्यवस्था हो।

इसी कमी का लाभ उठाते हुए भारत के सभी राजनीतिक दल पूरी तरह से परदे के पीछे  रहकर इस तरह की हेरा-फेरी करने में सफल हो जाते हैं ताकि उनके वित्तीय लेन-देन जनता के सामने न आ पाएं। जाहिर है ऐसी स्थितियों में भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता। यह राजनीतिक व्यवस्था इसकी संरक्षक है। इसलिए इस व्यवस्था में बदलाव अत्यंत आवश्यक है तभी भ्रष्टाचार पर नियंत्रण संभव है।

 

शैलेन्द्र चौहान। संपर्क: पी-1703, जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स, प्लाट न. 12 ए, अहिंसा खंड, इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद – 201014
 

आवश्यक है चुनावों की वित्त पोषण प्रणाली का पारदर्शी होना

अपने घर से लेकर बाहर तक मैं चुनावों के दौरान अक्सर यह बात सुनता हूं कि हारने वाले उम्मीदवार को मत देकर लोगों ने मत ख़राब कर दिया। या चुनावों के बाद वे पछताते हुए पाये जाते हैं कि उन्होंने जिसे वोट दिया था वह तो हार गया और उनका वोट बरबाद हो गया। आखिर यह कैसी मानसिकता है? क्या तुलसीदास ने इसीलिए लिखा था 'समरथ को नहीं दोस गुसाईं'। इस मानसिकता का उत्स कहाँ है? यदि गौर से इस बारे में सोंचा जाये तो हम देखते हैं कि हम सांस्कृतिक गुलामी से कभी मुक्त नहीं हो पाये। कभी राजाओं, नबाबों की गुलामी, उनके कारिंदों, जमीदारों, जागीरदारों की गुलामी, तो कभी उच्च वर्ण की गुलामी, या फिर पुरुषवर्चस्व की गुलामी। अंग्रेजों की गुलामी, प्रशासनिक अमले की गुलामी, और भारतीय राजनेताओं की गुलामी। और सर्वोपरि धन की गुलामी।

समाज में हर स्तर पर अनेकों भेद-विभेद हैं जो हमें बलशाली के इशारों पर विवश करते हैं, उसकी ओर आकर्षित करते हैं। उसका चरित्र और मानसिकता वहां गौण होती है उसकी शक्ति और प्रभाव प्रधान। उसके गुण अवगुण सब उसकी इस सामर्थ्य में छुप जाते हैं। चाहे भले ही वह अव्वल दर्जे का अपराधी ही क्यों न हो। जब मैं उन्हें समझाता हूँ कि चुनाव कराये ही इसलिए जाते हैं कि हम अपनी पसंद के प्रत्याशी को वोट करें वह हारे या जीते। अन्यथा चुनावों की क्या जरुरत है? जो बलशाली और पैसेवाला व रसूखदार प्रत्यासी हो उसी को जीता हुआ मान लिया जाये। ये पैसे का खर्च, समय की बरबादी, बेबजह का हो हल्ला, आरोप-प्रत्यारोप, गाली गलौज और बिना मतलब के तनाव आदि से बच जाये। विपक्ष की कोई आवश्यकता ही न रहे। जीतने वाला जो चाहे करे- सही-गलत, अच्छा-बुरा तब तो सब जायज होगा।

लोग ये बात सुनते हैं और यह मान भी लेते हैं कि चुनाव एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है इसलिए सबको अपने अपने हिसाब से वोट डालने की आजादी है। इस तरह 'नोटा' विकल्प का तो कोई औचत्य ही नहीं है। अब संयोग से एक समझदारी भरा प्रश्न भी होता है कि चुनावों में बारी-बारी से हार-जीतकर चाहे किसी भी नाम वाली पार्टी की सरकार बनें, आखिरकार सत्ता व ताकत पर कब्जा तो कुछ ही 'माननीयों' का रहता है यह क्यों? तंत्र और व्यवस्था तो बदलती नहीं। यह भी स्पष्ट है कि इंसाफ के हक़ में जनता से उठने वाली हर सामूहिक आवाज को कुचलने के लिये सभी पार्टियों के नेता अपने सभी मनमुटाव, मतभेद, दुश्मनी भुलाकर सगे भाइयों की तरह तुरन्त एका कर लेते हैं। और विरोध करने वाले जागरूक लोगों को धमका कर झूठे मुकदमों में फंसाकर, जेलों में ठूंसकर, वक्त जरुरत हत्यायें कराकर, सुरक्षाबलों का नाजायज, गैरकानूनी इस्तेमाल कर, दंगे और  सामूहिक कत्ले आम तक करा देते हैं।

किसी भी आम आदमी को नक्सली, माआवादी, आतंकवादी या उग्रवादी का ठप्पा लगाकर जबरन मुजरिम बना लेते हैं। आज तो यही देश की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी हैं, व सबसे बड़ा सवाल भी। असल में मौजूदा भारतीय राजनीति में सब कुछ जायज है और सब कुछ क्षम्य। दिन रात झूठ बोलें फिर तुरत बदल जाऐं कहें क़ि उनकी बात को गलत तरीके से तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है। चौराहे पर जाकर किसी को भी झूठे ही बदनाम कर दें और फिर माफी मांग लें तो आपका अपराध माफ। माफी मांगने से किया गया अपराध ‘न किया हुआ’ हो जाता है। यह सब ऐसा ही है जैसे कि आप पापकर्म भी करिए और गंगास्नान करके उस पाप से मुक्त भी हो जाइए। असल में हमारी प्रदूषित और भ्रष्ट चुनावी दौड़ को पैसा चलाता है जैसे रेस के घोड़े को पैसे का पर्याय माना जाता है।

वर्तमान में चल रहे ‘ग्रेट इंडियन पॉलिटिकल सर्कस’ में छुटभैया नेता, जनसेवक, बड़े नेता और उनकी अपनी-अपनी पार्टियां चुनावों के लिए पैसा जुटाती हैं क्योंकि पैसा जुटाने का इससे बेहतर समय और क्या हो सकता है? फिर सत्ता में आने पर पांच वर्षों तक अकूत कमाई का जरिया बनता है, विपक्ष में रहने पर भी कुछ तो हाथ लग ही जाता है। यूं तो सरकार ने गत वर्षों में पार्टी के पैसों को विनियमित करने के लिए विधेयक लाने का प्रयास किया ताकि चुनावों के दौरान और अन्य समय में पार्टी के व्यय तथा उनके वितरण पर नजर रखी जा सके और इस राशि का नियमित लेखा-जोखा बनाया जा सके और उन लेखाओं को लेखा परीक्षा के लिए उपलब्ध कराया जा सके। यदि पार्टियां अपनी चुनाव विवरणी में इसकी गलत जानकारी देती हैं तो उनकी मान्यता समाप्त करने की धमकी भी दी गई किन्तु इस सबके बावजूद चुनावों की लागत बढ़ती गई।

यदि चुनाव के वित्त पोषण के लिए पारदर्शी प्रणाली होती है तो इससे सबसे बड़ा नुक्सान नेताओं को होगा और सबसे बड़ा लाभ आम लोगों को होगा। जब तक यह सुनिश्चित नहीं किया जाता है कि चुनाव के लिए पैसा कानूनी स्रोतों से प्राप्त हुआ है तब तक चुनावों में काले धन और निहित स्वार्थों के कुप्रभाव को कम करने की आशा नहीं की जा सकती है। राजनीति और उद्योगों के बीच घनिष्ठ संबंध हैं। कम्पनियों द्वारा दिया गया दान पार्टियों को चुनावों के लिए मिली राशि का एक अंशमात्र है। आज पार्टियां एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की तरह कार्य करती हैं और उनके धन के स्रोत रहस्यमय हैं। ऐसी स्थिति में एक अच्छे जन प्रतिनिधि का चुनाव बहुत ही मुश्किल है तब मास्टर एंड फॉलोवर की गहरी पैठी मानसिकता से आम जान को निजात कैसे मिल सकती है? हमारे इस असंगत लोकतंत्र को अब इस व्याधि से मुक्त किया जाना आवश्यक ही नहीं अपरिहार्य है।

 

शैलेन्द्र चौहान। संपर्क : पी-1703, जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स, प्लाट न. 12 ए, अहिंसा खंड, इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद – 201014 (उ.प्र.), मो.न. 07838897877

भगाणा पीड़ितों की लड़ाई देश में उत्‍पीड़न से मुक्ति की लड़ाई में तब्‍दील होः स्‍वामी अग्निवेश

नई दिल्‍ली: भगाणा सामूहिक बलात्‍कार पीड़ितों के लिए गुरूवार (24 अप्रैल) को जंतर-मंतर पर कैंडिल मार्च का अयोजन किया गया। मार्च में बड़ी संख्‍या में महिला संगठनों के लोग, जेएनयू के छात्र व बुद्धिजीवियों समेत लगभग 50 सामाजिक संगठनों के लोगों ने भाग लिया। मार्च के पूर्व आयोजित सभा में 27 अप्रैल को गृह मंत्री सुशील शिंदे के आवास का घेराव का फैसला लिया गया। कार्यक्रम के आयोजको ने इसके लिए दिल्‍ली के अलावा विभिन्‍न प्रदेशों के जागरूक व संवेदनशील लोगों को भी दिल्‍ली पहुंचने का आह्वन किया है।

 
सभा को संबोधित करने आये स्‍वामी अग्निवेश ने संघर्ष के लिए दिल्‍ली के लोगों के इतनी बड़ी संख्‍या में जुटने को लेकर हर्ष प्रकट करते हुए कहा कि यह लड़ाई इस देश में उत्‍पीड़न से मुक्ति की लड़ाई में तब्‍दील हो सकती है। जेएनयू के प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने सामुहिक बलात्‍कार की इस घटना को बेहद खौफनाक बताते हुए कहा कि न्‍याय यह लडाई लंबी चलेगी, लेकिन कोई कारण नहीं है कि इसमें हमें सफलता न मिले। जेएनयू के ऑल इंडिया बैकवर्ड स्‍टूडेंट फोरम के अध्‍यक्ष जितेंद्र यादव ने अन्‍ना हजार के आंदोलन से इसकी तुलना करते हुए कहा कि उनका उद्देश्‍य आरंभ से ही राजनीतिक था, लेकिन आज देश का दलित-पिछड़ा समुदाय आज यहां राजनीति के लिए नहीं बल्कि न्‍याय की गुहार लगाने के लिए जुटा है। जेएनयूएसयू के अध्‍यक्ष अकबर चौधरी ने कहा है जेएनयू के छात्र-छात्राएं इस आंदोलन को कतई झुकने नहीं देंगे।

 

संपर्क: जितेंद्र यादव #09716839326, जगदीश काजला #09812034593

राजनीति का नया ‘अभिषेक’

आसान जीत की ओर बढ़ रहे अभिषेक सिंह का राजतिलक लगभग तय है लेकिन इसके बाद खुद को साबित करने की चुनौती मुंहबांये खड़ी है. अब तक राजनांदगांव से खुद को दाँव पर लगाने वालों की सच्चाई यह है कि राजनीतिक रोटियां सेंकने के सिवाय वे कोई खास चमत्कार नहीं कर सके अत: परिवार से लेकर जनता-जनार्दन तक में आशा की यह डोर बंधी है कि शुक्ल-युग का अवसान होने के बाद देश के राजनीतिक-शीर्ष पर युवा छत्तीसगढिय़़ा की जो कमी राज्य महसूस कर रहा है, अभिषेक इसे भरने में कामयाब होंगे, ठीक राहुल गांधी, सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह.

जादुई स्पर्श लिए मुस्कान और अदाभरी शालीन चुप्पी के साथ अभिषेक सिंह जब चुनाव-प्रचार के लिये घर से निकलते हैं तो छह फीट से अधिक की काया वाले इस शख्स से हाथ मिलाने को लोग बेताब हो उठते हैं. बुढ़ापा ओढ़े दो शख्स के बीच खड़ी एक नन्हीं बिटिया के सर पर बाबा हाथ फेरते हैं और बुजुर्गों से कहते हैं, 'इस क्षेत्र की सेवा करना चाहता हूं. आपका आर्शीवाद चाहिये. जोश से भरी युवाओं की टोली नारे लगाती है और काफिला आगे बढ़ जाता है. लेकिन कांगे्रस-जोकि विपक्षी चुनौती के तौर पर सामने है-के झण्डे-बैनर देखना मुश्किल पड़ रहा है. इसकी वजह साफ करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता कहते हैं, 'जनमत का दबाव या सत्ता के लोभ का असर कह लीजिये, विद्रोह और विरोध की हर चिंगारी जलने से पहले ही बुझ गई.

लेकिन राजा-रजवाड़ों के प्रभुत्व वाले इस शहर में ऐसा कब नहीं हुआ? सत्ता का तो चरित्र ही यही है. क्षेत्र का संसदीय इतिहास गवाह है कि राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह से लेकर रानी पद्मावती देवी, शिवेंद्र बहादुर सिंह, मोतीलाल वोरा, राजा देवव्रत सिंह, डॉ. रमनसिंह और मधुसूदन यादव तक में मात्र यादव ही तो थे जो महल बनाम हल की लड़ाई जीतकर संसद पहुंचे और अब यह नारा कांग्रेस प्रत्याशी कमलेश्वर वर्मा लगा रहे हैं. अभिषेक पर अप्रत्यक्ष प्रहार करते हुए वे कहते हैं, 'मतदाता चाहकर भी महल के प्रत्याशी (अभिषेक सिंह) से नहीं मिल पायेंगे. अभिषेक इसके जवाब में मौन साध लेते हैं.

पन्द्रह लाख से ज्यादा की आबादी वाले राजनांदगांव लोकसभा में चुनावी बिसात सज चुकी है. हाथों में मुद्दे और आरोपरूपी तलवार के साथ मोहरे मैदान में हैं और पार्टी के दिगगज रणनीतियों के साथ एक-दूसरे को धराशायी करने में लगे हैं. तस्वीर साफ है कि गुजरे विधानसभा में भाजपा और कांग्रेस चार-चार सीटें जीतकर बराबरी पर रही थीं और यदि कांग्रेस ने वर्तमान की तुलना में मजबूत प्रत्याशी उतारा होता तो अभिषेक को गहरी चुनौती से जूझना पड़ता लेकिन अब खुला खेल फर्रूखाबादी हो चला है. राजनीतिक पंडितों का आंकलन है कि जब प्रदेश की राजनीति में नई जमात दहाड़ रही है तब अभिषेक ने धमाकेदार एण्ट्री मारी है.

लडखड़़ाहटों के साथ ही सही, अभिषेक ने अपने राजनीतिक कैरियर की शानदार शुरूआत की है. कुछ अभिषेक को पैराशूट कैंडीडेट मान रहे हैं मगर वे गफलत में हैं. विरोधी तर्क देते हैं कि उनका कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है और सिर्फ एक ही योगयता है कि वे मुख्यमंत्री के सुपुत्र हैं. इसे बचाव में वरिष्ठ पत्रकार विजय कानूगा कहते हैं, 'ऐसे लोगों के लिये सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को याद करना चाहिये जिन्होंने कम अनुभव के बावजूद पिता की विरासत संभाली और राजनीति में सफल हुए. आप देखिएगा, अभिषेक की जीत एक लाख से ज्यादा मतों से होगी.

दरअसल राजनांदगांव लोकसभा क्षेत्र पर बाबा की नजर तीन साल पहले लग गई थी. सीट तय होने के बाद मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह के सलाहकार विवेक सक्सेना को वहां का प्रभार सौंपा गया जिन्होंने दिन-रात एक करके स्थानीय समीकरणों को साधा, रास्ते की रूकावटों को साफ किया, असंतुष्टों को मनाया और सरकारी मशीनरी को झोंकते हुए विकास की गंगा बहा दी. इलाका चमन हो चुका है और यहां के सडक़ मार्ग से गुजरते वक्त आप इसका नजारा बखूबी देख सकते हैं.

गुजरे विधानसभा चुनाव में बाबा की नेतृत्व-क्षमता को परखने का वक्त था सो पर्दे के पीछे रखते हुए उन्हें राजनांदगांव सीट का चुनाव संचालक बनाया गया. पूरे दो महीने तक अभिषेक ने जिस सूझबूझ से चुनाव संचालन किया और पिताश्री को पैंतीस हजार से ज्यादा की लीड से विजयश्री का वरण कराया, उसने भाजपा संगठन, आम आदमी और पिता का दिल जीत लिया. इस सफलता के बाद इस बात पर मुहर लग गई थी कि अगला लोकसभा चुनाव अभिषेक ही लड़ेंगे. ऐसा नहीं है कि वर्तमान सांसद मधुसूदन यादव की टिकट काटने से पार्टी और संगठन में खदबदाहटें नहीं हुईं लेकिन उसे जादू की झप्पी के साथ बेहद खामोशी से दफन कर दिया गया. सुना है कि इस कुर्बानी के बदले मधुसूदन को लालबत्ती से नवाजते हुए युवा आयोग का अध्यक्ष बनाया जा सकता है.

अब जबकि अभिषेक सांसद बनने की ओर हैं तब एक बड़ा सवाल जेहन में यह है कि वे लम्बी राजनैतिक पारी खेलेंगे या देवव्रत सिंह और मधुसूदन यादव जैसे युवा चेहरों की तरह अगले चुनाव तक फुस्स हो जायेंगे. अंचल का दुर्भागय कह लीजिये कि राजपरिवार के आश्रय में पल-बढ़ रहा राजनांदगांव आज भी देश में पहचान के लिये मोहताज है. अगले पांच साल बाद तय होगा कि बाबा ने खुद का राजनैतिक धरातल किस कदर मजबूत किया है? फिलहाल भाजपा और कांग्रेस के संसदीय फलक पर जो युवा चेहरे जमे हैं, उनमें तरूणाई तो गायब सी हो गई है. भाजपा के दिनेश कश्यप, कांग्रेस के देवव्रत सिंह और कुछ हद तक दुर्ग की सरोज पाण्डे को छोड़ दें तो अभिषेक सिंग के रास्ते में ज्यादा अवरोध नहीं है. वे अपने पिता की तरह ही छुपे रूस्तम साबित हो सकते हैं क्योंकि सियासी शालीनता और परिपक्वता के मुकाबले अभिषेक सबसे बीस ही नजर आते हैं. मगर फिर भी बाबा को जंग खाई मुरझाई सोच को तिलांजलि देकर आगे बढऩा होगा. पिता का आभामण्डल-जो इनके इर्द-गिर्द बना है-को तोडक़र खुद की देशव्यापी छवि बनाने की चुनौती है. मन में आशा के फूल खिले हैं कि अभिषेक उस शून्य को जरूर भरेंगे जो शुक्ल-युग के अवसान के बाद देश की राजनीति में छत्तीसगढ़ के लिये पैदा हो गया है. हमारी शुभकामनाएं साथ हैं.

 

लेखक अनिल द्विवेदी राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।

संजीव श्रीवास्तव जी फोकस न्यूज़ की गलतियों पर ध्यान दीजिए

हिन्दी न्यूज चैनलों में गुणवता और स्क्रीन एलर्टनेस में गिरावट दिखना अब आम हो गया है। मसलन, थके हुए विजुअल्स, हेडलाइन्स कुछ और हेडलाइन्स-विजुअल्स कुछ और। कामचलाऊ शब्दों का उपयोग। एंकरिंग का मतलब बिना किसी भाव भंगिमा के सिर्फ टीपी पढ़ना। ग्राफिक्स पैकेजिंग में भारी झोल आदि-आदि। सिर्फ एक-दो चैनलों को छोड़ गुणवत्ता में ऐसी गिरावट सभी चैनलों की स्क्रीन पर आमतौर पर देखने को मिल जाती है। मैं हमेशा चैनलों को वॉच करता रहता हूं और जहां गलतियां दिख जाती हैं वहीं पर मेरी आंखें रुक जाती हैं।

फोकस न्यूज को वॉच कर रहा था। टेक्सट प्लेट पर चल रहा टेक्सट वकील साहब के फोनो प्लेट के पीछे जाकर छिप जा रहा था। इतना ही नहीं कहीं संवैधानिक तो कहीं संविधानिक लिखा आ रहा था। अक्सर ऐसी गलतियां तभी होती हैं जब आपकी टीम गंभीर और एलर्ट की अवस्था में बिल्कुल नहीं हो और मार्गदर्शन करने वाले की पैनी नजर स्क्रीन पर नहीं हो।

मैं कोई आलोचना नहीं कर रहा हूं, बल्कि हिन्दी चैनलों के प्रति मेरा आत्मिक लगाव रहा है। संजीव श्रीवास्तव जी को मैं नहीं जानता, मगर उनका नाम गंभीर पत्रकारिता करने वालों में शुमार किया जाता है और इस लिहाज से मुझे उनके प्रति एक सम्मानभाव भी है और इसी भावना से मेरी उनसे गुज़ारिश भी है कि स्क्रीन पर जा रही गलतियों पर ध्यान दें।

 

एक दर्शक द्वारा भेजा गया पत्र।

मजीठिया से बचने के लिए फॉर्म पर कर्मचारियों के दस्तखत ले रहा पंजाबी जागरण प्रबंधन

दैनिक जागरण समूह के पंजाबी जागरण अखबार के कर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड भूल जाने के लिए बोल दिया गया है। सूचना  है कि आज (शुक्रवार) सभी रिपोर्टरों और कर्मचारियों को एक फॉर्म पर दस्तखत करने के लिए हेड ऑफिस जालंधर बुलाया गया है। जागरण के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि पंजाब में कोई भी अखबार मजीठिया वेज बोर्ड नहीं देगा इसलिए पंजाबी जागरण के कर्मचारी भी किसी खुशफहमी में न रहें।

कुछ कर्मचारियों ने जब पंजाबी जागरण के संपादक से कहा कि वेज बोर्ड देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश है, तो संपादक का जवाब था- अरे गुस्सा ना करो। सुप्रीम कोर्ट और प्रेस कौंसिल सब जगह इन्हीं के बंदे बैठे हैं। बस एक दो हफ्ते का शोर शराबा है, उसके बाद सब ठंडा पड़ जाएगा।

 

भड़ाक को भेजे गए पत्र पर आधारित।

लोकसभा चुनाव में हो रहे अपार सम्मान से पत्रकारों के छलक आए आंसू

फर्रुखाबाद व कन्नौज में 2 दिग्गज चुनाव के मैदान में हैं। एक हैं विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद तो दूसरी हैं उप्र के मुख्यमंत्री की पत्नी डिंपल यादव। फर्रुखाबाद व कन्नौज के पत्रकार बड़ी उम्मीद के साथ चुनाव में लगे पड़े थे की कुछ न कुछ तो बड़ा मिलेगा। फर्रुखाबाद के हालत तो बड़े ही मजेदार थे ज्यादातर पत्रकार सोंच रहे थे किसी भी प्रत्याशी ने कुछ किया नहीं है। पिछले 5 साल तक सलमान ने भी कुछ नहीं किया तो अब चुनाव में जरूर कुछ न कुछ मिलेगा। वहीं फर्रुखाबाद में जब चुनाव के एक दिन रह गया तो फिर क्या सलमान खुर्शीद ने जिले के चुनिंदा वरिष्ठ पत्रकारों को माइक्रोमैक्स का एक मोबाइल दे दिया। डिब्बा पैक होने की वजह से पत्रकार बड़े खुश दिखे। खोला तो निकला मंहगा वाला मोबाइल। अब तो फर्रुखाबाद के पत्रकारों के ख़ुशी के आसू रोके नहीं रूक रहे हैं। वहीं कन्नौज में डिम्पल यादव ने सभी वरिष्ठ पत्रकारों को 50000 रूपये के सम्मान ने नवाजा है।

 

फर्रुखाबाद से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।

साथी, भगणा की लड़कियां अब भी आपकी राह देख रहीं हैं!

कल दोपहर में हरियाणा भवन, दिल्‍ली पर भगणा बलात्‍कार पीड़ितों के आंदोलन का बहिष्‍कार करने वाले इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया संस्‍थानों के दफ्तर से शाम को आंदोलनकारियों को फोन आया कि वे आंदोलन का 'बहिष्‍कार' नहीं कर रहे। ख़बर दिखाएंगे। संभवत: उनका फैसला मीडिया संस्‍थानों में खूब पढ़े जाने वाले भड़ास फॉर मीडिया व अन्‍य सोशल साइटस पर इस आशय की खबर प्रसारित होने के कारण हुआ।

जंतर मंतर पर धरना पर अपने परिवार के साथ भगाणा की दलित लडकियां

जानते हैं भागणा के लगभग 100 गरीब दलित परिवरों की इन महिलाओं, पुरूषों, बच्‍चों के साथ दिल्‍ली पहुंचने के पीछे क्‍या मनोविज्ञान रहा है? उन्‍हें लगता है कि यहां का मीडिया उनका दर्द सुनाएगा और दिल्‍ली उन्‍हें न्‍याय दिलाएगी। उन्‍होंने निर्भया कांड के बारे सुन रखा है। उन्‍हें लगा कि उनकी बच्चियां को भी दिल्‍ली पहुंचे बिना न्‍याय नहीं मिलेगा। यही कारण था कि वे अपनी किशोरावस्‍था को पार कर रही गैंग-रेप पीड़ित चारों लड़कियों को साथ लेकर आए। अन्‍यथा चेहरा ढक कर घर से बाहर निकलने वाली इन महिलाओं को अपनी बेटियों की नुमाईश के कारण भारी मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ रहा है।

जानता हूं, ऊंची जातियों में पैदा हुए मेरे पत्रकार साथी एक बार फिर कहेंगे कि हमने तो उनकी खबर नहीं रोकी। इस आंदोलन में जितनी भीड़ थी, उसके अनुपात में उन्‍हें जगह तो दी ही।

लेकिन साथी! क्‍या आपका दायित्‍व इतना भर ही है? क्‍या खबर का स्‍पेस सिर्फ भीड़ और बिकने की क्षमता पर निर्भर करना चाहिए? क्‍या मीडिया का समाज के वंचित तबकों के प्रति कोई अतिरिक्‍त नैतिक दायित्‍व नहीं बनता? क्‍या अपनी छाती पर हाथ रख कर आप बताएंगे कि अन्‍ना आंदोलन के पहले ही दिन जो विराट देश व्‍यापी कवरेज आपने दिया था, उस दिन कितने लोग वहां मौजूद थे? क्‍या निर्भया की याद में कैंडिल जलाने वालों की संख्‍या कभी भी भगाणा के आंदोलनकारियों से ज्‍यादा थी?

जब भगणा के आंदोलनकारियों को धरने पर बैठे चार दिन हो गये और आपने कोई कवरेज नहीं दी तो उन्‍हें लगा कि शायद निर्भया को न्‍याय जेएनयू के छात्र-छात्राओं के आंदोलन की वजह से मिला। वे 19 अप्रैल को जेएनयू पहुंचे और वहां के छात्र-छात्राओं से इस आंदोलन को अपने हाथ में लेने के लिए गिड़गिड़ाए। 22 अप्रैल को जेएनयू छात्र संघ (जेएनएसयू) ने अपने पारंपरिक तरीके के साथ जंतर-मंतर और हरियाणा भवन पर जोरदार प्रदर्शन किया। लेकिन क्‍या हुआ? कहां था 'आज तक', 'एवीपी न्‍यूज', 'एनडीटीवी'? सबको सूचना दी गयी, लेकिन पहुंचे सिर्फ हरियाणा के स्‍थानीय चैनल, और उन्‍होंने भी आंदोलन के बहिष्‍कार की घोषणा कर आंदोलनकारियों के मनोबल को तोड़ा ही।

साथी, चुनाव का मौसम है। हरियाणा में कांग्रेस की सरकार है। भगाणा के चमार और कुम्‍हार जाति के लोग पिछले दो साल से जाटों द्वारा किये गये सामाजिक बहिष्‍कार के कारण अपने गांव से बाहर रहने को मजबूर हैं। धनुक जाति के लोगों ने बहिष्‍कार के बावजूद गांव नहीं छोड़ा था। यह चार बच्चियां, जिनमें दो तो सगी बहनें हैं, इन्‍हीं धुनक परिवारों की हैं, जिन्‍हें एक साथ उठा लिया गया तथा इनके साथ दो दिन तक लगभग एक दर्जन लोग इनके साथ गैंग-रेप करते रहे। यह सामाजिक बहिष्‍कार को नहीं मानने की खौफनाक सजा थी। एफआईआर, धारा 164 का बयान, मेडिकल रिपोर्ट आदि सब मौजूद है। ऐसे में, क्‍या यह आपका दायित्‍व नहीं था कि आप कांग्रेस के बड़े नेताओं से यह पूछते कि आपके राज में दलित-पिछड़ों के साथ यह क्‍या हो रहा है? किस दम पर आप दलित-पिछडों का वोट मांग रहे हैं?

आप मोदी के 'पिछड़ावाद' की लहर पर सवार भाजपा के वरिष्‍ठ नेताओं की बाइट लेते कि पिछले चार-पांच सालों से हरियाणा से दलित और पिछड़ी लड़कियों के रेप की खबरें लगातार आ रही हैं लेकिन इसके बावजूद आपकी राजनीति सिर्फ जाटों के तुष्टिकरण पर ही क्‍यों टिकी हुईं हैं? आप अरविंद केजरीवाल से पूछते कि भाई, अब तो बताओ कौन है आपकी नजर में आम आदमी? अरविंद केजरीवाल तो उसी हिसार जिले के हैं, जहां यह भगणा और मिर्चपुर गांव है। लेकिन क्‍या आपने कभी 'आम आदमी पार्टी' को हरियाणा के दलितों से लिए आवाज उठाते देखा। जबकि उनके हरियाणा के मुख्‍यमंत्री पद के संभावित उम्‍मीदवार योगेंद्र यादव यह कहते नहीं थकते कि दिल्‍ली में उन्‍हीं सीटों पर उनकी पार्टी को सबसे अधिक वोट मिले जहां गरीबों, दलितों और पिछड़ों की आबादी थी। आप क्‍यों नहीं उनसे पूछते कि दलित-पिछड़ों के वोटों का क्‍या यही इनाम आप दे रहे हैं? बात-बात पर आंदोलन करने वाला दिल्‍ली का आपका कोई भी विधायक क्‍यों जंतर-मंतर नहीं जा रहा? क्‍यों आपने महान प्रोफेसर आनंद कुमार ने जेएनयू में 19 अप्रैल को इन लड़कियों को न्‍याय दिलाने के लिए बुलायी गयी सभा में शिरकत नहीं की, जबकि उन्‍हें बुलाया गया था और वे वहीं थे।

साथी, अब भी समय है। भगणा की दलित बच्चियां जंतर-मंतर पर अब भी आपकी राह देख रही हैं।

 

(प्रमोद रंजन की फेसबुक वॉल से)

 

एबीपी न्‍यूज़ के घोषणा पत्रः ‘लगे रहो नमो भाई आरएसएस’

एबीपी न्‍यूज के घोषणा पत्र में 'लगे रहो नमो भाई आरएसएस' कुछ खास बातेंः

1. व्‍यंग और विनोद जीवन से खत्‍म हो गया तो जीवन कहां रह जाएगा।
मतलब
– चुनावी रैलियों पर शहजादा व जीजा की बात कही जा रही है केवल व्‍यंग व विनोद के भाव से कही जा रही है।

2. शरद पावर से ही नहीं, बल्‍कि मेरी लालू प्रसाद से भी अच्‍छी दोस्‍ती है, लेकिन वैचारिक मतभेद हो सकते हैं।
मतलब
– आप घोटालेबाजों को, यूपीए सरकार में शामिल सहयोगियों को दोस्‍त बना सकते हैं, लेकिन सत्‍ता लेने की बात आएगी तो जनता को उनके खिलाफ फुसलाकर सत्‍ता छीनना चाहेंगे। ऐसे दाउद से भी दोस्‍ती की जा सकती है, वैचारिक मतभेद अलग रखकर।

3.घोषणा पत्र प्रोग्राम के प्रारूप को तोड़ा गया, केवल तीन प्रश्‍न पूछने वाले दिखायी पड़े, वहां से पत्रकारों, बुद्धिजीवियों का जमवाड़ा गायब ?
मतलब
– नरेंद्र मोदी जनता के सवालों के जवाब देने से डरते हैं, या यह भी इंटरव्‍यू शर्तों के आधार पर दिया गया।

4. आक्रामक रवैया केवल रणनीति का हिस्‍सा
मतलब – मतलब, जनता को मूर्ख बनाने के लिए तीन महीनों की लम्‍बी फिल्‍म। फिल्‍म खत्‍म होने के बाद अमिताभ बच्‍चन, धर्मेंद्र, अमजद खान, संजीव कुमार एक साथ एन्‍जॉय करते हैं। 'लगे रहो नमो भाई आरएसएस'।

 

लेखक कुलवंत हैप्‍पी युवारॉक्‍स डॉट कॉम के संचालक हैं। वे दैनिक जागरण, पंजाब केसरी दिल्‍ली, सीमा संदेश, वेबदुनिया, याहू, जानो दुनिया न्‍यूज चैनल समेत की बड़े मीडिया समूहों के साथ अलग अलग पदों पर कार्य चुके हैं। संपर्कः 9904204299

मजीठिया का लाभ न मिलने से निराश दैनिक भास्कर ग्रुप के एक मीडियाकर्मी का पत्र

दैनिक भास्कर ग्रुप में पिछले एक वर्ष से काम कर रहे एक साथी ने मेल लिख कर भड़ास से अपनी पीड़ा साझा की है। एमबीए डिग्रीधारी और साढ़े तीन वर्षों का तजुर्बा रखने वालो इस साथी को मात्र 11200/- रुपए मिलते हैं जबकि उसने एमबीए की पढ़ाई के लिए बड़ा लोन भी लिया था। उसे बड़ी उम्मीद थी कि मजीठिया लागू होगा और उसके वेतन में बढ़ोत्तरी होगी। लेकिन सभी कुछ उसकी उम्मीदों के विपरीत हो रहा है। पढ़िए भड़ास को भेजा गया पत्रः

Dear,

As you are aware that big media houses like-Hindustan (Hindi), Punjab Kesari etc. are generating specific methods to escape from huge monetary loss.

Giant media groups like-Dainik Bhaskar, Rajasthan Patrika had created parallel agencies and most of employees are not on the pay role of Dainik Bhaskar, Patrika etc. while these employees are working under these agencies as per legal considerations.So, if any person file a writ against these news papers, will be defeated by law.

This is such an insane.Its totally harassment of talents, while such groups generate good profits by these talents.

I am working with Dainik Bhaskar Group from last one year and have total 3.5 years of work experience, also have done MBA from top institute of Bangalore where my salary is surprising (It's only Rs. 11200/- monthly) which is not even sufficient monthly expanses for me alone.I am carrying big compromise, taken edu loan of Rs. 6300000 for MBA.You know, I have achieved my yearly target in first 2 quarters which is approx. 50 times of my salary and now on a growth of 100+% even after excellent growth i have nothing as appreciation and motivation.But still I have to continue my job here.What to do????

See, I just wanted to give you a situation that what is ground realty about such big groups where front line employees get pissed.

Thank you

 xyz


पत्र भेजने वाले ने अपना नाम न प्रकाशित करने का अनुरोध किया है.

बंद होगा भास्कर समूह का ‘डीएनए’ अख़बार, कर्मचारियों के सामने रोज़ी का संकट

इंदौर। दैनिक भास्कर समूह का इंग्लिश अख़बार डीएनए 29 अप्रैल को बंद होने जा रहा है। ऐसे में 54 कर्मचारियों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। डीएनए के अचानक बंद करने का कारण स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है। सूत्रों के अनुसार हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मजीठिया लागु किया जाना इसका भी एक कारण हो सकता है।

डीएनए इंदौर की शुरुवात जून 2011 में हुई थी। पिछले महीने ही करीब 20 से अधिक कर्मचारियों ने विभिन्न विभागों में जॉइनिंग की थी, जिसमे भोपाल, जयपुर, दिल्ली और बेंगलुरु के लोग शामिल है। कुछ लोग तो भास्कर मैनेजमेंट को देखते हुए परिवार सहित इंदौर में बस गए थे और कुछ किसी तरह किराये के मकान में रहकर गुजर बसर कर रहे थे। ऐसे में डीएनए इंदौर का बंद होना यहाँ के कर्मचारियों के भविष्य के लिए चिंता का विषय है। यहाँ के कर्मचारियों में भास्कर मेजमेंट के प्रति भरी आक्रोश है।

सूत्रों के अनुसार डीएनए के जयपुर और अहमदाबाद संस्करण भी बंद हो सकते हैं।

 

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।
 

नवीन जिन्दल ने मुख्य चुनाव आयुक्त से की ज़ी न्यूज़ के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की शिकायत

नई दिल्ली, 23 अप्रैल। कुरुक्षेत्र से 16वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी नवीन जिन्दल ने जी न्यूज, उसके चेयरमैन सुभाष चंद्रा और भारतीय जनता पार्टी के कुरुक्षेत्र से प्रत्याशी राजकुमार सैनी के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व कानून, आदर्श चुनाव आचार संहिता और भारतीय दंड संहिता का घोर उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। जिन्दल ने कहा है कि जी न्यूज ने प्रचार की अवधि समाप्त होने के बाद भी उनके खिलाफ मनगढ़ंत खबरें खूब चलाईं। इस चैनल के चेयरमैन सुभाष चंद्रा ने भाजपा प्रत्याशी राजकुमार सैनी के लिए मंच से वोट मांगे और मेरे एवं मेरी पार्टी कांग्रेस के खिलाफ दुष्प्रचार में जी मीडिया के सभी चैनलों का इस्तेमाल किया। अपने तथ्यों के पक्ष में सभी प्रमाण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने जी मीडिया, चेयरमैन सुभाष चंद्रा और भाजपा प्रत्याशी राजकुमार सैनी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

 
नवीन जिन्दल ने आज निर्वाचन सदन में मुख्य निर्वाचन आयुक्त वी. सम्पत से मुलाकात कर उन्हें 7 पेज का शिकायतपत्र सौंपा और प्रमाण दिया कि 10 अप्रैल को हुए कुरुक्षेत्र संसदीय क्षेत्र के चुनाव में जी मीडिया के चैनलों और भाजपा प्रत्याशी राजकुमार सैनी ने मिलकर तमाम कायदे-कानून ताक पर रख दिए। उन्होंने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (3ए), 123 (4), 125, 126, 130 व भारतीय दंड संहिता की धारा 171 जी, 171 एच और 505 (2) के साथ-साथ आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन कर चुनाव जैसी महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था का मखौल उड़ाया। जी मीडिया के चैनलों द्वारा मेरे खिलाफ अभियान छेड़ दिया गया और चुनावी कायदे-कानून को ताक पर रखकर बेशुमार बेसिर-पैर की खबरें प्रसारित की गईं। जिन्दल ने कहा कि वह जी मीडिया के खिलाफ 18 मार्च को भी शिकायत दाखिल कर चुके हैं और उसकी अलोकतांत्रिक हरकतों से चुनाव आयोग को अवगत करा चुके हैं। उन्होंने कहा कि जी समूह मीडिया कारोबार की आड़ में मुझसे और मेरी कंपनी जेएसपीएल से 100 करोड़ रुपये की नाजायज वसूली की कोशिश में एक स्टिंग ऑपरेशन में पकड़ा गया है जिस कारण वह मेरी छवि खराब करने पर तुला हुआ है और नियमित रूप से मेरे खिलाफ मनगढ़ंत और बेबुनियाद खबरें चला रहा है। इस मामले में दिल्ली पुलिस ने जी न्यूज के संपादकों और चेयरमैन सुभाष चंद्रा के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल कर दिया है।
 
नवीन जिन्दल
ने शिकायतपत्र में लिखा है कि सुभाष चंद्रा ने 1 अप्रैल को इनेलो प्रत्याशी बलबीर सैनी के समर्थन में प्रचार किया लेकिन 3 अप्रैल को वह भाजपा प्रत्याशी राजकुमार सैनी के मंच से वोट की अपील करते नजर आए। सुभाष चंद्रा ने हरियाणा के अन्य क्षेत्रों में भी भाजपा के लिए प्रचार किया और उनकी पूरी कवरेज जी मीडिया के चैनलों ने की। इसके अलावा उन्होंने प्रेस नोट जारी कर भाजपा के लिए वोट भी मांगे जो सीधे-सीधे पेड न्यूज के दायरे में नजर आता है।
 
जिन्दल
ने आरोप लगाया कि जी मीडिया के चैनलों ने आईबीएसपी प्रत्याशी कांता आलडिय़ा का वह संवाददाता सम्मेलन 5 अप्रैल को करीब 25 बार दिखाया जिसमें उनके खिलाफ बेबुनियाद आरोप लगाए गए थे। इसके प्रसारण में तथ्यों की पड़ताल भी नहीं की गई। इसी तरह 7 अप्रैल को कांता आलडिय़ा के आरोप बिना जांच-पड़ताल किए 29 बार प्रसारित किए गए।  

जिन्दल ने आयोग से मांग की कि वह जी मीडिया और राजकुमार सैनी की दुरभिसंधि की विस्तृत जांच कराए क्योंकि 8 अप्रैल को प्रचार की समय सीमा समाप्त होने के बाद भी जी मीडिया के चैनलों ने कांग्रेस पार्टी और उनके खिलाफ मनगढ़ंत व बेबुनियाद खबरों का अभियान चलाए रखा और 32 मिनट 28 सेकंड का कार्यक्रम मेरे खिलाफ प्रसारित किया। इनके पीछे मुख्य मकसद कुरुक्षेत्र के मतदाताओं की निगाह में मेरी छवि खराब करना था जो चुनाव आचार संहिता का सरासर उल्लंघन है।
 
जिन्दल ने आरोप लगाया कि कुरुक्षेत्र के मथाना और कैथल के चूहड़ माजरा की खबरों से जी न्यूज की दुर्भावना स्पष्ट हो जाती है। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य जताया कि जी मीडिया के रिपोर्टर रवि त्रिपाठी ने उन पर कोयला खान आवंटन मामले में आरोप तय करा दिया जबकि अभी इस मामले में सीबीआई प्राथमिकी दर्ज कर जांच ही कर रही है।

नवीन जिन्दल ने कहा कि 10 अप्रैल को मतदान के दिन जी मीडिया के चैनलों ने लगातार मेरे खिलाफ फर्जी, बेबुनियाद, मनगढ़ंत और मनमाना खबरें चलाईं व दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को भी लंबे समय तक दरकिनार रखा जिसमें कहा गया था कि मेरा पक्ष लिये बगैर जी मीडिया कोई खबर प्रसारित नहीं कर सकता। मेरा पक्ष तब चलाया गया जब मतदान समाप्त होने को था।

जिन्दल ने मुख्य चुनाव आयुक्त से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर जी मीडिया और भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी राजकुमार सैनी के खिलाफ उचित कार्रवाई करने की मांग की है।
 

मजीठिया से बचने के लिए ‘आज समाज’ की चाल, कर्मचारियों से वापस मांगे नियुक्ति पत्र

सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका ख़ारिज होने के बाद मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने से बचने के लिए अखबार मालिक तरह-तरह के टोटके आजमा रहे हैं। इस संबंध में भड़ास पर दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, पंजाब केसरी द्वारा मजीठिया से बचने के लिए की जा रही कोशिशों की खबरें पहले ही प्रकाशित हो चुकीं हैं। अब खबर आ रही है कि 'आज समाज' अखबार भी मजीठिया से बचने के लिए कुछ पैंतरेबाजी कर रहा है। आज समाज ने अपने सभी कर्मचारियों से उनके पुराने नियुक्ति पत्र वापस करने के लिए कहा है। प्रबंधन का कहना है कि इनके स्थान पर नए नियुक्ति पत्र कर्मचारियों को दिए जाएंगे। प्रबंधन द्वारा उठाए गए इस कदम से सभी कर्मचारी सतर्क हो गए हैं।

आज समाज में इन दिनों एक मेल की खूब चर्चा है जिसके माध्यम से सभी कर्मचारी एक-दूसरे को प्रबंधन के नए आदेश के प्रति सतर्क कर रहे हैं। पढ़ें मेलः   

"साथियो ,
              मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतनमान लेने की मुहीम छेड़ दी गई है। प्रबंधन ने पुराने अप्वाइंटमेंट लेटर मांग के नए लेटर देने शुरू कर दिए हैं। आप पुराने लेटर न दें। न ही नए लेटर लें और न ही किसी दस्तावेज में हस्ताक्षर करें।"

 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।

संबंधित खबरेंः

कर्मचारियों को इनपुट-आउटपुट के फेर में फंसा मजीठिया की काट ढूंढ रहा जागरण http://bhadas4media.com/article-comment/18439-dj-input-output-majithia.html

मजीठिया से बचने के लिए अपने पत्रकारों को 'शौकिया-पत्रकार' बना रहा 'हिन्दुस्तान' http://bhadas4media.com/article-comment/19081-hindustan-journos-sign-agreement.html

पंजाब केसरी भी अपने कर्मचारियों से ले रहा 'शौकिया पत्रकारिता'  करने का शपथपत्र http://bhadas4media.com/article-comment/19100-punjab-kesari-taking-affidavits.html

क्या लखनऊ से सपा के लोकसभा प्रत्याशी अभिषेक मिश्रा आईआईएम में प्रोफेसर थे?

लखनऊ से सपा के लोकसभा प्रत्याशी अभिषेक मिश्रा के नाम के आगे 'प्रोफेसर' लिखे पोस्टर, बैनर, पर्चे सभी जगह दिखाई दे रहे हैं। अभिषेक मिश्रा स्वयं को देश की प्रतिष्ठित संस्था आईआईएम अहमदाबाद का भूतपूर्व प्रोफेसर बताते आये हैं। पर हकीकत में अभिषेक मिश्रा आईआईएम अहमदाबाद में कभी प्रोफेसर रहे ही नहीं हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि कैसे अभिषेक मिश्रा सरीखे व्यक्ति जनता के समक्ष झूठे तथ्य रखकर अपने आप को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं और कभी विधान सभा पहुंच जाते हैं तो कभी लोक सभा के प्रत्याशी बनकर वोट मांगते दिखाई देते हैं। सारा सिस्टम मूकदर्शक बना मात्र तमाशा देखता रहता है, पर करता कुछ भी नहीं है।

एक आरटीआई के जवाब में आईआईएम अहमदाबाद से प्राप्त प्रपत्रों के अनुसार अभिषेक मिश्रा 27 फरवरी 2007 से 01 अक्टूबर 2009 तक की अल्प अवधि के लिए आईआईएम अहमदाबाद में असिस्टेंट प्रोफेसर रहे हैं न कि प्रोफेसर। अब सवाल यह है कि जब अभिषेक मिश्रा आईआईएम अहमदाबाद में कभी प्रोफेसर रहे ही नहीं हैं तो लखनऊ में लोकसभा चुनाव में अभिषेक मिश्रा को प्रोफेसर बताने वाले पोस्टर, बैनर, पर्चे बांटना या बंटवाना क्या जनता के साथ की जा रही धोखाधड़ी नहीं है? क्या चुनाव आयोग को इस मामले में अभिषेक मिश्रा को अयोग्य घोषित कर उनके खिलाफ धोखाधड़ी का आपराधिक मामला दर्ज नहीं कराना चाहिए?
 
आईआईएम अहमदाबाद, और उत्तर प्रदेश शासन से सामाजिक कार्यकर्ता और इंजीनियर संजय शर्मा और मेरे द्वारा दायर आरटीआई से प्राप्त प्रपत्रों से अभिषेक मिश्रा की डॉक्ट्रेट डिग्री पर भी संशय उत्पन्न हो रहा है। आईआईएम अहमदाबाद और उत्तर प्रदेश शासन के पास अभिषेक मिश्रा की डॉक्ट्रेट डिग्री नहीं है और चुनाव आयोग ने अभी तक हमारी आरटीआई का जवाब नहीं दिया है।
 
अभिषेक मिश्रा के सम्बन्ध में आईआईएम अहमदाबाद में दायर आरटीआई द्वारा प्राप्त प्रपत्रों से आईआईएम की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह भी लग रहे हैं जो आईआईएम और अभिषेक मिश्रा के मध्य दुरभिसन्धि होने की पुष्टि कर रहे है।

उर्वशी शर्मा
मोबाइल- 9369613513

आरटीआई में प्राप्त प्रपत्रों को डाउनलोड करने के लिए इन वेब लिंक्स पर क्लिक करें:

http://upcpri.blogspot.in/2014/04/rti-by-urvashi-sharma-reveals-abhishek.html

http://upcpri.blogspot.in/2014/04/rti-by-activist-sanjay-sharma-casts.html
 

अमीषा पटेल की कवरेज को गए पत्रकार की जेब कटी

इलाहाबाद: फिल्म अभिनेत्री अमीषा पटेल की कवरेज के लिए पहुंचे वरिष्ठ पत्रकार शिव त्रिपाठी का जेबकतरों ने बटुआ उड़ा दिया। शिव त्रिपाठी एक डेली न्यूज पेपर से जुड़े हैं। सोमवार को वह शाहगंज एरिया में सभा की कवरेज के लिए पहुंचे थे। इस दौरान किसी ने उनकी जेब काट कर बटुआ निकाल लिया। पर्स में कुछ कैश, दो एटीएम कार्ड, पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस था। उन्होंने इस चोरी की रिपोर्ट शाहगंज पुलिस स्टेशन में दर्ज करायी है।

 

माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालयः विद्यार्थियों को नहीं मिली छात्रवृत्ति, कुलसचिव को ज्ञापन

भोपाल 22 अप्रैल। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के विद्यार्थियों ने पिछले 2 वर्षो से छात्रवृत्ति न मिलने के कारण कुलसचिव चंदन सोनाने को ज्ञापन सौंपा। ज्ञात हो कि प्रशासनिक लापरवाहियों के चलते पिछले 2 वर्षो से विश्वविद्यालय के अनुसुचित जाति, अनुसूचित जन जाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों को छात्रवृत्ति नही मिल पायी है। जिसके चलते कई छात्रों अपने शिक्षण कार्य को निरंतर चला पाना संभव नही हो पा रहा है। जिसके कारण आज पूनः कुलसचिव महोदय को छात्रवृत्ति के संबंध में ज्ञापन सौंपा गया इसके पूर्व भी कई बार आवेदन प्रतिवेदन किये जा चुके है। किन्तु छात्रवृत्ति अभी तक किसी छात्र-छात्रा को प्राप्त नहीं हुई है।

कुलसचिव ने ज्ञापन स्वीकार कर आश्वासन दिया है कि जल्द ही सभी आरक्षित वर्गों के विद्यार्थियों तक छात्रवृत्ति पहुंचा दी जायेगी। इस संबंध में छात्रों ने कहा है कि यदि समस्या का समाधान जल्द नहीं किया गया तो छात्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।

भवदीय
खुमेंन्द्र
#9993705564

अनिवार्य मतदान की व्यवस्था पर ज़रूरी है व्यापक बहस

कुछ साल पहले आज की अपेक्षा कम मतदान होता था, इससे चिंतित इंतजामिया ने लोगों को प्रेरित करने के लिए अभियान चलाने प्रारंभ किए। आज सरकार से लेकर हर राजनीतिक दल, हजारों स्वयंसेवी संगठनों सहित मीडिया और बाजारवाद के तमाम मंच लोगों को वोट जरूर डालने के प्रति जागरूक कर रहे हैं। मतदान को राष्ट्र, समाज हित में और पुनीत कर्तव्य बता रहे हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने विगत दिनों अहमदाबाद में कहा है कि चुनाव के बाद केंद्र में उनकी सरकार बनी तो देश में अनिवार्य मतदान की व्यवस्था लागू की जायेगी। उन्होंने सुझाया है कि वोट नहीं देनेवालों को दंडस्वरूप अगले चुनाव में मतदान के अधिकार से वंचित करने की व्यवस्था बनायी जा सकती है।

उल्लेखनीय है कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार एवं गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी अनिवार्य मतदान के पक्षधर हैं। यही क्यों देश में, तमाम विचारक, व्यवस्था के सभी अंगों से जुड़े बहुतेरे लोगों का विचार है कि वोट न देने वाले को कड़ी सजा दी जानी चाहिए।

गुजरात अकेला राज्य है, जहां अनिवार्य मतदान विधेयक को विधानसभा से पारित किया गया है। इससे पहले आडवाणी देश में बहुदलीय संसदीय प्रणाली की जगह अमेरिका की तरह राष्ट्रपति शासन प्रणाली की वकालत भी कर चुके हैं। दूसरी ओर कई विश्लेषकों की राय में आडवाणी का यह विचार ‘मजबूत केंद्र और अनुशासित जनता’ के दक्षिणपंथी सोच से प्रेरित है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए हर मतदाता की राजनीतिक जिम्मेवारी है कि वह अपने मताधिकार का प्रयोग करे, लेकिन अहम सवाल यह भी है कि क्या उसे मतदान के लिए मजबूर किया जाना उचित होगा? इतना ही नहीं, भारत जैसे विशाल राज्य में वोट नहीं देनेवालों की पहचान कर उन्हें दंडित करने की प्रक्रिया काफी जटिल और खर्चीली भी होगी।

धन्नासेठ और उनके परिवार वाले आमतौर पर वोट डालने नहीं जाते। वे मतदान करने को अपनी हेठी समझते हैं। उन्हें लगता है कि वे आम लोग नहीं हैं, वह विशेष लोग हैं। और मतदान करना और अन्य कानूनी प्राविधानों का पालन करना आम आदमी का काम है। आडवाणी या ऐसे ही लोग क्या कुमार मंगलम बिड़ला या ऐसे ही अन्य धन्नासेठों को मतदान न करने पर अदालत में खड़ा देखने का बयान देखने की हिम्मत दिखा सकेंगे? विडंबना देखिये कि उसी सभा में आडवाणी यह भी कहते हैं कि मौजूदा आम चुनाव के परिणाम तो मतदान से पहले ही लोगों द्वारा तय कर दिये गये हैं। ऐसे में उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि जब परिणाम पहले ही तय हो सकते हैं, तो सबको मतदान के लिए मजबूर करने की जरूरत क्या है?

यह आडवाणी की तानाशाही सोच को प्रतिबिंबित करता है। राइट टू रीकॉल का सवाल उठाते ही राजनीतिकों को पसीना आ जाता है। अगर अनिवार्य मतदान की व्यवस्था लागू की जानी जरूरी लगती है तो फिर यह व्यवस्था भी लागू होनी चाहिए कि जो जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र में चुनाव प्रचार के समय किए गये वादे पूरे नहीं करता है, जनभावनाओं की उपेक्षा करता है उसे हटाने की भी व्यवस्था होनी चाहिए। नेता और नेताओं या व्यवस्था को संचालित करने वाली आर्थिक शक्तियों का संकट निरंतर बढ़ रहा है इसलिए वे विभिन्न बहानों से इस व्यवस्था को दुरुस्त बताने का अभियान चलाए हुए हैं और इसे बनाएं रखने के लिए तमाम बहाने बना रही हैं साथ ही जनता को तमाम जकड़बंदियों में डालने के प्रयास में हैं। यही नहीं वे जनता के मन में तमाम तरह के विभ्रम भी पैदा कर रही हैं। येन-केन-प्रकारेण यही व्यवस्था व्यवस्थापकों के लिए मुफीद है और कोई जनपक्षीय व्यवस्था उनके लिए घातक है। तमाम समस्याओं में जकड़ी जनता कहीं इसके खिलाफ विद्रोह न कर दे, इसकी फिक्र व्यवस्था को बहुत अधिक है।

इंटरनेशनल पॉलिटिकल साइंस रिव्यू द्वारा 2011 में 36 देशों में हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक जिन देशों में मतदान अनिवार्य है, वहां औसत मतदान 85.7 फीसदी, जबकि अन्य देशों में 77.5 फीसदी था। मौजूदा आम चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में भी मतदान प्रतिशत में वृद्धि हो रही है। और फिर मतदान में अपेक्षाकृत कम भागीदारी उन्हीं तबकों की हो रही है, जो विकास का अधिक लाभ हासिल कर रहे हैं। ऐसे में लोकतंत्र की खामियों का उपचार कठोर कानूनों से नहीं, बेहतर शासन के जरिये ही हो सकता है। और देश को आजाद हुए सात दशक होने वाले हैं, व्यवस्था और राजनीतिज्ञ अपने काम-काज से जनता को सहमत नहीं कर पाए हैं। इसलिए अनिवार्य मतदान जैसा कोई भी फैसला लेने से पहले इसकी खूबियों एवं खामियों पर राष्ट्रव्यापी बहस जरूरी है। और इस बहस में केवल अनिवार्य मतदान ही नहीं खराब जनप्रतिनिधि को हटाने की भी आसान व्यवस्था हो। जितनी तरह की सीखें जनता को दी जाती हैं उतनी जनप्रतिनिधियों, अफसरों को आखिर क्यों नहीं दी जातीं ? जनता को इस सोचना चाहिए।

 

अयोध्या प्रसाद ‘भारती’, (लेखक-पत्रकार), गदरपुर (ऊधम सिंह नगर) उत्तराखंड। मो. 09897791822
 

चुनावों के पीछे की चालबाज़ियां: आनंद तेलतुंबड़े

मौजूदा चुनावी प्रक्रिया, इसके जातीय पहलू और जनता के हितों के अनुकूल एक मुनासिब चुनावी प्रणाली के विकल्पों पर आनंद तेलतुंबड़े का विश्लेषण. अनुवाद: रेयाज उल हक
 
कुछ ही दिनों में सोलहवें आम चुनावों की भारी भरकम कसरत पूरी हो जाएगी. और इसी के साथ भारत के सिर पर लगे दुनिया के सबसे महान कार्यरत लोकतंत्र के ताज में एक और हीरा जड़ जाएगा, जबकि यहां रहने वाले ज्यादातर लोग बेचारगी और छीन ली गई आवाजों के साथ अपने वजूद के संघर्ष में फिर से जुट जाएंगे. लोकतंत्र के कुछ महीने लंबे नाच के आखिर में चुने हुए प्रतिनिधि बच जाएंगे जो अपने करोड़ों के निवेश पर पैसे बनाने के धंधे में लग जाएंगे. इस गरीब देश को चुनावों की इस प्रक्रिया की जो कीमत चुकानी पड़ती है, उसकी तुलना सिर्फ अमेरिका से ही हो सकती है (ऐसा कहा गया है कि भारतीय राजनेता 2012 के पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में खर्च की गई 7 बिलियन डॉलर की राशि के बरअक्स 5 बिलियन डॉलर खर्च करने वाले हैं) और इस पूरी प्रक्रिया में वे सब साजिशें और छल-कपट किए जाते हैं, जिनकी कल्पना कोई इन्सान कर सकता है. जाहिर है कि तब इन सबकुछ को सिर्फ मुट्ठी भर अमीरों के निजाम और अपराधों के जरिए ही कायम रखा जा सकता है. चूंकि हकीकत में ऐसा ही होता रहा है, इसलिए इस पर गौर करना होगा कि भारत की खामियों को तलाशते हुए चुनावों की इस प्रक्रिया की पड़ताल जरूरी है.
 
जनता के साथ धोखा

उदारवादी ढांचे में प्रत्यक्ष लोकतंत्र मुमकिन नहीं है. चुनावों का मकसद लोकतंत्र को चलाने के लिए जनता के प्रतिनिधियों को चुनना है. हालांकि लोगों की पसंद राजनीतिक दलों द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवारों और कुछ निर्दलियों तक सीमित होती है, जिनमें से ज्यादातर तो मुख्य राजनीतिक दलों के चुनावी गुना-भाग में मदद करने के लिए कठपुतली उम्मीदवार के रूप में खड़े होते हैं. यही वजह है कि बिना किसी काम का सबूत दिए, चुनाव दर चुनाव समान लोगों का समूह चुना जाता रहा है. यह पूरी प्रक्रिया [बाकियों के] भीतर दाखिल होने की रुकावट के रूप में काम करती है. मिसाल के लिए, लोक सभा के उम्मीदवार को अधिकतम 75 लाख रुपए खर्च करने की इजाजत है, यह खर्च सिर्फ मुख्यधारा के राजनीतिक दल ही उठा सकते हैं. लेकिन असली खर्च तो इससे कई गुना ज्यादा होता है. अगर चुनावों में कोई भारी पूंजी लगाने का जोखिम उठाता है, तो सैद्धांतिक रूप से इस निवेश पर उसे फायदा भी होना चाहिए. चूंकि इसका [कानूनन] कोई फायदा नहीं है, इसलिए यह अनिवार्य रूप से बढ़ते हुए भ्रष्टाचार के रूप में सामने आता है. इसने राजनीति को टिकटों के बड़े कारोबार में बदल दिया है, जिसमें बेजोड़ मुनाफा है और यह सब लोगों की नजरों से छुपा हुआ होता है. नेता सामंत बन जाते हैं और निर्वाचन क्षेत्र उनकी जागीर, जिसकी किलेबंदी बाहुबल और धनबल से होती है.
 
एक
एनजीओ एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर) के सौजन्य से चुनावों में हिस्सा लेने वाले नेताओं के बारे में जानकारी अब सरेआम है. नेता चुनाव आयोग को जो हलफनामे जमा करते हैं, एडीआर ने उनमें से जानकारियां जुटा कर उन्हें इस तरह पेश किया है कि लोग समझ सकें. हालांकि ये आंकड़े नेताओं द्वारा खुद कबूल किए जाते हैं और इसकी गुंजाइश ज्यादा है कि उन्हें बहुत घटा कर बताया जाता होगा लेकिन इसके बावजूद इन आंकड़ों से यह उजागर होता है प्रतिनिधियों में करोड़पतियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. पंद्रहवीं लोकसभा चुनावों में 1205 करोड़पति उम्मीदवार थे, जिनमें से 300 से ज्यादा संसद में पहुंचे. अपराधों के आंकड़े भी उनकी बढ़ती हुई दौलत के साथ बढ़ते जाते हैं और ये सभी दलों में मौजूद हैं.

दो मुख्य दलों कांग्रेस और भाजपा से जुड़े करोड़पति सांसदों की संख्या 2004 में क्रमश: 29 और 26 थी, जो 2009 में बढ़ कर 42 और 41 हो गई. ये उस जनता, उस व्यापक बहुसंख्या के प्रतिनिधि थे जो 20 रुपए रोज पर गुजर करती है! हरेक चुनाव में उनकी बेपनाह दौलत के बढ़ने की दर इससे भी अधिक दिलचस्प है. एडीआर और नेशनल इलेक्शन वाच (एनइडब्ल्यू) ने अपने विश्लेषण में पाया कि फिर से चुनाव लड़ रहे 317 उम्मीदवारों की दौलत 1000 प्रतिशत बढ़ गई थी. ये दरें तो कॉरपोरेट दुनिया में भी नहीं सुनी जाती हैं. एक औसत क्षमता का इंसान, जो ऊपर से गरीबों की सेवा में लगा हो, यहां बेहतरीन फंड प्रबंधकों को मात दे देता है! आम मामलों में ऐसे सबूत आयकर और भ्रष्टाचार-निरोधक अधिकारियों के कान खड़े कर देते हैं, लेकिन इन दौलतमंदों के राजनीतिक रिश्ते उन्हें ऐसे दुनियावी खतरों से बचाए रखते हैं. यहां इस दौलत के स्रोतों के बारे में अंदाजा नहीं लगाया जा रहा है, जबकि यह जानी हुई बात है कि पूरी मशीनरी जनता के नाम पर कॉरपोरेट घरानों और दूसरे धन्ना सेठों के लिए काम करती है.
 
चुनावों की पद्धति

जब भारत आजाद हुआ, तो नए शासकों के सामने सबड़े बड़ी चुनौती जनता की वे उम्मीदें थीं, जो आजादी के संघर्ष के दौरान पैदा हुई थीं. ये उम्मीदें क्रांति के बाद के रूस (सोवियत संघ) द्वारा हासिल की गई शानदार तरक्की, दूसरे विश्व युद्ध के बाद की कल्याणकारी तौर-तरीकों और पड़ोसी चीन में क्रांति जैसी घटनाओं से कई गुना बढ़ गई थीं. सत्ता हस्तांतरण के दौरान भड़की सांप्रदायिक उथल पुथल, रियासतों के रूप में मौजूद 600 राजनीतिक इकाइयों का भारत के भीतर एकीकरण, देश के कुछ इलाकों में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में हथियारबंद संघर्षों और निचली जातियों के उभार ने एक साथ मिल कर नए शासकों के सामने एक भारी चुनौती पेश की थी. उन्होंने जो गणतांत्रिक संविधान बनाया था, उसमें इन उम्मीदों की झलक थी. हालांकि वास्तविक अर्थों में, सत्ता हासिल करने वाली कांग्रेस पार्टी, बुर्जुआ हितों की प्रतिनिधित्व करती थी और उसे बड़ी कारीगरी से उसे बढ़ावा भी देना था.

एक तरफ जनता की उम्मीदों को पूरा करने का दिखावा करने की जरूरत और दूसरी तरफ वास्तव में पूंजी के हितों को बढ़ावा देने से एक तनाव पैदा हुआ. यह तनाव इसकी एक के बाद एक बेईमानी भरी कार्रवाइयों की श्रृंखला में भी दिखा. समाजवादी दिखावे के लिए पंचवर्षीय योजना की शुरुआत की गई लेकिन भीतर ही भीतर बंबई योजना को अपनाया गया था-जिसे तब के देश के आठ शीर्ष पूंजीपतियों ने बनाया था. या फिर भूमि सुधारों की शुरुआत की गई, लेकिन इसमें सुनिश्चित किया गया कि उन पर इस तरह अंकुश बना रहे कि व्यापक देहातों में सहयोगी के रूप में धनी किसानों का एक वर्ग बनाया जा सके. या फिर भूख खत्म करने के नाम पर देहातों में पूंजीवादी संबंधों के प्रसार के लिए हरित क्रांति को आगे बढ़ाया गया. ये महज कुछेक मिसालें हैं. लोकतंत्र को चलाने के लिए राजनीतिक रूप से एक ऐसी पद्धति जरूरी थी, जिससे उन्हें सत्ता पर पूरा नियंत्रण हासिल होता.
 
सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजयी घोषित करने वाली चुनावी [एफपीटीपी-फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम] व्यवस्था शासक वर्ग की राजनीतिक सत्ता को मजबूत करने वाली ऐसी ही पद्धति थी. यों यह व्यवस्था औपनिवेशिक शासन से विरासत में अपनाई गई थी, जैसा कि ब्रिटिश साम्राज्य के उपनिवेश रह चुके दूसरे सभी देशों में हुआ था. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था जो भारत को अपने हालात के मुताबिक एक बेहतर पद्धति को अपनाने के लिए इसे छोड़ने से रोकता. आज हम खुद को जिन बुराइयों से घिरा हुआ पाते हैं, उनमें से ज्यादातर इसी एफपीटीपी व्यवस्था से पैदा हुई हैं. असाधारण रूप से ऐसी विविधता भरे राज्यतंत्र में होने वाले चुनावों में एक अकेले विजेता का होना बहुसंख्यक तबके के समर्थन के बिना नहीं हो सकता था.

इसका नतीजा यह हुआ कि समान हितों के आधार पर बने ज्यादातर समूहों को बहुसंख्यक तबके के हितों के साथ समझौता करना पड़ा, जिसने इन समूहों को मिला लिए जाने [को-ऑप्शन] और दूसरी धांधलियों का रास्ता खोल दिया. देश में हितों की विविधता अभी भी अनेक दलों को आगे ले आ सकती है, जो बुनियादी रूप से प्रतिस्पर्धी एफपीटीपी चुनावों को और भी बदतर बना देगी, जिसके साथ साथ बढ़ी हुई दर के साथ भारी खर्चे बढ़ते जाएंगे जिन्हें बड़े कारोबार पूरा करेंगे. इसी में जातियों, समुदायों, धर्म वगैरह जैसी मौजूदा खामियों और बेशक बाहुबल का बेरोकटोक इस्तेमाल भी बढ़ेगा. दलगत सीमाओं से ऊपर उठ कर, अनिवार्य रूप से यह सभी शासक वर्गों के मुट्ठीभर लोगों की शक्ति संरचना में रूप में विकसित हो गया है, जिसकी अनेक तरीकों से हिफाजत की जाती है और जिसकी सर्वोच्च ताकत पुलिस और फौज है.
 
एक वैकल्पिक मॉडल

क्या चुनावों की इस पद्धति का कोई विकल्प नहीं था? देश में शक्ल ले रहा विविधतापूर्ण राज्यतंत्र चुनावों के एक अलग मॉडल की तरफ इशारा करेगा. इसे हम आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था कह सकते हैं. यह वो व्यवस्था है जो ज्यादातर यूरोपीय लोकतंत्रों और उन अनेक दूसरे देशों में अपनाई जाती है जिनका लोकतांत्रिक रेकॉर्ड बहुत अच्छा रहा है. हालांकि व्यावहारिक रूप में आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था की अनेक किस्में हैं. लेकिन बुनियादी रूप से ये दलों या सामाजिक समूहों के लिए मतदान की व्यवस्था देती हैं (न कि किसी व्यक्ति को वोट देने के), जो अपने मतों के हिस्से के अनुपात में प्रतिनिधित्व पाते हैं. मिसाल के लिए दलित भारत में 17 फीसदी हैं लेकिन हरेक निर्वाचन क्षेत्र में अल्पसंख्यक होने के कारण वे एफपीटीपी व्यवस्था में कभी भी स्वतंत्र रूप से नहीं चुने जाते, आरक्षित सीटों पर भी नहीं.

आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था संसद और विधान सभाओं में उनकी हिस्सेदारी को सुनिश्चित करेगी और यह उन्हें अपने जनाधार का विस्तार करने वाली शक्ति भी मुहैया करा सकती है. आज जिसे थोड़े नरम शब्दों में बहुजन कहा जाता है, उसका निर्माण इसी प्रक्रिया के जरिए मुमकिन था. सामाजिक पहचान की जगह वर्गीय चेतना लेगी और पूरी राजनीति को वर्गीय धुरी पर केंद्रित करेगी. इस व्यवस्था में कोई गलाकाट मुकाबला भी नहीं होगा, क्योंकि हरेक समूह को तर्कसंगत रूप से उनके हिस्से का प्रतिनिधित्व मिलेगा. इसके बजाए मुकाबला संसद के भीतर होने लगेगा, जिसे बहुसंख्यक जनता के हितों में नीतियां बनानी होंगी. एफपीटीपी व्यवस्था में, एक बार चुनाव हो जाने के बाद, नीतिगत मामलों पर संसद में बहस के लिए प्रेरणा देने वाली कोई ताकत नहीं होती. जनता पर असर डालने वाली सरकार की ज्यादातर भौतिक नीतियां (जैसे कि आपातकाल लागू किया जाना और नवउदारवादी आर्थिक सुधार) पर संसद में कभी बहस ही नहीं हुई.
 
एफपीटीपी चुनावों में सैद्धांतिक खामी यह है कि चुने हुए प्रतिनिधियों को आधे मतदाताओं का वोट भी मुश्किल से ही मिला होता है. यह खामी आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था में इस तरह दूर हो जाती है कि यह समान हितों के आधार पर बने ज्यादातर समूहों को उनकी उचित हिस्सेदारी देता है. एफपीटीपी चुनावों में गहन मुकाबले के नतीजे में भारी खर्चे होते हैं और उसके बाद भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी होती है, जिन्हें आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था में दूर किया जा सकता है. सबसे अहम बात यह कि भारत के संदर्भ में, यह शासक वर्गों द्वारा जनता को जातियों और समुदायों में बांटने के बुरे मंसूबों पर लगाम लगाती है. मिसाल के लिए, दलितों के लिए आरक्षित सीटों की जरूरत नहीं रह जाएगी और इस तरह दलित होने के ठप्पे की भी जरूरत नहीं रहेगी.

इस तरह राजनीति में से जातियों का बोलबाला भी खत्म हो जाएगा. हालांकि कोई भी व्यवस्था किसी को अपने समुदाय से अलग होकर उसे समुदाय हितों के खिलाफ काम करने से नहीं रोक सकती, लेकिन आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था समुदाय को उसकी उचित हिस्सेदारी देकर इसकी ढांचागत गुंजाइश को खत्म कर सकती है. दलित पूना समझौते के जरिए गांधीवादी ब्लैकमेल पर बरसों से अफसोस जताते आए हैं, लेकिन वे यह नहीं समझ पाए कि यह समझौता एफपीटीपी व्यवस्था पर टिका था. पूना समझौता आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था में अपनी प्रासंगिकता खो देगा. इसी तरह यह भी कहा जा सकता है कि जातियों की पहचान को बनाए रखने की जरूरत भी खत्म हो जाएगी और इसी तरह खत्म हो जाएंगी वे सारी तकलीफदेह मुश्किलें भी, जो इस जरूरत से पैदा हुई हैं.
 
सचमुच, भारत को इससे भारी फायदा होगा, लेकिन क्या शासक वर्ग को इसकी परवाह होगी?

 

आनंद तेलतुंबड़े

मोदी को कट्टर ही बनाए रखना चाहते हैं मदनी

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना मदनी के इस कथन ने एक नई बहस को जन्म दिया है कि मैं तिलक नहीं लगा सकता तो मोदी भी टोपी क्यों पहनें। उनकी बात बहुत ही तार्किक, सीधी-सीधी गले उतरने वाली और वाजिब लगती है। इसी से जुड़ी हुई ये बात भी सटीक महसूस होती है कि जब मुस्लिम इस्लाम के मुताबिक अपनी रवायत पर कायम रखता है और उसे बुरा नहीं माना जाता तो किसी हिंदू के अपने धर्म के मुताबिक चलते हुए मुस्लिम टोपी पहनने को मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। कुछ ऐसा ही मसला दोनों धर्मों के धर्म स्थलों को लेकर है। मुस्लिम मंदिर नहीं जाता तो  इसे सहज में लिया जाता है, मगर कोई हिंदू मस्जिद अथवा दरगाह से परहेज रखता है तो उसे कट्टर क्यों माना जाना चाहिए। मगर सच ये है चंद हिंदुओं को छोड़ कर अधिसंख्य हिंदुओं को दरगाह, गिरिजाघर अथवा गुरुद्वारे में माथा टेकने में कोई ऐतराज नहीं होता।

अजमेर के संदर्भ में बात करें तो यह एक सच्चाई है कि देशभर से यहां आने वाले मुस्लिम जायरीन का एक प्रतिशत भी तीर्थराज पुष्कर नहीं जाता। जाता भी है तो महज तफरीह के लिए। दूसरी ओर देशभर से आने वाला अधिसंख्य हिंदू तीर्थयात्री दरगाह जरूर जाता है। अनेक स्थानीय हिंदू भी दरगाह में माथा टेकते देखे जा सकते हैं। तो आखिर इसकी वजह क्या है?

इसी सिलसिले में दरगाह में बम विस्फोट के आरोप में गिरफ्तार असीमानंद के उस इकबालिया बयान पर गौर कीजिए कि बम विस्फोट किया ही इस मकसद से गया था कि दरगाह में हिंदुओं को जाने से रोका जाए। दरगाह बम विस्फोट की बात छोड़ भी दें तो आज तक किसी भी हिंदू संगठन ने ऐसे कोई निर्देश जारी करने की हिमाकत नहीं की है कि हिंदू दरगाह में नहीं जाएं। वे जानते हैं कि उनके कहने को कोई हिंदू मानने वाला नहीं है। वजह साफ है। चाहे हिंदू भी ये कहें कि ईश्वर एक ही है, मगर उनकी आस्था छत्तीस करोड़ देवी-देवताओं में भी है। बहुईश्वरवाद के कारण ही हिंदू धर्म लचीला है। हिंदू संस्कृति स्वभावगत भी उदार प्रकृति की है। और इसी वजह से हिंदू धर्मावलम्बी कट्टरवादी नहीं हैं। उन्हें शिवजी, हनुमानजी और देवी माता के आगे सिर झुकाने के साथ पीर-फकीरों की मजरों पर भी मत्था टेकने में कुछ गलत नजर नहीं आता। रहा सवाल मुस्लिमों का तो वह खड़ा ही बुत परस्ती के खिलाफ है। ऐसे में भला हिंदू कट्टरपंथियों का यह तर्क कहां ठहरता है कि अगर हिंदू मजारों पर हाजिरी देता है तो मुस्लिमों को भी मंदिर में दर्शन करने को जाना चाहिए। सीधी-सीधी बात है मुस्लिम अपने धर्म का पालन करते हुए हिंदू धर्मस्थलों पर नहीं जाता, जब कि हिंदू इसी कारण मुस्लिम धर्म स्थलों पर चला जाता है, क्यों कि उसके धर्म विधान में देवी-देवता अथवा पीर-फकीर को नहीं मानने की कोई हिदायत नहीं है।

बहरहाल, ताजा मामले में मौलाना मदनी ने नरेन्द्र मोदी को सुझाया है कि वे भी मुस्लिमों की तरह अपने धर्म के प्रति कट्टर बने रहें। उन्हें शायद इसका इल्म नहीं है कि मुसलमान भले ही बुत परस्ती के विरुद्ध होने के कारण तिलक नहीं लगाएगा, मगर सभी धर्मों को साथ ले कर चलने वाला हिंदू खुद के धर्म का पालन करते हुए अन्य धर्मों का भी आदर करता है। कदाचित इसी कारण हिंदूवादी संघ की विचारधारा से पोषित भाजपा के नेता भी दरगाह जियारत कर लेते हैं। पिछले दिनों भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने तो धर्मनिरपेक्षता के नाते बाकायदा मुस्लिम टोपी पहन कर दिखाई थी। इसे वोटों के गणित से भी जोड़ कर देखा जा सकता है। अलबत्ता संघ से सीधे जुड़े लोग परहेज करते हैं। मोदी भी उनमें से एक हैं, जिन्होंने एक बार टोपी पहनने से इंकार कर देश में एक बड़ी बहस को जन्म दिया है। स्वाभाविक बात है कि वोटों के ध्रुवीकरण की खातिर उन्होंने ऐसा किया। हालांकि बाद में जब बहुत आलोचना हुई तो यह कह कर आरोप से किनारा किया कि वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं, मगर पालन अपने धर्म का करते हैं, टोपी पहन कर नौटंकी नहीं कर सकते।

और ऐसा भी नहीं है कि पूरा मुसलमान कट्टर है। अजमेर के संदर्भ में बात करें तो पुष्कर की विधायक रहीं श्रीमती नसीम अख्तर इंसाफ तीर्थराज पुष्कर सरोवर को पूजा करती रही हैं, ब्रह्मा मंदिर के दर्शन करती रही हैं। भले ही इसे हिंदू वोटों की चाहत माना जाए, मगर धर्मनिरपेक्ष राजनीति ने मुस्लिम को भी कुछ लचीला तो किया ही है। इसके अतिरिक्त भारत में रहने वाले बहुसंख्यक मुसलमान पर हिंदू संस्कृति का असर सूफी मत के रूप में साफ देखा जा सकता है। कट्टर मुस्लिम दरगाह में हाजिरी नहीं देते, जबकि अधिसंख्य मुस्लिम दरगाहों की जियारत करते हैं। इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान तक के कई मुस्लिम दरगाह जियारत करने आते हैं। सवाल ये उठता है कि मोदी के टोपी न पहनने का समर्थन करने वाले मौलाना मदनी मुस्लिमों को दरगाह जाने से रोक सकते हैं?

 

अजमेर निवासी लेखक तेजवानी गिरधर राजनीतिक विश्लेषक हैं। दैनिक भास्कर में सिटी चीफ सहित अनेक दैनिक समाचार पत्रों  में संपादकीय प्रभारी व संपादक रहे हैं। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश  सचिव व जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान के अजमेर जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। वर्तमान में अपना स्थानीय न्यूज वेब पोर्टल संचालित करने के अतिरिक्त नियमित ब्लॉग लेखन भी कर रहे हैं।

न्यूज़ फर्स्ट टीवी से जुड़े सलीम सैफी

न्यूज़ फर्स्ट टीवी के साथ वरिष्ठ पत्रकारों का जुड़ना जारी है। ताज़ा कड़ी में वरिष्ठ टीवी पत्रकार सलीम सैफी ने न्यूज़ फर्स्ट टीवी को ज्वाइन किया है। उन्हें न्यूज़ फर्स्ट टीवी में एडिटर स्पेशल एसाइनमेंट बनाया गया है। इससे पहले वो इसी पद पर समाचार प्लस चैनल के साथ जुड़े हुए थे। सलीम सैफी के पास टीवी का लंबा अनुभव है। वो आज तक समेत कई चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। सलीम सैफी से पहले वरिष्ठ पत्रकार रवि शर्मा भी बतौर कार्यकारी संपादक संस्थान के साथ जुड़ चुके हैं। वो दैनिक जागरण, अमर उजाला और जनवाणी समेत कई अख़बारों में अहम पदों पर काम कर चुके हैं। उनके पास लगभग 25 साल का अनुभव है।

न्यूज़ फर्स्ट डॉट टीवी भारत का सबसे पहला लाइव इंटरनेट न्यूज़ चैनल है। इस चैनल को गौरी मीडिया प्राइवेट लिमिटेड ला रहा है। इंटरनेट का ये लाइव टीवी चैनल जल्द ही लॉंच होने जा रहा है। डॉ. ललित भारद्वाज इस चैनल के प्रबंध संपादक और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। ये समूह पहले से ही राष्ट्रीय मासिक पत्रिका दि सिटी इंडिया और साप्ताहिक समाचार पत्र विशिष्ठ समाचार का प्रकाशन कर रहा है।

समूह ने चंदन प्रताप सिंह को न्यूज़ डायरेक्टर और चैनल हेड बनाया है। वो लगभग 23 सालों से मीडिया में हैं और ज़ी,स्टार समेत कई बड़े चैनलों में अहम पदों पर काम कर चुके हैं। अर्जुन को कंपनी का डायरेक्टर ऑपरेशन्स और टेक्निकल बनाया गया है। वो भी लगभग एक दशक से मीडिया में सक्रिय हैं। उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही इस समूह के साथ कई और वरिष्ठ पत्रकार जुड़ेंगे।
 

23 अप्रैल को होगा भारत भास्कर अवॉर्ड का आयोजन

रायपुर। भारत भास्कर अवॉर्ड का आयोजन 23 अप्रेल को वृन्दावन हॉल में शाम 6 बजे होगा। इस आयोजन में छत्तीसगढ़ की 11 अलग अलग विधाओं के लोगों को सम्मानित भी किया जाएगा। दैनिक भारत भास्कर की वेब साइट http://www.bharatbhaskar.com भी इसी आयोजन का हिस्सा होगा। वेब साइट के समाचार सम्पादक आशीष मिश्रा हैं। भारत भास्कर के प्रधान सम्पादक संदीप तिवारी और प्रबंध सम्पादक अहफ़ाज़ रशीद ने आज इस बात की जानकारी दी।

श्री तिवारी और रशीद ने बताया कि इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ के पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री विश्वरंजन होंगे. अध्यक्षता वरिष्ठ मीडिया विशेषज्ञ डॉक्टर सुशील त्रिवेदी करेंगे। विशेष अतिथि के रूप में चेतन इंडस्ट्रीज़ के वॉइस प्रेसिडेंट श्री एस. के. शर्मा और शिक्षाविद व समाजसेवी डॉक्टर राकेश सॉलोमन उपस्थित रहेंगे। दैनिक भारत भास्कर की वेब साइट इसी मौके पर एक रॉक बैण्ड समर रेन द्वारा छत्तीसगढ़ी और हिन्दी गीतों को नए अंदाज़ में पेश किया जाएगा। कार्यक्रम का संचालन मशहूर शायर मुमताज करेंगे। संदीप तिवारी और अहफ़ाज़ ने बताया कि पत्रकारिता पुरस्कार हर वर्ष स्वर्गीय देवेन्द्र कर की स्मृति में होगा। यह पुरस्कार इस वर्ष वरिष्ठ पत्रकार श्री जयशंकर प्रसाद शर्मा "नीरव" को प्रदान किया जा रहा है. अन्य अवॉर्ड भी सम्बंधित गतिविधियों से जुड़े उन लोगों की स्मृति में होगा जो आज हमारे बीच नहीं हैं।

फ़ोटो जर्नलिज़्म पुरस्कार स्वर्गीय एस. अहमद की स्मृति में वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट श्री विनय शर्मा को प्रदान किया जाएगा। फिल्म और रंगमंच का पुरस्कार स्वर्गीय हबीब तनवीर की स्मृति में वरिष्ठ निर्देशक श्री जलील रिज़वी को दिया जाएगा। स्वर्गीय कुलदीप निगम स्मृति पुरस्कार छत्तीसगढ़ के इकलौते पपेटियर श्री विभाष उपाध्याय को प्रदान किया जाएगा। अन्य पुरस्कार इस तरह से होंगे – स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा स्मृति हिन्दी साहित्य पुरस्कार श्री संजय अलंग को , स्वर्गीय हरि ठाकुर स्मृति छत्तीसगढ़ी साहित्य पुरस्कार सुशील भोले को , समाज सेवा के लिए बढ़ते कदम के संस्थापक स्वर्गीय अनिल गुरुबक्षाणी स्मृति पुरस्कार श्री फैज़ खान को, छत्तीसगढ़ में संगीत की अलख जगाने वालीं स्वर्गीय अनिता सेन स्मृति पुरस्कार श्री शरद अग्रवाल को, कला और अभिनय के लिए पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म के निर्माता स्वर्गीय विजय पाण्डे स्मृति पुरस्कार वरिष्ठ कलाकार शिवकुमार दीपक को, इ. टी. वी. के कैमरामेन स्वर्गीय संजय दास स्मृति इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पुरस्कार माधवी श्रीवास को और खेल विधा के लिए स्वर्गीय विजय हिन्दुस्तानी स्मृति पुरस्कार फुटबॉल की अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी सुप्रिया कुकरेती को प्रदान किया जाएगा।

 

विज्ञप्ति
 

शशिशेखर इन दिनों पाठक परिवार को उपकृत करने में लगे हैं

दैनिक 'हिन्दुस्तान' के सम्पादकीय पृष्ठ पर पिछले काफी दिनों से अमितांशु पाठक और उनके भाई किंशुक पाठक के लेख नियमित तौर पर चित्र के साथ छप रहे हैं। तमाम जाने-माने लेखकों, पत्रकारों को उनसे ईष्या हो सकती है क्योंकि ये युवा स्तम्भकार हिन्दुस्तान के सभी संस्करणों में प्रमुखता से छपते हैं। अमितांशु पाठक का परिचय स्वतंत्र पत्रकार के रूप में दिया होता है गोया वे जाने-माने पत्रकार रहे हों। जानकार बताते हैं कि वे कुछ समय तक 'नई दुनिया' के लिए वाराणसी से फीचर आदि लिखते थे। वाराणसी में उनके काफी ठाठ रहे हैं। वे बड़ी बड़ी गाड़ियों में चलते और पुलिस-प्रशासन में उनकी हनक भी थी लेकिन कानाफूसी के अनुसार, मायावती के शासनकाल में महत्वपूर्ण पद पर रहे एक पुलिस अधिकारी ने उनके साथ कुछ ऐसा व्यवहार किया कि वे लम्बे समय तक नेपथ्य में चले गए। अब वे इन स्तम्भ के साथ प्रकट हुए हैं।

 
सवाल यह है कि आखिर वह कौन सी योग्यता है जिसके बूते 'हिन्दुस्तान' जैसे प्रतिष्ठित अखबार में वे और उनके भाई स्तम्भकार के रूप में प्रमुखता से छप रहे हैं। यह योग्यता है वाराणसी के पुराने और पत्रकार राममोहन पाठक के बेटा होने की। बताते चलें कि हिन्दुस्तान के प्रधान सम्पादक शशिशेखर के पुराने मित्र हैं राममोहन पाठक और 'आज' एवं 'अवकाश' के दिनों में दोनो का काफी साथ रहा है तो शशिशेखर न सिर्फ राममोहन पाठक का स्तम्भ छाप रहे हैं बल्कि उनके दोनों बेटों का भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। आखिर शशि जी से बेहतर यह कौन जान सकता है कि योग्यता किसी मतलब की नहीं होती और अन्ततः सम्बन्ध ही काम आते हैं। तमाम योग्य लोगों को दाएं-बाएं कर और अन्ततः नवीन जोशी को भी हाशिए पर लगाकर उन्होंने योग्यता को उसकी औकात बता ही दी है। तो शशि जी इन दिनों अपने पुराने सम्बन्धों का निर्वाह करते हुए पाठक परिवार को उपकृत करने में लगे हैं।

अब अमितांशु के लेखन के कुछ उदाहरण भी देख लें। 'फिर उसी मोड़ पर खड़ी है वाराणसी' (2 अप्रैल 2014) में वह लिखते हैं-'वाराणसी की दिक्कत यह है कि उसे पिछले कुछ समय से स्थानीय सांसद मिले ही नहीं हैं। इसे लेकर यहां कई बार अब और नहीं, बाहरी नहीं का नारा भी बुलंद हुआ है।' लेकिन अगर हम तथ्यों पर जाएं तो पाते हैं कि हाल के मुरली मनोहर जोशी से पहले लम्बे समय तक यहां स्थानीय सांसद रहे हैं। जोशी के पहले कांग्रेस के राजेश मिश्र सांसद थे जो स्थानीय थे । शंकर प्रसाद जायसवाल लगातार तीन चुनावों 1996, 1998, 1999 में विजयी हुए और सांसद बने। राजेश मिश्र ने उन्हें 2004 में हराया था।

संभव है कि 1996 से 2009 में जोशी के जीतने के पहले के स्थानीय सांसदों के करीब 13 वर्षों के कार्यकाल को अमितांशु 'पिछले कुछ समय' के रूप में न देख पाते हों। शंकर प्रसाद से पहले श्रीचन्द्र दीक्षित और अनिल शास्त्री जरूर बाहरी रहे, हालांकि अनिल शास्त्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे हैं, लेकिन उनसे पहले श्यामलाल यादव और कमलापति त्रिपाठी भी स्थानीय रहे। तो काशी की पीड़ा यह नहीं कि उसे स्थानीय सांसद नहीं मिले, विडम्बना यह रही कि स्थानीय सांसदों ने भी अपने नगर की सुध नहीं ली। लगता है कि अमितांशु को पापा ने ठीक से बताया नहीं।

 

(वाराणसी से एक पत्रकार की रिपोर्ट)

जंतर मंतर और हरियाणा भवन पर जेएनयू छात्रों का प्रदर्शन

नई दिल्‍ली : मंगलवार को दिल्‍ली के जंतर-मंतर पर जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भगाणा की गैंग-रेप पीड़ित ल‍ड़कियों को न्‍याय दिलाने के लिए जोरदार प्रदर्शन किया तथा हरियाणा भवन पहुंच कर अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा। इस अवसर जेएनयू छात्र संघ के नेताओं ने हरियाणा व केंद्र सरकार विरोधी नारे लगता तथा खाप पंचायतों की संस्‍कृति को ध्‍वस्‍त करने की बात कही।

 
इस अवसर पर सर्व समाज संघर्ष समिति के अध्‍यक्ष वेदपाल सिंह तंवर ने कहा कि गत 23 मार्च, 2014 को रात आठ बजे इन चार लडकियों को गांव के दबंग समुदाय के लोगों ने कार से में उठा लिया तथा लगातार दो दिनों एक दर्जन से अधिक लोग इनके साथ गैंग रेप करते रहे। काफी जद्दोजहद के बाद 25 मार्च को मामले की एफआईआर दर्ज हो सकी और भारी विरोध के कारण पुलिस ने इनमें 5 लोगों को गिरफ्तार किया है लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के कारण आरोपी दबंग सरपंच तथा अन्‍य आरोपी अभी भी खुले घूम रहे हैं।

तंवर ने कहा कि यह सिर्फ एक गांव का मामला नहीं है। हरियाणा में दलित-पिछडी महिलाओं के साथ लगातार गैंग-रेप और अन्‍य प्रकार के उत्‍पीडन की घटनाएं हो रही हैं। वहां हमारी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है। जाट बिरादरी की संख्‍याबल, बाहुबल तथा धनबल के कारण कोई भी राजनीतिक पार्टी स्‍थानीय स्‍तर पर हमारी सुध नहीं लेती। प्रशासन पूरी तरह इसी दबंग बिरादरी के कब्‍जे में है। उन्‍होंने रेप के आरोपियों को फांसी देने तथा पीड़ित लड़कियों को 15-15 लाख रूपये मुआवजा देने की मांग की। तंवर ने कहा कि चुंकि पहले से ही सामाजिक बहिष्‍कार झेल रहे भगाणा गांव के दलित परिवारों की ये गैंग-रेप पीड़ित लडकियां अब अपने गांव भी नहीं लौट सकतीं, इसलिए सरकार इनके निकटवर्ती शहर में पुनर्वास की व्‍यवस्‍था करे व उच्‍च शिक्षा का खर्च वहन करे व बालिग होने पर सरकारी नौकरी दिये जाने का आश्‍वासन दे।

Vedpal Singh Tanwar
(M)- 09813200043

 

ओपी श्रीवास्तव ने मेरी कीमत लगाने की जुर्रत की थी… बावजूद इसके ओपी के व्यवहार से बेहद प्रभावित हुआ था

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग सात)

फिर मैं समझ गया अपनी ही केंचुल में सिमटे वामपंथियों का चरित्र

हम लोगों ने छेड़ दी फैसलाकुन जंग, आमरण अनशन शुरू

ताजा-ताजा बने चचा-भतीजा के बलुआ रिश्तों की पींगों का अन्‍तर्भाव

ज्यादातर वामपंथियों में होता है खुद के प्रति श्रेष्ठतम सम्मान का पाखण्ड

लखनऊ: वैसे आपको एक बात बताऊंगा जरूर, कि ओपी श्रीवास्तव के व्यवहार से बेहद प्रभावित हुआ था। बावजूद इसके कि उन्होंने मेरी कीमत लगाने की जुर्रत की थी। लेकिन उन जैसे व्यक्ति से उससे ज्या‍दा और क्या हो सकता था। माना कि वे सहारा इंडिया के दूसरे नम्बर की हैसियत रखते थे, लेकिन पहले दर्जे वाली हैसियत वाले सुब्रत राय के कोसों-योजनों दूर निचले पायदान पर ही तो। जो कुछ भी उन्होंने मुझसे कहा उससे ज्यादा वे कर भी तो नहीं सकते थे, यह मैं खूब जानता था। लेकिन मेरा मानना है कि उन्होंने अपना श्रेष्ठ्तम प्रदर्शन किया, मेरे सन्दर्भ में। यकीन मानिये, कि मैं सहारा इंडिया में ओपी श्रीवास्तव और बाद के विवेक सहाय जैसे लोग सहारा इंडिया के पाप-कुण्ड के अक्षुण-निष्पाप आत्मा हैं। वे वाकई सोचते और करते थे, बिना किसी ढिंढोरा मचाये हुए। हां, सुब्रत राय नामक जैसा फोबिया उन लोगों पर अगर हावी रहता था, तो उसमें हैरत या अचरज क्यों? उन्होंने अगर मुझे एक लाख रूपयों की रिश्वत की पेशकश की थी, तो भी उसमें उनका प्रोफेशनलिज्म ही तो था। हां, इतना जरूर था कि चूंकि मैं उस आन्दोलन का सर्वाधिक मजबूत पहरूआ था, इसलिए उन्होंने मुझे खरीदने का प्रस्ता‍व रखा। अब इसमें हमारे आंदोलन को तबाह करने की मंशा थी, इसलिए मैंने उसे खारिज कर दिया था। लेकिन जो शैली उन्होंने अपनायी उसका तो मैं आज तक मुरीद हूं।

खैर, ओपी श्रीवास्तव के घर के लौटते ही मैं कीर्ति प्रेस के बाहर बने धरना स्थल पर पहुंच गया। अरे हां, आपको बताना भूल गया हूं कि इसके पहले ही हम लोगों ने राजधानी के मजदूर आंदोलन को अपने आंदोलन से खींचकर लाने की कवायद छेड़ थी। हमारा आंदोलन अच्छा-खासा हो चुका था। बिला-शक, सुब्रत राय और सहारा इंडिया प्रबंधन ने हमारे आंदोलन की तीव्रता को महसूस करके ही ओपी श्रीवास्त‍व के घर मुझे साजिशन बुलाया था। वे चाहते थे कि अगर कुमार सौवीर इस आंदोलन से टूट जाएंगे तो शान-ए-सहारा के श्रमिक आंदोलन को आसानी से बिखेरा-कुचला जा सकेगा।
 
हां, तो धरना स्थल पर मैंने श्याम अंकुरम को अलग बुलाया और ओपी श्रीवास्तव के साथ हुई सारी बातचीत का ब्योरा तफ्सील से दे दिया। लेकिन यह बात सुनते ही श्याम अंकुरम बिलकुल हत्थे से उखड़ गया। उसने बाकायदा मुझे गंदी गालियां दीं और मुझे दलाल साबित करने लगा। उसका ऐतराज था कि जब तुम श्रमिकों के साथ हो और नेतृत्व कर रहे हो, तो तुम ओपी श्रीवास्तव के घर क्यों गये? उसका आरोप था कि तुम मूलत: दलाल हो और हमेशा दलाली ही करते रहोगे।

अब मैं क्या करता? श्याम मुझे समझने की कोशिश ही नहीं कर रहा था और जो आरोप वह मुझ पर लगा रहा था, वे बेहूदा है और यह भी कि मैं कुछ भी हो, मैं दलाल नहीं हो सकता। लेकिन दो दिनों तक श्याम अंकुरम ने मुझे जबर्दस्त प्रताड़ना दी। लेकिन चूंकि मैं उससे प्यार करता था, मजदूरों का नेता था और मेरी किसी प्रतिकूल हरकत श्रमिक आंदोलन को ठेस पहुंचा सकती थी, इसलिए मैं उसके ऐसे सारे आरोपों को कांधे की धूल की तरह झाड़ता रहा। हालांकि उसके बाद भी उसने मेरे खिलाफ लगातार वमन किया। कभी बेईमान, भ्रष्ट तो कभी साम्प्रदायिक तक करार दे दिया। मेरे पीठ पीछे तो कभी मेरे सामने भी। सरेआम भी कई बार किया।

उसके शब्द–बाण इतने तीखे और विषभरे होते थे, कि कोई भी तिलमिला जाए। लेकिन मैं हर बार उसकी ऐसी अभद्रताओं को लगातार भूलने की कोशिश करता रहा। न जाने क्या कारण था कि जब उसे मेरी आवश्यकता होती थी, उसका व्यवहार बहुत आत्मीय हो जाता था, लेकिन बाकी वक्त में उस पर ज्यादा पढ़े होने का आडम्बर छाया रहता था। वह तो मैंने बाद में समझा कि यह ज्यादातर नव-वामपन्थियों का चरित्र है। खुद को श्रेष्ठ‍ और बाकी लोगों को तुच्छ‍ मानने का पाखण्ड। दरअसल, ऐसा करके ये लोग खुद को श्रेष्ठतम साबित करते रहते थे। आखिरकार मैंने तंग आकर अंतिम रूप से सम्बन्ध खत्म कर दिये। लेकिन यह तो काफी बाद की बात है। उस पर बातचीत बाद में करूंगा।

खैर, शान-ए-सहारा के आंदोलन को लेकर उमाशंकर मिश्र और शिवगोपाल मिश्र वगैरह बड़े नेताओं से हम लोगों की सक्रियता बढ़ने लगी। कीर्ति प्रेस की गेट-मीटिंग लगातार होने लगी। और आखिरकार एक दिन हम लोगों ने ऐलान कर दिया कि कीर्ति प्रेस के गेट पर 18 जून-85 से अनिश्चितकालीन धरना शुरू हो जाएगा और तब तक अगर मांगें स्वीकार नहीं की गयीं तो तीन जुलाई-85 से आमरण अनशन किया जाएगा। तय हुआ कि आमरण अनशन पर श्याम अंकुरम बैठेगा और मैं पूरे आंदोलन का नेतृत्व करूंगा।

18 जून-85 को कीर्ति प्रेस के बाहर जन-सैलाब उमड़ पड़ा। हम लोगों ने राजधानी लखनऊ के श्रमिक आंदोलन पर जो एकजुटता दिखायी थी, उनकी मदद की थी उसका बदला इन श्रमिकों-मजदूरों ने हमारे आंदोलन को बाकायदा संजीदगी वाली हमदर्दी के साथ अदा किया था। इतना ही नहीं, रोजाना सुबह-सुबह शहर भर के श्रमिक हमारे आंदोलन में हवन करने आ जाते थे। कुछ तो स्थाई तौर पर अपना डेरा डाल चुके थे। कहने की जरूरत नहीं कि अपनी सफलता को देख कर मैं मन ही मन कुप्पा हो चुका था। बावजूद इसके कि शान-ए-सहारा के प्रबंधन और सहारा इंडिया के सुब्रत राय ने इस बारे में मेरे खिलाफ स्पष्ट तौर पर कड़ा मन बना रखा था। लेकिन श्रमिकों की जबर्दस्त एकता और एकजुटता ही उनकी सख्ती के खिलाफ हमारी मजबूती बढ़ाती रही थी।

दो जुलाई-85 की शाम को तय हो गया कि तीन जुलाई से शुरू होने वाली अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर श्याम अंकुरम बैठेगा और मेरी भूमिका इस आंदोलन को दूसरे श्रमिकों के संगठनों से सम्पर्क करने और हमारे आंदोलन को मजबूत करने की होगी। ऐन दिन सुबह दस बजे के करीब हमारी गेट मीटिंग के चलते हजारों श्रमिकों का रेला उमड़ने लगा। ढोल-मंजीरा और क्रान्तिकारी गीतों से पूरा सुंदरबाग गूंजने लगा। शहर के मानिन्द श्रमिकों ने हम लोगों के आंदोलन की सफलता की कामना की और करीब दोपहर बारह बजे श्याम अंकुरम अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठ गया।

उधर सहारा इंडिया और शान-ए-सहारा के दर्जनों वरिष्ठ अधिकारियों ने कीर्ति प्रेस पर जमावड़ा जमाया और कई दौर में जमकर दावतें उड़ायीं। जाहिर है कि उनकी यह हरकतें हम लोगों के आंदोलन की खिल्ली उड़ाने के लिए ही थी। लेकिन इसके अलावा हम कर ही क्या सकते थे। हां, केवल इतना ही कर सकते थे कि उनकी इस कमीनगी को हम उनके खिलाफ अपने हथियार की धार की ऊर्जा के तौर पर तब्दील कर दें। और हम लोगों ने यही किया। पहले दिन का आमरण अनशन बेमिसाल रहा। देर रात तक करीब दो-ढाई हजार श्रमिक हमारे आंदोलन से जुड़े रहे, लेकिन हम लोगों ने चाय की एक घूंट तक नहीं पी। आनन्द स्वरूप वर्मा जी हालांकि अभी तक शान-ए-सहारा से अलग हो चुके थे, और हम लोगों के आंदोलन के साथ थे। मगर खुलेआम नहीं।

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520
 

सहारा प्रबंधन ने मुझे दी थी एक लाख की रिश्वत वाली पेशकश

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग छह)

सहारा इण्डिया के पाप-कुण्ड में केवल ओपी और सुबोध ही निष्पाप दिखे

देर रात तक चकल्लस और क्रांतिकारी गीतों और नाटकों का रिहर्सल

लखनऊ: हमारे अखबार में एक विज्ञापन प्रतिनिधि हुआ करता था केके श्रीवास्तव। थोड़ा घमण्डी, लेकिन कम से कम मुझसे और अचिन्त्य अधिकारी से खुला हुआ था। कारण यह कि जब वह एच-रोड वाले मकान में आया, तब तक हम लोग आफिस बंद होने के बाद खूब मस्तीन किया करते थे। बाथरूम में तो गजबै कार्रवाइयां हुआ करती थीं। अचिन्त्य जब यहां आया तो सबसे पहले मैंने उसे सम्पूर्ण नंगा किया। फिर श्याम अंकुरम का नम्बर आया। एक नया क्लर्क भर्ती हुआ अभय श्रीवास्तव। वह भी गोरखपुर का था। रेल कालोनी में उसके पिता रहते थे। वह भी यहां नंगा हो गया। इसके बाद तो तय यह हुआ कि दफ्तर का काम निबटने के बाद से पूरे परिसर में हम लोग केवल नंगे ही रहते थे। चार के चारों नंगे।

बस इसी बीच एक फिर नया नमूना केके श्रीवास्तव वहां धड़ाम की तरह पहुंच गया। बस फिर क्या  था। उसे भी नंगा कर दिया गया। शुरूआत तो उसे अपने बड़े होने का बड़ा घमण्ड था, लेकिन जब जबरिया नंगा किया गया तो काफी डायल्यूट हो गया। उसके बाद से वह भी हमारी ही तरह नंगा ही रहने लगा। लेकिन कुछ भी इतना होने के बावजूद वह ओहदे के स्तर पर हम लोगों को किसी चपरासी से ज्यादा नहीं समझता था। हां, मेरे प्रति उसका व्यवहार दूसरे अन्य के अपेक्षाकृत ज्यादा घनिष्ठ था।

शान-ए-सहारा का आंदोलन अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचने लगा था। श्रमिक जगत में हम लोगों के नाम के डंके बजने लगे थे। इसी बीच अचानक केके श्रीवास्ताव ने एक दिन मुझे टोका। बोला:- "कहां रहते हो सौवीर। मैं न जाने कब से तुम्हें  खोज रहा हूं। चलो, मेरे एक चाचा जी हैं, तुमसे कुछ जरूरी बात करना चाहते हैं। चलो, अभी चलो।" और बिना पूरी बात किये उसने अपना स्कूटर स्टार्ट किया और फर्राटा का गन्तव्य सीधे अलीगंज के सेक्टर-बी में कोहली पैथॉलॉजी के सामने स्थित एक मकान तक पहुंचा। केके श्रीवास्तव ने इस मकान की घण्टी बजायी। कोई नौकर दरवाजा खोलकर बाहर झांका और केके श्रीवास्तव को देखते हुए दरवाजा पसार कर हम लोगों को पूरे सम्मान के साथ अन्दर ले गया।

रवैये से पता तो चल ही गया कि केके श्रीवास्तव के इन चाचा के यहां उसकी खासी पूछ है। मैंने टेबुल पर पड़ी मैग्जी‍न के पन्ने पलटना शुरू किया कि अचानक केके श्रीवास्तव हड़बड़ा कर खड़ा हो गया। साफ लगा कि घर का मालिक पहुंच गया था। मैं भी उठा लेकिन इस शख्स को देखते ही मैं हैरत में आ गया। केके श्रीवास्तव के यह चाचा कोई और नहीं, साक्षात ओपी श्रीवास्तव ही थे। सहारा इंडिया में सुब्रत राय के बाद के दूसरे नम्बर के निदेशक। हालांकि मेरी समझ में ओपी श्रीवास्तव का व्यवहार हमेशा सुलझे हुए शख्स की ही तरह होता रहा था, इसलिए इस अचानक हुई मुलाकात से कोई खास हड़कम्प मैंने खुद में नहीं समझी। लेकिन एक झिझक तो हो ही गयी। आखिर वह बहुत बड़े ओहदेदार थे और मैं सम्पादकीय विभाग के सबसे छोटे पायदान पर लटका हुआ शख्स। तुर्रा यह कि आजकल मैं बर्खास्तशुदा भी था।

केके श्रीवास्तव ने लपक कर ओपी श्रीवास्तव का चरण-स्पर्श किया और फिर जबरिया मुझे झुकाकर मेरे हाथों को उनके चरणों पर स्पर्श करा दिया। मेरी हल्की भी सही, मगर झिझक को तोड़ा ओपी श्रीवास्तव जी ने। बोले:- "अरे आराम से बैठो, यह मिठाई खाओ। न न, शर्माओ मत। जैसे यह केके श्रीवास्तव मेरा भतीजा है, ठीक उसी तरह मैं भी तुम्हारा चाचा हूं।" और अपनी ही बात पर ओपी श्रीवास्तव जी जोरदार ठहाके लगाने लगे। मैंने भी हंसने की कोशिश की। ऐसे मौकों पर, जब सबसे बड़ा आदमी हंस रहा हो, तो हम जैसे लोगों का न हंसना भी तो अभद्रता हो जाती है ना। बात भले चूतियापन्थी की हो।

अगली बात भी ओपी जी ने ही की। बोले:- "क्या चल रहा है आजकल।" वक्ती तौर पर तो मैं हल्का झिझका था, लेकिन था तो मैं गजब का ही खिलन्दड़, बोला:- "बस, वही आन्दोलन, सहारा इंडिया के खिलाफ ही चल रहा है।" चाचा ने कुछ सोचा, फिर बोले:- "बेटा, मैं तुम को बहुत प्या‍र करता हूं। बहुत सम्मान देता हूं तुम लोगों के हौसलों को। अगर यह गर्मी न हो, तो इंसान कभी भी इंसान न बन पाये। लेकिन जरा यह भी तो समझो कि इससे तुम्हें मिलेगा क्या? केवल परेशानियां और दुश्वारियां ही तो!

चाचा ने अपनी बातें जारी रखीं:- "देखो सौवीर, तुम जवान हो, समझदार हो, मेहनती हो, जोश भी है तुमने, कुछ कर डालने का माद्दा है तुममें। तो फिर उसका इस्तेमाल भी तो करो। चलो, माना कि यह जवानी का जोश तुम पर चढ़ा हुआ है। यह आन्दोलन-फान्दोलन से क्या मिलेगा तुम्हें? इससे रोटी तो नहीं मिल सकती है ना? बताओ ना? खुद भी भूखे रहोगे और अपने साथियों को भी भूखा रखोगे? क्या यही जिन्दगी होगी तुम्हारी? मैं समझता हूं कि अब मैं तुम्हें सही लाइन पर खड़ा कर दूं। मैंने तय किया है कि मैं तुम्हा्रे लिए एक प्रेस खुलवा दूं। न न, पैसे के लिए तुम्हें परेशान नहीं होना पड़ेगा। मैं हूं ना अभी। तुम्हारा चाचा अभी जिन्दा है बेटा, इसीलिए कह रहा हूं कि तुम जाओ और अपना एक नया प्रेस खड़ा करो। दूसरों के भड़काने पर मत चलो। अरे कितना खर्चा लग जाएगा एक प्रेस खड़ा करने में? 70-80 हजार? अरे 90 हजार या इससे भी ज्यादा, बताओ ना? अरे चलो, माना कि इसके लिए एक लाख रूपयों की जरूरत पड़ेगी, तो हो। मैं हूं ना। चाचा के रहते कुछ मत सोचना। मैं दूंगा यह रकम। हां, हां, अपनी जेब से दूंगा। सहारा इंडिया के खाते से नहीं। वहां से तो दे भी नहीं सकता। बड़े साहब ( सुब्रत राय ) इसकी इजाजत ही नहीं देंगे। तुम्हें बताऊं कि वे तुमसे बहुत नाराज हैं। तुम्हारी हरकतों से उनका दिल ही टूट गया है। खैर, उन्हें तो अब पता भी नहीं चलना चाहिए कि मैं यह सब तुम्हारे लिए कर रहा हूं। बिलकुल अपने स्तर पर रखना।"

"और यह मेरी एक सलाह है तुम्हें। सलाह क्या, समझो तुम्हारे चाचा तुम्हें हुक्म दे रहे हैं और अब भतीजे को अपने चाचा का आदेश मानना ही पड़ेगा कि तुम इन हड़तालियों से हट जाओ। बिलकुल हट जाओ। जाओ, अपना भविष्य सम्भालो। और जब भी कभी तुम्हें मेरी जरूरत पड़ेगी, मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा। तो आज और अभी से ही यह हड़ताल की बात भी तुम्हारी दिमाग में नहीं आनी चाहिए। हट जाओ इन लोगों से। यह लोग तुम्हारी जिन्दगी खराब कर देंगे। यह लोग तो खुद को भुखमरा करने के लिए पैदा होते हैं, तुम्हें भी भूखा मार कर खत्म कर देंगे। तो, मानोगे ना मेरी बात?"

गजब घेराबंदी हो गयी थी मेरी। समझ में नहीं आया कि तत्काल मैं क्या जवाब दूं? अपना पिण्ड छुड़ाने के लिए आखिरकार बोल ही दिया:- "जी, जैसा आप कहेंगे, वैसा ही करूंगा।" एक ताजा-ताजा जबरिया बने चाचा-भतीजे के खालिस बलुआ रिश्ते से इतने से ज्यादा रस निकल भी तो नहीं सकता था ना। उस घर से निकलने पर जब ताजा हवा के झोंकों ने मेरे दिल-दिमाग को ठण्डा किया तो यही पहला अहसास हुआ कि:- "इतना ही बहुत है यार। बोलो, है कि नहीं"

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520
 

सुब्रत राय ने नौकरी छीनी तो श्रमिक जगत ने हमें सिर-माथे पर लिया

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग पांच)

लखनऊ के श्रमिक आंदोलन का ऐसा जोश अब स्वप्न से परे है

राजकुमार केसवानी ने की थी भोपाल औद्योगिक नर-संहार की भविष्यवाणी

लखनऊ: आज के पत्रकारों को यह अहसास करने का मौका तक नहीं मिला होगा कि इस देश में कोई भीषणतम औद्योगिक नर-संहार भी हो चुका है। जी हां, हम यूनियन कार्बाइड हादसे की बात कर रहे हैं जिसकी भोपाल वाली कीटनाशक दवा बनाने वाली यूनिट में एमआईसी(मिक) यानी मिथाइल आइसो सायनाइड की टंकी रिसने लगी और इस हादसे में करीब चालीस हजार लोगों की मौत हो गयी। इतना ही नहीं, करीब सवा पांच लाख लोगों पर स्थाई तौर विकलांगता का प्रभाव पड़ा।

 
यह हादसा 3 दिसम्बर-84 की रात तब हुआ जब पूरा भोपाल समेत पूरा देश गहरी नींद की आगोश में था। इस हादसे की गम्भीरता का पता तो दो दिन बाद तब पता चला जब सरकारी ऐलान हुआ कि हादसे की रात ही 2259 लोगों ने दम तोड़ दिया था। हैरत की बात तो यह रही थी कि न तो फैक्ट्री प्रबंधन को और न ही सरकार को यह पता तक नहीं था कि यहां गैस रिसाव का इलाज क्या होना चाहिए। करीब चार दिन तक भोपाल श्मशान में तब्दील होता रहा था। उसके बाद ही पता चला कि इस गैस टंकी के रिसाव पर अगर पानी का छिड़काव कर दिया जाए तो उसे थामा जा सकता है। नतीजा, हेलीकॉप्टर से पूरी फैक्ट्री परिसर पर पानी का छिड़काव किया गया।

इसके एक हफ्ते बाद मध्य प्रदेश सरकार ने दावा किया कि इस हादसे में कुल 3787 व्यक्तियों की मृत्यु गैस के रिसाव के परिणामस्वरूप हुई थी। लेकिन गैर सरकारी अनुमानों के अनुसार आठ से दस हजार लोगों की मौत गैस रिसाव के 72 घंटे के भीतर हो गई थी, और लगभग 25,000 व्यक्ति गैस से संबंधित बीमारियों से मर चुके हैं। 40,000 से अधिक स्थायी रूप से विकलांग, अंधे और अन्य गैस व्याधियों से ग्रसित हुए थे, सब मिला कर 5,21.000 लोग गैस से प्रभावित हुए। इस हादसे ने पूरे विश्व को दहला दिया था।

दरअसल यूनियन कार्बाइड की जमीनी हकीकत को पहली बार एक पत्रकार ने खुलासा किया था जिसका नाम था राजकुमार केसवानी ने। वह जनसत्ता का भोपाल रिपोर्टर था। पहले पन्ने के पांच कॉलम बॉटम में छपी इस खबर में राजकुमार केसवानी ने लिखा था कि यहां कभी भी हो सकता है श्रमिकों का नरसंहार, जिसका कारण बनेगी यहां बनने वाली दवा की गैस-टंकी। इस खबर ने देश भर के श्रमिकों का ध्यान आकर्षित किया और फिर तो बवण्डर ही खड़ा हो गया। और फिर अचानक जैसे ही यह हादसा हुआ, श्रमिक जगत में हंगामा खड़ा हो गया। देश में ओद्योगिक असुरक्षा के माहौल के खिलाफ श्रमिकों का गुस्सा स्वाभाविक भी था।

यूनियन कार्बाइड की एक यूनिट लखनऊ में भी थी, मगर यहां जीप नामक टॉर्च और बैटरी बनती थी। यहां भी हजारों कर्मचारी थे और आंदोलन चरम पर था। और भोपाल काण्ड के बाद तो यहां मानो आग ही लगा दी थी। वैसे भी, अक्सर यहां बवाल होता रहता था। गेट मीटिंग्स नियमित होती रहती थी। धरना दिन-रात चलता था। अक्सर भूख-हड़ताल भी चलती थी। दरअसल, यह गढ़ था कर्मचारी असंतोष और उसके खिलाफ उमड़े श्रमिक आंदोलन का।

जैसा कि मैंने कहा, कि यह श्रमिक आंदोलनों का दौर था। हालांकि इसके पहले भी ट्रेड यूनियनों की सक्रियता खूब थी। जहां भी शोषण और अन्याय होता था, यह यूनियनें अपना झण्डा लेकर खड़ी हो जाती थीं। चाहे वह दवा उद्योग रहा हो या फिर फैक्ट्री या बैंक, रेल या प्रिंटिंग उद्योग। बाजार और दूकानों पर भी आंदोलन की आंच थी। श्रमिक आंदोलन के बड़े नेता यहीं जुटते थे। मसलन उमाशंकर मिश्र और उनके सहयोगी शिवगोपाल मिश्र जो आज देश की रेल श्रमिकों द्वारा निर्वाचित प्रमुख हैं और उनका दर्जा केंद्रीय मंत्री का है। बैंक-‍कर्मियों के नेता राकेश का गजब जलवा हुआ करता था। नाटककारों में आत्मजीत हम लोगों के आदर्श थे। क्या् ऐशबाग इं‍डस्ट्रियल एरिया था या फिर नादरगंज, इस्माइलगंज, अमौसी या फिर अपट्रान अथवा मोहन डिस्टलरी का क्षेत्र। यह वह दौर था जहां जिजीविषा हुआ करती थी, दलाली की गुंजाइश नहीं। एक आवाज पर सारे कर्मचारी जुट जाते थे।

28 मई-85 से हम तीनों लोग तो बर्खास्तशुदा हो चुके थे। सो, मैंने और श्याम अंकुरम ने अपना डेरा-डंगर श्रमिक आंदोलन में लगा दिया। ज्यादातर वक्त यूनियन कार्बाइड के गेट पर ही बीतने लगा। श्याम अंकुरम तो अपना ज्यादातर वक्त किताबें पढ़ने में लगाता था, बाकी वक्त् में वह नारकीय, असह्य और भीषण बदबू रिलीज करने में जुटा रहता था। मैं क्रांतिकारी गीतों और नुक्कड़-नाटकों में जुट गया। वहां के प्रमुख श्रमिक नेता थे गंगाप्रसाद जी, विद्युत सिंह जैसे करिश्माई लोग। उनके प्रेम-स्नेह की गंगा, जल्दी ही हम लोगों पर जमकर बरसने लगी। कुछ ही समय भीतर हम लोग लखनऊ के श्रमिक आंदोलन के अपरिहार्य अंग बन गये। हर गेट मीटिंग पर हमारी टोली जुटती थी। नाटक के बाद हम लोग अपनी चादर गेट के सामने बिछा देते थे जिस पर लोगबाग अपनी सामर्थ्य भर पैसा डाल देते थे। लेकिन हम लोगों ने शान-ए-सहारा प्रेस की ड्योढ़ी नहीं छोड़ी थी। सुबह-शाम हम लोग यहां जुटते थे। नियम से।
 
शहर की सारी फैक्ट्रियों के मजदूरों से मिलना-जुलना शुरू हुआ तो बदले में वहां के मजदूर भी हमारे गेट पर जुटने लगे। सारे कम्पोजीटर्स तो हमारे साथ थे ही। हमारे आंदोलन ने इन लोगों का हौसला बढ़ाया था। वैसे भी, वे बेचारे अगर जाते भी तो कहां। उधर हम लोग जब नुक्कड़ नाटकों के बाद जो पैसा जुटाते थे, उससे रोटी-चोखा-भुर्ता हमारे ही प्रेस के गेट पर बनता था। पूरी रात यहीं से संचालित होती थी। देर रात तक चकल्लस और क्रांतिकारी गीतों और नाटकों का रिहर्सल हुआ करता था। शाम उतरते ही हमारा प्रेस मजदूरों का किला बन जाता था। चूंकि हम लोग पूरी तरह शांतिपूर्वक रहते थे, इसलिए पीएसी वालों ने प्रेस बंद होने बाद हम लोगों को मैदान और उसका शौचालय आदि इस्तेमाल करने की इजाजत भी दे रखी थी। सुबह नौ बजे तक हम लोगों को यह परिसर खाली करना होता था। पीएसी की ओर से पूरी सख्ती बरती जा रही थी कि कोई भी साथी मजदूर प्रेस की ओर न जाए।

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520
 

28 मई 1985 को सुब्रत राय ने मुझे बर्खास्त कर दिया, मजदूर हितैषी तडि़त कुमार दादा ने जारी कराया आदेश

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग चार)

पारिवारिक संस्था व सर्वहारा की डींग मारते पाखण्डी बुर्जुआ लोग

लखनऊ: अखबार को शुरू हुए दो साल शुरू हो चुके थे। कर्मचारियों में खुसफुसाहट शुरू हो गयी थी कि वेतन बढ़ना चाहिए। सम्पादकीय लोगों में भी चर्चा पकड़ रही थी। कि अचानक अप्रैल-85 को ऐलान हुआ कि सभी कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ गयी है। दिल धकड़ने लगा था। किसी से भी पूछने लगो तो जवाब ही नहीं मिलता था। जिस जिसी से भी पूछता, तो जवाब मिलता कि लेटर मिलने के बाद ही पता चलेगा। आखिरकार एक दिन लेटर मिल ही गया। हालांकि सबको गोपनीय पत्र से सूचित किया था, लेकिन यह बात छुप कहां होती है। दो-एक दिनों में ही पता चला कि तडित दादा का वेतन साढ़े छह हजार, वर्मा जी का साढे चार हजार, सम्पादकीय लोगों का 12 सौ से ढाई हजार के बीच मिला था। मेरा व श्याम की पदोन्नति हो गयी थी और हम लोगों को कॉपी-होल्डर के बजाय सीधे प्रूफ रीडर बनाते हुए 660 रूपया महीना मिलेगा।

लेकिन कम्पोजिंग सेक्शन में मातम पसर गया। उनमें से 5 से लेकर 50 रूपया तक की वेतन-वृद्धि दी गयी थी और कई लोग तो ऐसे थे जिन्हें एक कानी-फूटी दमड़ी तक नहीं दी गयी थी। चूंकि हम लोग इसी कम्पोजिंग सेक्शन में बैठते थे, इसलिए उनका रूदन सबसे हम लोगों ने सुना। कम्पोजीटर्स ही हम लोगों के अभिन्न थे, और उनमें बेहिसाब आक्रोश था। तय हुआ कि चूंकि यह बढोत्तरी अपमानजनक है। आपको सच बताऊं कि कम्पोजिंग सेक्शन वाकई अमानवीय माहौल में बैठता था। बाकी दफ्तर मे तो गर्मियों के दिनों कूलर लगे हुए रहते थे और जाड़ों में हीटर। लेकिन कम्पोजिंग सेक्शन एसबेस्टेस शीट से घिरी छत पर सिमटा हुआ करता था। गर्मी के दिनों में तो यहां बेहोश कर देने वाली गर्मी तड़कती थी जबकि सर्दियों में टेम्पेरेचर बाकी दफ्तर के मुकाबले बेहद कम।
 
उस पर तुर्रा यह कि कम्पोजिंग कर्मचारियों की तनख्वाह कुछ इस तरह बढ़ायी गयी थी मानो भीख दी गयी हो। हालांकि मेरा और श्याम का वेतन दो गुना से भी ज्यादा बढ़ चुका था, लेकिन आक्रोश तो हम लोगों में भी था। प्रश्न केवल यही नहीं था कि हम लोगों की तनख्वाह बढ़ी है, बल्कि समस्या यह थी कि हमारे बाकी साथी भूखों मर रहे थे। अरे सौ-सवा सौ में भी कोई आदमी कैसे अपना परिवार का पेट पाल सकता है? मैं मानता हूं कि इनमें कई कम्पोजिटर्स ऐसे थे जो वाकई गधे थे, लेकिन मैं शपथ ले कर कह सकता हूं कि ज्यादातर कम्पोजीटर्स में ज्ञान, कुशलता, और त्वरा इतनी थी कि शायद खुद वर्मा जी और तडित जी में भी न रही होगी। इन लोगों ने कई बार नहीं, सैकड़ों हजारों बार मुझे इन बड़े पत्रकारों की ऐसी-ऐसी कापी दिखायीं जिससे किसी को भी शर्म आ सकती थी, जिनमें इन कम्पोजीटर्स ने हंस करते हुए उन्हें सुधार लिया था। जी हां, यही था इन छोटे लोगों का बड़प्पन। फिर जब ऐसे छोटे-ओछे लोग अगर भूख के लिए तड़प रहे हों, तो कम से कम हम लोग तो चुप नहीं रह सकते थे। इसीलिए हम लोगों ने तय कर लिया इस वेतन बढोत्तरी के खिलाफ हम लोग विरोध दर्ज करेंगे और जब तक वेतन असंगति बनी रहेगी, कम्पोजिंग सेक्शन के हम सारे लोग अपना वेतन नहीं उठायेंगे।

लेकिन यह क्या? आसमान फट गया। वही लोग जो क्यूबा, रूस, चीन आदि देशों के मजदूर आंदोलनों से लेकर चेग्वेरा-माओ-लेनिन-मार्क्स को आदर्श के तौर पर माना करते थे, वे हम लोगों पर तेल-पानी लेकर पिल पड़े। उनकी नयी शब्दावली में सर्वहारा का मतलब अपने श्रमिकों को पूरी तरह हारा-त्रस्त कर देना ही बन गया था। अब उनका सर्वहारा का अर्थ पूरी तरह बदल चुका था। तडित दादा तो किसी सामन्ती जमीन्दार या उनके शब्दों में कहें तो बुर्जुआ की तरह अपने राजा की रक्षा के लिए हर सच-झूठ साबित करने में जुटे थे। कम्पोजीटर्स के आर्तनाद पर हम लोगों ने जो फैसला किया, उसका पता चलते ही तडित दादा रौद्र-रूप पर आ गये। राम-सीता स्वयंवर-लीला के परशुराम की तरह फरसा-नुमा पेन नचाते हुए बोले:- "तुम, तुम लोग? मेरे ही खिलाफ हो और मेरी ही कब्र खोदने पर आमादा हो तो मैं भी अब तुम लोगों को औकात में खड़ा न कर पाया तो मेरा भी नाम तडित कुमार चटर्जी नहीं।"
 
यकीन नहीं आया कि यह तडित दादा की आवाज है, जिन्होंने अपनी बेरोजगारी के दौर में कविता लिखी थी कि:- "मैं कुत्ता नहीं जो वक्त–बेवक्त अपनी पूंछ हिलाता रहूं।" तडित दादा की नाराजगी कर्मचारियों के रवैये पर तो थी ही, साथ ही वे आनन्द स्वरूप वर्मा के रवैये पर ज्यादा खफा थे। वजह यह कि वर्मा जी ने अपना वेतन बहुत कम समझा था। नतीजा, वर्मा जी ने पहले तो हमारे आंदोलन से दूरी बनाये रखी, क्योंकि उन्हें  अपनी वेतन-वृद्धि बहुत कम लग रही थी और वे चाहते थे कि यह बढ़ोत्तरी कम से कम छह हजार तक हो। सम्पादकीय से जुडे कुछ लोगों ने हम लोगों को खुफिया जानकारियां दी थीं। छन कर जो भी खबरें आयीं, उनसे पता चला कि सुब्रत राय से भेंट करके वर्मा जी ने अपने घर के सारे खर्च का बाकायदा एक परचा लिख कर सौंपा था। उनका कहना था कि इतनी कम वेतन में उनका काम नहीं चल पा रहा है। लेकिन सुब्रत राय ने उस परचे की ओर झांका तक नहीं। बोले: "अगर आपको लगता है कि इतने पैसे से आपका काम नहीं चल पायेगा, तो आप कहीं दूसरी जगह पर काम खोज लीजिए।"

अब यह तो पता नहीं चला कि सु्ब्रत राय से और क्या-क्या बातचीत वर्माजी की हुई, लेकिन एक दिन बाद ही वर्मा जी के घर से जाकर सहारा के कुछ लोग पहुंचे और स्कूटर अपने साथ लेकर चले गये। यह अपमान की पराकाष्ठा थी, हम लोगों को भी यह हरकत बहुत बुरी लगी। और अपनी इसी नाराजगी को हम लोगों ने अपने आंदोलन की ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया।
 
कुछ भी हो, दो-चार दिनों के भीतर हम लोगों के साथ ज्यादातर सम्पादकीय सहकर्मी जुड गये। इसी के साथ ही साथ अगली 28 मई-85 को तडित कुमार दादा ने संस्थान के तीन लोगों को बर्खास्त करते हुए करीब छह लोगों को देश के भिन्न-विभिन्न शहरों पर ट्रांसफर करने का आदेश जारी कर दिया। जिन लोगों को बर्खास्त किया गया था उनमें पहले नम्बर पर था, मेरा यानी कुमार सौवीर का नाम, फिर श्याम अंकुरम और तीसरा नाम था एक कम्पोजीटर सुरेंद्र सिंह। हम लोगों को दफ्तर में आने पर मनाही कर दी गयी। लेकिन हम लोग भीतर जाने लगे। हमारा विरोध बढ़ चुका था, हमारे खिलाफ मैनेजमेंट ने सुब्रत राय को क्या-क्या पट्टी सिखाया-समझाया, पता नहीं। लेकिन अगले पखवाड़ा के भीतर ही सुब्रत राय ने प्रेस के गेट पर ही एक पीएसी का तीन टेंट लगवा दिया, जिसमें करीब तीन दर्जन जवान मुस्तैद रहते थे। साफ संदेश था कि सुब्रत राय अब हम मजदूरों का दमन ही करेंगे। इसके लिए उन्हें चाहे कितनी भी कीमत चुकानी पड़े।
 
पीएसी के यह जवान दिन भर प्रेस के प्रांगण में सावधान-विश्राम करते रहते थे। उनकी राइफलें और उनकी संगीनें लगातार चमकती रहती थीं। सहारा के लोग उनके साथ ही गेट पर रहते थे, और उनकी इजाजत के बिना किसी को भी भीतर जाने की इजाजत नहीं मिलने लगी। यानी जंग शुरू हो गयी।

और यह जंग उस सुब्रत राय नामक शख्स ने छेड़ी, जो अपने संस्थान को कर्मचारियों की एक निजी पारिवारिक संस्था के तौर पर पेश करता और प्रचारित करता रहा था। वह सहारा इंडिया को परिवार बताता था और इस परिवार के सारे सदस्य मेरे इसी परिवार के बच्चे हैं और सुब्रत राय इस परिवार का मुखिया है। इसी परिवार के मुखिया ने अपने ही परिवार के विखण्डन का ताना-बाना बुना और तय कर दिया कि इस परिवार के इन तीन सदस्यों का जीवन तबाह कर देगा। और इसके लिए वह पीएससी तैनात कर इन्हींक पारिवारिक सदस्यों को खण्ड-खण्ड कर चूर-मसल देगा।

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520

पत्रकारिता के बड़े पदों को छेंके हुए ओछे बौने लोग

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग तीन)

पत्रकरिता में खोखले सुरंग-जीवीयों को करीब से देखा मैंने

मौका मिलते ही पाखण्डी बन जाते हैं आदर्श बघारते लोग

लखनऊ: आपको एक बात बता दूं कि इस पूरे अखबार में सुब्रत राय ने एक बार भी हस्तक्षेप नहीं किया। हां, एक बार सुब्रत राय के नाम से एक पत्र जरूर प्रकाशित हुआ। पूरे दौरान केवल तीन बार ही प्रेस में आये और बारीकी से यहां को देखा-समझा। लेकिन ऐसा नहीं है कि यह अखबार पूरी तरह शांत रहा था। गुटबाजी और तेल लगाने की परम्परा यहां पनप गयी। मसलन, सन-84 में इंटर की परीक्षाओं के दौर में मेरे दाहिने हाथ पर तेल खौलती कटोरी गिर गयी थी। बड़ा फफोला पड़ गया था। बेहिसाब जलन थी। उसी हालत में मुझे एक राइटर देकर परीक्षा करायी गयी। अगले दिन जब परीक्षा देकर मैं आफिस पहुंचा, तो काम करने के बीच ही मुझे झपकी आ गयी। कि अचानक सुब्रत राय मुआयने पर पहुंचे। मैं कुर्सी की पुश्त पर टेक लगाये हुए था। सुब्रत राय ने कंधे पर हाथ रखा तो मैं जाग गया। चूंकि मैं यहां का पहला कर्मचारी था, इसीलिए वे मुझे खूब पहचानते थे।

मुझसे पूछा: सौवीर, यह सोने की जगह है क्या  ?

मैंने अपने दाहिने हाथ पर पड़े गमछे को हटाया तो सुब्रत राय चौंक पड़े। वहां मौजूद तडित दादा आदि लोगों से कहा कि:- दादा, आप लोग इन लोगों का भी ध्यान रखा कीजिए। जाओ, तुम कुछ दिन की छुट्टी ले लो। मुझे सुब्रत राय की यह शैली मुझे बहुत अच्छी। लगी। लेकिन अभी जब मैं खुश ही रहा था कि अचानक सुपरवाइजर हरीओम कनौजिया ने एक नोटिस थमा दी। इसमें लिखा था कि सुब्रत राय के अचानक मुआयने के मौके पर कुर्सी पर सोते हुए पाये जाने पर आपके खिलाफ क्यों न गम्भीर कार्रवाई की जाए। हैरत की बात यह कि नोटिस तडित दादा की ओर से जारी किया गया था। मैंने जो कुछ भी हुआ था, लिख कर दे दिया और साथ ही लिख दिया कि सुब्रत राय को इस घटना का संज्ञान है और तडित दादा अगर चाहें तो उसकी पुष्टि सुब्रत राय से करा सकते हैं।

मगर हैरत की बात है कि इसके बाद से ही तडित जी और वर्मा जी का व्यवहार मेरे खिलाफ सख्त हो गया। इसके पहले मेरी कई रिपोर्ट्स अक्सर छपी रहती थीं, लेकिन उसके बाद से यह सुविधा बंद हो गयी। नतीजा, मैंने कई प्रमुख घटनाओं की रिपोर्ट्स लिखी और उसे सीधे नवभारत टाइम्स और अमर उजाला जैसे अखबारों में दे दिया। नवभारत टाइम्स में कमर वहीद नकवी और अमर उजाला में थे वीरेन डंगवाल। बेहद आत्मीय शख्सियतें। उस समय नवभारत टाइम्स में फीचर प्रभारी थे कमर वहीद नकवी। वे भी मुझे स्नेह करते थे और मेरी ऐसी सारी रिपोर्ट्स को उन्होंने बाकायदा सम्मान के साथ छापा। आज दैनिक ट्रिब्यून के समूह सम्पादक सन्तोष तिवारी जी तब दिनमान में थे। उन्होंने तो मुझे सांस्कृतिक गतिविधियों का नियमित लेखक बना डाला था।

इसी बीच सन-84 में अचानक बहराइच जिला मुख्यालय स्थित बच्चों की जेल में बच्चों ने आगजनी की थी। इन बच्चों ने इस बच्चा-जेल के कर्मचारियों को जमकर पीटा और जेल तोड़कर भाग गये थे, इसकी खबर मुझे शाम को ही मिल गयी। पता चला कि इस बच्चा‍-जेल का अधीक्षक कोई त्रिपाठी था, जो यहां के बच्चों के साथ समलैंगिक-रिश्ते बनाता था। त्रिपाठी ने जिले के कई बड़े जजों-अफसरों के ऐसे शौक के लिए लड़के मुहैया करा रखे थे। कई बड़े पैसावाले लोग भी इसी त्रिपाठी के लिए यह धंधा कराते थे। मैंने एक अखबारी टैक्सी पकड़ा और सुबह-सुबह बहराइच पहुंच गया। पता चला कि एक फोटोग्राफर ने उसका कवरेज किया था। मैंने उससे रील हासिल कर ली। शाम तक काम किया और अगले सुबह स्क्रिप्ट दादा के हवाले किया। मगर दादा का मूड बिगड़ गया।

बोले: तुम किससे पूछ कर बहराइच गये थे?
मैंने जवाब दिया: कल मेरी छुट्टी थी।
दादा बहुत बिफरे और बोले: मैं एक रिपोर्टर बहराइच भेज रहा हूं और उसकी ही रिपोर्ट छपेगी, तुम्हारी नहीं।

लंच टाइम मैं कमर वहीद नकवी के आफिस पहुंचा। तब वे हस्तक्षेप नामक पेज भी तैयार करते थे। चार-पांच दिन बाद ही यह पेज लगना था, लेकिन उन्होंने गजब दिमाग लगाया और 14 नवम्बर को हस्तक्षेप पेज बनाकर मेरी खबर छाप दी। पेज पर बैनर। मय फोटो। खबर का शीर्षक लगाया: सवाल, जो पूरी शिद्दत के साथ जवाब चाहता है। इतना ही नहीं, श्याम अंकुरम ने एक व्यंग्य लिखा था, उसे हमारे नियंताओं ने बकवास बताते हुए मेज पर फेंक दिया। यह अपमान था, वह परेशान हो गया। मैंने सलाह देकर उसे अमृतप्रभात के विनोद श्रीवास्तव के पास जाने को कहा। मजेदार बात यह कि विनोद जी ने अपने अगले रविवारीय अंक के प्रथम पृष्ठ पर छाप दिया। और उसका पारिश्रमिक उसे 35 रूपया मिला। पैसा की बात उतनी बड़ी नहीं थी, उसका छपा नाम देख कर वह उचककर बजरंग-बली हो गया।

यह बातें हमारे संस्थान में लगातार खटकती जा रही थीं। दरअसल, हम लोग चाहते थे कि हमें भी लिखने का मौका मिले, लेकिन हमें लद्दू-गदहा बनाने पर मजबूर किया जा रहा था। हम पर ऐतराज होने लगा कि हम लोग बाहर के अखबारों में नहीं लिख सकते। मैंने ऐतराज किया कि आखिर क्यों नही लिख सकते हैं। यह तो दादागिरी है कि आप न तो छापेंगे और जब कहीं और छपेगा तो उस पर ऐतराज करेंगे। मगर उनका ऐतराज बना रहा और हमारा रवैया भी उसी तर्ज पर स्टैंड करता रहा। हैरत की बात है कि सम्पादकीय लोगों ने हम लोगों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। अक्सर हम लोगों पर आक्षेप लगने लगे तो मैंने भी मोर्चा खोला। इन लोगों की कॉपी चेक लगा और वहां मौजूद भारी गलतियों और ब्लंडर्स को चिन्हित करने लगा। उनकी कापी पर नोटिस लिखने लगा यदि त्रुटियां नहीं सुधारी गयीं तो हम उन्हें यथावत पास कर दिया करेंगे। मगर इन लोगों ने अपना रवैया नहीं बदला, मगर हम लोग सहज ही रहे। इस बात का मुझे गर्व है कि हम लोगों ने कभी भी कोई गलती प्रिंट में जाने नहीं दी। मजेदार बात तो यह है कि हमारे पास आने वाली सारी कॉपी भारी-भरकम त्रुटियों-गलतियों से सराबोर रहती थीं। हा हा हा..

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520
 

दूसरों की मजबूरियां दो कौड़ी में खरीदने सुब्रत राय को महारत है

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग दो)

मुझे गर्व है कि दिग्गजों ने मेरे भविष्य की दिशा तय की

नौकरी मिली तो मछली-भात, और बेरोजागार हुए तो क्रांति-कामी

लखनऊ : साप्ताहिक शान-ए-सहारा अखबार के लिए आफिस खोजने के लिए दो दिनों में ही मैंने सात मकान छान मारे। अपनी टुटी लेडीज साइकिल के बल पर। तडित दादा तो कुछ देर के लिए सुब्रत राय के अलीगंज वाले मकान में कुछ देर के लिए ही आते थे, फिर बाकी अपने घर में ही। दरअसल, खाली वक्त में दादा को मछली की याद सबसे ज्यादा सताती थी ना, इसीलिए। और दादा की खासियत यह है कि वे खाली वक्त तब ही पाते हैं, जब नौकरी उनके हाथ में होती है। नौकरी मिली तो मछली-भात, और जब बेरोजगारी मिली तो क्रान्तिकारिता। लेकिन हम लोगों के प्रति दादा ही नहीं, पूरा परिवार भी स्नेह-प्यार की वर्षा करता था। मैं भी खाली ही था, न घर-बार न परिवार। सो, ज्यादातर वक्ता दादा की सेवा में ही रहता था मैं।

खैर, महानगर के एच-रोड स्थित एक मकान हम लोगों ने खोजा और तय किया। कुल जमा तीन कमरे थे, एक किचन-बाथ सहित। मैंने दादा को दिखाया, फाइनल किया और पजेशन ले लिया। तब तक एक नया जोशीला लड़का भी हम लोगों में जुट गया। नाम था अचिन्त्य अधिकारी। वह बंगाली था। न उसके पास कोई ठिकाना और न मेरा। सो, इसी आफिस में हम दोनों का डेरा पड़ा। तीन महीनों के भीतर सम्पा‍दकीय सहयोगियों का चयन हो गया और उनकी कुर्सियां पड़ गयीं। डमी की तैयारी होने लगी। तब तक श्याम अंकुरम को भी कॉपी-होल्डार के पद पर तैनाती मिल गयी।

इसी बीच हीवेट रोड पर एक नया प्रेस मिल गया सहारा को। नाम था कीर्ति प्रेस। इसके मालिक के पिता ने बेहिसाब मेहनत-निष्ठा के साथ यह प्रेस खड़ा किया था और उसका नाम अपने बेटे के नाम पर रखा था। यह प्रेस प्रिंट-जगत में बहुत बड़ा नाम था। लेकिन इस बंगाली ने उसे तबाह कर दिया। कीर्ति बनर्जी को दुनिया भर के शौक थे, और उसी में कीर्ति की साख बह गयी। फिर उन्होंने सुब्रत राय के यहां नौकरी कर ली और यह प्रेस सहारा ने किराये पर ले लिया। तब तक सुब्रत राय की छवि बन चुकी थी कि वे अपने लोगों की कमियों को कौड़ियों में खरीद लेते हैं।

खास बड़ा था इसका परिसर। अखबार का दफ्तर इसी में खुला। अब तक इसमें आनन्दस्वरूप वर्मा और उर्मिलेश जैसे लोग जुड़ चुके थे। उर्मिलेश तो दिल्ली सम्भाल रहे थे, जबकि आनन्दस्वरूप वर्मा जी लखनऊ पधारे। सहारा ने दादा और वर्मा जी को एक-एक मकान और स्कूटर की सुविधा दे दी थी। इन दोनों का आवास अलीगंज के सेक्टर-डी में ही था। करीब-करीब एक-दूसरे के आसपास ही। वर्मा जी ने अपने नोएडा वाले मकान सहारा को किराये पर गेस्ट हाउस के तौर पर दे दिया था।
 
अब आइये, मैं आपको बताता हूं कि इस अखबार में वेतन-स्ट्रक्चर क्या था। तडित दादा का वेतन ढाई हजार, वर्मा जी का डेढ़ हजार, रिपोर्टर और डेस्क वालों का साढे़ छह से लेकर 12 सौ रूपये तक। इनमें रामेश्वर पाण्डेय, वीरेंद्र सेंगर, कमलेश त्रिपाठी, घनश्याम दुबे, विनय सिंह, दिनेश दीनू, आदियोग वगैरह आदि शामिल थे। उल्लेखनीय है कि तडित दादा ने अपने गोरखपुर के अधिकांश अपने साथी-संगियों को इस अखबार में खपाया था। इनमें आनंदस्वरूप, कमलेश त्रिपाठी, रामेश्वर पाण्डेय और एक दुबे जी थे, जो उनके साथ गोरखपुर के वक्त के साथी रहे थे। तडित दादा ने अपनी बिजूखा नामक अपनी किताब में शायद इन्हीं दुबे जी का जिक्र पूरे सम्मान के साथ लिया है। मेरा दावा है कि उनका यह सलेक्शन पूरी की पूरी मेरिट पर था, सिर्फ दोस्ती या सिफारिश के बल पर नहीं।
 
वजह यही रही कि इन लोगों ने मेरा ज्ञानार्जन भी कराया। खूब कराया। मसलन आनंदस्वरूप वर्मा ने मेरी रूचि को समझा और मुझे कई विदेशी पत्रिका के लेखों का ट्रांसलेशन कराने का जिम्मा दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने फिजी में वहां के राष्ट्रपति महेंद्र चौधरी के मामले पर बारीकी जानकारियां दीं। मसलन, वहां का जेवेल आन्दोलन। अमेरिका में गर्भपात विषयों पर न्यूजवीक जैसी गंभीर पत्रिकाओं पर छपी रिपोर्ट भी उन्होंने अनूदित करायीं। नाथूराम गोडसे ने एक किताब के हाशियों पर कुछ टिप्पणी लिखी थीं। फांसी की कोठरी में बंद गोडसे का जस्टिफिकेशन भरा सवाल था:- ह्वाई आई शॉट गांधी। इस का अनुवाद वर्मा जी ने मुझसे कराया। तीन दिन में मैंने यह अनुवाद कर डाला। वर्मा जी खुश हुए और मेरी मेहनत की बहुत प्रशंस की। उन्होंने उसे कम्पोजिंग के लिए भेज दिया। अगले दिन उसकी कॉपी मिल गयी तो वर्मा जी ने उसे अगले अंक के लिए पास कर दिया। लेकिन इसे दुर्भाग्य ही तो कहा जाएगा कि दो दिन बाद ही इन्दिरा गांधी की हत्या हो गयी और मेरी मेहनत गोडसी-प्रवृत्ति पर बलि हो गयी।
 
उधर रामेश्वर पाण्डेय ने मुझे हावर्ड फ्रास्ट की किताब पढ़ने की सिफारिश की जिसका नाम था आदि-विद्रोही। मूल ग्लैडियेटर का अनुवाद किया था अमृत राय ने। ऐसे कई मसलों-किताबों पर यह दोनों ही लोग मेरे साथ कुछ न कुछ समय दे देते थे। मुझे गर्व है कि मुझ जैसे होटलों में बर्तन धोने वाले, वेटरी करने वाले और रिक्शा-चालक से अपना पेट भरने वाले शख्स को इन महानतम लोगों ने मुझे स्नेह दिया, दिशा दी। हां, मुझे इस बात का भी खुद पर गर्व है कि मैंने कभी विधिवत स्‍कूलिंग न करने के बावजूद हर सकारात्मक पक्षों से सीखा और समझा। अंग्रेजी को पढ़ना और समझना मेरे लिए बहुत कष्टकारी हुआ करता था, लेकिन वर्मा जी ने मुझे पहली बार मुझे अनुवादक के तौर पर पहचान दिलायी। आपको एक जानकारी देना चाहता हूं कि आज भी मैं अंग्रेजी लिखने की तमीज नहीं रखता हूं।
 
खैर, तो शान-ए-सहारा में मेरा व श्याम अंकुरम में से प्रत्येक का 315, कम्पोजीटर्स का वेतन 90 से लेकर 175 तक। सुपरवाइजर का वेतन था 700 और चपरासी का वेतन 125 रूपये। बस। जीवन इसी में चल रहा था। आपको तो खैर पता ही होगा कि यह वह दौर था जब गोर्बाच्योव और उसके बाद की संततियों तक ने ग्लास्तनोस्त और पेरिस्त्रोइका जैसे शब्दों की भाव-भंगिमा को न खोजा था, न समझा था और न कभी पहचाना था।

दिसम्बर-82 तक यह अखबार शुरू हो गया और अगले साल तक हिन्दी बेल्ट‍ में इसने अपना डंका बजाना शुरू कर दिया। प्रिंट-लाइन में टीके चटर्जी का नाम दो बार छपता था। मगर प्रबन्ध सम्पादक के तौर पर सुब्रत राय के भाई जयब्रत राय का नाम छपता था। संयुक्त सम्पादक थे आनन्द स्वरूप वर्मा और उसके बाद सारे सम्पादकीय व रिपोर्टर्स नाम भी छपता था। हमारा और श्याम का नाम नहीं छपता था।

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520

सुब्रत राय का इलाज या तो मजदूर होते हैं, या फिर सुप्रीम कोर्ट

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग एक)

श्रमिकों के तेवर के सामने सुब्रत राय की अकड़-फूं निकल गयी

चुटकियों में निपट गया साप्ताहिक शान-ए-सहारा का झंझट

लखनऊ : सुब्रत राय और सहारा इंडिया का यह सिर्फ किस्सा ही नहीं है, एक खबर की मुकम्मल पंच-लाइनें हैं। इसे समझने के लिए आपको देखना होगा कि अपना चेहरा काला करने वाले लोग अपनी हराम की कमाई को फंसते देख कर कैसे चुप्पी साध लेते हैं, जबकि खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को वापस हासिल करने वाला श्रमिक जब अपनी औकात पर उतरता है, तो कयामत की तरह कहर तोड़ देता है। जी हां, मैं सहारा इंडिया और सुब्रत राय के ही बारे में बात कर रहा हूं, जब श्रमिकों के तेवर के सामने सुब्रत राय की अकड़-फूं निकल गयी थी। श्रमिकों ने जब भी, तनिक सी भी तेवर-त्योरी चढ़ायी, सुब्रत राय ने बाकायदा आत्म समर्पण कर दिया।

यह मामला है अप्रैल-85 से लेकर मार्च-86 तक का। लेकिन शुरूआत हुई थी 2 जून-82 से। उस वक्त मैं सहारा इंडिया के शान-ए-सहारा नामक साप्ताहिक अखबार में काम करता था। यहां चपरासी से लेकर सम्पादक तक लोग श्रमिक-हितकारी बुद्धि और जीवट के लोग थे, मगर जब श्रमिकों का गुस्सा भड़का तो सारे दिग्गजों ने अपनी-अपनी पूछें अपनी पिछली टांगों में घुसेड़ लीं। कोई भी सामने नहीं फटका। और जो सुब्रत राय 24 हजार करोड़ की हेराफेरी के आरोप में तिहाड़ जेल में पसीना बहा रहे हैं, वह उस समय हम लोगों के हर कदम पर शीश झुकाया करते थे।

तो, शुरूआत हो गयी 2-जून-82 में। मैंने हाईस्कूाल की परीक्षा दी थी। प्राइवेट। इसके पहले होटल-चाकरी और रिक्शा–चालन वगैरह के बल पर पेट भरने के चक्कर में स्कूल में पढ़ने का मौका ही नहीं मिल पाया था। खैर, यह लम्बा किस्सा है। उस पर बाद में बातचीत होगी। फुरसत में। मौका मिला और क्षमता हासिल हुई तो बाकायदा किताब छपवा दूंगा यार। खैर…।

मई-82 में हाईस्कूल की परीक्षा दी थी। रिजल्ट आने ही वाला था। इसके पहले में आईपीएफ और उसके बाद जन संस्कृति मंच वगैरह से जुड़ा हुआ था। रवींद्रालय समेत कई थियेटरों में मंच व क्रांतिकारी नुक्कड़-नाटकों में प्रमुख भूमिका निभाता था। जिलों से लेकर दिल्ली तक अपना डमरू बजा चुका था। वगैरह-वगैरह। हमारे नेता थे हमारे मंझले भाई आदियोग, और सहयोगी थे अनिल सिन्हा, सुप्रिय लखनपाल, नीरज सिन्हा, पुच्चन यानी प्रवीण तिवारी, हरीकृष्ण मिश्र, नीरज मिश्र, दिल्ली में पत्रकारिता कर रहे अतुल सिन्हा भी हमारे साथ थे, जो मूलत: पटना के हैं और पुण्य-आत्मा अनिल सिन्हा के छोटे भाई हैं। पत्रकार अजय सिंह और अनिल सिन्हा जैसे लोग मेरा हौसला बढ़ाते रहते थे। बाद में जुटे गोंडा के श्यारम अंकुरम, चक्रधर और कृष्ण्कान्त धर द्विवेदी, डॉ. एसपी मिश्र, लाल साहब, वगैरह-वगैरह।

इसी आबोहवा में तड़ित कुमार से भेंट हो गयी। तब तड़ित कुमार यानी टीके चटर्जी तब बहुत सरल हुआ करते थे। बंगालियों पर मजाक करने और बंकिमचन्द्र की आनन्द मठ जैसी किताब को कचरा घोषित करने की हैसियत किसी भी बंगाली में नहीं होती, लेकिन तडित दादा अपवाद थे। उनकी किताब बिजूखा बांचिये ना। कविता में उनकी असीमित तिक्तता-तीव्रता थी। इसीलिए मैं आज तक उनका स्मरण पूरी श्रद्धा के साथ करता हूं। मैं मानता हूं कि बाद के वक्त में बेरोजगारी के भय और मुकम्मल बेरोजगारी ने उनके व्यवहार को काफी तोड़ा-मरोड़ा और मसला भी। जमकर। उनकी कविताएं किसी भी बदलाव-कामी युवक की भींगती मसों को मरोड़ सकती थीं।

हजरतगंज में ही हुई थी तडित कुमार जी से भेंट। फुटपाथ पर। साथ में श्याम अंकुरम भी था। गोंडा का रहने वाला यह बागी ठाकुर क्रान्तिकारी चेहरे के साथ था। अराजक बढ़ी दाढी, मुक्तिबोध समेत वामपंथी किताबों का तिलचट्टा, मोहब्बत में मैं उसे मरकस-बाबा कहता था। यानी मार्क्स-बाबा। उसके गले भर तक आक्रोश भरा था, लेकिन पेट हमेशा खराब। भोज्य पदार्थों को प्राण-घातक गैस में तब्दील करने में मानो उसमें अद्भुत महारत थी।
 
चूंकि मैं नाटकों में काम करता रहता था, इसीलिए तडित कुमार जी ने मुझे फौरन पहचान लिया। हम दोनों ही लोग बेरोजगार थे। बातचीत बढ़ी तो दादा ने कहा:- कुमार सौवीर को तो मैं फौरन ले सकता हूं, लेकिन श्याम को अभी तीन-चार महीने का वक्त लगेगा। दरअसल, तडित दादा को एक ऐसा शख्स चाहिए था जो उनके अखबार के आफिस वगैरह खोजने-व्यवस्थित करा सके। मैं गजब का उत्साहित आदमी-नुमा श्रमिक रहा हूं, कभी भी न का नाम मेरी जुबान से नहीं मिलता था, जब तक अगला आदमी बदतमीजी पर आमादा न हो जाए। लेकिन यह सीमा टूटते ही मैं किसी पर भी टूट पड़ सकता हूं। यह आदत अब तक मौजूद है। और यह हुनर श्या़म अंकुरम के पास नहीं था। वह पक्का ठाकुरवादी कम्युनिस्ट था, वह अपनी अक्खड़ई को केवल असह्य बदबू में ही तब्दी‍ल कर सकता था।

दो दिन बाद ही सहारा इंडिया के लालबाग स्थित कमांड आफिस में मेरा साक्षात्कार हुआ। साक्षात्कार वाले कमरे में कई लोग मौजूद थे। उन लोगों ने मुझसे कई बातें पूछीं, मैंने सहजता से जवाब दिया। इसी बीच ओपी श्रीवास्तव नामक एक निदेशक ने खेल के बारे में बात कीं।
मैंने कहा: मैं जूडो खेलता हूं।
सवाल उठा: कैसे खेलते हैं यह खेल?
मैं उठ खड़ा हुआ और बोला: आप सामने आइये, अभी दिखा देता हूं।
श्रीवास्त़व जी सकपका गये। लेकिन कमरे में ठहाके जमकर लगे।

यह मध्य जून-82 की बात है और मैंने 2 जून-82 को सहारा इंडिया के शान-ए-सहारा में ज्वाइन कर लिया। पद था कॉपी-होल्डर। मतलब काम प्रूफ-रीडर का, मगर पद थोड़ा इन्फीरियर। आज के अखबारी जगत ने तो प्रूफ-रीडर के पद की अन्येष्टि कर दी है, लेकिन तब वह दौर भी था जब इण्डिया-टुडे जैसी पत्रिकाओं के प्रिण्ट-लाइन में प्रूफ-रीडर का नाम भी छपता था। खैर, मेरा वेतन तय हुआ 315 रूपया महीना। अपॉइंटमेंट लेटर पर सुब्रत राय का हस्ताक्षर था। बेहद हसीन हस्ताक्षर। जैसे मेरे बचपन की किसी सपनीली मोहब्बत की तरह नाजुक और आकर्षक।

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520

वाराणसी प्रकरणः पत्रकार ही घोंप रहे अपने साथियों की पीठ में खंजर

वाराणसी: शहर के व्‍यस्‍ततम चौराहे पर पुलिसवालों ने अपनी घायल महिला रिश्‍तेदार को अपने घर ले जाने की कोशिश कर रहे दो पत्रकारों के साथ न केवल अभद्रता की, बल्कि भरे-बाजार उनकी जमकर पिटाई भी कर दी। पत्रकारों के साथ हुए इस हादसे से खफा पत्रकारों ने यह पूरा मामला एसएसपी के सामने पेश किया। लेकिन इसके पहले कि इस मामले पर कोई कार्रवाई शुरू होती, शहर के कुछ दलाल पत्रकारों ने वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक के साथ काना-फूंसी की और मामला हमेशा-हमेशा के लिए रद्दी की टोकरी तक चला गया।

यह मामला है काशी का। यहां के दलाल पत्रकारों ने दरअसल काशी की पत्रकारिता के चेहरे पर कालिख पोत डाली है। हैरत की बात है कि यह काम किसी और किसी ने नहीं, बल्कि उनमें से कुछ पत्रकार तो इन्‍हीं पीडि़त पत्रकार के संस्‍थान में बड़े पत्रकार माने जाते हैं।

आपको बता दें कि अभी करीब दस दिन पहले दशाश्‍वमेध घाट की ओर जाने वाले गोदौलिया चौराहे पर यह हादसा हुआ था। हुआ यह कि जनसंदेश टाइम्‍स के रिपोर्टर संदीप त्रिपाठी बुरी तरह से घायल अपनी माता को अस्‍पताल से लौट कर अपने घर ले जा रहे थे। दशाश्‍वमेध घाट निवासी संदीप त्रिपाठी की माता का एक दुर्घटना में पैर बुरी तरह टूट गया था। गोदौलिया चौराहे पर जैसे ही उनकी कार दशाश्‍वमेध घाट की ओर बढ़ी, चौराहे पर खड़े सिपाहियों ने उनकी कार रोकी और अभद्रता करते हुए उन्‍हें वापस लौटने पर दबाव बनाया। जब संदीप त्रिपाठी ने अपनी माता की हालत बताते हुए घर जाने की इजाजत मांगी, तो उन पुलिसवालों ने उन्‍हें बुरी तरह लाठियों से पीट दिया। इसी बीच संदीप के संस्‍थान के चीफ रिपोर्टर राजनाथ त्रिपाठी मौके पर पहुंचे तो इन पुलिसवालों ने उनकी भी पिटाई कर दी।

इस घटना की सूचना पाकर काशी पत्रकार संघ के पदाधिकारी समेत पूरा पत्रकार जगत हक्‍का-बक्‍का हो गया और उन्‍होंने एसएसपी से मिल कर दोषी पुलिसवालों पर कार्रवाई की मांग की। वरिष्‍ठ पत्रकार अत्रि भरद्वाज और आर रंगप्‍पा बताते हैं कि इस शिकायत पर एसएसपी ने कार्रवाई का आश्‍वासन देते हुए कहा कि वे इस पूरे प्रकरण पर चौराहे पर लगे सीसीटीवी कैमरे के फुटेज को भी देखेंगे।

लेकिन अभी पता चला है कि एसएसपी ने इस मामले को कूड़े टोकरे में फेंक दिया है। कारण यह कि काशी के ही चंद पत्रकारों ने एसएसपी के कान पर यह खबर भर दी कि राजनाथ त्रिपाठी के मामले में कोई मामला ही नहीं बन रहा है। जनसंदेश टाइम्‍स के कई पत्रकारों ने बताया कि दरअसल एसएसपी को कान भरने वाले पत्रकार पुलिस के करीब रिश्‍तों के लिए बदनाम हैं। इतना ही नहीं, राजनाथ त्रिपाठी और संदीप त्रिपाठी के साथ इन पत्रकारों की खुली ठना-ठनी बनी रहती है। पत्रकार बताते हैं कि एसएसपी के साथ ऐसी कानाफूसी करने वाले पत्रकारों में जनसंदेश टाइम्‍स के साथ ही साथ उन लोगों की टोली भी शामिल है जो पत्रकारों के इस गिरोह के हम-प्‍याला बताये जाते हैं। इसीलिए एसएसपी ने अब इस प्रकरण को ठण्‍डे बस्‍ते पर डाल दिया है। हालांकि, कार्रवाई के नाम के लिए जांच का नाटक भी चल रहा है। जबकि इस प्रकरण के लिए जिम्‍मेदार दबंग पुलिसवाले अब तक इसी चौराहे पर धुंधुआ रहे हैं और जमकर वसूली में मस्‍त हैं।

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520
 

सुप्रीम कोर्ट परिसर में यौन उत्पीड़न की शिकायत पर मुख्य न्यायाधीश का पहला आदेश

सुप्रीम कोर्ट परिसर में यौन उत्पीड़न के मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने आरोपी अधिवक्ता के सुप्रीम कोर्ट परिसर में प्रवेश पर 6 महीने के लिए पाबंदी लगा दी।

सुप्रीम कोर्ट की लिंग संवेदीकरण और आंतरिक शिकायत कमेटी ने अपनी जांच रिपोर्ट में उक्त अधिवक्ता के परिसर में प्रवेश पर एक साल के लिए पाबंदी की अनुशंसा की थी।  

मुख्य न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि यह पहली और एक मात्र शिकायत है इसलिए मेरे मतानुसार सुप्रीम कोर्ट परिसर में प्रवेश पर 6 महीने की पाबंदी उचित है। ये उक्त अधिवक्ता को सुधरने का मौका देगी और निरोधक का कार्य भी करेगी।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की यौन उत्पीड़न पर कमेटी का गठन जस्टिस एके गांगुली पर एक इंटर्न द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद किया गया था।
 

ज़ी न्यूज़ ने किए एक तीर से दो शिकार

ज़ी न्यूज़ और नमो की दोस्ती किसी से छुपी नहीं है। कुरुक्षेत्र में 'ज़ी न्‍यूज' के मालि‍क सुभाष चंद्रा ने नरेंद्र मोदी के साथ मंच साझा किया था और कहा था कि 'मैं भी हरि‍याणा का सूं, यो ज़ी चैनल भी समझो थारा ही सै।' ज़ी न्यूज़ और कांग्रेस के बीच छत्तीस का आंकड़ा नवीन जिंदल के चलते है।

नमो का हिमायती होने के कारण चैनल अपनी विश्वसनीयता खोता जा रहा था। अचानक मुरली मनोहर जोशी के साथ फिक्स इंटरव्यू न करने की बात कहकर चर्चा में आया जी न्यूज अपनी विश्वसनीयता वापस लाने की कोशिश में है। लेकिन साथ ही साथ, नरेंद्र मोदी को न पसंद करने वाले नेता मुरली मनोहर जोशी का पत्ता काटने की कोशिश कर रहा है, जो वाराणसी छोड़कर कानपुर से चुनाव लड़ रहे हैं।

मोदी की सबसे बड़ी रणनीति है कि बीजेपी की तमाम बड़े लीडर इस बार चुनावों में हार जाएं, लेकिन बीजेपी को बहुमत मिले मिले। आज अगर चुनावी स्थलों पर नजर दौड़ाएं तो विंदिशा में सुषमा स्वराज अकेली पड़ रही है। गांधीनगर में एलके आडवाणी के साथ दूसरे नंबर की नेता आनंदीबेन पटेल नजर नहीं आ रही है। पंजाब के अमृतसर से अरुण जेटली को चुनाव मैदान में उतारकर नवजोत सिंह सिद्धू और उसके प्रशंसकों को नाराज कर, वहां समीकरण बदल दिए।

राजनाथ सिंह लखनऊ से लड़ रहे हैं, लेकिन उनको भी टोपी पहननी पड़ रही है। अटल बिहारी जैसी छवि का प्रचार करवाना पड़ रहा है। राजनाथ सिंह राज ठाकरे के समर्थन को सिरे से खारिज करते हैं तो नरेंद्र मोदी चुप्पी साधे रहते हैं। नरेंद्र मोदी को पता है कि अगर दिल्ली का रास्ता साफ करना है तो बीजेपी के सीनियर लीडरों को किनारे करना होगा। शिवसेना एलके आडवाणी पर ठप्पा लगाती है। जेडीयू भी पुन:समर्थन देने की बात कहती है, लेकिन एलके आडवाणी की अगुवाई में, इसके अलावा सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी, अरुण जेटली एक ही खेमे से आते हैं। जसवंत सिंह रेस से बाहर हो ही चुके हैं।

 

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।

मैं बनारस हूं, मेरे मर्म को समझिए

एक बार फिर चुनावी बयार के बीच मैं बनारस हूं। राजनीतिक उपेक्षा और तिरस्कार का शहर बनारस। कहने को सबसे पुराना शहर, सांस्कतिक राजधानी पर सबसे बेहाल और बदहाल। राजनीतिज्ञों के लिए इस बार मैं दिल्ली की सत्ता पाने की पहली सीढ़ी हूं। शोर है, होड़ है, चर्चाए है, विरोधी है, समर्थक हैं। नारे हैं, पोस्टर हैं सबको अपनी बात कहकर आगे निकल जाने की जल्दी है। इन सबके बीच मैं अपने जख्मों के साथ उन पर मरहम रखने के इंतजार में खड़ा हूं।

है कोई जो मुझे समझेगा, मेरे संकट का रास्ता निकालेगा। कोई जबाव नहीं मिल रहा है, मुझे, इतने बड़े-बड़े नाम इतने बड़े-बड़े वादे, इनमें मेरे लिए भी कुछ है भाई। मैं तो बस इतना चाहता हूं कि मेरी गंगा पहले की तरह निर्मल और स्वच्छ हो जाए। मेरी सड़को पर धूल न उड़े, बिजली, पानी मेरे लोगो को मिले। भ्रष्टाचार पर रोक लगे। नए-नए रोजगार के मौके यहां भी आएं। यही वो छोटी-छोटी मांगे है, जो मेरे दर्द की दवा भी है और मेरी खुशहाली का राज भी।

हां, एक बात और मेरे मिज़ाज को समझिए। चुनाव लड़ने से पहले मेरे गंगा-जमुनी तहजीब की विरासत को अपनाइए। मेरे कबीर को मेरे नज़ीर की विरासत को आगे बढ़ाईए। मेरे तुलसी के लोकमंगल के मर्म को अपने अन्दर जज्ब किजिए। यकीन मानिए आप सही मायनो में लोक की भलाई का मर्म समझ सकेंगे। राजनीति की जमीन संवेदनहीन हो सकती है, पर मेरी नहीं। अगर इस जमीन पर आ ही गये है, तो थोड़ा सा नर्म बनिए। झुकना सीखिए लोगो से मतदाताओं से वादा करने से पहले खुद से वादा कीजिए कि आप मर्यादाओं को तार-तार नहीं करेंगे।

चलिए एक बार और सही आपको देखता हूं। मैं तो गंगा की तरह लहर दर लहर आगे चलने पर विश्वास रखता हूं। एक नये भविष्य और नए भारत की कल्पना मेरे लिए सर्वोपरि है। जानते है क्यों, क्यों कि मैं बनारस हूं। मेरी पहचान यही है…….
       
दुइयै चले ला पान औ पनही
बात मत करैं छोटी
लेब-देब होई जिनगी क
अकिल बहुत हौ खोटी
ई राजा काषी हौ।

 

वाराणसी से भाष्कर गुहा नियोगी।
              

कोबरापोस्ट पड़ताल: सिक्ख विरोधी दंगों के दौरान दिल्ली पुलिस की संदिग्ध भूमिका का खुलासा

चैप्टर 84: 1984 में हुए सिक्ख विरोधी दंगों के दौरान दिल्ली पुलिस की भूमिका पर कोबरापोस्ट की तहकीकात। पहली बार कैमरे पर कोबरापोस्ट 1984 के सिक्ख विरोधी दंगों के दौरान दिल्ली पुलिस की संदिग्ध भूमिका का खुलासा करता है, जिसके चलते देश की राजधानी मे 3000 से अधिक लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था।

नयी दिल्ली: अपनी एक बड़ी तहकीकात में कोबरापोस्ट ने दिल्ली पुलिस के उन अफसरों को खुफिया कैमरे में क़ैद किया है जो 1984 के सिक्ख विरोधी दंगों के दौरान दिल्ली के अलग अलग इलाकों में थाना अधिकारी थे। इनमे से कई ने कैमरे के सामने स्वीकारा कि है कैसे दिल्ली पुलिस एक फोर्स के रूप में नाकामयाब रही और कुछ ने यह भी बोला कि इनके आला अधिकारी तत्कालीन सरकार के साथ मिल कर सिक्खों को सबक सिखाना चाहते थे।

अपनी इस पड़ताल के दौरान कोबरापोस्ट ने शूरवीर सिंह त्यागी (एस॰एच॰ओ॰) कल्याणपुरी, रोहतास सिंह (एस॰एच॰ओ॰) दिल्ली केंट, एस.एन.भास्कर (एस॰एच॰ओ॰) कृष्णानगर, ओ.पी.यादव (एस॰एच॰ओ॰) श्रीनिवासपुरी, जयपाल सिंह (एस॰एच॰ओ॰) से महरौली में मुलाकात हुई। तत्कालीन ऐडिशनल पुलिस कमिश्नर गौतम कौल ने हमारे प्रश्नों के जवाब में कहा कि उन्हे दंगों की कोई जानकारी नहीं थी। तत्कालीन पुलिस कमिश्नर एस सी टंडन ने भी हमारे प्रश्नो का का जवाब देने से पल्ला झाड़ लिया। कोबरापोस्ट रिपोर्टर की मुलाक़ात अमरीक सिंह भुल्लर से भी हुई जो कि 84 के दंगो के वक़्त पटेल नगर थाने के एसएचओ थे। भुल्लर ने जांच आयोग को दिये अपने हलफनामे में कुछ स्थानीय नेताओ के नाम लिए थे जो भीड़ को उकसा रहे थे और उसकी अगुवाई कर रहे थे।

कोबरापोस्ट के विषेश संवाददाता असित दीक्षित ने इन सभी अधिकारियों से मुलाक़ात की जो इस वक़्त सेवा से मुक्त हो चुके हैं और एक सरकारी नौकर को मिलने वाली सभी सुविधाओं का फायदा उठा रहे हैं। असित दीक्षित से हुई बातचीत इन सभी अधिकारियों ने ये खुलासे किए वो हैं:
 
सिक्ख विरोधी उन्माद के सामने पुलिस फोर्स ने घुटने टेक दिए थे और उसने दंगों और लूटपाट आगजनी को बढ़ाने मे हाथ बटाया।
सिक्खों के खिलाफ सांप्रदायिक तनाव बढ़ता जा रहा था। इस चेतावनी को पुलिस के आला अधिकारियों ने अनसुना कर दिया गयी।
पुलिस कंट्रोल रूम में दंगे और लूटपाट के संदेशों की बाढ़ सी आ गयी थी। लेकिन उनमें से सिर्फ 2% संदेश ही रिकार्ड किए गए।
वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा अपनी नाकामी को छुपाने के लिए लॉग बुक में बदलाव कर दिया गया।
ट्रांसफर के डर से कुछ अधिकारियों ने अपनी ड्यूटि ढंग से नहीं निभाई।
कुछ पुलिस अधिकारियों ने अपने इलाके में कम से कम नुकसान दिखाने के लिए शवों को दूसरे इलाकों मे फिकवा दिया।
पुलिस ने पीड़ितों की एफआईआर दर्ज़ नहीं करी और जहां करी वहाँ लूटपाट, आगजनी और हत्या के कई मामलों को एक साथ एक एफआईआर मे मिला दिया ।
पुलिस को ये संदेश दिया गया कि जो दंगाई “इन्दिरा गांधी ज़िंदाबाद” के नारे लगा रहे हैं उनके खिलाफ कोई कार्रवाई ना की जाए।
तत्कालीन सरकार ने पुलिस को अपना काम नहीं करने दिया और ऐसा माहौल बनाया की लगे पुलिस खुद ही कुछ नहीं कर रही है।  
वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने अपने अधीनस्थों को दंगाइयों पर गोली चलाने की आज्ञा नहीं दी।
फायर ब्रिगेड ने भी उन इलाको में आने से मना कर दिया जहां पुलिस द्वारा दंगों की सूचना दी जा रही थी।

दिल्ली पुलिस मे नीचे से लेकर ऊपर तक कुछ ऐसी निष्क्रियता छा गयी थी कि जो जरूरी कदम उठाए जाने थे वो नहीं उठाए गए. कुसुम लता मित्तल कमेटी ने इस निष्क्रियता के लिए दिल्ली पुलिस के 72 अधिकारियों को दोषी ठहराया था इनमे से 30 अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त करने की सिफ़ारिश भी की गयी थी। कुसुम मित्तल कमेटी का गठन रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफ़ारिश पर किया गया था।

इनमें से कोबरापोस्ट ने जिन अधिकारियों से मुलाक़ात की उनमे से कुछ ने पूर्व पुलिस आयुक्त एस॰सी॰टंडन की बड़ी कठोर शब्दों मे निंदा की है। शूरवीर त्यागी टंडन पर खुल्लमखुल्ला आरोप लगाते हुए कहते हैं की पुलिस आयुक्त तत्कालीन कांग्रेस सरकार के प्रभाव में काम कर रहे थे। उनके शब्दों में, “तो जाने अंजाने में वो गवर्नमेंट के इंफ्लुएंस में रहे हैं की उन्होने मिसमैनेज किया शुरू में और दो दिन बाद असल मे बात जब हाथ से निकाल गयी”। इसी तरह ओ॰पी॰ यादव आरोप लगाते हुए कहते हैं की टंडन ने उस नाजुक घड़ी में दिल्ली पुलिस को कोई नेतृत्व प्रदान नहीं किया। उधर भास्कर कहते हैं कि कुछ थानाधिकारियों को चिन्हित कर उन्हे सज़ा देने के बजाय टंडन को ही उनके पद से बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए था।

रंगनाथ मिश्रा कमीशन ने भी टंडन को कानून व्यवस्था के बिगड़ने के लिए दोषी ठहराया था। वहीं कपूर-कुसुम मित्तल कमेटी ने तो अपनी रिपोर्ट के एक पूरे अध्याय में टंडन की इस भूमिका पर प्रकाश डाला था। कोबरापोस्ट रिपोर्टर ने टंडन से मुलाक़ात तो की, लेकिन टंडन ने इस मामले मे कोई जानकारी नहीं दी।

कानून व्यवस्था की हालत ऐसी बना दी गयी थी की दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने उन तमाम वायरलेस संदेशों पर गौर करना उचित नहीं समझा जिनमें उनसे अतिरिक्त पुलिस बल की मांग की गयी थी। भास्कर के अनुसार, “मैं तो अपने लेवेल से ये कह सकता हूँ की जब मैंने चार बजे मैसेज भेजा आपसे फोर्स मांग रहा हूं तो आपने मुझे क्यों नहीं दी”।

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के नक्कारेपन का एक और उदाहरण हुकुम चंद जाटव है जिन्होने प्रैस रिपोर्टरों के कहने पर भी कोई कार्यवाही नहीं की। तत्कालीन एसएचओ भुल्लर के अनुसार “हुकुम चंद जाटव यहाँ के ही थे करोल बाग के ही आई पी एस थे तो उस टाइम थे डी आई जी अब वो कंट्रोल रूम मे बैठे हुए थे और रिपोर्टर वहाँ उनको पूछ रहे हैं और वो कह रहे हैं एव्रिथिंग ने आल राइट उन्होने कहा वहाँ तो बंदे मर गए हैं आपकी इतनी दुनिया लुट गयी है जा के देखो तो सही नहीं नहीं मैं यहाँ कंट्रोल रूम में हूँ एंड ही न्यू एव्री थिंग लेकिन वहाँ से मूव ही नहीं किया”।
 
हालात इसलिए भी बिगड़े कि वरिष्ठ अधिकारियों ने गोली चलाने की इजाजत नहीं दी। ऐसे एक अधिकारी चन्द्र प्रकाश के बारे में तत्कालीन एसएचओ रोहतास सिंह कहते हैं “न उन्होने मुझे ये कह दिया कि मतलब लिख के भी दिया है ये भी कह दिया यार वो तो गोली चलने से तो इन्दिरा गांधी वाला कांड इतना बड़ा बन पड़ा है तुम क्यों नया कांड खड़ा करते हो”।
 
अगर रोहतास सिंह की बात मे सचाई है तो पुलिस कंट्रोल रूम को भेजे गए संदेशों में महज़ 2 फीसदी संदेश ही दर्ज़ किए गए थे, “अगर वो रिकार्ड हो गयी होती तो मैं काफी कुछ साबित कर सकता था नॉट ईवन 2 पेरसेंट वेयर रेकोर्डेड कंट्रोल रूम में जो लॉग बुक थी”। रोहतास सिंह आगे कहते हैं की चन्द्र प्रकाश ने ऐसे संदेशों का मज़मू ही बदल डाला जो उसको ले बैठते  “तो वायरलेस लॉग बुक के की बता रहा हूँ …. उसमे कुछ ऐसे मैसेज थे जो उसको ले बैठते…. जहां जहां उसको सूट नहीं कर रही थी वो सब चेंज कर दिया”।
 
एक बहुत बड़ा कारण यह भी था कि समूची दिल्ली पुलिस सांप्रदायिक सोच से पूर्वाग्रहीत हो गयी थी रोहतास सिंह इस सचाई को स्वीकार करते हुए कहते हैं “इसमे मुझे कोई संकोच नहीं है कहने मे हमारे पुलिस मैन भी यहीं लोकल मैन थे वो भी कम्युनल माईंडेड हो गए थे”।
 
मारकाट, आगजनी और लूटपाट के कई दौर चलने के बाद जब तीसरे दिन सेना बुला ली गयी तब जाकर दंगों की आग बुझना शुरू हुई। लेकिन इसके साथ ही दिल्ली पुलिस ने दंगों में हुई तमाम आपराधिक करतूतों पर पर्दा डालने का प्रयास आरंभ कर दिया। सबसे पहले दंगा पीड़ितों की शिकायत दर्ज़ नहीं की गयी और जब शिकायत दर्ज़ भी हुई तो कई मामलों को एक ही एफआईआर मे मिला दिया गया।
बक़ौल भुल्लर, “लोगों ने केस रजिस्टर नहीं किए दबाने की कोशिश की तेरे इलाके में हुआ की इतने लंबे चौड़े रायट हुए उनको कोशिश की कम से कम करने की अपनी नौकरी बचाने के लिए और उठा के बॉडी वहाँ फेक दी सुल्तानपुरी”।

कोबरापोस्ट के इस खुलासे से यह बात स्पष्ट हो जाती है की 1984 के दंगों के दौरान पुलिस का नक्कारापन अकस्मात नहीं था बल्कि यह एक सोची समझी साजिश का नतीजा था। दूसरे शब्दों मे इसे हम दंगों मे पुलिस की मिलीभगत कह सकते हैं जिसके फलस्वरूप यह राज्य प्रायोजित नरसंहार हुआ था।

कोबरापोस्ट
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प्रेस विज्ञप्ति
 

फासीवाद को स्वर देते श्री श्री रविशंकर

अभी कुछ दिन पहले ही, ‘आध्यात्मिक गुरू और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर ने मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि क्षेत्रीय पार्टियों को लोकसभा चुनाव में भाग लेने से प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए। इसके पीछे उनका तर्क था कि क्षेत्रीय पार्टियों के लोकसभा चुनाव लड़ने के कारण ही केन्द्र में मिली-जुली सरकारें बनती है और जिसके लिए उन्होंने ’खिचड़ी’ शब्द इस्तेमाल किया। उनका मानना था कि खिचड़ी सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, तथा रुपए के अवमूल्यन के लिए जिम्मेदार होती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर केन्द्र में अगली सरकार मिली-जुली बनती है, तो भारतीय रुपए की कीमत काफी नीचे चली जाएगी। उनका विचार था कि मुल्क में अमरीकी समाज जैसा राजनैतिक सिस्टम लागू होना चाहिए जहां केवल दो ही दल हैं। उन्होंने अपने अनुयायियों से भी अपील की कि, वोट देने से पहले वे राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में जरूर रखें।

गौरतलब है कि श्री श्री रविशंकर की संस्था आर्ट ऑफ लिविंग के अंर्तराष्ट्रीय महासचिव महेश गिरि पूर्वी दिल्ली से भाजपा के टिकट पर लोकसभा के प्रत्याशी हैं। यहां तक कि राजनीतिक जगत में श्री श्री रविशंकर की छवि भी संघ के एक वैचारिक समर्थक की मानी जाती है। यही नहीं, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से उनके व्यक्तिगत रिश्ते बहुत अच्छे हैं। ऐसे में, यह बात साफ है कि उनकी यह अभिव्यक्ति भी संघ के राजनैतिक दर्शन का एक छोटा सा प्रतिबिंब है, और इस लिहाज से इसका विश्लेषण होना चाहिए कि छोटे दलों को लोकसभा चुनाव लड़ने से रोकने की इस विचारधारा के पीछे का राजनैतिक और सामाजिक मनोविज्ञान क्या है? आखिर इस विचार के प्रचार के पीछे संघ की कौन सी राजनैतिक रणनीति काम कर रही है? क्या यह सच है कि क्षेत्रीय दल ही वर्तमान समय में देश की सुरक्षा तथा अर्थव्यस्था की बदहाली के लिए जिम्मेदार हैं? और क्या उनके लोकसभा चुनाव से हटते ही सारी समस्या खत्म हो जाएगी?

जहां तक इस देश में क्षेत्रीय दलों के उदय का सवाल है, यह बात हमें स्पष्ट समझ लेनी चाहिए कि इनका राजनीति में उदय अचानक घटी कोई परिघटना नहीं थी। आजादी के समय तक देश के अंदर कांग्रेस, वामपंथी पार्टियों के अलावा गिनती के कुछ ही ऐसे दल थे जो राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर नहीं थे। ज्यादातर जनता का नेतृत्व कांग्रेस और अन्य इन्हीं दलों में कार्यरत देश के सवर्ण और एलीट तबकों द्वारा किया जाता था। देश के सामाजिक और राजनैतिक विकास की प्रक्रिया में जब जब किसी खास वर्ग को ऐसा महसूस हुआ कि उसके लाजिमी सवाल अब वर्तमान नेतृत्व हल नही कर सकता या फिर करने का इच्छुक नहीं है, तो ऐसी स्थिति में उसी वर्ग के किसी व्यक्ति द्वारा उस वर्ग को राजनैतिक रूप से संगठित करने की कोशिश शुरू हुई। इसे हम उत्तर भारत में बहुजन समाज पार्टी के उदय के रूप में देख सकते हैं। वर्तमान बसपा का दलित मतदाता, जो कभी कांग्रेस का ही वोट बैंक था, आज उसके अलग हटकर अपने सवालों पर गोलबंद होकर एक राजनैतिक ताकत बन चुका है।

इसी तरह तकरीबन हर राज्य में क्षेत्रीय दलों की उत्पत्ति राज्य विशेष के सामाजिक आर्थिक सवाल और जातिगत अस्मिता को लेकर हुआ है। यही वजह है कि दक्षिण की क्षेत्रीय पार्टियों का जनाधार उत्तर में नहीं है और उत्तर की राजनैतिक पार्टियां दक्षिण में अपना कोई जनाधार नही रखती हैं। कुल मिलाकर यह मानना कि इनकी वजह से ही राजनीति और अर्थव्यवस्था की सारी समस्याएं हैं, कोई मजबूत तर्क नहीं लगता। एक बात और, भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जहां हर राज्य के आदमी की राजनैतिक आकांक्षाएं और सवाल अलग-अलग हैं, किसी सामान्य मुद्दे पर एक राय नहीं हो सकता। क्योंकि, आज तक इस मुल्क की राजनीति ने कोई ऐसा सामान्य सवाल पैदा ही नहीं किया जिसे देश के सभी राज्यों के नागरिक  लाजिमी समझें और एक राष्ट्रीय विचारधारा के तहत एक सूत्र में बंध सकें। रोटी, कपड़ा, मकान और शिक्षा जैसे सामान्य मुद्दे राष्ट्रवाद के आधार स्तंभ हो सकते थे लेकिन आज की राजनीति इन सवालों पर बात करना जरूरी नहीं समझती।

शायद यही वजह है कि यह देश आज तक एक राष्ट्र का रूप धारण नहीं कर पाया है। अब अगर हम श्री श्री रविशंकर की यह मांग मान भी लें और लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए केवल राष्ट्रीय दलों को ही आगे लाया जाए, तो और भी गंभीर समस्याएं इस मुल्क की राजनीति के सामने आ जाएंगी। वे लोग जो अब क्षेत्रीय दलों को वोट करते हैं, अपना मत किसे देंगे? फिर उन लोगों को जबरिया किसी ऐसे दल को जिसे वे नहीं चाहते, वोट देने के लिए बाध्य करना भी एक तरह की तानाशाही ही होगी। इन मतदाताओं के विकल्पों का खात्मा नहीं किया जा सकता। हम यह भी जानते हैं कि मुख्यधारा के ज्यादातर राजनैतिक दलों के बीच संघ की गहरी घुसपैठ है और यह भी सच है कि क्षेत्रीय दलों को वही जातियां ज्यादा समर्थन करती हैं, जो लंबे समय तक सामाजिक और राजनैतिक तिरस्कार तथा अन्याय सहते हुए देश के विकास क्रम में पिछड़ गई थीं। या फिर, वे सब देश की सवर्ण पोषित मनुवादी व्यवस्था के उत्पीड़न की शिकार रही हैं।

फिर यह भी एक बड़ा सवाल है कि इस तरह से देश के एक बड़े वर्ग की राजनैतिक सहभागिता का खात्मा करके इस लोकतंत्र को कैसे जिंदा रखा जा सकेगा? गौरतलब है कि संघ का पूरा राजनैतिक दर्शन ही मनुस्मिृति आधारित तानाशाही युक्त कुलीनतंत्रीय है जहां एक खास वर्ग ही सत्ता संचालन करता है। उसकी इस व्यवस्था में लोकतंत्र और सामाजिक न्याय जैसे शब्द केवल एक भ्रम से ज्यादा कुछ नही हैं। दरअसल आज इस देश का लोकतंत्र जिस जगह पर खड़ा है वह एक एक लंबे विकास का परिणाम है। क्षेत्रीय पार्टियों का विकास भी उसी क्रम में हुआ है। उन्हें अब इस परिदृश्य से अचानक गायब नहीं किया जा सकता और न ही उन्हे देश की समस्याओं की जड़ ही कहा जा सकता है। कुल मिलाकर, श्री श्री रविशंकर का यह बयान संघ के उस फासीवादी राजनैतिक दर्शन को समर्थन देता है जहां पर देश की पिछड़ी, शोषित और दलित, अल्पसंख्यक जातियों के लिए कोई स्थान नहीं है। अगर यह बात मान ली जाए तो एक बड़ी आबादी के राजनैतिक अधिकार का खात्मा हो जाएगा और केवल कुछ ही दलों के पास वास्तविक सत्ता केन्द्रित हो जाएगी। यह कदम धीरे धीरे लोकतांत्रिक रास्ते से मुल्क को फासीवाद की ओर अग्रसर कर देगा। क्या हम लोकतंत्र के रास्ते इस मुल्क में फासीवाद को अपनी पकड़ बनाने का मौका देना चाहेंगे? जाहिर है बिल्कुल नहीं क्योंकि उस अवस्था में एक नागरिक के मूल अधिकार भी अलग-अलग होंगे जो कि बेहद खतरनाक होगा।

 हरे राम मिश्र
 सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार

 निवास-द्वारा- मोहम्म्द शुऐब एडवोकेट
 110/46 हरिनाथ बनर्जी स्टरीट
 लाटूश रोड नया गांव ईस्ट
 लखनउ (उप्र)
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दिल्ली में मीडिया ने किया रेप पीड़ित दलित लड़कियों के आंदोलन का बहिष्‍कार

दिल्ली। यह कितनी अजीब बात है कि भागाणा (हरियाणा) में गैंग रेप की शिकार हुई बालिकाओं के लिए दिल्‍ली में चल रहे आंदोलन का आज मीडिया ने घोषित रूप से बहिष्‍कार कर दिया। जैसा कि आप जानते होंगे कि भगाणा के लोग गैंग-रेप की शिकार हुई बालिकाओं के साथ पिछले 6 दिनों से दिल्‍ली के जंतर-मंतर पर धरना दे रहे हैं। आज (22 अप्रैल, 2014) जेएनयू के सभी छात्र संगठनों के साथियों ने भगाणा के पीड़ितों को साथ लेकर हरियाणा भवन पर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान आयोजित जन-सभा में एक साथी ने भगाणा प्रकरण को तवज्‍जो नहीं देने को लेकर मीडिया को ब्राह्मणवादी कहा। इस पर वहां खड़े पत्रकारों ने आंदोलन के जातिवादी होने का आरोप लगाते हुए इसके बहिष्‍कार करने की घोषणा कर दी। उन्‍होंने आयोजकों का सबक सिखाने की धमकी दी तथा एक ओर गोल बनाकर खड़े हो गये।

दलितों के आंदोलन के बहिष्कार की घोषणा के बाद हरियाणा भवन के किनारे खड़े पत्रकार

मैं नही समझता कि यह बताने की आवश्‍यकता है कि वास्‍तव में ऐसा क्‍यों हुआ।

 

फारवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन के फेसबुक वॉल से

क्या फर्क पड़ता है कि हरिसिंह जाटव मर गया

बरेली। विगत 17 अप्रैल को आंवला लोक सभा क्षेत्र के देवचरा में एक मतदान बूथ पर हरिसिंह जाटव ने केरोसिन डाल कर आत्मदाह कर लिया था। हरिसिंह वोट डालने के लिए जयपुर से अपने घर आया था। वह राम भरोसे इंटर कॉलेज मतदान केंद्र के बूथ संख्या 310 पर वोट डालने भी गया। लेकिन मतदान पर्ची न होने के कारण मतदान कर्मियों ने उसे वोट नहीं डालने दिया। बार-बार मना किए जाने से क्षुब्ध हरिसिंह ने आत्मघाती कदम उठा लिया। फिर जैसा कि होना था, प्रशासन ने हरिसिंह को विक्षिप्त औऱ शराबी बता कर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की और अपनी रिपोर्ट में निर्वाचन आयोग को ये बात लिख भेजी।

इस मुद्दे को बरेली के मीडिया और कुछ समाजसेवी संगठनों ने प्रमुखता से उठाया है। इससे प्रशासन की तबीयत पर तो कुछ असर नहीं हुआ, हां हरिसिंह के आश्रितों (बूढ़ी मां, पत्नी और पांच छोटे बच्चे) की मदद के लिए हाथ ढेरों हाथ आगे आए हैं।

यहां कुछ सवाल चुनाव आयोग से भी है। हरिसिंह तक मतदान पर्ची क्यों नहीं पहुंची? उस तक पर्ची पहुंचाने की जिम्मेदारी किसकी थी? मतदान पर्ची पहचान का दस्तावेज़ नहीं है और न ही उसे पोलिंग बूथ पर लाना आवश्यक है फिर हरिसिंह को बिना मतदान पर्ची वोट क्यों नहीं डालने दिया गया? क्या मतदान कर्मियों, सुरक्षाबल के जवानों को इतनी सख्त हिदायत दी गयी थी कि चाहे कुछ हो जाए वे अपने स्थान से नहीं हिलेंगे? क्या वोटरों को जागरूक करने के बाद चुनाव आयोग की ये जिम्मेदारी नहीं कि वो प्रत्येक वोटर का मतदान सुनिश्चित कराए?

प्रस्तुत है इस घटना पर अमर उजाला बरेली के संपादक दिनेश जुयाल का लिखा और अमर उजाला में 19 अप्रैल को प्रकाशित एक बहुत ही मार्मिक लेखः 


  

                      क्या फर्क पड़ता है कि हरिसिंह जाटव मर गया

बरेली। देवचरा मतदान केंद्र के अंदर स्कूल कैंपस में मेन गेट से करीब 25 मीटर दूर हरिसिंह की एक चप्पल, कॉलर का अधजला टुकड़ा और पैंट के साथ जली हुई खाल 30 घंटे के बाद भी वहीं पर है। सुबह की बारिश भी इसे बहा नहीं पायी। थानेदार जीएल यादव कह रहे हैं कि घटना स्थल सड़क पर है तो इसे ही सरकारी सच मानना पड़ेगा। पीपल का पेड़ गवाही नहीं दे सकता कि सारे बीएलओ यहीं पर बैठे थे, यहीं दो बार हरिसिंह की तकरार हुई, यहीं पर आग लगा कर वह बायीं तरफ काफी दूर तक भाग कर जमीन पर गिर गया था। स्कूल के चपरासी महेश को सब पता है, हमें उसने बताया भी लेकिन वह ऐसी गवाही नहीं देगा। वह कहेगा कि उस समय तो वह पानी पिलाने गया था। आग बुझाने के नाम पर अखबार से फटका मारने वाला दरोगा कुछ नहीं कहेगा। पता नहीं कितने लोग थे मौके पर, कौन उन्हें गवाही के लिए लाएगा? सीआईएसएफ के जवान भी ड्यूटी करके चले गए। सरकार ने आनन-फानन में लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस बुला कर कह दिया कि हरिसिंह की मौत की वजह मतदान से जुड़ी नहीं है। प्रशासन ने अपनी त्वरित रिपोर्ट में उसे पागल और शराबी तक करार दे दिया तो हरि सिंह प्रतिवाद नहीं करेगा उसे तो कल रात ही आनन-फानन में जला दिया। एक गरीब उस पर भी जाटव मजदूर खुद जल कर मर गया किसको फर्क पड़ता है? फर्क पड़ता जो लोकतंत्र के महापर्व पर कोई दाग लगता, आफीशियली यह घोषित कर दिया कि ऐसा नहीं हुआ अब किसी बात से क्या फर्क पड़ता है।

नई बस्ती में कीचड़ का रास्ता पार कर एक अधबने मकान के पास हरिसिंह की फूस की झोपड़ी के बाहर उसकी मां-बीवी और पांच बच्चों को दिलासा देने बस्ती की कुछ महिलाएं बैठी हैं। यही वे लोग बचे हैं जिन्हें इस मौत से फर्क पड़ता है। हरिसिंह के कमजोर परिवार को सहारा देने वाले भजनलाल हों या फिर आसपास की महिलाएं, हरि को पागल और शराबी कहे जाने को सरकारी बेहयाई की मिसाल मानते हैं। कहते हैं, जो पेट मुश्किल से भर पाता हो वह शराब कहां से पीएगा। कभी मिल गई तो लगा ली लेकिन इस बार तो चुनाव की वजह से तीन दिन से यहां औरों ने भी शराब नहीं पी थी। सब कहते हैं उसे पागल कैसे करार दे सकते हैं? दिमागी रूप से सारे ही गरीब कमजोर होते हैं, बड़ा दिमाग होता तो बाबू साब नहीं होते। हरि जरी का बेहतरीन कारीगर था, हर तरह की मजदूरी करता था। पांच बच्चों का कच्चा परिवार है, कभी बीवी पर झुंझलाहट तो निकालता ही होगा। यह कल्पना कर एसडीएम ने लिख दिया गया कि वह पत्नी से झगड़ कर आया था। हरि का विसरा सुरक्षित कर लिया गया है, इसमें गंदा पानी बताया गया है। हो सकता है कि हजारों विसरों की तरह ये भी सालों यों ही पड़ा रहे। अगर फर्क पड़ता लगा तो जल्द जांच भी हो जाएगी और जैसी रिपोर्ट चाहे मिल जाएगी।

हरि के मामा बामसेफ से जुड़े हैं। शायद यही वजह थी कि यह जरी कारीगर बसपा को वोट देने के लिए जयपुर से यहां आया था। यकीनन उसने दबाव बनाने के लिए आत्मदाह का प्रयास किया लेकिन शायद मरना तो उसने भी नहीं चाहा होगा। बीएलओ से पहली बार हुए झगड़े की बात हरि की पत्नी वीरवती ने भी कही, तब वह भी साथ में थी। पर्ची हरि ही नहीं गांव के और लोगों को भी नहीं दी गई थी। गांव वाले इसकी तस्दीक कर रहे हैं लेकिन प्रशासन का इस पर ज्यादा जोर है कि बीएलओ की भूमिका सामने न आए वरना मामला चुनाव से जुड़ जाएगा। वीरवती की तहरीर को एसओ पहले ही झूठा बता रहे हैं, जांच के बाद इसका क्या हश्र होगा यह कहने की जरूरत नहीं।
 
एसओ भमोरा ने बताया कि मामले की जांच एसडीएम, सीओ और स्थानीय पुलिस कर रही है। दोपहर बाद तीन बजे तक इनमें से न कोई मौके पर दिखा न हरि के घर गया। एसओ ने बताया कि दरोगा सत्येंद्र जांच पर निकले हैं, शाम को आएंगे। घटनास्थल थाने से दो किलोमीटर और घर ढाई किलोमीटर पर है। जब उनसे कहा कि जांच के लिए बहुत दूर तो जाना नहीं तो बोले-मौके पर इतने लोग मौजूद थे कोई कर्नाटक पहुंच गया होगा और कोई बरेली, जांच इतनी जल्दी नहीं होती। खास कर इस मामले में तो लंबा समय लगना है। लोग कुछ भी लिखें-कहें सच वही माना जाएगा जो हमारा आईओ लिखेगा।
 
सारे प्रत्याशी शुक्रवार को थकान मिटा रहे थे लेकिन हरि जैसे वोटरों के मरने पर बसपा को शायद फर्क पड़ता है इसलिए कल रात बसपा विधायक सिनोद शाक्य यहां पहुंचे थे। गांव के प्रधान गुप्ता जी हरि के घर नहीं पहुंचे। हरि शायद उनका वोटर नहीं है इसलिए हरि का न बीपीएल कार्ड बना है और न इंदिरा आवास के लिए उसे पात्र माना गया। हरि की 10 गुणा आठ की झोपड़ी के अंदर एक कोने पर कुछ सूखी लकड़ियां हैं। कुछ गत्ते के छोटे-छोटे डिब्बे, एक लकड़ी का बक्सा और तीन खटिया। सामने बच्चों की कुछ किताबें भी हैं। बस इतनी सी पूंजी है। खाना घर के बाहर खुले में पकता है। कोई दरवाजा नहीं, एक टाट लटक रहा है। बड़ा बेटा तेरह साल का अनितेश साढ़े चार फुट का हो गया है। कभी-कभार शादी-ब्याह में उसे भी काम मिल जाता है। उसका नाम पांचवीं कक्षा में लिखाया गया है। प्रतीक्षा, अतुल और संजना तीनों कक्षा तीन में बैठती हैं और छह साल की स्वाति आंगनबाड़ी में। ये मिड डे मील वाले बच्चे हैं। इतना गरीब आदमी मर गया किसे फर्क पड़ेगा। मतदान प्रक्रिया पर दाग लगने से बच जाए ये चिंता किसी की हो सकती है लेकिन एक विधवा, पांच अनाथ बच्चे बूढ़ी बेसहारा मां इनकी चिंता पड़ोस के लोग और भजनलाल कब तक कर पाएंगे, पता नहीं। कह रहे थे इन्हें अनाथालय भिजवाने की व्यवस्था करवा दीजिए, हुजूर।

 

दिनेश जुयाल

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मतदान न कर पाने से क्षुब्ध व्यक्ति ने किया आत्मदाह, न्यायिक जाँच की मांग http://bhadas4media.com/article-comment/19167-bareilly-voter-self-immolates.html

मतदान न कर पाने से क्षुब्ध व्यक्ति ने किया आत्मदाह, न्यायिक जाँच की मांग

आँवला लोकसभा क्षेत्र के देवचरा में मतदान  केंद्र के भीतर कथित रूप से मतदान न कर पाने से क्षुब्ध हरिसिंह की मृत्यु की न्यायिक जाँच की मांग

महोदय,
            उपरोक्त
विषयक निम्नांकित तथ्य आपके संज्ञान में लाना चाहते हैं:

1. दिनांक 17 अप्रैल 2014 को मतदान के दौरान आंवला लोक सभा क्षेत्र के देवचरा में राम भरोसे इंटर कॉलेज मतदान केंद्र के बूथ संख्या 310 के वोटर संख्या 1309 हरि सिंह को कथित रूप से मतदाता पर्ची न होने की वजह से कई प्रयासों के बाद भी वोट नहीं डालने दिया गया। इससे कुपित होकर उसने मतदान प्रक्रिया के दौरान ही मतदान केंद्र के अंदर तमाम सुरक्षा बलों, सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों व मतदाताओं की मौजूदगी में ही केरोसिन डालकर आत्मदाह कर लिया। 90 प्रतिशत जल जाने के कारण कुछ ही देर में जिला अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गयी।

 

 

 2. मृतक कपड़ों पर ज़री कढ़ाई की डिजायनें तैयार करता था। यही उसके परिवार, जिसमें उसकी बूढ़ी माँ, पत्नी और पांच अवयस्क बच्चे हैं, की आय का एक मात्र स्रोत था।

3. प्रशासनिक जांच के मुताबिक मृतक नशे में था, अवसाद ग्रस्त था तथा पत्नी से झगड़ कर आया था तथा इस घटना का मतदान से कोई सम्बन्ध नहीं है।

4. हमारी संस्था के 6 सदस्यीय दल ने कल मृतक के परिवार, पड़ोसियों व साथियों से मुलाकात की। इन सभी के बयानों के मुताबिक मृतक न तो अवसाद ग्रस्त था, न ही शराब पिए था और न ही पत्नी से झगड़ कर आया था। वह पत्नी के साथ ही वोट डालने आया था। आरोप है कि मतदान से पूर्व कोई भी पर्ची मृतक को नहीं दी गयी जिसकी वजह से उसके पास कोई पर्ची नहीं थी, इसी कारण उसे वोट नहीं डालने दिया गया, उसने तीन बार वहां मौजूद लोगों से गुहार की, हर बार उसे झिड़क दिया गया। इनका आरोप है कि इसी से कुपित होकर मृतक ने ये आत्मघाती कदम उठाया। पत्नी तथा मृतक के साथ काम कर चुके फहीम के बयानों  का विडिओ छायांकन सुरक्षित है।

5. मृतक का 7 सदस्यीय परिवार जाति से जाटव(दलित), बेहद गरीब, साधनहीन है जिसमें कोई भी वयस्क पढ़ा लिखा नहीं है। यह भूमिहीन परिवार फूस की बनी झोपडी में रहता है।

6. उपरोक्त परिस्थितियों में न्यायहित में होगा कि हरी सिंह की मृत्यु की परिस्थितियों की विशेषरूप से मतदान कर्मियों की भूमिका की न्यायिक जांच हो तथा यदि इसके लिए जो भी लोग जिम्मेदार हों उनके खिलाफ कठोर कानूनी कार्यवाही अमल में लायी जाय।

हमारी मांग है कि इस पूरे प्रकरण की न्यायिक जाँच कराकर इस दलित, नितांत बेसहारा और साधनहीन परिवार के साथ न्याय किया जाय ताकि करके लोकतंत्र की गरिमा बनी रहे।

भवनिष्ठ,

डॉ. प्रदीप कुमार,
सचिव
जागर जन कल्याण समिति (पंजीकृत ग़ैर सरकारी सोसायटी)
498 कर्मचारी नगर, बरेली 243 122    
Mobile: 9719122372

अमर उजाला के इस साथी पत्रकार को सलाम

लखनऊ। लोक सभा चुनाव में जहां पेड न्यूज़ के किस्सों की भरमार हैं और मीडिया पर तरह-तरह के आरोप लग रहे हैं वहीं अमर उजाला के एक साथी पत्रकार की ईमानदारी प्रशंसा योग्य है। वाक़या समाजवादी पार्टी के कैसरबाग कार्यालय पर शनिवार को हुयी एक बैठक का है। कवरेज के लिए वहां ‘अमर उजाला’ का संवाददाता भी पहुंचा। संवाददाता ने जब बैठक के विषय में कुछ और जानकारी चाही तो मीडिया प्रभारी ने बताया कि इसके लिए उसको लोकसभा प्रत्याशी प्रो. अभिषेक मिश्र के चुनाव कार्यालय चलना पड़ेगा। इसके बाद वो मीडिया प्रभारी अमर उजाला संवाददाता को चुनाव कार्यालय पर ले गया जहां एक छोटे  कमरे में सपा के ही एक दूसरे नेता ने हजार के नोटों की गड्डी निकाली और संवाददाता की ओर बढ़ा दी।

भौचक संवाददाता ने इसकी वजह पूछी तो मीडिया प्रभारी ने कहा प्रो. अभिषेक मिश्र ने आपको देने के लिए कहा है। आपसे आग्रह है कि खबरों को थोड़ा समझ लिया कीजिए। संवाददाता ने जब इस हरकत पर नाराजगी जताई तो रुपये देने वाले नेता ने कहा कि आप दिन भर दौड़ते हैं, पेट्रोल का खर्चा समझकर रख लीजिये।
 
इस
पर संवाददाता ने जवाब दिया कि पेट्रोल के खर्चे का भुगतान तो हमारी कंपनी कर देती है। हमें इस मेहरबानी की जरूरत नहीं है। इतना कह कर संवाददाता वहां से उठकर चला आया। माई सिटी के पहले पेज पर प्रकाशित हुई इस खबर को पढ़ने के बाद सियासी हलकों में हलचल मच गई है। हालांकि, सपा ने अभी तक इस मामले पर कोई सफाई नहीं दी है।

हाईकोर्ट ने कहा हज पर जाने वालों को दी जाएं बेहतर सुविधाएं

शाहजहाँपुर(उप्र), 21 अप्रैल। इमरोज़ होटल, कच्चा कटरा, में एक प्रेस कांफ्रेंस में बोलते हुए हाजी मोहम्मद असलम खां वारसी ऐडवोकेट ने बताया कि भारत के हाजियो के साथ हज के समय बहुत नाइंसाफी, हक्तल्फी, बेमानी होती थी। पैसा होटलो में रोकने का लिया जाता लेकिन उन्हे पुरानी खस्ता हाल इमारतों में रोका जाता था। जबकि दुनीया भर के हाजी होटलो में रुकते है। इसके खिलाफ एक जनहित याचिका हाईकोर्ट इलाहबाद में दायर की गयी थी। याचिका पर हाई केर्ट ने फैसला दिया है कि भारत के हाजियो को वही सहूलियतें दी जाएं जो और मुल्को की हज कमेटी के ज़रिये जाने वाले हाजियो को मिलती है।

काफी लम्बे समय से भारत से जाने वाले हाजियो के साथ ये अन्याय हो रहा था। पूरे मुल्क के हाजियो की लड़ाई हाजी मोहम्मद असलम खां वारसी ऐडवोकेट के लड़ने व कामयाब होने पर शहर के ज़िम्मेदार लोगो ने हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए उन्हे मुबारकबाद दी जिनमें अकील अहमद (प्रिंसिपल G.F. College), सय्यद काज़ी मसूद (काज़ी शहर झन्डा कलां) शाहजहाँपुर, हाजी मलक आसिफ खां (सिंजई, शाहजहाँपुर), डॉ. हुसैन अहमद आज़म (मज़मून निगार और शायर ऐवार्ड प्राप्त उर्दू एकैडमी पटना बिहार), मशहूद हसन खां ऐडवोकेट (पूर्व अध्यच्छ बार कौंसिल शाहजहाँपुर), सय्यद डॉ. अनवार (हड्डी रोग विशेषग), सय्यद ज़ुबैर अब्दुल क़ादिर (प्रिंसिपल इस्लामिया इंटर कालेज), हाफिज़ मोहम्मद इज़हार खां आदि थे।

एडवोकेट हाजी मोहम्मद असलम खां वारसी से #9936941007 पर संपर्क किया जा सकता है।
 

न्यूज़ चैनल पर प्रसारित कार्यक्रम में मारपीट, सपा विधायक पर एफआईआर

लखनऊ। एक न्यूज़ चैनल पर प्रसारित कार्यक्रम में बहस के दौरान हुई मारपीट के मामले में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के सदस्यों ने मैनपुरी में एक दूसरे पर एफआईआर दर्ज करायी है।

 
बसपा
सदस्यों की ओर से मैनपुरी के सपा विधायक राजू यादव और चार अज्ञात के खिलाफ जानलेवा हमले और लूट का मामला दर्ज किया गया है। ग़ौरतलब है कि एक न्यूज चैनल के वाद-प्रतिवाद कार्यक्रम के दौरान बसपा नेता से मारपीट की गई थी।

विधायक राजू यादव के समर्थक कौशलेंद्र कठेरिया ने भी बीएसपी के राजीव शाक्य व अन्य पर भी लूट और एससएसटी एक्ट का मामला दर्ज कराया है।

अगर मोदी की सरकार आई तो क्या अख़बार मालिकों के अच्छे दिन आएंगे?

अच्छे दिन आने वाले हैं, मगर अख़बार मालिकों के, अगर मोदी की सरकार आई तो…। इसी साल 7 फ़रवरी को सुप्रीम कोर्ट ने सभी अख़बार मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड सम्बन्धी केन्द्रीय श्रम मंत्रालय के 2011 के आदेश को उसी तिथि से लागू करने का आदेश दिया था। उसके बाद एबीपी, राजस्थान पत्रिका जैसे कई संस्थानों ने कोर्ट में पुनर्विचार याचिकाएं दायर कीं, जिनके ख़ारिज हो जाने के बाद अब इसे लागू करना ज़रूरी हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से ही इसकी काट में जुटे अख़बार मालिकों ने नई रणनीति बनाई है।

अब चूँकि 16वें लोकसभा चुनाव के पाँच चरणों का मतदान हो चुका है और 16 मई तक नई सरकार बननी है। ऐसे में अख़बार मालिक अपनी कूटनीति के तहत भाजपा समर्थित सामग्री को बढ़ावा देकर मोदी-सरकार को लाने के प्रयास में हैं, कांग्रेस सरकार में पत्रकारों के हित में किया गया यह महत्वपूर्ण फ़ैसला उद्योगपतियों की गोद में बैठे मोदी की भाजपा सरकार में बदला जा सके।
 
2011 में ज़्यादातर सांसदों के विरोध के बावजूद सोनिया गाँधी ने मजीठिया आयोग की सिफ़ारिशों को गम्भीरता से लिया और श्रम मंत्रालय से इस सम्बन्ध में शासनादेश जारी करा कर पत्रकारों के हित की दिशा में ज़रूरी कदम उठाया था। लेकिन अब जबकि इसे लागू करने का समय आ गया है तब दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर जैसे सर्वाधिक टर्न-ओवर वाले संस्थान इसे लागू करने के एवज़ में तमाम तिकड़में लगा रहे हैं।

दूसरों की दशा पर लिखने वाले प्रिंट मीडिया के पत्रकार लम्बे समय से कम वेतन और ज़्यादा वर्किंग आवर काम कर शोषित होते रहे हैं। ऐसा पहली बार है जब पत्रकारों के हक़ के लिए कांग्रेस सरकार में मजीठिया वेज बोर्ड जैसे ठोस कदम उठाए गए।

ये भी इस बार ही हो रहा है कि बिहार में राजनीतिक दल जेडीयू ने अपनी घोषणा में पत्रकारों के हित की बात कही। इसलिए ज़रूरी है कि सभी मीडिया संस्थानों में कार्यरत सभी कर्मचारी एकजुट होकर ‘‘हर हाथ शक्ति, हर हाथ तरक्की’ पाएं।

 

एक पत्रकार दवारा भेजा गया पत्र।
 

ये नेता हैं या गुंडे?

जिन-जिन लोगों को हिंदी फिल्में देखने का शौक़ है वह सब अमरीश पूरी, प्रेम चोपड़ा, गुलशन ग्रोवर, शक्ति कपूर, सदाशिव अमरापुरकर, प्राण और इसी प्रकार के दुसरे विलन को अच्छी तरह जानते हैं। ये फिल्मी विलेन गाँव वालों को या आम जनता को धमकी देते रहते हैं की यदि तुमने हमारा काम नहीं किया तो हम तुम्हें उठवा लेंगे, तुम्हारे घर वालों को उठवालेंगे या फिर यह कि तुम्हारी ज़मीन छीन लेंगे। यह सब फ़िल्मी गुंडे हैं और ऐसी हरकतें सिर्फ फिल्मों में करते हैं मगर अफसोस की बात यह है कि हमारे प्यारे देश भारत में जिन नेताओं को जनता की रक्षा के लिए चुना जाता है वही आये दिन जनता को और अपने विरोधियों को धमकी देते रहते हैं।

प्रवीण तोगड़िया, अकबरुद्दीन ओवैसी, अमित शाह, इमरान मसूद, वसुंधराराजे सिंधिया, गिरिराज सिंह और अजित पवार जैसे लोग इन दिनों किसी अच्छे काम के लिए मशहूर नहीं हुए हैं बल्कि इन्होंने अपने भाषणों के दौरान कुछ ऐसी बातें कहीं हैं जिनसे ऐसा लगता है कि वह या तो वोटरो, किसी खास धर्म के मानने वालों को यह फिर अपने राजनितिक विरोधियों को धमका रहे हैं। कोई किसी को टुकड़े-टुकड़े करने की धमकी दे रहा है तो कोई चुनाव बाद कौन किसके टुकड़े करता है ऐसा कहकर धमका रहा है। कोई मोदी विरोधियों को भारत से निकल जाने की धमकी दे रहा है तो किसी को यह पसंद नहीं है कि मुस्लिम हिन्दुओं के मोहल्ले में बिज़नेस करें। अगर कोई मुस्लमान हिन्दू मोहल्ले में बिज़नेस करने की हिम्मत करता है तो उसे प्रवीण तोगड़िया जैसे लोग धमकी देते हैं और अपने गुंडों को उस मुसलमान का घर लूट लेने की बात कहते हैं।

अफ़सोस इस बात का भी है कि वरुण गांधी और राज ठाकरे जैसे लोग किसी को धमकी दें तो बात समझ में आती है कि इन्हें अभी बहुत कुछ सीखना है मुलायम सिंह यादव जैसे बड़े नेता भी ऐसा करते हैं। तीन अप्रैल को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने शिक्षा मित्रों को कथित रूप से धमकी दी कि वे एसपी को वोट करें नहीं तो उन्हें स्थायी करने का फैसला वापस ले लिया जाएगा।

ऐसा नहीं है कि भारत की राजनीति में अचानक इतनी गिरावट आ गयी है पहले भी लोग नेता लोग गलत भाषा का प्रयोग करते रहे हैं, एक दूसरे की निजी ज़िन्दगी पर हमले होते रहे हैं अलबत्ता इस बार यह देखने को मिल रहा है की नेता जी हज़ारों की भीड़ के सामने एक दूसरे को देख लेने की धमकी दे रहे हैं। राजनितिक पार्टियों में कोई भी पार्टी ऐसी नहीं हैं फ़िलहाल आम आदमी पार्टी को छोड़कर जो यह कहे कि उसके एक भी नेता ने किसी को धमकी नहीं दी. कोई कोई नेता तो ऐसा है जिसने बदतमीज़ी की हद ही पार कर दी है। इसमें इमरान मसूद, अमित शाह, अजित पवार और गिरीराज जैसों का नाम लिया जा सकता है। जहाँ इमरान मसूद ने मोदी को टुकड़े-टुकड़े कर देने की धमकी दी वहीँ गिरीराज ने तो यहाँ तक कह दिया की जो लोग मोदी को पसंद नहीं करते वह पाकिस्तान जाने के लिए तैयार हो जाएँ।

हालाँकि इन सभी मामलों में चुनाव आयोग ने भाषण की सीडी मंगवाई और थोड़ा बहुत एक्शन भी लिया मगर चूँकि इस तरह की धमकी देने वालों के खिलाफ कभी उचित कार्रवाई नहीं हुई इसलिए ऐसे नेता आये दिन जनता को या अपने विरोधियों को धमकी देते रहते हैं। अजित पवार पहले भी कई बार गलत भाषा का प्रयोग कर चुके हैं अगर पहले ही उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो गयी होती तो वह इस बार जनता जो वोट नहीं देने की स्थिति में पानी रोक देने की धमकी नहीं देते।  

अजित पवार ने लोगों को धमकी देते हुए कहा, कल वोटिंग है यदि लोगों ने सुप्रिया के पक्ष में वोट नहीं किया तो हम गाँव की पानी की आपूर्ति काट देंगे। मेरी बहन को बारामती से बहुत वोट मिलते हैं। इसकी हार जीत पर तुम लोगों के वोटों से कोई अंतर नहीं पड़ेगा और सुप्रिया को तो हम बाहर से जितवा ही देंगे लेकिन मैं वोटिंग मशीन से इस बात का पता लगवा लूंगा कि तुम लोगों ने किसके पक्ष में वोट डाला है।

अजित पवार कितने संजीदा राजनेता हैं इसका अंदाजा आप उनके पहले के बयान से लगा सकते हैं। एक बार अजित पवार ने कहा था कोई किसान डैम से पानी छोड़ने की मांग पर बल देने के लिए भूख हड़ताल पर बैठा है हम पानी लांएं कहाँ से? भूख हड़ताल करने से पानी नहीं मिलेगा, पानी-पानी  किया करते हो। क्या पानी लाने के लिए हम डैम में पेशाब करें। जब पीने के लिए पानी ही नहीं है तो पेशाब भी आसानी से नहीं उतरता।  

ज़रा गौर कीजिये इस घटिया बयान के बाद यदि पवार के विरुद्ध कोई सख़्त कार्रवाई की गयी होती तो आज वह वोटरों को धमकी देते? यही नहीं पवार ने यह भी कहा, महारष्ट्र में बिजली की कमी है। बिजली चली जाने के बाद लोगों के पास बच्चा पैदा करने के सिवाय और कोई काम ही नहीं रहता।

सवाल यह है कि आखिर नेता इस हद तक क्यों गिरते जा रहे हैं। क्या उनका सिर्फ एक ही मक़सद होता है सत्ता पाना और इसके लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। राजनीति पर नज़र रखने वाले कहते हैं जब राजनितिक लाभ के लिए नेता लोग दंगा तक करवा देते हैं, सैकड़ों की जानें चली जाती हैं, हज़ारों बेघर हो जाते हैं और यह सब सिर्फ इसलिए कराया जाता है कि इस से राजनितिक लाभ उठाया जा सके। जब लाश पर राजनीति की जा सकती है तो फिर एक दूसरे को गाली गलौज देने और फिर किसी को धमकाने में इन नेताओं को शर्म क्यों महसूस हो?

गिरीराज सिंह का मामला ही देख लीजिये। भाजपा ने उनके बयान से पल्ला झाड़ लिया है फिर भी वह अपने बयान पर क़ायम हैं और कहते हैं उन्हों ने कुछ गलत नहीं किया। अगर जनता को लगता है कि नेताओं में ह्रदय परिवर्तन होगा तो वह गलत सोच रहे हैं। जनता ही चाहे तो ऐसे धमकी देने वाले नेताओं को उनकी औक़ात बता सकती है। गलती जनता की भी है। जब भी कोई नेता किसी को धमकी देता है तो सभा में मौजूद लोग खूब तालियां बजाते हैं उन्हें यह अंदाज़ा नहीं लगता कि आज जो नेता अपने लाभ के लिए किस दूसरे को धमकी दे रहा है तो कल उसे भी धमकी दे सकता है। जनता में सुधार के बिना नेताओं के सुधरने की उम्मीद नहीं की जा सकती। नेता लोग इन दिनों जैसी धमकी वाली राजनीति कर रहे हैं उस से यह तय करना कठिन हो रहा है कि यह नेता हैं या गुंडे?

 

अब्दुल नूर शिबली। संपर्कः anshibli@gmail.com

सुब्रत रॉय की ज़मानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश सुरक्षित

नई दिल्ली, 21 अप्रैल। सुप्रीम कोर्ट ने आज सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय और दो निदेशकों की ज़मानत याचिका पर अपने आदेश को सुरक्षित रख लिया है। ये तीनो 4 मार्च से न्यायिक हिरासत में हैं। न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ की दो सदस्यीय खंडपीठ ने सुब्रत राय और दो निदेशकों की जमानत के लिए दस हजार करोड़ रुपए का भुगतान करने के सहारा के प्रस्ताव पर भी विचार करने की सहमति दे दी है। मामले की अगली सुनवाई की तारीख अभी तय नहीं की गई है।

 

राजनीतिक पत्रिका ‘न्यूज बेंच’ का हिंदी और अंग्रेजी संस्करण बाजार में

ग्रांड कॉन्सेप्ट्स मीडिया सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड ने एक राजनीति केंद्रित मासिक पत्रिका ‘न्यूज बेंच’ का प्रकाशन हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं में किया है। न्यूज बेंच के प्रवेशांक की कवर स्टोरी है ‘नरेद्र मोदी के असली दुश्मन’, जिसमें खुलासा किया गया है कि नरेंद्र मोदी को 24 अकबर रोड ‘कांग्रेस’ चाहे अजय भवन ‘वामदल’ से कोई खतरा ही नहीं है। उन्हें असली खतरा अंग्रेजीदां अभिजात्य बुद्धिजीवियों और अपनी ही पार्टी के उन घाघ नेताओं से हैं, जो लगातार उनकी टांग खीचने में लगे हुए हैं। 76 पृष्ठों वाली इस पत्रिका ने पूरे देश के राजनीतिक नब्ज़ को टटोलने के साथ अन्य क्षेत्रों को भी अपने भीतर समेटने का प्रयास किया है।

नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में एक भव्य समारोह के दौरान प्रसिद्ध पत्रकार व पूर्व संपादक, जनसत्ता, अच्युतानंद मिश्र ने ‘न्यूज बेंच’ के  हिंदी और अंग्रेजी संस्करण का लोकार्पण किया। गांधीवादी दार्शनिक व सात राज्यों के पूर्व राज्यपाल भीष्म नारायण सिंह समारोह के मुख्य अतिथि रहे। इस अवसर पर ‘मीडिया और चुनाव’ विषय पर एक सेमिनार का भी आयोजन किया गया, जिसमें सतीश जैकब (प्रसिद्ध पत्रकार, दो दशक तक बीबीसी से जुड़े रहे), एन.के. सिंह (वरिष्ठ टीवी पत्रकार व महासचिव, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन), कैलाश सत्यार्थी (चेयर पर्सन, ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर) आदि विशिष्ट अतिथियों सहित कई वरिष्ठ पत्रकारों ने अपने विचार रखे।

कंपनी के चेयरमैन कुशल देव राठी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए बताया कि कंपनी पिछले चार साल से ‘न्यूज बेंच’ नाम से ही द्वीभाषीय साप्ताहिक समाचार पत्र प्रकाशन कर रही है। यह पत्रिका हमारी पिछले चार साल की मेहनत का नतीजा है। इस पत्रिका के माध्यम से हमारा मकसद पत्रकारिता के सुनहरे दौर को एक बार फिर जीवंत करना है। इस अवसर पर साप्ताहिक समाचार पत्र के एनसीआर संस्करण को रिलांच करने के साथ वेब पोर्टल भी लांच किया गया।
 
न्यूज बेंच के संपादक अनिल पांडेय हैं। इससे पहले वे 14 भाषाओं में प्रकाशित पत्रिका द संडे इंडियन (हिंदी) के कार्यकारी संपादक और द संडे इंडियन (अंग्रेजी ) के सीनियर एडीटर रह चुके हैं। अनिल पांडेय इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के हिंदी दैनिक जनसत्ता और स्टार न्यूज में भी काम कर चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में अध्यापन भी किया है। उन्हे मीडिया की कई फेलोशिप भी मिल चुकी है और राजनीतिक और इनवेस्टीगेटिव रिपोर्टिंग के लिए कई बार पुरस्कृत भी किया जा चुका है।

 

प्रेस रिलीज़
 

न्यूज़ फर्स्ट से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार रवि शर्मा

मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार रवि शर्मा ने गौरी मीडिया प्राइवेट लिमिटेड को ज्वाइन किया है। संस्थान में उन्हें कार्यकारी संपादक बनाया गया है। रवि शर्मा लंबे समय से प्रिंट मीडिया से जुड़े रहे हैं। वो दैनिक जागरण, अमर उजाला और जनवाणी समेत कई समाचार पत्रों में अहम पदों पर काम कर चुके हैं।

गौरी मीडिया इटरनेट का पहला लाइव न्यूज़ चैनल 'न्यूज़ फर्स्ट डॉट टीवी' लांच करने जा रहा है। अगले महीने से मासिक पत्रिका 'मेरठ प्लस' भी लांच होने जा रही है। ये समूह पहले से ही राष्ट्रीय मासिक पत्रिका 'दि सिटी इंडिया' और साप्ताहिक समाचार पत्र 'विशिष्ट समाचार' का प्रकाशन कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट तेजपाल की ज़मानत अर्ज़ी पर सुनवाई को तैयार

नई दिल्ली, 21 अप्रैल। सुप्रीम कोर्ट ने तहलका के संस्थापक संपादक तरुण तेजपाल की ज़मानत अर्ज़ी सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली है। मुख्य न्यायाधीश की बैंच ने सुनवाई करते हुए गोवा पुलिस से चार हफ्तों में जवाब देने को कहा है। तेजपाल पर अपनी एक जूनियर महिला सहयोगी से दुष्कर्म का आरोप है।

सुप्रीम केर्ट में एक संक्षिप्त बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने अपने मुवक्किल तेजपाल के लिए अंतरिम ज़मानत की मांग की। उन्होने कहा कोर्ट चाहे तो ट्रायल के दौरान तेजपाल पर किसी भी तरह की शर्तें लगा कर सकता है।

इससे पहले 14 मार्च को बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने तेजपाल की की ज़मानत अर्ज़ी ख़ारिज़ कर दी थी।  
 

ये चुनावी इंकलाब सिवाय ज़़ुबानी जमा-खर्च और कुछ नहीं

वाराणसी। न शहादत दिवस है और न ही जन्म दिवस फिर भी अपने शहर बनारस की सरज़मीन पर इंकलाब-जिदांबाद के नारे को सुन रहा हूं तो भगत सिंह की बातें इंकलाब का मतलब अन्याय पर टिकी व्यवस्था का खात्मा है, जेहन में गूंज रहा है। चुनावी मौसम में इस नारे के औचित्य को समझना चाहता हूं पर समझ छोटी पड़ रही हैं। नारे लगाने वाले राजनीतिक दल कौन सा इंकलाब लाना चाहते हैं। इनका इंकलाब कब आयेगा, ये तो नहीं पता पर अफसोस काश भोली-भाली आवाम इन्हें समझ सकती? जान पाती इनके मंसूबों को? इनके चेहरों को पहचान पाती? वैसे ये शहर एक लम्बे समय से किसी इंकलाब की बाट जोह रहा है, जो यहां के हालात में आमूल-चूल परिवर्तन ला दे।

इनके भीतरखाने में झांक कर देखिए चुनाव जीतने के लिए जात-धर्म, अगड़ी-पिछड़े के सभी समीकरण को आजमाने में इन्हें कोई गुरेज नहीं है। इन्हें किसी तरह सत्ता पाना है। जन सुविधाओं की कीमत पर उसे पचाकर सुख भोगना है। चुनाव से पहले ही खुद को इस मुल्क का प्रधानमंत्री मान चुके एक माननीय यहां से चुनाव लड़ रहे है। हाल ही में छोटे पर्दे पर बीतें 23 मार्च को भगत सिंह के शहादत दिवस पर इन्हें देखा था, कोई स्वामी जी है, जो आजकल राश्ट्र भक्त होने का प्रमाण पत्र बांटते फिर रहे है, उन्ही के मंच पर ये महाशय विराजमान थे इनके बोलने का मौका आया तो इनके गले से एक बार भी नहीं निकला इंकलाब-जिदांबाद, भगत सिंह जिदांबाद।

किसी तरह से बामुश्किल कह सके शहीदो,,,,शहीदों हैरत हुई किसकी शहादत दिवस पर किसे याद कर रहे थे ये महाशय। इनसे ये सवाल पूछने वाला कोई नहीं कि जिसकी शहादत दिवस पर आप मौजूद थे उसके सपनों का भारत आपके इलेक्शन मैनिफेस्टों में किस जगह पाया जाता है? जबाब नहीं खामोशी है, आगे बढ़ता हूं। दो दिन पहले एक सभा में, एक और महोदय जिनकी घोषणा है कि ये महाक्रांति करने बनारस आये है। जनता से संवाद करने पहुंचे नारा दिया इंनकलाब-जिन्दाबाद लेकिन ये इन्कलाब है क्या बताने की जहमत नहीं उठाई। और भी है यहां, समाजवादी से लेकर राश्ट्रवादी तक, बहुजन समाज से लेकर सर्वजन समाज तक की बेहतरी की बात करने वाले। लेकिन इन सबके बीच भगत सिंह का इंनकलाब कहां खड़ा है? जो तब तक नहीं रूकता या थमता जब तक कि शोषण पर टिकी व्यवस्था का अंत नहीं होता।

कम से कम ऐसा कोई संघर्ष तो यहां फिलहाल नहीं दिखता। रंग-बिरंगी टोपी, झंडे और साथ में जिन्दाबाद का नारा लगाने वाले जिस किसी से भी मिलते है, हर मर्ज के इलाज का दावा करते हुए जब कहते है, हां-हां सब ठीक है तो मुझे कवि धूमिल के शब्दों में कहना पड़ता हैं, 'आप सब के मुंह में जितनी वाहवाही है, उससे ज्यादा पीक है, इसे कहा थूकेंगे लोगो की इच्छाओं और आंकाक्षाओं पर' …… और फिर निकल लेंगे अगले 5 सालों के लिए। और वक्त की दौड़ में पीछे छूट जायेगा मेरा शहर बनारस। एक इंकलाब की आस लिए और उस सवाल का जबाब भी नहीं मिलेगा रोटी-रोजी से जो खेलता है, वो तीसरा आदमी कौन है।

भास्कर गुहा नियोगी
वाराणसी।

 

सुंदर ने अपनी पहली मोहब्‍बत को अपनाया है, बीवी के साथ

लखनऊ: आर सुंदर ने आखिरकार पत्रकारिता को टाटा बाय-बाय कर दिया है। मतलब यह नहीं कि वह अब अभिव्‍यक्ति के असीम क्षेत्र को छोड़ने जा रहा है, बल्कि उसने पत्रिकारिता के परम्‍परागत क्षेत्र को छोड़कर अध्‍यापन को अंगीकार कर लिया है। वह भी फोटोग्राफी। लखनऊ के रामस्‍वरूप विश्‍वविद्यालय में अब वह सहायक प्रोफेसर के तौर पर अपने छात्रों को कैमरे के कमाल और बारीकियों-तकनीकियों से रू-ब-रू करायेगा।

कैमरा तो सुंदर की पहली मोहब्‍बत थी। बचपन से ही उसे कैमरे से बेइंतेहा मोहब्बत थी। लेकिन उसने अपनी इस पहली-पहली मोहब्‍बत को अब अपनाया है। पत्रकारिता में करीब 26 साल खपाने के बाद। हालांकि इसके पहले वह दो बैंक में भी काम कर चुका था, लेकिन जल्‍दी ही उसे इलहाम हो गया था कि बैंक की नौकरी उसका अभीष्‍ट नहीं है, और यहां रकम की जमा-निकासी का धंधा करने के लिए ही नहीं जन्‍मा है। आर सुंदर वैसे तो चेन्‍नई में जन्‍मा था। उसके पिता सेना में थे और बचपन में ही अपने पिता के साथ कानपुर में बस गया था। वहीं पढ़ाई की। एमकाम तक।

सन-82 में उसे बैंक आफ इंडिया में जुड़े। बाद में केनरा बैंक में क्‍लर्की मिल गयी। इसी बीच बैंक की हाउस मैग्‍जीन में उसका एक लेख छपा। उसी अंक में फतेपुर के जहानाबाद की रहने वाली और बैंक ऑफ इंडिया की ही कर्मचारी नमिता सचान की कविता छपी थी। दोनों से आपसी बातचीत की और मामला इतना ज्‍यादा बिगड़ गया कि आखिरकार इन दोनों ने शादी कर ली। अरे एक-दूसरे से ही यारों।

लेकिन सुंदर की सुंदरता तो पत्रकारिता में ही थी। सो, सन-88 में उसने टाइम्‍स इंस्‍टीच्‍यूट में प्रवेश लिया और 89 में उसका सलेक्‍शन लखनऊ के नवभारत टाइम्‍स में हो गया। सब एडीटर के तौर पर। सन-90 में उसने जयपुर के राजस्‍थान पत्रिका में काम शुरू किया और फिर 92 में कानपुर के स्‍वतंत्र भारत में नौकरी कर ली। फिर सन-94 में लखनऊ के राष्‍ट्रीय सहारा में और उसके बाद सन-2001 में हिन्‍दुस्‍तान के बाद उसने सन-2004 मुम्‍बई में सीएनबीसी आवाज ज्‍वाइन कर लिया। सन-2007 में बिजनेस स्‍टैंडर्ड में काम किया लेकिन सन2009 में नौकरी छोड़ दी। उसे लग चुका था कि परम्‍परागत पत्रकारिता के लिए वह नहीं जन्‍मा है। काफी उहापोह के बाद अब उसने शिक्षण का काम शुरू कर दिया है।

उधर नमिता अब बैंक की नौकरी से निवृत हो चुकी है। नमिता की कविताएं अभी भी सुंदर और उसके बेटों के साथ ही उनके मित्रों को ऊर्जा देती रहती हैं। न न, कभी भी इन लोगों में कोई बड़ा झगड़ा नहीं किया। अगर कोई काम पूरी शिद्दत के साथ किया तो इकलौता काम वह था सिर्फ एक-दूसरे से बेपनाह मोहब्‍बत। दो बेटे हैं, एक संकल्‍प और दूसरा शुभम। दोनों ही बैंगलोर में सेटल हैं, जबकि यह पुरानी जोड़ी लखनऊ में।

करीब बीस साल बाद आर सुंदर से मेरी मुलाकात आज दोपहर वाराणसी के हरीशचंद्र घाट के पास एक इडली की दूकान पर हुई। नमिता साथ ही थी। हमारे एक संयुक्‍त मित्र भी हमारे साथ मौजूद थे। यह परिवार अपनी माता-पिता के श्राद्ध के सिलसिले से काशी आया था। बातचीत का दौर चला तो सुंदर ने माना कि आज के कैमरे किसी सब्‍जेक्‍ट को केवल यथावत पेश करते हैं, उनमें तकनीकियों का तानाबाना बेहद न्‍यूनतम हो चुका है। उसने बड़ी निराश स्वर में कहा 'अरे! थ्रिल ही नहीं बची है आज के कैमरों में।'

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520

दिव्य भास्कर ने लिया धीमंत से इस्तीफा, कल्पेन को नोटिस

दिव्य भास्कर, अहमदाबाद में बतौर पॉलिटिकल एडिटर काम कर रहे धीमंत पुरोहित का चुनावो के दौरान ही इस्तीफा ले लिया गया है। एक अन्य पत्रकार कल्पेन मकवाणा को इस्तीफे का नोटिस दे दिया गया है।
उल्लेखनीय है कि, नरेन्द्र मोदी का फर्जी इन्टरव्यू फ्रन्ट प्रेज प्रकाशित होने और बाद में माफी मांगने के कारण धीमंत पूरोहित के सामने काफी सवाल खड़े होने लगे थे। इसके बाद एक और घटना में भी दिव्य भास्कर को माफी मांगनी पड़ी थी। कहा जा रहा है कि, दिव्य भास्कर स्टेट एडिटर अवनीश जैन ने ही धीमंत की बतौर पोलिटिकल एडिटर नियुक्ति की थी और आज जैन ने ही धीमंत का इस्तिफा ले लिया है।

इतना ही नहीं, स्टेट एडिटर अवनीश जैन ने अन्य एक रिपोर्टर कल्पेन मकवाणा को भी तीन महिने के अंदर इस्तीफा देने का नोटिस दे दिया है।

वहीं गांधीनगर ब्यूरो से अहमदाबाद लाए गए और कांग्रेस बीट की रिपोर्टिंग कर रहे रिपोर्टर आशीष आचार्य ने दिव्य भास्कर को बाय-बाय कर संदेश न्यूज़ पेपर ज्वाइन किया है।
 

क्या राज ठाकरे की इतनी न्यूज-वेल्यू है कि मीडिया उससे अपनी औकात नपवाए?

चौथे खंभे के जिन दिग्गजों को हम जैसे लोग लोकतंत्र के पहरुये, रक्षक-उद्धारक समझ रहे थे, वे बेहद बौने साबित हुए। राज ठाकरे ने टीवी चैनलों पर नामी पत्रकारों की ऐसी-तैसी कर दी। इन तथाकथित बड़े पत्रकारों के लिए भीगी बिल्ली बन जाना, मुआवरा भी छोटा साबित हुआ। पहली बार पत्रकारों को इतना दयनीय रूप में देखा। ये स्थिति न केवल शर्मनाक, वरन भविष्य के लिहाज से चिंताजनक भी है। आपातकाल के बारे में सुना है कि तब इंदिरा गांधी ने मीडिया को थोड़ा झुकने के लिए कहा था और उसकी परिणति रेंगने के रूप में सामने आई थी। लेकिन अब भारतीय मीडिया, खासतौर टीवी मीडिया रेंगने से भी आगे की दुर्गति को प्राप्त हो गया है।

20 अप्रैल को रात रात दस बजे राज ठाकरे एक साथ एबीपी, इंडिया टीवी और आईबीएन7 चैनलों पर नमूदार हुआ। एबीपी ने अपने चैनल के सभी बड़े पत्रकारों को घोषणापत्र कार्यक्रम में जुटाया हुआ था। जबकि, आईबीएन7 पर एटिडर-इन-चीफ(वैसे उनकी स्थिति एडिटर-इन-चीप जैसी थी) राज ठाकरे को ह\ट-सीट पर बैठाए हुए थे। इंडिया टीवी पर रजत शर्मा राज ठाकरे को आपकी अदालत में लेकर बैठे हुए थे। तीनों ही कार्यक्रमों में राज ठाकरे तमाम पत्रकारों के लिए जरासंध बने हुए थे। इस सारे मामले को दो स्तरों पर देखे जाने की जरूरत है। पहला है-राज ठाकरे के सामने इन नामी पत्रकारों की स्थिति और दूसरा राज ठाकरे का दंभ, सोचने का नजरिया और भविष्य के खतरे।

पहला बिंदू, एबीपी न्यूज पर राज ठाकरे के सामने एंकर किशोर मोटवाणी जरूरत से ज्यादा विनम्र बने हुए थे। इसकी वजह थी, श्रोताओं मे मौजूद दिबांग को राज दो बार हड़का चुके थे। दिबांग सफाई देने की मुद्रा में थे और जैसे-तैसे खुद को, सिर पर पड़ी राज-रूपी मुसीबत से निकालने में जुटे थे। राज ने वानखेडे़ को भी हड़काने में कसर नहीं छोड़ी। इस कार्यक्रम में कई पत्रकारों को राज ने बीच में चुप करा दिया और उनके सवालों के जवाब भी सवालों में दिए। पत्रकारों को यह आदत नहीं होती कि कोई उनसे सवाल पूछे। ऐसे में, राज के सवालों के जवाब उनके पास थे भी नहीं। उनके पास खिसियाकर रह जाना ही अंतिम विकल्प था। यही विकल्प उन्होंने चुना थी, लेकिन संभवतः दर्शकों को ऐसी आदत नहीं है कि वह पत्रकारों को खिसिया हुआ देखे।

केवल किशोर मोटवाणी, बल्कि इंडिया टीवी पर रजत शर्मा का पत्रकारीय-आत्मविश्वास भी लुटा-पिटा दिख रहा था। ऐसा लग रहा था मानो वे इंटरव्यू की बजाय मिजाजपुर्सी में लगे हैं। कार्यक्रमों के आखिर में सारे सवाल चापलूसी पर सिमट गए। राज ठाकरे के जवाब ऐसे थे कि यदि इन पत्रकारों में थोड़ा भी स्वाभिमान जिंदा था तो उन्हें कार्यक्रम बीच में खत्म करके राज को विदा कर देना चाहिए था। लेकिन, न जाने कौन-सी मजबूरी या बाध्यता थी कि वे राज को दिखाने के लिए मजबूर हुए। राज ठाकरे न तो मोदी है और न राहुल गांधी हैं। वो केजरीवाल या प्रकाश करात भी नहीं है। फिर, अचानक कहां से इतनी न्यूज-वेल्यू आ गई राज में कि पूरा मीडिया अपनी औकात नपवाने पर आ गया।

ये चैनलों की अंधी दौड़ का परिणाम था कि एक चैनल ने राज ठाकरे को पकड़ा तो सारे चैनल उन्हें देवता मान बैठे। पर, इस पर उन्हें ठीक सबक मिला है। इन कार्यक्रमो का सबसे बुरा पहलू यह है कि मीडिया की इमेज को गहरा धक्का लगा है। उन लोगों को धक्का लगा है जो यह भरोसा करते रहे हैं कि मीडिया जनता के हित में किसी से भी सवाल पूछ सकता है और उस व्यक्ति को बाध्य कर सकता कि वह नियम-कायदों को माने, लोकतंत्र पर भरोसा करके और कानून का पालन करे। लेकिन, राज ठाकरे ने ठेंगा दिखा दिया। जो सवाल थोड़े भी चुभने वाले थे, उन पर राज ने पत्रकारों को ही नंगा करने की कोशिश की। उनके जवाब थे-
तो?
फिर?
मैं क्या करूं?
ऐसे थोड़े ही होता है।
मैं नहीं समझा सकता तुम्हें।
ये मेरी प्रॉब्लम नहीं है।

सबसे ज्यादा बुरा तो राजदीप सरदेसाई को देखकर लगा। रजत शर्मा से बातचीत में तो राज ठाकरे ने उन्हें आप कहकर संबोधित किया, लेकिन सरदेसाई के साथ तो सारी बातचीत तू-तड़ाक के अंदाज में ही हुई। ऐसा लग रहा था कि राज नहीं, बल्कि राजदीप हॉट सीट पर बैठे हों। आखिर तक आते-आते राजदीप की स्थिति बेहद पीड़ादायक हो गई। वे वाहियात सवालों पर उतर आए। सच बात यही थी कि वे न तो ऐसी स्थिति का सामना करने को तैयार थे और न ही ये समझ पा रहे थे कि इस कार्यक्रम को अंजाम तक कैसे पहुंचाएं। असल में, पत्रकार जब सवाल पूछते हैं तो उनके पास एक पूर्व निधारित उत्तर भी होता है। वे इसी उत्तर की उम्मीद भी करते हैं। लेकिन, राज ठाकने ने पत्रकारों के इस अनुमान को ध्वस्त कर दिया। वे किसी भी अनुमान से परे जाकर उत्तर थे रहे थे। इसका परिणाम यह था कि इंटरव्यूकर्ता बेहद बचकाने लग रहे थे।

राज पर केंद्रित कार्यक्रम को देखते हुए मैं यह सोच रहा था कि इस स्तर का दुर्व्यवहार तो कभी माया और मोदी ने भी नहीं किया होगा। आजम खान और अमित शाह भी राज की तुलना में बेहद संतुलित और विमन्र दिखते हैं। सारे कार्यक्रमों में ऐसा लग रहा था कि राज ढके-छिपे तौर पर यह तैयारी करके आए हैं कि टीवी चैनलों को उनकी हैसियत का अंदाज कराया जाए। उन्होंने न केवल सवालों के जवाब देने से मना कर दिया, वरन सवाल पूछने के ढंग, सवाल की प्रस्तुति और सवाल में छिपे अंतर्प्रश्न पर भी सवालिया निशान लगा दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने बातचीत के लिए अपनी शर्तें भी बता दी। किसी रिपोर्टर, एंकर, एडिटर की हिम्मत नहीं हुई कि राज ठाकरे को चैलेंज कर सके, उसे चलता कर सके। राज के सामने सब निरीह गाय दिख रहे थे और राज उनका मनमाना दोहन कर रहे थे।

अब, इस प्रकरण का दूसरा पहलू देखिए। तथाकथित राष्ट्रीय स्तर पर के चैनलो पर राज ठाकरे यूपी, बिहार और झारखंड के लोगों पर सवाल उठाते रहे और स्वनामधन्य पत्रकार उनके सामने खिसियानी हंसी हंसते रहे। ये वास्तव में चिंताजनक पहलू है। राज के इन कार्यक्रमों को देखने के बाद देश के कुछ और ऐसे ही छुटभैये नेताओं की हिम्मत बढ़ेगी कि वे चैनलों पर बैठकर न केवल मीडिया को उसकी हैसियत दिखाएं, वरन क्षेत्रीय या धार्मिक आधार पर लोगों के खिलाफ जहर भी उगलें। संभव है इन कार्यक्रमों के बाद संबंधित चैनलों की टीआरपी बढ़ गई हो, लेकिन उन्होंने जो कुछ गंवाया है, उसकी कीमत बहुत ज्यादा है। वास्तव में, ये शर्मिंदा होने का वक्त है।

 

डॉ. सुशील उपाध्‍याय। #9997998050, ईमेलः gurujisushil@gmail.com

सारधा समूह के न्यूज चैनल की प्रमुख रहीं अर्पिता घोष को ईडी का नोटिस

कोलकाता। बालूरघाट संसदीय क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार औऱ सारधा समूह के न्यूज चैनल की प्रमुख रहीं अर्पिता घोष को केन्द्रीय जांच एजेन्सी इंफोर्समेन्ट डायरेक्टोरेट (ईडी) ने पूछताछ के लिए नोटिस भेजा है। ईडी बहुचर्चित सारधा घोटाले की जांच कर रहा है। अर्पिता से सारधा समूह के न्यूज चैनल से संबंधित कागजात और खातों के बारे में पूछा गया है। उनका कहना है कि वे नोटिस का जवाब देंगी और अगर जाना पड़ा तो 24 अथवा 25 अप्रैल को स्वयं ईडी के ऑफिस जाएंगी।

इस मामले में दो अन्य लोगों को भी नोटिस भेजा गया है जिनमें पूर्व आईपीएस अधिकारी और एक व्यवसायी शामिल हैं। हालांकि उन्होंने नोटिस की बात नहीं स्वीकारी है।

राज ठाकरे धमकाता रहा और संपादक भीगी बिल्ली बनकर बैठे रहें

पिछले दो तीन दिनों में मैंने राजदीप सरदेसाई और टाइम्स नाउ के मठाधीश एंकर को राज ठाकरे का साक्षात्कार लेते हुए टीवी पर देखा। मोटी मलाई खाकर बड़े बड़े स्टुडिओज में ही बैठकर देश का विजन सेट करने की गफलत पाले इन बड़े चेहरों की बेचारगी निश्चित तौर पर भारतीय मीडिया जगत की गिरावट का प्रबल उदाहरण बनकर सामने आई।

       
पत्रकार के लिए निर्भीकता और आत्म सम्मान सबसे कीमती गहने होते हैं, लेकिन ग्लैमर और पैसे की चकाचौंध में इन मठाधीशो ने अपने यह अलंकार कभी के बेच खाये हैं। वरना किसी नेता की ऐसी ज़ुर्रत कि वो मिडिया को इस क़दर हड़काए की सामने देखने वाला दर्शक ही शर्मिंदा हो जाये। और वो भी बीच चुनाव में जब उसे मिडिया की सबसे अधिक ज़रुरत है। हैरान हूँ के जब इलेक्शन नहीं होते होंगे तब तो राज ठाकरे जैसे नेता इन तथाकथित संपादकों का क्या हश्र करते होंगे।

लेकिन हाय री मोटी तनख्वाहों और निजी स्वार्थो का सदका! इन मठाधीशो के चेहरे पर शिकन तक नहीं। हैरान हूँ के ऐसे कैसे एक नेता जिसका अपने राज्य में कोई ख़ास जनाधार नहीं वो टीवी के ऊपर "भौंक लिए" "हाथ नीचे करो" "तुम्हारे में दिमाग नहीं" "माईक निकाल दूंगा" "पीछे होकर बैठो सीधा बैठो" "उल्टा बैठो" की धमकी दे और ये संपादक भीगी बिल्ली बनकर बैठे रहें। क्या होगा मुझे आशंका है के जिनके कंधो पर मीडिया को ऊँचा उठाने की जिम्मेवारी है उनके कंधे वास्तव में इतने मज़बूत है भी या नहीं।

कहते है के गरीब को दो धक्के फालतू मिलते है और यही मिडिया में हो रहा है केजरीवाल ने तो भ्रष्ट मेडियकर्मिओं को जेल भेजने की बात कही थी तो मीडिया ने इतना बवाल खड़ा कर दिया मनो कोई भूचाल आ गया। परन्तु जब राज ठाकरे उनका शरेआम स्टूडियो में चीरहरण कर रहा है तो इन तथाकथित संपादको की आवाज़ भी नहीं निकली। तो क्या कमज़ोर और मज़लूम पर ज़ोर चलाकर ही कोई खुद को तीसमार खां साबित करेगा।

जाते जाते दो अच्छे उदाहरण देना चाहूंगा इन संपादको से अच्छा तो हमारे करनाल का एक छोटा सा स्ट्रिंगर है जिसे उसके रीजनल चैनल के मालिक का फोन आया की फलाने के घर में एक कार्यक्रम है कवर करो तो स्ट्रिंगर ने कहा कि यह उसका निजी कार्यक्रम है उसे कहो के मुझे इन्वाइट करे। मालिक ने कहा मैं कह रहा हूँ पर स्ट्रिंगर ने कहा बिन बुलाये नहीं जायूँगा, मेरा आत्म सम्मान मुझे इज़ाज़त नहीं देता। और वो नहीं गया। दूसरा उदहारण वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा का जो आपकी अदालत चलाते हैं हेमा मालिनी हो या सलमान खान नितीश हो या लालू, नरेंदर मोदी हो या अन्ना हज़ारे किसी की भी हिम्मत नहीं पड़ती के वो उन्हें रजत बुला दे, रजत जी कहकर सम्बोधन होता है। एक गौरव का एहसास तो होता है के एक पत्रकार के प्रति देश की हस्तियों का कितना सम्मान है।

 

 करनाल से सरबजीत सिंह। #9896290262

आरटीआई के ज़रिए तेजपाल ने अपने मुक़दमे के खर्च का ब्यौरा मांगा

पणजी। अपनी एक जूनियर महिला सहयोगी से दुष्कर्म के आरोप में जेल में बंद तहलका के संस्थापक संपादक तरूण तेजपाल ने सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) के तहत अपने मुकदमे की पूरी छानबीन और अभियोजन पर हुए खर्चे की जानकारी मांगी है। आरटीआई के माध्यम से तेजपाल ने चार सवालों के साथ गोवा पुलिस के समक्ष एक आवेदन पेश किया है। तेजपाल ने पूछा है कि इस मामले में वकीलों को कितनी धनराशि का भुगतान किया गया है। इसके अलावा कितने पुलिसकर्मी इस मामले की जांच कर रहे हैं। तेजपाल ने यह भी पूछा है कि उनके मामले में कितनी बार गोवा-मुंबई और गोवा-दिल्ली-गोवा के बीच विमान यात्राएं की गई हैं।

 
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि तेजपाल के आवेदन की जांच की जा रही है कि क्या उनकी ओर से मांगी गयी सूचना आरटीआई कानून के तहत दी जा सकती है। तेजपाल को पिछले साल 30 नवंबर को गिरफ्तार किया गया था। सत्र अदालत और हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत देने से इन्कार कर दिया था। जमानत के लिए अब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

मतदाता को डराने-धमकाने की राजनीति और ख़ामोश चुनाव आयोग

जब बात सत्ता पाने की राजनीति को लेकर हो तो उसमें अच्छी नीति की संभावना न के बराबर ही होती है। राजनीति और झूठ का रिश्ता इतना गहरा हो गया है कि सत्ता सुख के लिए जनता को ललचाना, बहकाना, खरीदना, झूठे वादे करना ये सब राजनीति की प्रवृत्ति बन चुकी है, और एसे में जब कोई नेता वोट के लिए मतदाताओं को डराना शुरू कर दे तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं। हमारे राजनेताओं का स्तर इतना गिर चुका है कि वें वोट बैंक के लिए किसी भी अमानविय घटना को अंजाम देने के लिए एकदम तैयार बैठे हैं। 9 चरण वाले लोकसभा चुनाव 2014 का दौर जारी है, 6 चरण पूरे हो चुके हैं और तीन चरण अभी भी बाकी हैं और ऐसे में अमित शाह और आजम खान का मुद्दा अभी शांत हुआ नहीं था और आचार संहिता के उल्लंघन की प्रतियोगिता अभी चल ही रही थी कि मतदाताओं को डराने व धमकाने के जो नए मुद्दे सामने आए हैं वो लोकतंत्र के निर्वाचन प्रणाली में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए अशुभ संकेत है।

मतदाताओं को डराने के मामले में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के साथ-साथ सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव भी शामिल हैं। हाल ही में जारी हुए एक वीडियो में पवार ताजा विवादों में घिर गए हैं वीडियो में पवार ग्रामीणों को धमकी दे रहे हैं कि रांकपा प्रमुख शरद पवार की बेटी और उनकी चचेरी बहन सुप्रिया सूले को वोट नहीं दिया तो वे उस गांव की जलापूर्ति काट देंगे। यह वीडियो समाचार चैनलों पर खुब प्रसारित की जा रही है। बारमती लोक सभा क्षेत्र से आप प्रत्याशी व पूर्व आईपीएस अधिकारी सुरेश खोपड़े ने इस वीडियो का हवाला देते हुए चुनाव आयोग के अधिकारियों के समक्ष शिकायत दर्ज कराई है कि पवार ने चुनावी सभा के दौरान लोगों को धमकी दी जो आचार संहिता का उल्लंघन है। हालांकि अधिकारी अभी वीडियो के सत्यता की जांच कर रहे हैं जिसके बाद आरोप सुनिश्चीत होने पर वे कार्रवाई करेंगे।

दूसरा मामला राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले उत्तरप्रदेश का है जहां की राजनीतिक गतिविधियों पर पूरे देश की नजर टिकी है। यहां के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बुलंदशहर में सरकारी स्कूल के शिक्षकों को उनकी नौकरी खोने का भय दिखाते हुए कहा कि अगर आप हमें वोट नहीं देंगे तो ये समझ लीजिए कि आपकी नौकरी खतरे में है। जरा सोचिए उस पार्टी के नेता जो वर्तमान में सत्ता पर काबीज है, एक ऐसा व्यक्ति जो उस राज्य मुख्यमंत्री रह चुका है और पार्टी का सर्वे-सर्वा हो, के द्वारा जब खुलेआम निर्वाचन प्रणाली को मज़ाक बनाया जा रहा हो और मतदाताओं के अंदर डर का संचार कराया जा रहा हो तो ऐसे में हम अन्य नेताओं या अन्य पार्टियों से क्या उम्मीद कर सकते हैं।

गौरतलब हो कि पहले भी इसी पार्टी के नेता आजम खान द्वारा विवादीत बयान देने के आरोप में चुनाव आयोग ने खान पर प्रतिबंध भी लगाया है लेकिन फिर भी पार्टी के नीति में कोई खास परिवर्तन नहीं दिख रहा है। एक और मामला भी इसी राज्य के उस लोकसभा क्षेत्र से है जहां कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी खुद मैदान में है और इनके विरोध में आप से कुमार विश्वास खड़े है, संकेत साफ है कि यहां जिक्र अमेठी का हो रहा है जहां अपने भाई को जीताने के लिए प्रियंका गांधी भी डेरा डाले हुई हैं। लेकिन हाल ही में जारी हुआ एक वीडियो राहुल के लिए प्रियंका गांधी द्वारी की गई मेहनत पर पानी फेर सकता है। वीडियो के अनुसार गेस्ट हाऊस में विनोद मिश्रा नाम का एक कांग्रस कायर्कर्ता प्रियंका गांधी से बात करते हुए यह कहता है कि कुमार विश्वास राहुल भईया के खिलाफ बोल रहा है उसे गोली मार दूंगा। इस पूरे मामले का फायदा उठाते हुए कु. विश्वास ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए यह कहा है कि अगर भविष्य में मेरे उपर कोई भी हमला होता है तो उसकी जिम्मेदार कांग्रेस होगी।

अमेठी में इससे किस पार्टी को फायदा होगा और किसको नुकसान ये तो परिणाम आने पर ही पता चलेगा लेकिन सोचने वाली बात ये है कि मतदाताओं पर इन घटनाओं का क्या असर होगा, एक तरफ हमारे मतदान प्रतिशत बढ़ाने की बात कर रहे हैं और वहीं दुसरी तरफ एसी घटनाएं उनके दोहरे चरित्र को उजागर करती है जो निर्वाचन प्रक्रिया के प्रति लोगों में अविश्वास पैदा कर सकता है। आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में अगर लोकतंत्र के नींव को मजबूती प्रदान करने वाला निर्वाचन आयोग की भूमिका पर गौर करें तो इन नेताओं के सामने आयोग भी बौना साबित हो रहा है, आयोग द्वारा थोक में नोटिस भेजी जा रही है लेकिन नेताओं पर इसका कोई असर नहीं दिख रहा है। अगर आयोग द्वारा किसी नेता को नोटिस दी जाती है या कोई कार्रवाई की जाती है तो उस नेता से संबंधित पार्टी अपनी नीतियों में सुधार लाने के बजाय उल्टे चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करने लगती है, उदाहरण के लिए आजम खान और अमित साह का मुद्दा ले सकते हैं जिसमें पार्टियों ने भेद-भाव के आरोप लगाते हुए आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े किए।

इन सारी बातों से यह स्पष्ट है कि भले ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता हो लेकिन यहां कि राजनीतिक पार्टियां और उनके राजनेता आज भी जनता को लोकतंत्र के लोक नहीं बल्की राजतंत्र की प्रजा मान रही है। ऐसी प्रजा जिसे लालच देकर, डरा-धमका कर सत्ता तक पहुंचने का प्रयत्न बदस्तुर जारी है और शायद यही कारण है कि लोगों का मतदान से भरोसा उठता है और अखबारों में हमें मतदान का बहिष्कार या मतदान प्रतिशत कम होने जैसी खबरें पढ़ने और सुनने को मिलती है। अगर वक्त रहते राजनेता और जनता दोनों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में यह जनतंत्र की सेहत के लिए यह ठीक नहीं होगा।

 

लेखक किसलय गौरव से उनके ईमेल kislaygaurav@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

एक मई से भोपाल में लॉन्च होगा ‘हरिभूमि’

'हरिभूमि' के भोपाल संस्करण के लॉन्चिंग की तैयारियां पूरी हो गई हैं। 'हरिभूमि' भोपाल के संपादक डॉ. संतोष मानव के नेतृत्व में भोपाल में काम-काज शुरू हो गया है। 1 मई को इसके बाजार में आने की संभावना है। यह अखबार रोहतक, नई दिल्ली, बिलासपुर, रायपुर, जबलपुर से पहले ही प्रकाशित हो रहा है। एडिटोरियल, विज्ञापन, सर्कुलेशन सभी टीमों का गठन किया जा चुका हैं। अख़बार का डमी निकलना भी प्रारंभ हो गया है। हजारों लोगों को अब तक ग्राहक बनाया जा चुका है। भोपाल में होर्डिंग, स्टीकर से प्रचार-प्रसार भोपाल में एक नए अखबार के आने का माहौल बन चुका है।

 

रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र कर का सड़क दुर्घटना में निधन

रायपुर। रायपुर (छत्तीसगढ़) के वरिष्ठ पत्रकार और यहां से निकलने वाले दैनिक समाचार पत्र आज की जनधारा के मैनेजिंग एडिटर देवेंद्र कर उनकी धर्मपत्नी और बहन का शनिवार (19.4.14) को एक सड़क दुर्घटना में दुखद निधन हो गया। देवेंद्र कर जी के निधन से छत्तीसगढ़ का पत्रकार जगत सकते में है। छत्तीसगढ़ में लगभग 25 सालों से पत्रकारिता के विविध आयामों में सक्रिय देवेंद्र कर बेहद मिलनसार व्यक्ति थे। देवेंद्र कर अपने पत्रकार साथियों के दुख सुख में हमेशा उनके साथ सहभागी रहते थे।

 

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यूपी पुलिस ने दिया चतुर्थ श्रेणी कर्मियों पर गलत हलफनामा

आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर ने आरोप लगाया है कि उत्तर प्रदेश पुलिस गलत हलफनामा दायर कर घुमावदार तरीके से खुद को बचाने के प्रयास में है। पुलिस डिपार्टमेंट क्लास IV एम्प्लाइज एसोसियेशन द्वारा दायर पीआईएल में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने डीजीपी, यूपी को यह हलफनामा दायर करने को कहा कि ये कर्मचारी नियम के विपरीत कहीं तैनात नहीं किये गए हैं।

इस पर डीजीपी ने 05 अप्रैल 2014 को निर्देश जारी किये कि पुलिस अधिकारियों के साथ सम्बद्ध चतुर्थ श्रेणी कर्मियों की सम्बद्धता समाप्त की जाती है। लेकिन इसके तुरंत बाद 09 अप्रैल को डीजीपी की तरफ से दूसरे निर्देश जारी हुए कि केवल अधिकारियों के साथ नाम से सम्बद्धता समाप्त की गयी है, ना कि किसी कार्यालय से।

स्वयं एक आईपीएस अधिकारी की पत्नी डॉ. ठाकुर ने आरोपित किया है कि जहां उनके पति ने वास्तव में सम्बद्ध पुलिस कर्मी को वापस भेज दिया, वहीँ लगभग अन्य सभी मामलों में नाम की सम्बद्धता समाप्त कर उन्ही पुलिसकर्मियों को कार्यालय में तैनात कर पुनः उन अधिकारियों के घर पर काम के लिए भेज दिया गया है।

उन्होंने इसे प्रशासन में पारदर्शिता के विपरीत आचरण बताते हुए मामले को आगे बढ़ाने की बात कही है।

डीजीपी कार्यालय के पत्र दिनांक 09 अप्रैल 2014 की प्रति

 

भारत में फलता-फूलता मुक़दमेबाजी उद्योग

भारतीय न्यायातंत्र उर्फ मुकदमेबाजी उद्योग ने बड़ी संख्या में रोजगार उपलब्ध करवा रखा है। देश में अर्द्ध–न्यायिक निकायों को छोड़कर 20,000 से ज्यादा न्यायाधीश, 2,50,000 से ज्यादा सहायक स्टाफ, 25,00,000 से ज्यादा वकील, 10,00,000 से ज्यादा मुंशी टाइपिस्ट, 23,00,000 से ज्यादा पुलिसकर्मी इस व्यवसाय में नियोजित हैं और वैध–अवैध ढंग से जनता से धन ऐंठ रहे हैं। अर्द्ध-न्यायिक निकायों में भी समान संख्या और नियोजित है। फिर भी परिणाम और इन लोगों की नीयत लाचार जनता से छुपी हुई नहीं हैं। भारत में मुक़दमेबाजी उद्योग एक चक्रव्यूह  की तरह संचालित है, जिसमें सत्ता में शामिल सभी पक्षकार अपनी-अपनी भूमिका निसंकोच और निर्भीक होकर बखूबी निभा रहे हैं। प्राय: झगड़ों और विवादों का प्रायोजन अपने स्वर्थों के लिए या तो राजनेता स्वयं करते हैं या वे इनका पोषण करते हैं। अधिकाँश वकील किसी न किसी राजनैतिक दल से चिपके रहते हैं और उनके माध्यम से वे अपना व्यवसाय प्राप्त करते हैं, क्योंकि विवाद के पश्चात पक्षकार सुलह–समाधान के लिए अक्सर राजनेताओं के पास जाते हैं और कालांतर में राजनेताओं से घनिष्ठ संपर्क वाले वकील ही न्यायाधीश बन पाते हैं।

इस बात का खुलासा सिंघवी सीडी प्रकरण ने भी कर दिया है। इस प्रकरण ने यह भी दिखा दिया कि न्यायाधीश बनने के लिए आशार्थी को किन कठिन परीक्षणों से गुजरना पड़ता है। भारत में किसी चयन प्रक्रिया में न्यायाधीशों या विपक्ष को भी शामिल करने का कोई लाभ नहीं है, क्योंकि जिस प्रक्रिया में जितने ज्यादा लोग शामिल होंगे; उसमें भ्रष्टाचार उतना ही अधिक होगा। प्रक्रिया में शामिल सभी लोग तुष्ट होने पर ही कार्यवाही आगे बढ़ पाएगी। यदि निर्णय प्रक्रिया में भागीदारों की संख्या बढाने या विपक्ष को शामिल करने से स्वच्छता आती तो हमें विधायिकाओं के अतिरिक्त किसी अन्य संस्था की आवश्यकता क्यों पड़ती। इसलिए प्रक्रिया में जितना प्रसाद मिलेगा, उसका बँटवारा प्रत्येक भागीदार की मोलभाव शक्ति के अनुसार होगा और अंतत: यह बंदरबांट का रूप ले लेगी। कहने को चाहे संवैधानिक न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति न्यायाधीश करते होंगे, किन्तु वास्तव में यह भी राजनीति की इच्छाशक्ति की सहमति से ही होता है। जहां राजनीति किसी नियुक्ति पर असहमत हो तो, देश में वकील और न्यायाधीश कोई संत पुरुष तो हैं नहीं, वे प्रस्तावित व्यक्ति के विरुद्ध किसी शिकायत की जांच खोलकर उसकी नियुक्ति बाधित कर देते हैं। अन्यथा दागी के विरुद्ध किसी प्रतिकूल रिपोर्ट को भी नजर अंदाज कर दबा दिया जाता है। विलियम शेक्स्पेअर ने भी (हेनरी 4 भाग 2 नाट्य 4 दृश्य 2) में कहा है , “हमारा सबसे पहला कार्य वकीलों को समाप्त करना है।”

वैसे भी भारत की राजनीति किसी दलदल से कम नहीं है और लगभग सभी नामी और वरिष्ठ वकील किसी न किसी राजनैतिक दल से जुड़े हुए हैं, जिसमें दोनों का आपसी हित है और दोनों एक दूसरे का संरक्षण करते हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया तो वैसे ही गोपनीय है और उसमें पारदर्शिता का नितांत अभाव है। न्यायाधीश पद पर नियुक्ति के लिए मात्र कानून का ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु वह व्यक्ति चरित्र, मनोवृति और बुद्धिमता के दृष्टिकोण से भी योग्य होना चाहिए, क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति के भी कुटिल होने का जोखिम बना रहता है। अमेरिका में न्यायाधीश पद पर नियुक्ति के समय उसकी पात्रता–बुद्धिमता, योग्यता, निष्ठा, ईमानदारी आदि की कड़ी जांच होती है और प्रत्येक पद के लिए दो गुने प्रत्याशियों की सूची राज्यपाल को नियुक्ति हेतु सौंपी जाती है, जबकि भारत में ऐसा कदाचित नहीं होता है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों पर यौन शोषण के आरोप लगे और यह पाया गया कि उन्होंने शराब का सेवन किया तथा पीड़ित महिला को भी इसके लिए प्रस्ताव रखा। इससे यह प्रामाणित होता है कि वे लोग अभक्ष्य पदार्थों का भक्षण करने वाले रहे हैं, जिनमें सात्विक और सद्बुद्धि की कल्पना नहीं की जा सकती। निश्चित रूप से ऐसे चरित्रवान लोगो को इन गरिमामयी पदों पर नियुक्त करने में देश से भारी भूलें हुई हैं, चाहे उन्हें दण्डित किया जाता है या नहीं। न्यायाधीश होने के लिए मात्र विद्वान होना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु वह मन से सद्बुद्धि और सात्विक होना चाहिए। अन्यथा सद्चरित्र के अभाव में ऐसा पांडित्य तो रावण के समान चरित्र को ही प्रतिबिंबित कर सकता है और इसके अतिरिक्त कुछ नहीं।

विधि आयोग की 197 वीं रिपोर्ट के अनुसार भारत में दोषसिद्धि की दर मात्र 2 प्रतिशत है, जिससे सम्पूर्ण न्यायतंत्र की क्षमता–योग्यता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। जबकि अमेरिका के संघीय न्यायालयों की दोष सिद्धि की जो दर 1972 में 75 प्रतिशत थी, वह बढ़कर 1992 में 85 प्रतिशत हो गयी है। वहीं वर्ष 2011 में अमरीकी न्याय विभाग ने दोष सिद्धि की दर 93 प्रतिशत बतायी है। भारत में आपराधिक मामलों में पुलिस अनुसंधान में विलंब करती है, फिर भी दोष सिद्धियाँ मात्र 2 प्रतिशत तक ही सीमित रह जाती हैं। इसका एक संभावित कारण है कि पुलिस वास्तव में मामले की तह तक नहीं जाती, अपितु कुछ कहानियां गढ़ती है और झूठी कहानी गढ़ने में उसे समय लगना स्वाभाविक है। दोष सिद्धि की दर अमेरिकी राज्य न्यायालयों में भी पर्याप्त ऊँची है। रिपोर्ट के अनुसार यह टेक्सास में 84 प्रतिशत, कैलिफ़ोर्निया में 82 प्रतिशत, न्यूयॉर्क में 72 प्रतिशत उतरी कैलिफ़ोर्निया में 67 प्रतिशत और फ्लोरिडा में 59 प्रतिशत है। इंग्लॅण्ड के क्राउन कोर्ट्स में भी दोष सिद्धि की दर 80 प्रतिशत है। हांगकांग के सत्र न्यायालयों में 92 प्रतिशत, वेल्स के सत्र न्यायालयों में 80 प्रतिशत, कनाडा के समान न्यायालयों में 69 प्रतिशत और ऑस्ट्रेलिया के न्यायालयों में 79 प्रतिशत है। ऐसी स्थिति में क्या भारत में मात्र 2 प्रतिशत दोष सिद्धि जनता पर एक भार नहीं हैं? क्या इतना परिणाम यदि देश में बैंकिंग या अन्य उद्योग दें तो सरकार इसे बर्दास्त कर सकेगी? फिर न्यायतंत्र के ऐसे निराशाजनक परिणामों को सत्तासीन और विपक्ष दोनों क्योंकर बर्दास्त कर रहे हैं? इससे न्यायतंत्र के भी राजनैतिक उपयोग की बू आती है। देश में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा वसूली हेतु दायर किये गए मामलों में भी, जहां पूरी तरह से सुरक्षित दस्तावेज बनाकर ऋण दिए जाते हैं, वसूली मात्र 2 प्रतिशत वार्षिक तक सीमित है, जबकि इनमें लागत 15 प्रतिशत आ रही है। देश की जनता को न्यायतंत्र की इतनी विफलता में क्रमश: न्यायपालिका, विधायिका, पुलिस व वकीलों के अलग-अलग योगदान को जानने का अधिकार है।

जहां तक नियुक्ति या निर्णयन की किसी प्रक्रिया में पक्ष-विपक्ष को शामिल करने का प्रश्न है, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि जो पक्ष आज सता में है-कल विपक्ष में हो सकता है और ठीक इसके विपरीत भी। अत: इन दोनों समूहों में वास्तव में आपस में कोई संघर्ष-टकराव नहीं होता है, जो भी संघर्ष होता है-वह मात्र सस्ती लोकप्रियता व वोट बटोरने और जनता को मूर्ख बनाने के लिए होता है। यद्यपि प्रजातंत्र कोई मूकदर्शी खेल नहीं है, अपितु यह तो जनता की सक्रिय भागीदारी से संचालित शासन व्यवस्था का नाम है। जनतंत्र में न तो जनता जनप्रतिनिधियों के बंधक है और न ही जनतंत्र किसी अन्य द्वारा निर्देशित कोई व्यवस्था का नाम है। न्यायाधिपति सौमित्र सेन पर महाभियोग का असामयिक पटाक्षेप और राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भल्ला द्वारा अपर सत्र न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले को देश की जनता देख ही चुकी है, जहां मात्र अनुचित नियुक्तियों को निरस्त ही किया गया और किसी दोषी के गिरेबान तक कानून का हाथ नहीं पहुँच सका। जिससे यह प्रमाणित है कि जहां दोषी व्यक्ति शक्तिसंपन्न हो, वहां कानून के हाथ भी छोटे पड़ जाते हैं। देश के न्यायाधीशों की निष्पक्षता, तटस्थता और स्वतंत्रता खतरे में दिखाई देती है। देश का न्यायिक वातावरण दूषित है और इसकी गरिमा प्रश्नास्पद है। इस वातावरण में प्रतिभाशाली और ईमानदार लोगों के लिए कोई स्थान दिखाई नहीं देता है। न्यायाधीशों के पदों पर नियुक्ति हेतु आशार्थियों की सूची को पहले सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि अवांछनीय और अपराधी लोग इस पवित्र व्यवसाय में अतिक्रमण नहीं कर सकें। वर्तमान में तो इस व्यवसाय के संचालन में न्याय-तंत्र का अनुचित महिमामंडन करने वाले वकील, उनके सहायक, न्यायाधीश और पुलिस ही टिक पा रहे हैं।

हाल ही में उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीश की पदस्थापना के लिए यह नीति बनायी गयी कि मुख्य न्यायाधीश किसी बाहरी राज्य का हो, किन्तु यह नीति न तो उचित है और न ही व्यावहारिक है। न्यायाधीश पूर्व वकील होते हैं और वे राजनीति के गहरे रंग में रंगे होते हैं। इस वास्तविकता की ओर आँखें नहीं मूंदी जा सकती। अत: देशी राज्य के वकीलों का ध्रुवीकरण हो जाता है और बाहरी राज्य का अकेला मुख्य न्यायाधीश अलग थलग पड़ जाता है तथा वह चाहकर भी कोई सुधार का कार्य हाथ में नहीं ले पाता, क्योंकि संवैधानिक न्यायालयों में प्रशासनिक निर्णय समूह द्वारा लिए जाते हैं। वैसे भी यह नीति देश की न्यायपालिका में स्वच्छता व गतिशीलता रखने और स्थानान्तरण की सुविचारित नीति के विरूद्ध है। जहां एक ओर सत्र न्यायाधीशों के लिए समस्त भारतीय स्तर की सेवा की पैरवी की जाती है, वहीं उच्च न्यायालयों के स्तर के न्यायाधीशों के लिए इस तरह की नीति के विषय में कोई विचार तक नहीं किया जा रहा है, जिससे न्यायिक उपक्रमों में स्वच्छता लाने की मूल इच्छा शक्ति पर ही संदेह होना स्वाभाविक है।

उच्च न्यायालयों द्वारा आवश्यकता होने पर पुलिस केस डायरी मंगवाई जाती है, किन्तु उसे बिना न्यायालय के आदेश के ही लौटा दिया जाता है। जिससे यह सन्देश जाता है कि न्यायालय और पुलिस हाथ से हाथ मिलाकर कार्य कर रहे हैं न कि वे स्वतंत्र हैं। क्या न्यायालय एक आम नागरिक द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज को भी बिना न्यायिक आदेश के लौटा देते हैं? केरल उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने एक बार राज्य के महाधिवक्ता द्वारा प्रकरणों में तैयार होकर न आने पर न्यायालय से ही वाक आउट कर दिया, बजाय इसके कि कार्यवाही को आगे बढ़ाते अथवा महाधिवक्ता पर समुचित कार्यवाही करते अर्थात जहां सामने सशक्त पक्ष हो तो न्यायाधीश भी अपने आपको असहाय और लाचार पाते हैं-उनकी श्रेष्ठ न्यायिक शक्तियां अंतर्ध्यान हो जाती हैं। भारत का आम नागरिक तो न्यायालयों में चलने वाले पैंतरों, दांव-पेंचों आदि से परिचित नहीं हैं, किन्तु देश के वकीलों को ज्ञान है कि देश में कानून या संविधान का अस्तित्व संदिग्ध है। अत: वे अपनी परिवेदनाओं और मांगों के लिए दबाव बनाने हेतु धरनों, प्रदर्शनों, हड़तालों, विरोधों आदि का सहारा लेते हैं। आखिर पापी पेट का सवाल है। कदाचित उन्हें सम्यक न्यायिक उपचार उपलब्ध होते तो वे ऐसा रास्ता नहीं अपनाते। सामान्यतया न्यायार्थी जब वकील के पास जाता है तो उसके द्वारा मांगी जानी वाली आधी राहतों के विषय में तो उसे बताया जाता है कि ये कानून में उपलब्ध नहीं हैं और शेष में से अधिकाँश देने की परम्परा नहीं है अथवा साहब देते नहीं हैं।

पारदर्शिता और भ्रष्टाचार में कोई मेलजोल नहीं होता है, इस कारण न्यायालयों एवं पुलिस का स्टाफ अपने कार्यों में कभी पारदर्शिता नहीं लाना चाहता है। देश के 20,000 न्यायालयों के कम्प्यूटरीकरण की ईकोर्ट प्रक्रिया 1990 में प्रारंभ हुई थी और यह आज तक 20 उच्च न्यायालयों के स्तर तक भी पूर्ण नहीं हो सकी है। दूसरी ओर देखें तो देश की लगभग 1,00,000 सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक शाखाओं के कम्प्यूटरीकरण का कार्य 10 वर्ष में पूर्ण हो गया। इससे न्यायतंत्र से जुड़े लोगों की कम्प्यूटरीकरण में अरुचि का सहज अनुमान लगाया जा सकता है जो माननीय कहे जाने वाले न्यायाधीशों के सानिध्य में ही संचालित हैं। देश के न्यायालयों में सुनवाई पूर्ण होने की के बाद भी निर्णय घोषित नहीं किये जाते तथा ऐसे भी मामले प्रकाश में आये हैं, जहां पक्षकारों से न्यायाधीशों ने मोलभाव किया और निर्णय जारी करने में 6 माह तक का असामान्य विलम्ब किया। वैसे भी निर्णय सुनवाई पूर्ण होने के 5-6 दिन बाद ही घोषित करना एक सामान्य बात है। कई बार पीड़ित पक्षकार को अपील के अधिकार से वंचित करने के लिए निर्णय पीछे की तिथि में जारी करके भी न्यायाधीश पक्षकार को उपकृत करते हैं।

जबकि अमेरिका में निर्णय सुनवाई पूर्ण होने के बाद निश्चित दिन ही जारी किया जाता है और उसे अविलम्ब इन्टरनेट पर उपलब्ध करवा दिया जाता है। अपने अहम की संतुष्टि और शक्ति के बेजा प्रदर्शन के लिए संवैधानिक न्यायालय कई बार भारी खर्चे भी लगाते हैं, जबकि इसके लिए उन्होंने ऐसे कोई नियम नहीं बना रखे हैं, क्योंकि नियम बनाने की उन्हें कोई स्वतंत्र शक्तियां प्राप्त भी नहीं हैं। एक मामले में बम्बई उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने 40 लाख रुपये खर्चा लगाया जो उच्चतम न्यायालय ने घटाकर मात्र 25 हजार रुपये कर दिया। इस दृष्टांत से स्पष्ट है कि न्यायाधीश लोग अहम व पूर्वाग्रहों से कूटकूट कर भरे होते हैं व देश की अस्वच्छ राजनीति की ही भांति उनका आपसी गठबंधन व गुप्त समझौता होता है और समय पर एक दूसरे के काम आते हैं। अत: निर्णय चाहे एक सदस्यीय पीठ दे या बहु सदस्यीय पीठ दे, उसकी गुणवता में कोई ज्यादा अंतर नहीं आता है। न्यायालयों द्वारा कई बार नागरिकों पर भयावह खर्चे लगाए जाते हैं, जबकि खर्चे शब्द का शाब्दिक अर्थ लागत की पूर्ति करना होता है और उसमें दंड शामिल नहीं है व लागत की गणना भी किया जाना आवश्यक है। जिस प्रकार न्यायालय पक्षकारों से अपेक्षा करते हैं। यदि किसी व्यक्ति पर किसी कानून के अंतर्गत दंड लगाया जाना हो तो संविधान के अनुसार उसे उचित सुनवाई का अवसर देकर ही ऐसा किया जा सकता है, किन्तु वकील ऐसे अवसरों पर मौन रहकर अपने पक्षकार का अहित करते हैं।

वकालत का पेशा भी कितना विश्वसनीय है, इसकी बानगी हम इस बात से देख सकते हैं कि परिवार न्यायालयों, श्रम आयुक्तों, (कुछ राज्यों में) सूचना आयुक्तों आदि के यहाँ वकील के माध्यम से प्रतिनिधित्व अनुमत नहीं है अर्थात इन मंचों में वकीलों को न्याय पथ में बाधक माना गया है। फिर वकील अन्य मंचों पर साधक किस प्रकार हो सकते हैं? उच्च न्यायालयों में भी सुनवाई के लिए वकील अनुकूल बेंच की प्रतीक्षा करते रहते हैं-स्थगन लेते रहते हैं, यह तथ्य भी कई बार सामने आया है। जिसका एक अर्थ यह निकलता है कि उच्च न्यायालय की बेंचें फिक्स व मैनेज की जाती हैं व कानून गौण हो जाता है। कोई भी मूल प्रार्थी, अपवादों को छोड़कर, किसी याचिका पर निर्णय में देरी करने के प्रयास नहीं करेगा, फिर भी देखा गया है कि मूल याची या याची के वकील भी अनुकूल बेंच के लिए प्रतीक्षा करते हैं, जिससे उपरोक्त अवधारणा की फिर पुष्टि होती है।
 
देश में आतंकवादी गतिविधियाँ भी प्रशासन, पुलिस और राजनीति के सहयोग और समर्थन के बिना संचालित नहीं होती हैं। आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में भी परिवहन, व्यापार आदि चलते रहते हैं, जो कि पुलिस और आतंकवादियों व संगठित अपराधियों दोनों को प्रोटेक्शन मनी देने पर ही संभव है। वैसे भी इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता, जिसमें व्यापारी वर्ग को किसी शासन व्यवस्था से कभी कोई शिकायत रही हो, क्योंकि वे पैसे की शक्ति को पहचानते हैं तथा पैसे के बल पर अपना रास्ता निकाल लेते हैं। चाहे शासन प्रणाली या शासन कैसा भी क्यों न हो। पुलिस के भ्रष्टाचार का अक्सर यह कहकर बचाव किया जाता है कि उन्हें उचित प्रशिक्षण प्राप्त नहीं है। अत: कार्य सही नहीं किया गया, किन्तु रिश्वत लेने का भी तो उन्हें कोई प्रशिक्षण नहीं होता फिर वे इसके लिए किस प्रकार रास्ता निकाल लेते हैं। ठीक इसी प्रकार एक व्यक्ति को गृहस्थी के संचालन का भी प्रारम्भ में कोई अनुभव नहीं होता, किन्तु अवसर मिलने पर वह आवश्यकतानुसार सब कुछ सीख लेता है।

देश में प्रतिवर्ष लगभग एक करोड़ गिरफ्तारियां होती हैं, जिनमें से 60 प्रतिशत अनावश्यक होती हैं। ये गिरफ्तारियां भी बिना किसी अस्वच्छ उद्देश्य के नहीं होती हैं, क्योंकि राजसत्ता में भागीदार पुलिस, अर्द्ध-न्यायिक अधिकारी व प्रशासनिक अधिकारी आदि को इस बात का विश्वास है कि वे चाहे जो मर्जी करें, उनका कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है और देश में वास्तव में ऐसा कोई मंच नहीं है जो प्रत्येक शक्ति-संपन्न व सत्तासीन दोषी को दण्डित कर सके। जहां कहीं भी अपवाद स्वरूप किसी पुलिसवाले के विरुद्ध कोई कार्यवाही होती है, वह तो मात्र नाक बचाने और जनता को भ्रमित करने के लिए होती है। यदि पुलिस द्वारा किसी मामले में गिरफ्तारी न्यायोचित हो तो वे, घटना समय के अतिरिक्त अन्य परिस्थितियों में, गिरफ्तारी हेतु मजिस्ट्रेट से वारंट प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु न तो ऐसा किया जाता है और न ही देश का न्याय तंत्र ऐसी कोई आवश्यकता समझता है और न ही कोई वकील अपने मुवक्किल के लिए कभी मांग करता देखा गया है। यदि न्यायपालिका पुलिस द्वारा अनुसंधान में के मनमानेपन को नियंत्रित नहीं कर सकती, जिससे मात्र 2 प्रतिशत दोष सिद्धियाँ हासिल हो रही हों, तो फिर उसे दूसरे नागरिकों पर नियंत्रण स्थापित करने का नैतिक अधिकार किस प्रकार प्राप्त हो जाता है?

 

लेखक मनी राम शर्मा विधि विशेषज्ञ हैं। संपर्कः maniramsharma@gmail.com
 

स्मृति-शेषः तुमको तो दिल्ली आना था देवेंद्र….

तुमको तो दिल्ली आना था, कहां चले गए देवेंद्र? मैं तो इंतजार कर रही थी कि कब तुम दिल्ली आओ कब तुमसे ढेर सारे गाने सुनूं। कहीं साथ बैठकर खाना खाएं और ढेर सारी गपशप हो। पर रायपुर छोड़ने के बाद से यह सपना ही रह गया। तुम जब भी आए कितनी हडबडी में आए। कोई ऐसा करता है क्या? मुझे याद आ रहा है कटोरा तालाब में नए साल का जश्न। कितनी अच्छी महफिल जमाई थी न अपन ने, मेरी छत पर। रीतेश, अमित कुमार, तुम ,डाक्टर इंगले और मेरा परिवार। रात भर हारमोनियम बजा-बजाकर हर कोई सुरा -बेसुरा गाता रहा। मैं तुम्हे बेसुरा नहीं कह सकती। कितना अच्छा गाते हो तुम पर… उस दिन पत्नी से मासांहारी भोजन बनवाकर लाए थे तुम। जानते थे न कि दीदी न नॉनवेज बनाती है न खाती हैं।

और उस दिन रमन सिंह जब तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे तो कैसे  गर्मजोशी से मेरी तरफ आए थे तुम। अभी रूकिए जाना नहीं और उस दिन भी कहा था आऊंगा न दीदी जल्दी आऊंगा। बस जरा थोड़े काम निपटा लूं और भी कितनी बातें मित्तल जी और ईशान से लेकर दुनिया जहान तक। देवेंद्र मैं तो ताउम्र उन दिनों को भूल नहीं पाऊंगी जब हिंदुस्तान ने मुझे रायपुर भेजा 2003 के चुनाव में। फिर रीतेश और तुमसे मेरी अंतरंगता बनी। पर तुमने ठीक नहीं किया। ऐसी क्या हड़बड़ी थी जाने की। ठीक से रहना हम तुम्हे हमेशा याद रखेंगे देवेंद्र कार(मैं तो तुम्हें जीप और ट्रक कहती थी ना) तुम्हारे जैसे हंसोड़ और मददगार लोग होते ही कितने हैं?

 

इरा झा। संपर्कः irajha2@gmail.com

बाबा रामदेव पर आचार संहिता के उल्लंघन का मुक़दमा दर्ज

फतेहपुर(उत्तर प्रदेश)। योग गुरू बाबा रामदेव के खिलाफ चुनाव आयोग के निर्देश पर शनिवार की रात आचार संहिता उल्लंघन का मामला दर्ज किया गया। बिना अनुमति प्रेस कांफ्रेंस करने और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी व केजरीवाल पर निजि टिप्पणी करने को आयोग ने गंभीरता से लिया है। सदर कोतवाली में बाबा रामदेव के खिलाफ मामला दर्ज हुआ है। बाबा रामदेव को फतेहपुर औरखागा तहसील में योग शिविर करने की अनुमति मिली थी, लेकिन उन्होंने बिना प्रशासन की इजाज़त के भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में शनिवार दोपहर आवास-विकास कालोनी में प्रेस वार्ता की।

प्रेस वार्ता में रामदेव ने सोनिया गांधी पर निजी टिप्पणी की जो कि आदर्श आचार संहिता का खुला उल्लंघन है। जिलानिर्वाचन अधिकारी अभय ने बताया कि किसी पर निजी आरोप लगाना आचार संहिता का उल्लंघन है। इस मामले की जानकारी उन्होंने फौरन चुनाव आयोग को दी। सीडी बनवाकर आयोग को भेज दी गई है। आयोग के निर्देश पर रामदेव पर आचार संहिता उल्लंघन करने पर धारा 188 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

 

फतेहपुर से देवेन्द्र कुमार(रिपोर्टर, भास्कर न्यूज़) की रिपोर्ट। संपर्कः 9415559102
 

ईस्ट इंडिया कंपनी की नयी कहानी- अम्बानी और अडानी

आवश्यकता आविष्कार की जननी है। साल 2012-13 का दौर भी कुछ ऐसा ही वक़्त लगा था। तब हिन्दुस्तान को लगा कि आज़ादी की दूसरी क्रान्ति शुरू हो गयी है। अन्ना नाम के शख्स ने एक उम्मीद जगाई और केजरीवाल नाम के "नायक" का जन्म हुआ। इस दौर में लोगों की सोच में ख़ासी तब्दीली आई। महज़ घर में टी.वी. के सामने बैठ नेताओं को कोसने और देश की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाने वाला तबका भी घर से बाहर निकला। "आज़ादी की दूसरी लड़ाई" में, आंशिक तौर पर ही सही, पर शामिल हुआ। "आप" का जन्म हुआ। अरविन्द केजरीवाल ने, आम आदमी का पैसा चूसने वाले क्रोनी कैप्टिलिज़्म के प्रतीक अम्बानी-अडानी और वाड्रा जैसे तथा-कथित प्रॉपर्टी डीलरों की जमात की खुलेआम मुख़ालफ़त की। पर अचानक नयी फिल्म आयी। "महानायक" नरेंद्र मोदी का अवतार सामने आया। ऐसा "अजूबा" अवतार जिसका फैन आम आदमी हो गया।

एक ऐसा "कुली", जो दावा करता है कि आम जनता का बोझ उठाने का माद्दा सिर्फ उसमें है। मगर ये कुली ऐसा "जादूगर " है, जो हर इंटरव्यू में ये बताता फिर रहा है कि गरीब का, गर, पेट भर रहा है तो अम्बानियों-अडानियों की बदौलत। आम आदमी को दो पैसे मिल रहे हैं तो अम्बानियों-अडानियों की "कृपा " से। इस "सरकार" के गुजराती सरकारी काम का मुरीद आम आदमी कुछ इस कदर कि पूछिये मत। गाली मिलेगी, गर विरोध में आवाज़ तक उठा दी तो। अम्बानियों-अडानियों की मार झेल रहा आम आदमी, इस बात से कोई सरोकार नहीं रख रहा कि मोदी अम्बानियों-अडानियों को "भारत भाग्य विधाता" का दर्ज़ा क्यों दे रहे हैं? आम आदमी अभी भी स्वस्थ औघोगिक विकास और शॉर्ट-काट वाले औघोगिक विकास में अंतर नहीं समझ पा रहा और न ही इस बात में भेद कर पा रहा कि व्यक्तिगत विकास और सामूहिक विकास का फासला बहुत बड़ा कैसे होता जा रहा है।

आंकड़े बता रहे हैं कि आम आदमी का विकास रॉकेट की गति से भले ही न हुआ हो लेकिन आम आदमी की बदौलत, पिछले कुछ ही सालों में, स्पेस विमान की रफ़्तार से हिन्दुस्तान में कई अम्बानी-अडानी पैदा हो गए। करोड़ों की दौलत, अचानक से सैकड़ों-हज़ारों-लाखों करोड़ में जा पहुँची। कैसे? क्या नरेंद्र मोदी और मनमोहन सिंह जैसे लोग इस बात के ज़िम्मेदार हैं? क्या आम आदमी की हिस्सेदारी का काफी बड़ा हिस्सा "हथियाने" का हक़, अम्बानियों-अडानियों को मोदी और मनमोहन जैसे लोगों ने दिया? क्या आम-आदमी को मालूम है कि विकास की आड़ में आम-आदमी की आर्थिक हिस्सेदारी सिमटती जा रही है और व्यक्ति-विशेष की मोनोपोली सुरसा के मुंह की तरह फ़ैली जा रही है? क्या आम आदमी को मालूम है कि आज आम आदमी की औकात, अम्बानीयों-अडानियों के सामने दो-कौड़ी की हो चली है?

नहीं! आम आदमी को नहीं मालूम। मालूम होता तो वो मोदी और मनमोहन जैसों से ये ज़रूर पूछता कि आम आदमी और अम्बानियों-अडानियों की विकास-दर में क्या फ़र्क़ है? आम आदमी को मालूम होता तो वो ज़रूर सवाल करता कि अपने मुल्क़ में अम्बानी-अडानियों की इच्छा के बिना कोई फैसला क्यों नहीं होता? आम आदमी को मालूम होता तो वो ज़रूर ज़ुर्रत करता, ये पूछने, कि इस देश के प्राकृतिक संसाधन या ज़मीन पर पहला हक़ अम्बानीयों-अडानियों जैसों का क्यों है? आम आदमी को, मोदी और मनमोहन जैसे लोग ये कभी नहीं बताते कि अम्बानी-अडानी जैसों की जेब में भारत के मोदी और मनमोहन क्यों पड़े रहते हैं? सोनिया गांधी के दामाद, रॉबर्ट वाड्रा, अचानक बहुत बड़े प्रॉपर्टी डीलर बन गए। करोड़ों-अरबों कमा बैठे। कैसे? मोदी पैटर्न पर। हरियाणा के मुख्यमंत्री हुड्डा और गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी में फ़र्क़ सिर्फ इतना भर रहा कि मोदी ने विकास के नाम पर अम्बानियों-अडानियों जैसों को एकतरफा बेतहाशा अमीर बनने की छूट दी और हुड्डा ने "गुजराती" विकास की तर्ज़ पर, हरियाणा में "ज़मीन बांटों" अभियान के तहत DLF और वाड्राओं को "विकास-पुरुष" बनने का मौक़ा दिया।

किसी भी देश के विकास में उद्योग-धंधों की स्थापना का अहम योगदान होता है। पर इस तरह के विकास में समान-विकास की समान दर की अवधारणा अक्सर बे-ईमान दिखती है। ऐसा तब होता है जब देश-प्रदेश के "भाग्य-विधाता" हिडेन एजेंडे के तहत निजी स्वार्थ की पूर्ति में लग जाते हैं। यही कारण है कि अन्ना-आंदोलन और केजरीवाल जैसों की पैदाइश होती है। हिन्दुस्तान में 2012-2013 के दौरान पनपा जनाक्रोश, संभवतः, इसी एक-तरफ़ा विकास की अवधारणा के खिलाफ था। एक तरफ देश में महंगाई-हताशा-बेरोज़गारी चरम सीमा पर और दूसरी तरफ, उसी दरम्यान, विकास के नाम पर अम्बानीयों-अडानियों-वाड्राओं-DLF जैसों की दौलत, अरबों-खरबों में से भी आगे निकल जाने को बेताब। ऐसा कैसे हो सकता है कि एक ही वक़्त में मुट्ठी भर लोगों की दौलत बेतहाशा बढ़ रही हो और आम आदमी, महंगाई-हताशा-बेरोज़गारी का शिकार हो?

अन्ना-आंदोलन या केजरीवाल जैसों का जन्म किसी सरकार के खिलाफ बगावत का नतीज़ा नहीं है। ये खराब सिस्टम के ख़िलाफ़ सुलगता आम-आदमी का आक्रोश है जो किसी नायक की अगुवाई में स्वस्थ सिस्टम को तलाश रहा है। इसी तलाश के दरम्यान कभी केजरीवाल तो कभी मोदी जैसे लोग नायक बन रहे हैं, जिनसे उम्मीद की जा रही है कि महंगाई-हताशा-बेरोज़गारी के लिए ज़िम्मेदार अम्बानीयों-अडानियों-वाड्राओं-DLF पर रोक लगे। लेकिन मामला फिर अटक जा रहा है कि अम्बानी-अडानियो -वाड्राओं-DLF ने विकास का लॉलीपॉप देकर मोदी सरीखे नायकों को सिखा रखा (डरा रखा) है कि आम आदमी को बताओ कि ये मुल्क़ अम्बानीयों-अडानियों-वाड्राओं-DLF की बदौलत चल रहा है। इस मुल्क़ का पेट, अम्बानी-अडानियो-वाड्राओं-DLF की बदौलत भर रहा है। ये देश अम्बानीयों-अडानियों-वाड्राओं-DLF के इशारों पर सांस लेता है। पिछले 10 साल से केंद्र में मनमोहन सिंह और गुजरात के मोदी आम-आदमी को यही बतला कर डरा रहे हैं।

खैर, कुछ भी हो पर इतना ज़रूर है कि मुट्ठी भर अम्बानी-अडानियो-वाड्राओं-DLF से ये देश परेशान है। सतही तौर पर गुस्सा किसी पार्टी विशेष के ख़िलाफ़ है मगर बुनियादी तौर पर ये आक्रोश अम्बानियों-अडानियों-वाड्राओं-DLF के विरोध में है। आर्थिक सत्ता का केंद्र तेज़ी से सिमट कर मुट्ठी भर जगह पर इकट्ठा हो रहा है। मुट्ठी भर अम्बानी-अडानियो-वाड्राओं-DLF, देश के करोड़ों लोगों का हिस्सा मार कर अपनी तिजोरी भर रहे हैं और विकास की "फीचर फिल्म" के लिए मोदी या राहुल गांधी जैसे नायकों को परदे पर उतार रहे हैं। ये नायक अपने निर्माता-निर्देशकों और स्क्रिप्ट राइटर्स के डायलॉग मार कर बॉक्स ऑफिस पर अम्बानीयों-अडानियों-वाड्राओं-DLF की रील फिल्म हिट कर रहे हैं। मगर रियल फिल्म? पब्लिक चौराहे पर है। कई सौ साल तक ईस्ट इंडिया कंपनी की गुलामी झेलने के बाद आज़ाद हुई, मगर एक बार फिर से हैरान-परेशान है। उम्मीदों के नायकों ने समां बाँध दिया है लिहाज़ा उम्मीद, फिलहाल, तो है। मगर टूटी तो? क्रान्ति असली "खलनायकों " के खिलाफ। इंशा-अल्लाह ऐसा ही हो।

 

नीरज…..'लीक से हटकर।' संपर्कः journalistebox@gmail.com

मीडिया पर क्यों हो रहे चौतरफा हमले?

मीडिया में साख की कमी है ये तो जानी हुई बात है। लेकिन पिछले कई दिनों से मीडिया(खासकर टीवी चैनल्स) पर जिस तरह आरोपों के हमले हो रहे हैं वो असहजता पैदा करने वाले हैं। शनिवार को भी राज ठाकरे और उसके बाद आजम खान ने जिस अंदाज में भड़ास निकाली वो ध्यान खींचने के लिए काफी है। राज के बयान में उदंडता का भाव है वहीं आजम ने लगातार मीडिया पर नरेन्द्र मोदी से पैसे खाने का आरोप  लगाया है। एबीपी न्यूज के एक कार्यक्रम में आजम ने बदमिजाज लहजे में एंकर अभिसार को मोदी से पैसे मिलने का जिक्र किया। इस चैनल ने कोई प्रतिकार नहीं किया। बेशक पत्रकारिता की परिपाटी है कि सवाल पूछने के बाद पत्रकार को जवाब सुनना होता है चाहे जवाब कितना भी उत्तेजना पैदा करने वाला क्यों न हो। लेकिन केजरीवाल की तरफ से पत्रकारों को जेल भेजने वाली धमकी के बाद से ये सिलसिला सा बन गया है।

ऐसा लगता है एक एजेंडे के तहत मीडिया पर मोदी से पैसे पाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। राजनीतिक मकसद ये कि पत्रकार सेक्यूलर-कम्यूनल चुनावी अभियान में सेक्यूलरिस्टों का गुलाम की तरह साथ दें। मकसद जो भी हो कई सवाल उभरते हैं। मीडिया आरोपों को नकारता क्यों नहीं है? मीडिया ये क्यों नहीं पूछता कि आरोप लगाने वाले पुष्ट तथ्य पेश करें? मीडिया आरोप लगाने वालों को मानहानि के मुकदमें की चेतावनी क्यों नहीं देता? पीसीआई और एनबीए चुप क्यों है? मान लें कि सभी हिन्दी टीवी चैनल बिकाउ हैं तो सभी ने इकट्ठे मोदी से ही पैसे क्यों खाए? चैनलों ने कांग्रेस से पैसे क्यों नहीं लिए? बिन पैसे के तो समाजवादी पार्टी भी एक दिन नहीं चल सकती। तो आजम की पार्टी ने पत्रकारों को क्यों नहीं खरीद लिया?

क्या पिछले 65 सालों में राजनीतिक दलों ने पत्रकारों या चैनलों को कभी भी प्रभावित नहीं किया है। सत्ता या पैसों के जरिए? मान लें कि पैसों का खेल पहले भी हुआ तो उन चुनावों के समय मीडिया पर आरोप क्यों नहीं लगे? क्या बीजेपी को छोड़ बाकि सभी राजनीतिक दल राजा हरिश्चंद्र की तरह जीने का दावा कर सकने की हिम्मत रखते हैं? असल में साल 2009 से पत्रकारों ने जिस तरीके का व्यवहार किया है उसने कांग्रेस और अन्य कथित सेक्यूलर राजनीति वाले दलों को उन्हें गुलाम की तरह इस्तेमाल करने योग्य हथियार मानने के लिए लुभाया है। पहले भी इंडिया का मीडिया विचारधाराओं की प्रतिबद्धता में उलझने की भूल करता रहा है, और इस चक्कर में बेईमानी भी करता रहा है।

आजादी के आंदोलन में लगे लोगों को मीडिया का सहयोग कुछ हद तक मिलता रहा। विदेशी दासता से मुक्ति के लिए इसे जायज भी माना जा सकता था। लेकिन आजादी के बाद मीडिया को अपने रूख में जो तब्दीली करनी चाहिए थी वो चाहत नहीं दिखी। सुनियोजित तरीके से वाम कार्ड होल्डरों और लोहियावादियों का मीडिया में प्रवेश और इन विचारधाराओं के हिसाब से जनमत को प्रभावित करने का खेल चलता रहा। फिर भी कुछ मर्यादाएं रख छोड़ी गई… न्यूज़ सेंस से खिलवाड़ नहीं किया गया। लेकिन हाल के समय में न्यूज़ सेंस से भी छेड़छाड़ की गई है। एंटी इस्टैबलिस्मेंट मोड में होने की मनोवृति को भुलाकर सत्ताधारी दल की बजाए विपक्ष को लताड़ने की परिपाटी को पुष्ट किया गया।

मुजफ्फरनगर दंगों की रिपोर्टिंग दिलचस्प तथ्य पेश करने योग्य हैं। भड़काउ भाषण देने वाले नेताओं की फेहरिस्त से कांग्रेसी नेता का नाम एबीपी न्यूज के पैकेज से गायब होना नतमस्तक होने की पराकाष्ठा थी। बाबा रामदेव के समर्थकों पर हुए लाठीचार्ज के विजुअल केन्द्र की सत्ता की धमकी पर उपयोग नहीं करने जैसे पत्रकारीय अपराध किए गए। जाहिर है सत्ताधीशों का मन चढ़ेगा ही। आरोपों की बौछार के बीच मीडिया को अपने अंदर झांकने का वक्त आ गया है। साख पर बट्टा न लगे इसके लिए वे फौरी तौर पर आरोप लगाने वालों को जवाब दें साथ ही पत्रकारों को पानी में डूब कर नहीं भींगने की कला की ओर रूख करने के बारे में सोचना चाहिए।

 

लेखक संजय मिश्रा, संपर्कः ribhanga@gmail.com. बलॉग पताः http://ayachee.blogspot.in/2014/04/blog-post_19.html

स्मृति-शेषः अपने जिंदादिल अंदाज़ और बेबाकी के लिए बहुत याद आएंगें देवेंद्र कर

रायपुर के दैनिक अखबार ‘आज की जनधारा’ के संपादक-प्रकाशक देवेंद्र कर का रविवार एक सड़क दुर्धटना में निधन हो गया। यह लेख उनकी स्मृति में लिखा गया है।
 

मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि अपने बहुत प्यारे दोस्त, सहयोगी और एक जिंदादिल इंसान देवेंद्र कर के लिए मुझे यह श्रद्धांजलि लिखनी पड़ेगी। तीन दिन पहले की ही बात है देवेंद्र का फोन आया था वे मुझसे पूछ रहे थे “आखिर मप्र कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने मेरे खिलाफ बयान क्यों दिया है। ऐसा क्या लिख दिया सर।” वही चहकता अंदाज पर भोपाल और रायपुर की दूरी को पाट देने वाली हंसी। “सर विवाद आपका पीछा नहीं छोड़ते।” फिर वही परिवार का हाल “भाभी कैसी हैं बात कराइए।” मैंने कहा आफिस में हूं, घर जाकर भूमिका से बात कराता हूं। पर बात नहीं हो पाई। अब हो भी नहीं पाएगी। प्रभु को इतना निर्मम होते देखना भी कठिन है। एक परिवार से तीन शव निकलें, यह क्या है महिमामय परमेश्वर। इस दुर्घटना में देवेंद्र ,उनकी पत्नी और बहन तीनों की मौत मेरे लिए हिलाकर रख देने वाली सूचना है। उनके बहुत प्यारे दो बच्चे भी घायल हैं।

देवेंद्र का मेरा रिश्ता अजीब है। जिसमें ढेर सा प्यार था और स्वार्थ कुछ भी नहीं। जिन दिनों मैं दैनिक हरिभूमि, रायपुर का संपादक था उन्हीं दिनों देवेंद्र से पहली बार मिलना हुआ। साल 2003, महीना मई के आसपास। देवेंद्र हरिभूमि में कार्यरत थे और देवेंद्र के पास सूचनाओं की खान हुआ करती थी। रिश्तों को उसने कैसे कमाया कि रश्क होता था। प्रदेश के बड़े से बड़े नौकरशाह, राजनेता और समाज जीवन के अग्रणी लोग देवेंद्र को जानते थे। संपादक होने के नाते और मैदानी पत्रकारिता के प्रति अपने लंबे संकोच के नाते देवेंद्र ही मेरे लिए रायपुर में  हर ताले की चाबी थे। मेरे मंत्रालय का पास बनवाने से लेकर मान्यता दिलाने तक वे ही मेरे लिए आधार थे। उनके संपर्क गजब के थे। जहां से गुजरते देवेंद्र भाई, देवेंद्र भैया की आवाजें गूंजती। कभी उनके साथ घड़ी चौक स्थित उस समय के मंत्रालय में जाते तो लगता कि देवेंद्र की हस्ती क्या है। मंत्रालय के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों से लेकर आला अफसरों तक वही जलवा।

देवेंद्र की एक खूबी यह भी थी वो सारा कुछ कह देता था। अच्छे रिर्पोटर होने के नाते पूरी रिर्पोट जस की तस, संपादन तो उसने सीखा ही नहीं था। जो कहना है बिना संपादन के, बिना लाग-लपेट के कहना। आपको बुरा लगे तो लगता रहे। देवेंद्र ने कभी आदमी या कुर्सी देखकर बात नहीं की। उसे न जानने वाले तो जो भी राय बनाते रहे हों, किंतु जिसने देवेंद्र को जान लिया वह देवेंद्र का हो गया। देवेंद्र अपनी जिंदगी की तरह नौकरी में भी कभी व्यवस्थित नहीं रहा। उनकी मरजी तो वे एक दिन में चार एक्सक्यूसिव खबरें तुरंत दे सकते हैं और मरजी नहीं तो कई दिन दफ्तर न आएं। वह भी बिना सूचना के। फोन कीजिए तो वही अट्टहास “बस हाजिर हो रहे हैं सर।” पर देवेंद्र को कौन पकड़ सकता है। वे तो रायपुर में हर जगह हैं, पर दफ्तर में नहीं। बड़े भैया हिमांशु द्विवेदी से लेकर सुकांत राजपूत, ब्रम्हवीर सिंह सब इसकी ताकीद करेंगें कि वो अपने दिल की सुनता था, किसी और की नहीं। उन दिनों हम और भूमिका (मेरी पत्नी) उसके दीनदयाल नगर घर तक जाते तो वह बिछ जाता, बेटा दौड़कर बगल की दुकान से ठंडे की बड़ी दो लीटर की बोतल लाता, जिसमें ज्यादा वही (बेटा) पीता। उसके गंभीर रूप से घायल होने से विचलित हूं। मैं बेटे को  समझाता कि “बेटा बाबा रामदेव कहते हैं ठंडा कम पीयो ।“ वह कहता ‘अंकल आज तो पीने दो।‘

देवेंद्र के दोस्तों की एक लंबी श्रृंखला है जिसमें इतने तरह के लोग हैं कि आप सोच भी नहीं सकते। किंतु संवाद की उसकी वही शैली, सबके साथ है। देवेंद्र को यह नहीं आता कि वह अपने संपादक से अलग तरीके से पेश आए और किसी साधारण व्यक्ति से अलग। उसके लिए राज्य के सम्मानित नेता और नौकरशाह और उसके दोस्त सब बराबर हैं। संवाद में ज्यादा वह ही बोलता था। कई बार दोस्तों से मजाक में इतना छेड़ता कि वो भागते हुए मेरे पास शिकायत दर्ज कराते। कहते ‘सर देवेंद्र को संभाल लीजिए।‘ मैं कहता “भाई ये मेरे बस की बात नहीं।“ एक बार मेरे तब के रायपुर, अवंति विहार स्थित आवास पर देवेंद्र और अजय वर्मा ऐसा लड़े कि उन्हें समझाना कठिन था। देवेंद्र हंसता रहा, अजय अपना क्रोध प्रकट करता रहा। चीखता रहा। देवेंद्र इन्हीं बातों से बहुत प्यारा था। वह कुछ भी दिल में नहीं रखता था। उसे मनचाहा सच कहने की आदत थी।

बाद के दिनों मैं भोपाल आ गया किंतु देवेंद्र रिश्तों को भूलते नहीं और याद रखते थे। वो बराबर फोन कर मेरा और परिवार न सिर्फ हालचाल लेते रहे वरन रायपुर आने पर अपनी खुद ओढ़ी व्यस्तताओं में से मेरे लिए समय निकालते। मेरे हर आयोजन में वे खड़े दिखते और एक ही वाक्य ‘छा गए सर।' लेकिन हमें पता है कि देवेंद्र खुद अपने चाहने वालों के दिलोदिमाग पर छाया रहता था। एक बार मैं संयोगवश छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से रायपुर से भोपाल जा रहा था। मेरा भाग्य ही था कि सामने रीतेश साहू और देवेंद्र कर विराजे थे। वे दोनों दिल्ली जा रहे थे। एसी डिब्वों के सहयात्रियों को हमें अपने बीच पाकर दुख जरूर हुआ होगा पर भोपाल तक का रास्ता कैसा कटा कि वह आज भी अकेलेपन में देवेंद्र के खालिस जिंदादिल इंसान होने की गवाही सरीखा लगता है। देवेंद्र में खास किस्म का ‘सेंस आफ ह्यूमर’ था कि आप उसकी बातों के दीवाने बन जाते हैं।

पत्रकारिता में एक संवाददाता से प्रारंभ कर हमारे देखते ही देखते वह एक दैनिक अखबार ‘आज की जनधारा’ का संपादक-प्रकाशक बना, किंतु उसने अपनी शैली और जमीन नहीं छोड़ी। वह अपनी कमजोरियों को जानता था, इसलिए उसे ही उसने अपनी ताकत बना लिया। उसने लिखने-पढ़ने से छुट्टी ले ली और रोजाना खबरें देने के तनाव से मुक्त होकर बिंदास अपने सामाजिक दायरों में विचरण करने लगा। मुझे तब भी लगता था कि देवेंद्र को कोई तनाव क्यों नहीं व्यापते और आज जब उसके न रहने की सूचना मिली है तो उसका जवाब भी मिल गया है। जीवन को इस तरह क्षण में नष्ट होते देखने के बाद मुझे लगता है कि वह जिंदगी के प्रति इतना लापरवाह क्यों था? क्यों उसने अपने को बहुत व्यवस्थित व्यक्ति के रूप में स्थापित करने के जतन नहीं किए? क्यों वह अपने रिश्तों को हर चीज से उपर मानता रहा? क्यों उस पर लोग भरोसा करते थे और वह क्यों भरोसे को तोड़ता नहीं था?  

मुझे कई बार लगता है वह चालाक, तेज और दुनियादार लोगों के साथ रहा जरूर किंतु उसने जिंदगी ‘अपनी बनाई दुनिया’ में ही जी। आखिरी बार मेरे दोस्त बबलू तिवारी मुझे रायपुर स्थित उसके जनधारा के दफ्तर ले गए। वह कहकर भी वहां पहुंचा नहीं था। मैंने फोन पर कहा “बुलाकर भी गैरहाजिर”। उसका जवाब था “सर हम तो आपके दिल में रहते हैं। बस तुरंत हाजिर हुआ।“ देवेंद्र ऐसा ही था आपको बुलाकर गायब हो जाएगा। लेकिन आप पर खुदा न करे कोई संकट हो तो सबसे पहले अपना हाथ बढ़ाएगा। देवेंद्र इसीलिए इस चालाक-चतुर दुनिया में एक भरोसे का नाम था। उसके दोस्त और चाहनेवाले आज अगर उसकी मौत की खबर पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं तो मानिए कि उसने किस तरह आपके दिलों में जगह बनाई है। देवेंद्र जैसै लोग इसीलिए शायद ऊपरवाले को भी ज्यादे प्यारे लगते हैं क्योंकि जो अच्छा है, वह भगवान की नजर में भी अच्छा है। फोन को छूते हुए हाथ कांप रहे हैं। सुकांत राजपूत और हेमंत पाणिग्राही दोनों यह बुरी खबर मुझे बता चुके हैं। भरोसा नहीं हो रहा है कि की-बोर्ड पर थिरक रही उंगलियां देवेंद्र पर लिखा यह स्मृति लेख लिख चुकी हैं। आज से वह हमारी जिंदगी का नहीं, स्मृतियों का हिस्सा बन गया है। प्रभु उसकी आत्मा को शांति देना।

 

(लेखक संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। स्व. देवेंद्र कर के साथ उनके लंबे प्रोफेशनल और पारिवारिक रिश्ते रहे हैं)
 

पाकिस्तान के जाने-माने पत्रकार हामिद मीर पर जानलेवा हमला

करांची। पाकिस्तान के जाने-माने पत्रकार और जियो न्यूज़ के संपादक हामिद मीर को, अज्ञात हमालावरों ने शनिवार शाम गोली मार दी। मीर पर हमला करांची एयरपोर्ट से जियो न्यूज के दफ्तर जाते समय हुआ। खबर है कि हमलावर एयरपोर्ट से ही उनकी गाड़ी का पीछा कर रहे थे। गाड़ी पर अचानक फायरिंग की गई जिसमें पिछली सीट पर बैठे मीर के शरीर के निचले हिस्से में तीन गोलियां लगीं। समझदारी का परिचय देते हुए गाड़ी का ड्राइवर गंभीर रूप से घायल मीर को  एक अस्पताल तक ले गया, जहां उनका इलाज चल रहा है। डॉक्टरों के अनुसार उनकी हालत अब ख़तरे से बाहर है।

 

 

विफल रहीं चुनाव आयोग की कोशिशें, मप्र में कम रहा मतदान प्रतिशत

आमतौर पर माना जाता है कि जब वोट ज्यादा पड़ते हैं तो सत्ता में बदलाव निश्चित है लेकिन कल मध्यप्रदेश में मतदान प्रतिशत ने नक्सली समस्या से ग्रस्त पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ का सिर ऊंचा कर दिया है क्योंकि छत्तीसगढ़ में 66% व मप्र में 55% वोटिंग हुई। ट्विटर, फेसबुक जैसी सोशल साइट्स पर दिन-दुगने रात-चौगुने नमो-नमो का जाप करने वाले तथाकथित विकास के चहेते भी लगता है वोटिंग के दिन भी अपना एडमिन धर्म नहीं छोड़ पाए, मतदान के दिन भी ट्विट करने में व्यस्त रहे। रही बात विपक्षी कांग्रेस की तो वहां 2-4 सीटों पर प्रत्याशिेयों की दमखम रही वहीं, शेष सीटों पर पार्टी ने पहले से ही हार मान ली और कार्यकर्ता भी निराश है एवं उसका परंपरागत वोटर भी इस बार कुछ सोच नहीं पाया।

कम वोटिंग से दो अंदाज़े लगाए जा सकते हैं- पहला यह कि मप्र में हुए लोकसभा के दूसरे चरण में 10 सीटों पर 54 फीसदी मतदान में केवल बदलाव चाहने वालों ने वोट दिया है यानि विपक्षी पार्टियों को मत देने वाले समझ गए कि वोट हम जिस पार्टी को देंगे, वो व्यर्थ जाएगा। दूसरा यह अंदाज़ा यह है कि चुनाव आयोग के करोड़ो रुपए मतदाताओं को जागरुक करने पर खर्चने के बाद भी तमाम कोशिशें विफल रहीं क्योंकि 'कोई भी बन जाए, सब नेता बदमाश हैं' सोच कर कईयों ने बैलेट बटन दबाने के लिए उंगली नहीं उठाई॥

नीरज चौधरी
9425724481

पैसों की खातिर हेयर सैलून में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने लगे हैं फिल्मी सितारे

राजस्थान की राजधानी जयपुर में फिल्म प्रमोशन के नाम पर होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस अब फैन्स कॉन्फ्रेंस बनकर रह गई हैं। पिछले कुछ अरसे से देखा जा रहा है कि यहां प्रेस कॉन्फ्रेंस के नाम पर पत्रकारों की अच्छी-खासी संख्या जमा कर ली जाती है, लेकिन मीडिया को फिल्मी सितारों से बातचीत की बजाय अन्य लोगों की भीड में धक्के खाने को मजबूर होना पड़ रहा है। फिल्म प्रमोशन कंपनियों तथा निर्माता-निर्देशकों की धनपिपासु प्रवृति के चलते इन दिनों हालात ये हो गए हैं कि फिल्मी सितारे पैसों की खातिर हेयर सैलून तक में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने लगे हैं। मीडिया की मजबूरी यह है कि उन्हें कवर करने के लिए उसे ऐसी जगहों पर जाना पड़ता है जहां उनसे खुलकर बातचीत करना तो दूर, पत्रकारों को खड़े रहने के लिए भी जगह नहीं मिल पाती।

दरअसल समस्य तब से पैदा हुई है जब से राजस्थान सरकार ने जब से फिल्मों पर से मनोरंजन कर हटाया है। मनोरंजन कर से सरकार ने फिल्मों को तो मुक्त कर दिया लेकिन टिकट की दरें तय करने का अधिकार सिनेमा मालिकों और फिल्म निर्माताओं को दे दिया। ऐसे में सिने दर्शकों की जेब पर तो भार बढ़ा ही है, लेकिन फिल्म निर्माताओं की चांदी हो गई है। अब टिकट बिक्री से मिले रूपयों में से सरकार को 50 प्रतिशत टैक्स मिलने की बजाय अब 100 प्रतिशत धनराशी फिल्म निर्माता के खाते में जमा हो रही है। यही वजह है कि फिल्म निर्माता राजस्थान में फिल्मों का खूब जमकर प्रमोशन कर रहे हैं ताकि यहां से ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सके, क्योंकि देश के अन्य राज्यों में उन्हें आय का करीब 50 प्रतिशत तक मनोरंजन कर चुकाना पड़ता है जबकि यहां ऐसा नहीं है। ऐसे में हर सप्ताह रिलीज होने वाली फिल्मों के प्रमोशन का सिलसिला चल पड़ा है और उसका एक ही सस्ता और सरल माध्यम मिलता है और वह है ‘‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’’।

राजस्थान में पहले भी फिल्मों की प्रेस कॉन्फ्रेंस हुआ करती थी, लेकिन उन्हें आयोजित करवाने में होने वाला खर्च मसलन सितारों व फिल्म यूनिट की हवाई यात्रा, होटल में ठहरना, प्रेस कॉन्फ्रेंस का स्थान तथा पत्रकारों के जलपान आदि की व्यवस्था फिल्म निर्माता स्वयं कव खर्च पर करता था। अब यहां प्रेस कॉन्फ्रेंन्स करवाने वालों ने भी अपनी कमाई करने के नित-नये तरीके ईजाद कर लिए हैं। यहां की दुकानों, सैलून, कॉलेज-यूनिवर्सिटी, मल्टीप्लेक्स, फैशन व ज्वैलरी स्टोर तथा नाइट पार्टीज में सितारों के शामिल होने के नाम पर खूब पैसा लूटा जा रहा है। इससे जहां इन स्थानीय आयोजकों को धन कमाने का अवसर मिल रहा है, वहीं फिल्म निर्माता को भी प्रेस कॉन्फ्रेंस या फिल्म प्रमोशन के लिए कोई पैसा खर्चना नही पड़ता। अब तो ऐसी जगहों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस होने लगी है, जहां कोई पेशेवर पत्रकार जाना ही पसंद नहीं करता। लेकिन सितारों की चमक के आगे मीडियाकर्मी बौने नजर आते हैं। सेलिब्रिटीज भी घंटे-आधे घंटे की मौजूदगी दिखाकर अपनी फिल्म का प्रमोशन कर रहे हैं। ऐसी आपाधापी में होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया को इन सितारों के आगे-पीछे भागने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

मार्केटिंग के जमाने में फिल्मी प्रेस कॉन्फ्रेंस भी इतनी कॉमर्शियल हो गई हैं कि सैलून मालिकों, दुकानदारों तथा स्टोर मालिकों को भी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सितारों के बीच बैठा दिया जाता है। ऐसे में मीडिया के कैमरों में वे लोग भी सितारों के साथ कैद हो जाते हैं और मजबूरन मीडिया को उन्हें छापना-प्रसारित करना ही होता है। पैसा कमाए ईवेंट मैनेजर और फोकट की पब्लिसिटी करे मीडिया।

 

अमन वर्मा। संपर्कः aman.verma70@gmail.com

सामाजिक न्याय के एजेण्डे पर लड़ा जा रहा है वर्तमान लोकसभा चुनाव

सदियों से ऊंच-नीच की घृणा पर आधारित सामाजिक व्यवस्था में बदलाव का चक्र पूर्ण हुए बिना देश का सुचारु तरीके से आधुनिक लोकतांत्रिक प्रशासन की ओर अग्रसर होना संभव नहीं है। पिछले कई चुनाव से सामाजिक न्याय का एजेण्डा सर्वोपरि बना हुआ है। हालांकि जातिवादी वर्चस्व के दिन फिर लौटने का दिवास्वप्न देखने वाले मोदी को लेकर कुछ और ही राग अलाप रहे थे। उग्र हिन्दुत्व के संवाहक के रूप में मोदी की छवि को देखने की वजह से उन्हें यह मुगालता था कि इससे उनके दो मकसद हल होंगे। एक तो ऊंच नीच से मुक्त और भाईचारे पर आधारित होने के कारण पूरी दुनिया में बढ़त बनाने वाले इस्लाम को मोदी हिन्दुस्तान की सरजमीं पर शिकस्त देकर सैकड़ों वर्ष पहले उनसे परास्त होकर अपमानित हुए पूर्वजों का बदला पूरा होगा। दूसरे शोषित समाज में बराबरी के लिये जो कसमसाहट पैदा हुई है उसे भी कालीन के नीचे दबाया जा सकेगा लेकिन प्रधानमंत्री पद के दावेदार घोषित होने के बाद मोदी ने अपनी पुरानी केंचुल धीरे-धीरे उतार फेंकी और शोषित समाज में नव अंकुरित स्वाभिमान को आक्रामक चेतना में बदलते हुए नये हिन्दुस्तान की जरूरत के मुताबिक अपने को ढालना शुरू कर दिया। अम्बेडकर जयंती पर मोदी का भाषण इस कवायद का चरमोत्कर्ष था जिसके बाद से यथास्थितिवादियों में खलबली मची हुई है। वे हतप्रभ हैं और समझ नहीं पा रहे कि जिस वर्ण व्यवस्था के पुनरुत्थान के लिये उन्होंने मोदी का कंधा इस्तेमाल करने की योजना बनायी थी। मोदी की नई सोच की वजह से वह कहीं इतिहास की कब्र में हमेशा के लिये दफन न हो जाये।

आधुनिक भारत में वास्तविक बदलाव की शुरूआत वीपी सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में हुई। उनके द्वारा बाबा साहब अम्बेडकर को भारत रत्न दिया जाना व मण्डल आयोग की रिपोर्ट लागू किया जाना देश में वांछित सामाजिक क्रांति का प्रस्थान बिन्दु कहा जा सकता है। इसका वृत्त अधूरा रहता अगर वीपी सिंह ने उतनी ही शिद्दत के साथ सामाजिक बराबरी का सूत्रपात करने वाले इस्लाम को इस आंदोलन में अपनी कटिबद्घ धर्मनिरपेक्ष प्रतिबद्घता के जरिये न जोड़ा होता। दरअसल वर्ण व्यवस्था विरोधी आंदोलन और इस्लामी उसूलों में चोली दामन का रिश्ता है जिसे वीपी सिंह ने भरपूर समझा और अपने नये राजनैतिक आगाज का वैचारिक हथियार बनाया।
 
इसी
से खार खाये वर्ण व्यवस्था वादियों ने जवाबी कार्रवाई के तहत अयोध्या में मस्जिद को ढहाया और अपनी इस विध्वंसक योजना में उन पिछड़ों को हरावल दस्ता बनाया जिनके अधिकारों के लिये सामाजिक न्याय की जद्दोजहद अस्तित्व में आयी थी। क्रान्तियों के क्रम में कई अंतरिम चरण आते हैं। जिनमें न्याय की लड़ाई लड़ने वाले पहले शिकस्त खाते नजर आने लगते हैं। वीपी सिंह के आंदोलन के साथ भी यही हुआ लेकिन जब इस्लाम के मान मर्दन के नायक घोषित किये गये कल्याण सिंह और उमा भारती आदि को मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं की तर्ज पर अर्श से फर्श पर लाकर पटक दिया गया तो भाजपा वर्ण व्यवस्था को लेकर तीखी द्वंद्वात्मकता से घिर गयी। भाजपा को भान नहीं था कि मण्डल का आंदोलन उसके हिन्दुत्व को संक्रमित कर चुका है। इसी के चलते कल्याण सिंह के मुंह से वीपी सिंह के लिये तारीफ के शब्द निकलने लगे तो उमा दहाड़ उठीं कि पिछड़ी जाति के नेताओं का वर्चस्व भाजपा में बर्दाश्त नहीं किया जाता।
 
लेकिन द्वंद्वात्मकता की अंतिम परिणति यह है कि एक पिछड़े समाज के नेता नरेन्द्र मोदी को भाजपा को अपना तारणहार बनाना पड़ा। इसके बावजूद भाजपा के दिशा निर्देशक यह भ्रम पाले बैठे थे कि मोदी सुग्रीव की दास परम्परा को निभायेंगे लेकिन अब मोदी तो अपने को बालि साबित करने में लग गये हैं जो उनके लिये परेशानी का सबब बन चुका है। अम्बेडकर जयंती पर मोदी ने डंके की चोट पर कहा कि शोषित समाज से आया हुआ मोदी आज देश के सर्वोच्च राजनैतिक पद का दावेदार बन सका तो इसका श्रेय बाबा साहब के बनाये संविधान को है। ध्यान देने वाली बात यह है कि बाबरी मस्जिद को शहीद करने की तारीख संघ परिवार ने जानबूझकर बाबा साहब की निर्वाण तिथि के दिन चुनी थी और भाजपा जब पहली बार केन्द्र की सत्ता में आयी थी तो उसने पहला काम संविधान समीक्षा समिति बनाने के माध्यम से बाबा साहब के बनाये समतावादी संविधान को बदलकर वर्ण व्यवस्थावादी संविधान की भूमिका रचने का किया था लेकिन जब उसे पता चल गया कि संविधान का मूलभूत ढांचा अपरिवर्तनीय है और ऐसे दुस्साहस से उसके खिलाफ देश में बगावत हो सकती है तो भाजपा नेतृत्व को बैकफुट पर जाना पड़ा। मोदी राजनीति की नजाकत के कारण वीपी सिंह का नाम लेकर तो उनकी लाइन के लिये कोई स्वीकारोक्ति नहीं कर सकते थे लेकिन यह कहकर कि भाजपा समर्थित केन्द्र सरकार ने ही बाबा साहब को भारत रत्न दिया था बहुत कुछ कह दिया।

तथापि हमारा उद्देश्य यह नहीं है कि गुजरात में मोदी के कार्यकाल में हुए मुसलमानों के कत्लेआम के दामन को कलंक मुक्त घोषित कर दिया जाये लेकिन यह विचारणीय है कि जो श्रेय धर्मनिरपेक्षतावादी शूद्र नेताओं को मिलना चाहिये था वे उसमें कामयाब क्यों नहीं हुए और सामाजिक न्याय के संघर्ष की फसल सांप्रदायिकता की कोख से उपजा शूद्र नेता कैसे काटने जा रहा है। दरअसल वर्ण व्यवस्था बुनियादी नैतिकता और प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है जिसकी वजह से समाज में बड़े वर्ग का भारी उत्पीडऩ हुआ और भ्रष्टाचार व अनाचार पनपा। इसलिये सहज अनुमानित था कि जिन्होंने वर्ण व्यवस्था के दंश को भोगा है अगर सत्ता उनके हाथ में आ जायेगी तो भारतीय समाज को नैतिक समाज में बदला जा सकेगा।

सम्राट अशोक के समय का स्वर्ण युग भारत वर्ष में फिर वापस लाया जा सकेगा लेकिन शोषित समाज से आये मुलायम सिंह जैसे नेताओं ने अपराधीकरण, परिवारवाद और भ्रष्टाचार की इंतहा करके पूरे आंदोलन की साख का बेड़ा गर्क कर दिया। अगर उन्होंने साफ सुथरी राजनीति की होती तो आज धर्मनिरपेक्षतावादी शोषित समाज के नेताओं में से ही कोई मजबूत प्रधानमंत्री बनता। बहरहाल मोदी अगर प्रधानमंत्री बनने में सफल होते भी हैं तो शायद यह बदलाव का एक अल्पकालीन पड़ाव भर होगा। राजनाथ सिंह जैसे लोग तैयारी किये हुए बैठे हैं कि मोदी निष्कंटक होकर राजकाज न चला सकें। भाजपा के शूद्र नेताओं ने एकजुट होकर केन्द्र में अपनी सत्ता आने पर उत्तरप्रदेश सरकार को अपदस्थ कर देने का ऐलान किया था लेकिन राजनाथ सिंह इसके प्रतिवाद के लिये आगे आ गये जो भाजपा के अन्दर आगे चलकर होने वाले महाभारत का संकेत है।

वैसे तो मुलायम सिंह और राजनाथ सिंह के बीच पुरानी साठगांठ है लेकिन राजनाथ सिंह की सुविधा के लिये समाजवादी पार्टी द्वारा लखनऊ में अपना उम्मीदवार बदले जाने से आम लोगों तक दोनों की दुरभिसंधि जाहिर हो चुकी है। सामाजिक क्रांति को पलीता लगाने का मुलायम सिंह का इतिहास पहले से ही सर्वविदित है। दिसम्बर 1992 में दो बड़ी घटनायें हुई थीं। एक तो बाबरी मस्जिद शहीद की गयी थी दूसरी घटना इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मण्डल आयोग की रिपोर्ट को सही ठहराने का फैसला सुनाया गया था। इसके बाद धर्मनिरपेक्ष सामाजिक न्याय आंदोलनवादियों का मनोबल इतना ऊंचाई पर पहुंच गया था कि उसके ज्वार में नरसिंहराव सरकार का जहाज डूबता नजर आने लगा था। मुलायम सिंह ही थे जिन्होंने सदन से वाक आउट के माध्यम से नरसिंहराव सरकार को बचाया और इसके बाद धर्म निरपेक्ष सामाजिक क्रांति की लड़ाई लड़ रहे रामोवामो को ध्वस्त करने के लिये उत्तरप्रदेश विधानसभा के चुनाव में बसपा के साथ बेमेल गठजोड़ करना मंजूर किया। मुलायम सिंह की इसी कारस्तानी से नरसिंहराव की छद्म धर्मनिरपेक्ष सरकार अल्पमत में होते हुए भी अपना कार्यकाल पूरा कर सकी। न केवल इतना बल्कि नरसिंहराव की सरकार ने ही केन्द्र में संघ परिवार की साम्प्रदायिक सरकार के पदारूढ़ होने की प्रस्तावना लिखी। प्रतिगामी शक्तियों को निर्णायक मौके पर शक्ति प्रदान करने का मुलायम सिंह का इतिहास पुराना है और अपने को दोहराना इतिहास की जानी-मानी फितरत है। अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री बनने पर मोदी का अंजाम क्या होगा।

 

लेखक केपी सिंह, उरई(जालौन) के वरिष्ठ पत्रकार हैं। संपर्कः 9415187850
 

सिर्फ लोकप्रियता पाने के लिए दायर की गई दहेज़ की रोकथाम हेतु पीआईएलः हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने आज सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा दहेज़ के कुप्रभावों को रोकने के लिए बनाए गए उत्तर प्रदेश दहेज़ प्रतिषेध नियमावली 1999 के पूर्ण अनुपालन हेतु दायर पीआईएल को ख़ारिज कर दिया।

जस्टिस सुनील अम्बवानी और जस्टिस डीके उपाध्याय की बेंच ने वादिनी की अनुपस्थिति में बिना उन्हें सुने यह निर्णय किया कि यह याचिका बिना किसी रिसर्च के है और लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए की गयी है। यद्यपि कोर्ट ने माना कि समाज में दहेज़ के गंभीर दुष्परिणामों से इनकार नहीं किया जा सकता है। साथ ही कोर्ट ने कहा कि डॉ. ठाकुर ने यह पीआईएल अच्छे उद्देश्य के लिए दायर नहीं किया है। उन्होंने कहा कि समाज की बुराई दूर करने के लिए बनाए गए किसी भी क़ानून का पालन नहीं होना वादिनी के लिए पीआईएल का विषय हो जाता है।

इसी बेन्च ने एक सप्ताह पहले यह आदेश पारित किया था कि डॉ. ठाकुर प्रत्येक पीआईएल के साथ रजिस्ट्री में 25,000 रुपये जमा कराएंगी।

डॉ. ठाकुर ने कहा कि प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत कहता है कि बिना पक्ष को सुने कोई भी निर्णय नहीं किया जाना चाहिए और वह इस आधार पर इस महत्वपूर्ण मामले में अपील करेंगी।

रायपुर के पत्रकार विजय मिश्रा के भाई का सड़क दुर्घटना में निधन

रायपुर, 18 अप्रैल 2014। दतरेंगा के पास शुक्रवार की सुबह दैनिक अग्रदूत के पत्रकार विजय मिश्रा के भाई और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी संजय मिश्रा (49 वर्ष) का अज्ञात वाहन की चपेट में आ जाने से निधन हो गया।

रायपुरा सत्यम विहार निवासी संजय मिश्रा के परिवार में उनकी पत्नि सविता मिश्रा औऱ पुत्र आयाम मिश्रा है। उनका अंतिम संस्कार दोपहर 3 बजे महादेवघाट में संपन्न हुआ। अंतिम संस्कार में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी-कर्मचारी, पत्रकार एवं राजनीतिक दल के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

कहां हो दलितों के ‘मसीहाओं’, पुलिस नहीं सुन रही इस दुराचार पीड़िता की

इलाहाबाद। वाह रे पुलिस! दलित और कमजोर तबके के लोगों को कानूनी मदद तो दूर, खुद आरोपी से मिलकर उसकी मदद करने में पुलिस जुट गई है। एसपी के एफआईआर दर्ज करने का आदेश थाना आफिस में पड़ा धूल फांक रहा है। भुक्तभोगी बालिका एफआईआर कराने को दर-दर भटक रही है। सवाल उठता है, आखिर समाज के शोषित और कमजोर तबके को न्याय मिल पाना यूपी में टेढ़ी खीर साबित होता जा रहा है। सभी को न्याय और कानून सबके लिए का सरकारी नारा क्या सिर्फ थोथा नारा बनके रह गया है। चुनाव में तो नेताओं की बाढ़ है, सबके अपने बड़े-बड़े दावे और वादे हैं। दलित शोषित को न्याय दिलाने का दिनरात राग अलापने वाले हे राजनीति के मठाधीशों! आखिर इस गरीब दलित बालिका और उसके परिजनों को न्याय कैसे मिलेगा?

क्या इसे भी सूबे के सीएम अखिलेश सिंह यादव के पिताश्री व वाया तीसरा मोर्चा प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखने वाले मुलायम सिंह यादव के उस बयान से जोड़कर देखा जाए जो एक सप्ताह पहले दुराचार करने वालों को बच्चों की नादानी बताकर अपनी मंशा साफ करने की कोशिश कर चुके हैं। क्या यूपी की पुलिस उनके ही संकेत के मुताबिक कार्य कर रही है। शासन-सत्ता के जिम्मेदार कुर्सी पर बैठे भाग्य विधाताओं क्या लापरवाह पुलिस को सजा देने का अधिकार खत्म हो चुका है। क्या इसी तरह के दागों को लेकर जनता के बीच झूठी उपलब्धि बता रहे हो।

ईंट-भट्ठा पर मां-बाप के साथ मजदूरी करने वाली दलित जाति की बालिका के साथ बगल गांव के युवक ने शादी का झांसा देकर लगातार कई दिनों तक दुराचार किया। बाद में शादी से इंकार कर दिया। इस पर बालिका ने परिजनों के साथ पुलिस चौकी लालगोपालगंज पहुंचकर शिकायत की तो पुलिस ने कार्रवाई के बजाए आरोपी के पिता को चैकी बुलाकर समझौता कर लेने का दबाव डालना शुरू कर दिया। पुलिस की मनमानी से हतप्रभ दुराचार की शिकार बालिका ने 17 अप्रैल की दोपहर एसएसपी ऑफिस जाकर घटना की जानकारी दी। एसएसपी ऑफिस से नवाबगंज थाने को मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया गया। चैबीस घंटे बाद भी नवाबगंज पुलिस घटना की रिपोर्ट दर्ज नहीं कर सकी है। 18 अप्रैल को दिनभर पुलिस ने भुक्तभोगी बालिका को थाने पर बिठाए रखा। शाम को निराश होकर उसे घर वापस लौटना पड़ा।

इलाहाबाद के गंगापार में नवाबगंज थाना क्षेत्र के निंदूरा गांव निवासी श्यामनाथ चमार अपने परिवार के साथ अंधियारी गांव में शमीम प्रधान के ईंट-भट्ठे पर ईंट पथाई कर गुजारा करता है। उसकी बेटी अंजना कुमारी (पहचान छिपाने के लिए बाप-बेटी दोनों के नाम काल्पनिक), भी मां-बाप के साथ मजदूरी करती है। गरीब की इज्जत तो दो कौड़ी की समझी जाती है। बगल गांव के एक युवक ने शादी का झांसा देकर बालिका के साथ लगातार कई दिनों तक दुराचार किया। भुक्तभोगी बालिका के मुताबिक, अब वो शादी करने से इंकार कर रहा है। प्रेमी के झांसा देने पर बालिका ने परिजनों को जानकारी दी। परेशान परिजन लालगोपालगंज पुलिस चैकी गए और घटना की तहरीर दी।

पुलिस ने कार्रवाई करने के बजाए आरोपी युवक के पिता को बुलाकर समझौता करने का दबाव डालना शुरू कर दिया। भुक्तभोगी बालिका अपने परिजनों के साथ नवाबगंज थाने पहुंची। वहां से उसे डांट-डपट कर भगा दिया गया। पुलिस चैकी लालगोपालगंज और नवाबगंज थाना का बेहद लापरवाह रवैया देखकर बालिका ने परिजनों के साथ गुरूवार को एसएसपी ऑफिस पहुंचकर एसपी यमुनापार लल्लन राय से शिकायत की। घटना और स्थानीय पुलिस के रवैए को गंभीरता से लेते हुए एसपी ने नवाबगंज पुलिस को बालिका की मेडिकल जांच कराने और एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। आदेश के बावजूद दूसरे दिन शाम तक इस मामले मे अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी है।

दो लाख ले लो, समझौता कर लो

एसपी का आदेश लेकर घर लौटे भुक्तभोगी बालिका के परिजनो से लालगोपालगंज चैकी के दो सिपाहियों ने मिलकर आरोपी पक्ष से दो लाख रूपए लेकर समझौता करने पर दबाव डाला। भुक्तभोगी बालिका के बहनोई प्रवीण कुमार ने लिखित शिकायत की है कि गुरूवार को जब एसपी से मिलकर कार्रवाई का आदेश कराने के बाद घर लौटे तब चौकी से दो सिपाहियों ने घर पहुंचकर शिकायत को वापस लेने और आरोपी से दो लाख रूपए लेकर समझौता करने का दबाव डालना शुरू किया। इंकार करने पर वे बड़बड़ाते हुए वापस लौट गए।     

बोला दारोगा-एसओ साहब नहीं मिलेंगे, जाओ कल आना

शादी का झांसा देकर दलित बालिका से दुराचार करने और एसपी के आदेश के बावजूद थाने में मुकदमा न दर्ज करने वाली पुलिस की मनमानी ने हद कर दी। शुक्रवार को दिनभर थाने में भूखा-प्यासा बैठाने के बाद लालगोपालगंज चैकी इंचार्ज ने भुक्तभोगी बालिका और परिजनों से दो टूक कहा कि एसओ साहब नहीं मिलेंगे, घर जाओ, कल आना। भुक्तभोगी बालिका के मुताबिक, दरोगाजी यह कहते हुए थाने से चले गए। पुलिस के रवैए से नाराज बालिका ने मामले की शिकायत मुख्यमंत्री से करने का मन बनाया है।   

बजती रही घंटी, नहीं उठा एसपी का फोन

नवाबगंज थाने को एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने वाले एसपी यमुनापार लल्लन राय का पक्ष जानने के लिए उनसे कई बार मोबाइल पर संपर्क करने का प्रयास किया गया। कई बार घंटी बजने के बावजूद उन्होंने फोन उठाना तक मुनासिब नहीं समझा। ऐसे में उनका पक्ष नहीं जाना जा सका।
       
क्या इसे जंगलराज न माना जाए

इस समूचे प्रकरण में दो बातें खास मुख्यरूप से सामने आती हैं, क्या दुराचार पीड़ित बालिका की सुनवाई थाने में समुचित तरीके से की गई? अगर नहीं तो इसके लिए जिम्मेदार किसे माना जाए। क्या यूपी के थाने में वास्तव में कानून का राज चलता है? थाने में सुनवाई न करने वाले पुलिस के लिए कोई कारगर सजा निर्धारित की गई है। कैबिनेट मंत्री आजम खां की भैंस चोरी होने पर दिनरात मशक्कत कर पसीना बहाने वाली यूपी की पुलिस गरीब मजलूमो की इज्जत पर डाका डालने वाले दरिंदा के खिलाफ एक अदद रिपोर्ट दर्ज करने में नाकारा क्यों साबित हो रही है। जवाब दो सीएम अखिलेश सिंह, वे नहीं तो शासन-सत्ता के उनके कोई नुमाइंदे ही सही। निर्भया रेपकांड में बलिया जाकर टेसूए बहाने वाले अखिलेश सिंह क्या लालगोपालगंज के निंदूरा गांव आने या किसी प्रतिनिधि को मौके पर भेजकर उस पीड़ित परिवार के आंसू पोंछने का वक्त है आप लोगों के पास। दलित-शोषितों का पट्टा कराने वाली बसपाइयों क्या यह गंभीर नाइंसाफी का मामला नहीं बनता। सवाल यह भी कि यह बलिया की बिटिया नहीं यूपी के गरीब की बिटिया है, इसे न्याय कौन दिलाएगा।

 

इलाहाबाद से वरिष्ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट। सम्पर्क- भैरोंपुर, पो. अटरामपुर, जिला-इलाहाबाद, पिन- 229412, मोबाइल-9565694757, ईमेल- shivashanker_panddey@rediffmail.com

हाई कोर्ट ने आईपीएस अमिताभ के तबादले पर मांगा जवाब

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर द्वारा 30 जनवरी 2014 को मात्र 15 दिन में अभियोजन से नागरिक सुरक्षा विभाग में हुए तबादले पर दायर याचिका पर राज्य सरकार ने जवाब माँगा है।

जस्टिस एसएस चौहान और जस्टिस विष्णु चन्द्र गुप्ता ने श्री ठाकुर के इस तर्क को प्रथमद्रष्टया सही माना कि क़ानून की जानकारी नहीं होना कोई बहाना नहीं माना जा सकता और सरकार से तीन सप्ताह में जवाब देने को कहा।

श्री ठाकुर ने अपने तबादले को 28 जनवरी  को आईपीएस कैडर रूल्स 1954 के नियम 7 में हुए संशोधन कि आईपीएस अफसरों का तबादला सिविल सर्विस बोर्ड की संस्तुति पर ही किया जायेगा। और दो साल से पहले किये गए तबादले में उसके स्पष्ट कारण बताये जायेंगे, के विपरीत बताते हुए कैट, लखनऊ में चुनौती दी थी। कैट ने यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया था कि यद्यपि नियमावली 28 जनवरी को बने थे पर राज्य सरकार को इसकी जानकारी 14 फ़रवरी को हुई थी।

हरियाणा के भगाणा गांव की गैंग रेप पीड़ित लड़कियों के समर्थन में उतरे जेएनयू के छात्र

नई दिल्‍ली, 18 अप्रैल: हरियाणा के हिसार जिले के भगाणा गांव की गैंग रेप की शिकार चार नाबालिग लड़कियां अपने सैकड़ों परिजनों के साथ पिछले दो दिनों से जंतर-मंतर पर धरने पर बैठी हैं। इनकी मांग है कि कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी व भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्‍याशी नरेंद्र मोदी इनके गांव का दौरा करें तथा हरियाणा में दलितों-पिछड़ी महिलाओं के साथ निरंतर हो रही बलात्‍कार की घटनाओं से निजात दिलाएं।

गौरतलब है कि भगाना गांव में दबंग जाट बिरादरी ने खाप पंचायत के संरक्षण में पिछले दो वर्षों से दलित-पिछड़ी जातियों का बहिष्‍कार कर रखा है। न्‍यायपालिका, मानवाधिकार आयोग और अनुचित जाति आयोग के निर्देश के बाबजूद वे बहिष्‍कार खत्‍म करने को तैयार नहीं है जिस कारण गांव के अधिकांश दलित-पिछड़े पुरूष और महिलाएं पिछले दो वर्षों से हिसार स्थित जिला मुख्‍यालय परिसर में रहने को मजबूर हैं।

आठवीं व नौवीं कक्षा में पढ़ने वाली गैंग-रेप का शिकार हुई ये लड़कियां उन परिवारों की हैं, जिन्‍होंने जाटों द्वारा किये गये सामाजिक बहिष्‍कार के बावजूद गांव छोड़ने से इंकार कर दिया था। धरने का नेतृत्‍व कर रहे सर्व समाज संघर्ष समिति के अध्‍यक्ष वेदपाल सिंह तंवर ने बताया कि गत 23 मार्च, 2014 को रात आठ बजे इन चार लड़कियों को गांव के दबंग समुदाय के लोगों ने कार से में उठा लिया तथा लगातार दो दिनों एक दर्जन से अधिक लोग इनके साथ गैंग रेप करते रहे। काफी जद्दोजहद के बाद 25 मार्च को मामले की एफआईआर दर्ज हो सकी और भारी विरोध के कारण पुलिस ने इनमें 5 लोगों को गिरफ्तार किया है। लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के कारण अन्‍य आरोपी अभी भी खुले घूम रहे हैं।

तंवर ने कहा कि यह सिर्फ एक गांव का मामला नहीं है। हरियाणा में दलित-पिछड़ी महिलाओं के साथ लगातार गैंग-रेप और अन्‍य प्रकार के उत्‍पीड़न की घटनाएं हो रही हैं। वहां हमारी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है। जाट बिरादरी की संख्‍याबल, बाहुबल तथा धनबल के कारण कोई भी राजनीतिक पार्टी स्‍थानीय स्‍तर पर हमारी सुध नहीं लेती। प्रशासन पूरी तरह इसी दबंग बिरादरी के कब्‍जे में है। उन्‍होंने रेप के आरोपियों को फांसी देने तथा पीड़ित लड़कियों को 15-15 लाख रूपये मुआवजा देने की मांग की। तंवर ने कहा कि चुंकि पहले से ही सामाजिक बहिष्‍कार झेल रहे भगाणा गांव के दलित परिवारों की ये गैंग-पीड़ित लड़कियां अब अपने गांव भी नहीं लौट सकतीं, इसलिए सरकार इनके निकटवर्ती शहर में पुनर्वास की व्‍यवस्‍था करे व उच्‍च शिक्षा का खर्च वहन करे व बालिग होने पर सरकारी नौकरी दिये जाने का आश्‍वासन दे। (संपर्क: वेदपाल तंवर #09813200043, जगदीश काजला #09812034593)

रेप पीड़ित लडकियों के समर्थन में उतरे जेएनयू के छात्र

नई दिल्‍ली, 18 अप्रैल। जेएनयू के छात्रों ने हरियाणा की गैंग-रेप की शिकार लड़कियों को न्‍याय दिलाने के लिए आंदोलन चलाने की घोषणा की है। ऑल इंडिया बैकवर्ड स्‍टूडेंट्स फोरम, जेएनयू के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष जितेंद्र यादव ने कहा कि जेएनयू के छात्र भगाना गांव का दौरा करेंगे तथा दिल्‍ली में इन्‍हें न्‍याय दिलाने के लिए प्रदर्शन आयोजित करेंगे। उन्‍हेांने बताया कि 19 अप्रैल, 2014 (शनिवार) को रेप पीडित लडकियों व उनके परिजनों के साथ जेएनयू कैंपस में एक सभा का अयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर अनेक प्रोफेसर, सामाजिक कार्यकर्ता व अन्‍य बुद्धिजीवी भी मौजूद रहेंगे। (संपर्क: जितेंद्र यादव #9968124622)

हरियाणा में महिला उत्‍पीड़न और जाति का सवाल

भारत जैसे देश में कोई भी समस्‍या एक रेखीय नहीं है। महिलाओं के उत्‍पीड़न और विशेषकर बलात्‍कार के मामले में भी यही तथ्‍य सामने आता है। सबसे अधिक वंचित तबकों की महिलाओं को बलात्‍कार का शिकार होना पड़ता है। भारत के गांवों में बलात्‍कार सिर्फ पुरूष की शारीरिक हवस का मामला नहीं है, उससे  कहीं अधिक यह सामंती वर्चस्‍व को बरकार रखने का माध्‍यम है। अनेक मामलों में तो किसी विशेष समुदाय को नीचा दिखाने के लिए सामंती जातियों के पुरूष सुनियोजित रूप से बलात्‍कार को अंजाम देते हैं।
 
हरियाणा में खाप पंचायतों के संरक्षण में दलित-पिछड़ी महिलाओं के साथ निरंतर हो रही गैंग-रेप की घटनाएं इसका ज्‍वलंत उदाहरण हैं। पिछले दिनों हरियाणा के भगणा गांव (जिला-हिसार) की दलित परिवार की चार लड़कियों को दबंग लोगों ने उठा लिया और उनके साथ तीन दिनों तक 10-10, 12-12 लोग  गैंग-रेप करते रहे। यह वही भगणा गांव है, जहां की दबंग जाति ने पिछले दो वर्षों से दलित-पिछडों का सामाजिक बहिष्‍कार कर रखा है। दबंगों की ताकत का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि न्‍यायपालिका, मानवाधिकार आयोग, अनुसूचित जाति आयोग आदि के हस्‍तक्षेप के बावजूद वे इस सामाजिक बहिष्‍कार को खत्‍म करने को तैयार नहीं हैं।

खाप पंचायतों के भय से वहां न उनकी बात पुलिस सुनती है, न राजनेता। बलात्‍कार पीड़ित ये लड़कियां अपने सैकड़ों परिजनों के साथ पिछले दो दिनों से दिल्‍ली के जंतर-मंतर पर धरने पर बैठी हैं। यहां भी उनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है। न्‍याय की इस लड़ाई में इनके परिजनों को जेएनयू से साथ देने की उम्‍मीद कर रहे हैं।

ऑल इंडिया बैकवर्ड स्‍टूडेंटस फोरम जेएनयू के सभी छात्र-छात्राओं से जंतर मंतर पहुंचकर इनका साथ देने की अपील करता है। फोरम ने धरने पर बैठी महिलाओं व पुरूषों को कैंपस में भी आमंत्रित किया है। कार्यक्रम का स्‍थान व समय निम्‍नांकित है।

हरियाणा में महिला उत्‍पीड़न और जाति का सवाल

स्‍थान : सतलज हॉस्‍टल मेस
दिनांक : 19 अप्रैल, 2014  (शनिवार)
समय : 9 PM

वक्‍ता :
1.  भगाना की पीड़ित लड़कियां व उनके परिजन
2.  वेदपाल सिंह तंवर, अध्‍यक्ष, सर्वसमाज संघर्ष समिति, हरियाणा
3.  प्रो. सुषमा यादव (इग्‍नू),  प्रो. विवेक कुमार (जेएनयू)
4.  मुख्‍यत्‍यार सिंह, पीएचडी स्‍कॉलर जेएनयू

Jitendra Kumar Yadav

Research Scholar
Center of Indian Languages
School of Language Literature and Cultural Studies
Jawaharlal Nehru University
New Delhi- 110067

National President
All India Backward Students' Forum (AIBSF)
jite.jnu@gmail.com
Mo :+91  9716839326, +91 8459439496

 

प्रेस नोट
 

जनता से सीधा संवाद, राजनीति में नई परम्परा की शुरूआत

वाराणसी। परम्परागत राजनीति से अलग हटकर चुनौती, विरोध और सवाल-जबाब के जरिए राजनीति की नयी परिभाषा गढ़ने चली आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने मंगलवार की शाम कटिंग मेमोरियल स्थित गोकुल लान में जनता से सीधा संवाद स्थापित कर लोकसभा चुनावों में एक नई परम्परा की शुरूआत की। बनारस में अब तक हुए लोकसभा के चुनावों के इतिहास में षायद ऐसा पहली बार हुआ कि खुद चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी ने जनता के सवालों के सीधे जबाब दिया, नही तो चुनावी सभाओं, रैलियों में पहुंचे नेता अपनी ही कहकर चलते बनते है।

छोटे-छोटे कदमों से बड़े लक्ष्य को भेदने के प्रयास में लगी आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने स्पष्ट तौर पर कहा कि राजनीति में सवाल-जबाब का दौर है, लेकिन नरेन्द्र मोदी या राहुल गांधी तो जबाब ही नहीं देते। बनारस को राजनीति के महाक्रांति का मंच बताते हुए जनता से आह्वान किया कि मोदी को हरा कर इस महाक्रांति के अग्रदूत बने क्यों कि मोदी की हार से ही इस देश में नई राजनीति की शुरूआत होगी। उन्होने कहा कि अगर मोदी जीत गये तो बड़ौदा भाग जायेंगे और हारे तो देश की राजनीति की फिजा ही बदली सी होगी। साथ ही में उन्होनें दो सीटो से चुनाव लड़ने पर रोक लगाने के लिए कानून बनाने की मांग की।

मो. इकबाल के पहले सवाल कि आप के खिलाफ मोदी ने इतना कुछ कहा पर आपने चुनाव आयोग से शिकायत क्यों नही की? इसके जवाब में केजरीवाल ने कहा जनता कि अदालत सबसे बड़ी अदालत है जनता इस बार तय करेगी कि कैसे लोग देश की राजनीति का प्रतिनिधित्व करे। इसके बाद आरक्षण से लेकर जातीय व्यवस्था, अर्थवयवस्था से लेकर रोजगार, शिक्षा नीति, खेती-किसानी पर एक के बाद एक पूछे गए तीखे सवालों के जबाब केजरीवाल देते रहे। लोकतंत्र में लाख बिमारियों की एक जड़ भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जनता से मौजूदा व्यवस्था की सफाई करने के लिए निर्णायक भूमिका में आने को कहा। कहा खराब राजनीति का विकल्प ईमानदार और जनपक्षीय राजनीति ही हो सकती है। खुद को भगौड़ा कहे जाने के सवाल के जवाब में कहा मैं पाकिस्तान तो नहीं भाग गया। यही हूं भ्रष्टाचारियों से लड़ने के लिए खड़ा हूं और आगे भी लड़ता रहूंगा।
 
सब मिलाकर देखा जाए जनता से संवाद के जरिए आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप, और आकाश के रास्ते हेलीकाप्टर से सीधे मंच पर टपके नेताओं के रटे-रटाये डायलागनुमा उत्तेजित और भावनात्मक भाषणों से परे हटकर राजनीति में एक बेहतर परम्परा की नींव डाली है। साथ ही आम आदमी के छोटे-छोटे मगर जीवन को प्रभावित सवालों का जबाब देते हुए अपने चुनावी लक्ष्य को भेदने की कोशिश की शुरूआत भी की।

 

भास्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट।
 

शेखर गुप्ता ने अपनी किताब विवेक गोयंका को समर्पित की

इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर-इन-चीफ शेखर गुप्ता की बहुप्रतीक्षित किताब 'ANTICIPATING INDIA' बाज़ार में है लेकिन थोड़े परिवर्तन के साथ। किताब का जैकेट कवर और टैग लाइन बदली हुई है। पहले की टैग लाइन ' IF MODI WINS ON SUNDAY' बदल कर अब हो गई है 'THE BEST OF NATIONAL INTEREST.' शेखर गुप्ता की ये किताब, शनिवार को प्रकाशित उनके कॉलमों का संकलन है।

हार्पर कॉलिन्स द्वारा प्रकाशित अपनी किताब को इंडियन एक्सप्रेस के चेयरमैन विवेक गोयंका को समर्पित करते हुए गुप्ता लिखते है कि 'विवेक गोयंका के लिए, उन्नीस साल, 900 कॉलम औऱ एक भी कॉल क्यों पूछने के लिए नहीं। अगर आपको ऐसा कोई और समाचार पत्र मालिक मिले तो मुझे बताएं'।' 
 

मोदी के खिलाफ पर्चा भरने जा रहे नेता की कार सीज़

इलाहाबाद। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ संसदीय क्षेत्र वाराणसी से पर्चा दाखिल कर उनके खिलाफ चुनाव में ताल ठोंकने जा रहे एक युवा नेता संजीव मिश्रा की झंडा लगी कार को पुलिस ने सीज कर दिया। घंटों पुलिस से मिन्नतें करने के बाद भी पुलिस का दिल नहीं पसीजा। पुलिस ने चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन करने के मामले में लिखापढ़ी करते हुए मुकदमा दर्ज कर लिया है।
आखिरकार संजीव मिश्रा की मोदी के खिलाफ पर्चा दाखिल करने की हसरत मन में ही धरी रह गई।

संजीव मिश्रा युवा विकास पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। वे गुरूवार को दोपहर करीब बारह बजे अपने समर्थकों के साथ कार से वाराणसी जा रहे थे। इलाहाबाद-लखनऊ राजमार्ग पर नवाबगंज थाने के सामने कार पहुंची तभी वाहन चेकिंग कर रहे पुलिसकर्मियों ने उनकी कार रोककर तलाशी ली। स्टेटिक मजिस्ट्रेट भी मौके पर मौजूद थे। बताया जा रहा है कि कार में झंडा लगाने की परमीशन संजीव मिश्रा के पास नहीं थी। पुलिस के मुताबिक कार में झंडा लगाने का परमीशन नहीं थी। इसके अलावा कार के भीतर युवा विकास पार्टी के चालीस झंडे और पचास से ज्यादा पार्टी के स्टीकर भी बरामद किए गए हैं। कार को छुड़ाने के लिए संजीव मिश्रा ने काफी देर तक कोशिश की पर कार को पुलिस ने थाने लाकर सीज कर दिया।

 

इलाहाबाद से वरिष्ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट।

पंजाब केसरी भी अपने कर्मचारियों से ले रहा ‘शौकिया पत्रकारिता’ करने का शपथपत्र

दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान के बाद अब सूचना है कि पंजाब केसरी भी मजीठिया से बचने की जुगाड़ कर रहा है। पंजाब केसरी प्रबंधन अपने कर्मचारियों से दस रुपए के ग़ैर-न्यायिक स्टाम्प पेपर पर एक शपथ पत्र ले रहा है। शपथ पत्र का प्रारूप पंजाब केसरी द्वारा उपलब्ध कराया गया है। इसमें शपथकर्ता को अपने पूर्णकालिक मूल व्यवसाय की जानकारी देते हुए ये घोषणा करनी है कि पत्रकारिता उसकी मुख्य आजीविका न हो कर मात्र एक शौक है। औऱ यह भी कि उसके मूल व्यवसाय से होने वाली आमदनी उसके जीवन-यापन के लिए पर्याप्त है।

शपथकर्ता को यह भी घोषणा करनी है, चूंकि वह पंजाब केसरी को समाचार शौकिया तौर पर उपलब्ध कराएगा इसलिए वह प्रतिधारण शुल्क की करार राशी के अतिरिक्त किसी अन्य प्रकार के खर्चे का दावा नहीं करेगा। साथ ही प्रबंधन बिना किसी नोटिस या प्रतिपूर्ती या कारण के इस व्यवस्था को समाप्त करने को स्वतंत्र होगा और ऐसा होने पर शपथकर्ता किसी प्रकार का दावा नहीं करेगा।

शपथपत्र का प्रारूपः

 

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।

इसे भी पढ़ेंः

मजीठिया से बचने के लिए अपने पत्रकारों को 'शौकिया-पत्रकार' बना रहा 'हिन्दुस्तान' http://bhadas4media.com/article-comment/19081-hindustan-journos-sign-agreement.html
 

गोदौलिया प्रकरणः संदीप की लड़ाई उसका अखबार लड़े न लड़े, आईसीएन मीडिया ग्रुप उसके साथ है

मिर्ची। अपने कंधे पर जनसुरक्षा का दायित्व उठाने की सौगंध लिए घूम रही पुलिस ने जमीन छोड़ दिया है। शब्दों को अक्षरशः परिभाषित कर रही है जिले के दशाश्वमेघ थाने की पुलिस। नैतिकता, मानवाधिकार, और मानवीय संवेदनाओ को ताख पर रख चुकी पुलिस अपनी कार्यप्रणाली को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहती है। अमानवीय चेहरा दिखाते हुए दशाश्वमेघ थाने के गोदौलिया चौराहे पर दो पुलिसकर्मियों ने आम जनता को अपने कोपभाजन का शिकार बनाने के साथ-साथ मीडियाकर्मी संदीप त्रिपाठी, भाई अरुण त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार और संदीप त्रिपाठी के चाचा राजनाथ त्रिपाठी पर ताबड़तोड़ डंडे का प्रयोग, वर्दी का रौब, नियम कानून की धज्जिया उड़ाने के बाद दिखा दिया कि असली गुंडे हम है।

जनविरोध हुआ मौके पर क्षेत्राधिकारी डीपी शुक्ल थाना प्रभारी निरीक्षक वीके सिंह पहुचे। एकत्र मीडियाकर्मियों के दबाव में एसएसपी जोगेंद्र कुमार ने चौराहे पर लगे सीसीटीवी फुटेज और मामले के सन्दर्भ में रिपोर्ट संग क्षेत्राधिकारी डीपी शुक्ल को तलब किया। हो-हंगामा घंटो की किचकिच और मत्थापच्ची के बाद निष्कर्ष निकला कि दोष मीडियाकर्मी संदीप त्रिपाठी का है। नैतिकता के आधार पर हम भी मानते है की संदीप दोषी है। उसने कार में पड़ी अपनी अस्वस्थ माँ का हवाला पुलिसकर्मियों को दिया बताया की वह पैदल घर तक नही जा सकती। लिहाजा कार ले जाने की अनुमति प्रदान करे। पुलिसकर्मी अपनी जगह पर बिलकुल सही है। चितपरिचित अंदाज में इन्होने जबाब दिया संदीप के साथ बदसलूकी की। माँ-बहन को देख लेने की बात कही।

शाश्वत सत्य तो यही है कि आम आदमी के साथ पुलिस का रवैया ऐसा ही होता है। यह बात बड़े-बड़ो ने मानी है। संदीप त्रिपाठी का बताना भारी पड़ा कि मै मीडियाकर्मी हूं क्राइम बीट पर काम करता हुं। 99 प्रतिशत मै आपको कापरेट करने के ऐवज में 1 प्रतिशत कॉपरेशन की भावना रखता हुं। यह गलती संदीप को नही करनी चाहिए थी। मौके पर 100-50 का नोट निकालकर पुलिसकर्मियों को अगर वह दे देता तो इतना बड़ा बखेड़ा न खड़ा होता। पुलिस की अच्छाई की उन्होंने डंडे का रौब और तेवर संदीप को दिखाया और समझाया। हाल-फिलहाल संदीप त्रिपाठी का हाँथ फैक्चर है। कलम का सिपाही अब कई महिनो तक कलम न उठा पाएगा क्योंकि उसका हाथ टूट चूका है। पुलिस महकमा लामबद हो चूका है होना भी चाहिए पुलिसकर्मियों की बात है।

थूकते हैं हम पत्रकारों के मुंह पर। पुलिसकर्मियों से प्रेरणा लें कि अपनों की लड़ाई कैसे लड़ी जाती है। गलत और सही मायने नहीं रखता, मायने रखता है संदीप पत्रकार है। संदीप के हित की लड़ाई उसका अखबार लड़े या न लड़े, लाख गलती होने के बाबजुद आईसीएन मीडिया ग्रुप संदीप त्रिपाठी के साथ है। जरुरत पड़ी तो मौके पर जुत्तमपैजार होगा। मुकदमेबाजी से पार्टी नही डरती। उदाहरण चंद दिनों में सबके सामने होगा। मीडिया हाउसो के मालिकान का भला न चाहकर हम चाहते है भला कर्मचारियों का। अंततः वही बात, जय ही हो।

 

भड़ास को भेजा गया पत्र।
 

वाह रे कारपोरेट मीडिया का ‘लोकतंत्र’! मेक्सिको के कुछ सबक

पी. कुमार मंगलम का यह लेख मेक्सिको में चुनावों और प्रायोजित आंदोलनों तथा दलों के जरिए फासीवादी, जनविरोधी उभारों और जन संघर्षों को दबाने के साम्राज्यवादी प्रयोगों की रोशनी में भारत में पिछले कुछ समय से चल रही लहरों की (पहले ‘आप’ की लहर और अब मोदी की) पड़ताल करता है।
 
नरेंद्र मोदी
या फिर अरविंद केजरीवाल/राहुल गांधी (यहाँ कभी अगर क्रमों की अदला-बदली होती है, तो वह आखिरकार मीडिया कुबेरों के स्वार्थोँ से ही तय होती है)? आजकल अगर आप दोस्तों-रिश्तेदारों, लोकतंत्र के अपने अनुभवों का रोना रोते बुजुर्गों और अतिउत्साहित ‘नये’ वोटरों को सुनें, तो बात यहीं शुरु और खत्म हुआ करती है। जब 2014 के लोकसभा चुनावों का दौर शुरू हो चुका है, तब सभी संभावित राजनीतिक विकल्पों की गहरी पड़ताल के बजाए पूरी बात का सिर्फ़ इन चेहरों पर टंग जाना क्या स्वाभाविक है। आदि-समाजवाद से लेकर ‘ग्लोबलाईज़्ड’ समय के बीच की खिचड़ी सच्चाइयों से निकलते अनेकों जनसंघर्षों के इस दौर में सिर्फ़ ‘परिवार’, ‘संघ-परिवार’ और “अपनी ईमानदारी” की ‘उपलब्धि’ लिए घूमते इन चेहरों का यूं छाया रहना तो और भी अचरज भरा है! हालांकि, अगर इन दिनों चारों ओर से आ रही 'पल-पल की खबरों' पर गौर करें, तो चुनावों के मीडियाई नियंत्रण की कड़ियाँ अपने-आप खुलने लगती हैं। साथ ही, दुनिया के ‘सबसे बड़े’ भारतीय लोकतंत्र का खोखलापन भी नजर आता है। वैसे, बात सिर्फ भारत की ही नहीं है। ‘विकासशील’ या फिर ‘तीसरी दुनिया’ का ठप्पा झेलते देशों में ‘जनता का शासन’ अक्सर न दिखने वाले या फिर दिखने में लुभाऊ लगने वाले ऐसे ही फंदों से जकड़ा है। यहाँ हम लातीनी अमरीकी देश मेक्सिको में जनतंत्र के पिछले कुछ दशकों के अनुभवों की चर्चा करते हुए अपनी बात स्पष्ट करेंगे।
 
मेक्सिको: हड़प लिए गए लोकतंत्र की त्रासदी
 
हम शायद ही कभी यह सोचते हैँ कि सिर्फ एक देश संयुक्त राज्य अमरीका का आम प्रयोग (हिदी में और ज्यादा) में अमरीका कहा जाना एक शब्द के गलत प्रयोग से कहीं ज्यादा है। जैसाकि समकालीन लातीनी अमरीकी लेखक एदुआर्दो गालेआनो का कहना है, यह इस एक देश (अब से आगे यू.एस.) के द्वारा अपनी दक्षिणी सीमा के बाद शुरू होते लातीनी अमरीका का भूगोल, इतिहास, संस्कृति और राजनीति हथियाकर इस पुरे क्षेत्र को “एक दोयम अमरीका” में बदल देने की पूरी दास्तान है। यहाँ हम इस भयावह सच के पूरे ताने-बाने और अभी तक चल रहे सिलसिले की बात तो नहीँ कर सकते, लेकिन मेक्सिको की बात करते हुए इसके कई पहलू खुलेँगे।
 
भूगोल के हिसाब से उत्तरी अमरीका मेँ होने और यू.एस. से बिल्कुल सटे होने के बावजूद मेक्सिको स्पानी भाषा और स्पानी औपनिवेशिक इतिहास के साथ सीधे-सीधे दक्षिणी अमरीका का हिस्सा है। इस जुड़ाव की सबसे अहम बात यह है कि 1810-25 के बीच स्पानी हुकूमत से बाहर निकले मेक्सिको, मध्य और दक्षिणी अमरीका के देशों (इन तीनों को मिलाकर बना क्षेत्र ही लातीनी अमरीका कहलाता है) में बोई गई सामाजिक-आर्थिक गैरबराबरी, धनिकोँ के राजनीतिक वर्चस्व और यू.एस. की दादागिरी की नर्सरी भी यही देश रहा है। बात चाहे इस ‘आज़ादी’ के बाद भी स्पेनवंशी क्रियोल और मिली-जुली नस्ल के स्थानीय पूँजीपतियों के पूरे देश के संसाधन, संस्कृति और सत्ता पर कब्जे की हो या 1844-48 में यू.एस द्धारा मेक्सिको की आधी जमीन लील लिये जाने की हो, मेक्सिको कल और आज के लातीनी अमरीका की कई झाँकिया दिखलाता है।
 
‘आज़ाद’ मेक्सिको की लगातार भयावह होती गैरबराबरियों के खिलाफ वहां के भूमिहीन किसानों और खान मजदूरोँ का गुस्सा 1910 की मेक्सिको क्रांति बनकर फूटा। हालांकि, बहुत जल्द ही ब्रिटिश, फ्रांसीसी और आगे चलकर यू.एस. के बाज़ार और पैसे पर पलते क्रियोल वर्ग ने बदलाव के संघर्षों को बर्बरता से कुचल डाला था। 1930 के दशक मेँ उत्तर के पांचो विया और दक्षिण मेँ चियापास क्षेत्र के एमिलियानो सापाता जैसे क्रांतिकारी नेताओं की हत्या कर बड़ी पूँजी और सामाजिक भेदभाव की शक्तियों ने पूरे राज्य तंत्र पर कब्जा कर लिया था। 1929 में राष्ट्रपति रहे प्लूतार्को कायेस ने पीआरआई (पार्तिदो दे ला रेवोलुसियोन इंस्तितुसियोनाल-व्यवस्थागत क्रांति का दल) बनाकर इन शक्तियों को संगठन और वैचारिक मुखौटा दिया। जैसाकि नाम से ही जाहिर है, यह पार्टी क्रांति के दौर में जोर-शोर से उठी समानता और न्याय की मांगों[1] को एक अत्यधिक केंद्रीकृत राष्ट्रपति प्रणाली वाली व्यवस्था में दफनाने की शुरुआत थी।

प्लुतार्को कायेस के बाद आए सभी राष्ट्रपतियों ने जनआकांक्षाओं का गला घोंटने वाली इस व्यवस्था को मजबूत किया। मजेदार बात यह कि यह सब लगातार जनता के नाम पर, लोकप्रिय नायकों की मूर्तियां वगैरह बनवाकर तथा लोकगीतों-लोककथाओं के कानफोड़ू सरकारी प्रचार के साथ-साथ किया गया! यह भी बताते चलें कि मूलवासियों सहित अन्य वंचित तबकों की कीमत पर विदेशी पूंजी का रास्ता बुहारती पीआरआई सरकारें यू. एस. शासन-व्यवस्था की सबसे करीबी सहयोगी बन गईं थी। आश्चर्य नहीं कि जब 1950 के दशक में हालीवुड में "कम्युनिस्ट" कहकर चार्ली चैपलिन जैसे कलाकारों को निशाना बनाया जा रहा था, तब वहां के सरकारी फिल्मकारों ने मेक्सिको क्रांति के नायकों को खलनायक दिखा कई फिल्में ही बना डाली! 1953 में आई एलिया काज़ान की ऐसी ही एक फिल्म में चियापास के भुमिहीन किसानों के योद्धा रहे एमिलियानो सापाता को बातूनी और छुटभैया गुंडा बना दिया गया था!

‘आज़ाद’ मेक्सिको के आर्थिक-राजनीतिक हालातों की कुछ बारीकियाँ 1947 के बाद के भारत को समझने में मदद करती हैं। मसलन, जहां मेक्सिको में औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था, सत्ता और समाज में हावी रहे क्रियोल वर्ग ने नए निज़ाम पर जबरन कब्जा किया, वहीं भारत में अंग्रेजी राज से उपजे सवर्ण जमींदार 1947 के बाद “देशभक्ति” और खादी ओढ़कर पूरी व्यवस्था पर पसर गए! फिर, जहां मेक्सिको में शासक वर्गों ने पीआरआई का लुभावना सरकारी मुखौटा तैयार किया, वहीं ‘आज़ाद’ भारत की कांग्रेस ब्राह्मणवादी सामंतों के हाथों कैद होकर रह गई थी। यह जरूर है कि मेक्सिको में चियापास के मूलवासियों सहित भूमिहीनों-छोटे किसानों पर खुलेआम चली राजकीय हिंसा (जिसकी जड़ें अत्यधिक हिंसक औपनिवेशिक इतिहास में हैं) के बरअक्स भारत में यह हिंसा ‘लोकतंत्र’, ‘विकास’ और ‘राष्ट्रवाद’ के दावे से दबा दी जाती रही है। स्वरूप जो भी रहा हो, पूरी व्यवस्था पर गिनती के शोषक वर्गों के कब्जे ने दोनों ही देशों की बड़ी आबादी को अपनी ही जमीन पर तिल-तिल कर खत्म होने को मजबूर किया। इस पूरी प्रक्रिया में अपनी जीविका, भाषाओं और संस्कृतियों पर रोज ‘विकास’ के हमले झेलते भारत और मेक्सिको के मूलवासी बहुल क्षेत्र "सत्ता-केंद्र से पूरी योजना के साथ थोपे गये पिछड़ेपन" की जीती-जागती मिसाल बने (विलियम्स 2002)। वैसे,1991 के बाद से ‘जनहित’ के नाम पर बड़ी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के लिए खुलकर किसानों-मजदूरों की जमीन और रोजगार छिनते भारतीय लोकतंत्र का ‘मानवीय’ मुखौटा अपने-आप उतर गया है। इस पूरे दौर की एक खास बात यह रही है कि बड़े मीडिया समुह नव-उदारवादी नीतियों के सबसे बड़े पैरोकार बन पूरे देश में इन्हें लागू करने वाले दलों को एकमात्र राजनीतिक विकल्प बना कर पेश कर रहे हैं। ‘ग्लोबल’ कहकर खुद पर इठलाती कारपोरेट मीडिया के इस गोरखधंधे को समझने के लिये भी मेक्सिको एक अच्छा उदाहरण है, जो वैश्वीकरण की उलटबासियाँ  काफी पहले से झेल रहा है।

मेक्सिको: वैश्वीकरण और मीडियाक्रेसी का मकड़जाल
 
यू. एस. से सटे होने के कारण मेक्सिको और फिर मध्य अमरीकी देश वैश्वीकरण के पहले शिकारों में रहे हैं। ‘उदारीकरण’ ‘आर्थिक सुधार’ आदि का लुभावना चेहरा देकर वैश्वीकरण की जो नीतियां आज पूरी दुनिया में लागू की जा रही हैं, मेक्सिको काफी पहले से उन सबकी प्रयोगशाला रहा है (शायद यहीं से यह कहावत भी निकलती है: मेक्सिको, भगवान से इतना दूर और यू.एस. के इतना करीब!)। एक और खास बात यह कि लातीनी अमरीका के ज्यादातर देशों के उलट, जहां नव-उदारवादी नीतियां भयानक तानाशाहियों के द्धारा थोपी गईं [2], मेक्सिको में देश बेचने का काम छ्ह साला चुनावों के साथ और संसाधनों की लूट का हिस्सा मध्यवर्ग में बांटकर किया गया। हालांकि, 1980 के बीतते-बीतते शोषित तबकों को हथियार और कभी-कभी ‘भागीदारी’ के सरकारी झुनझुने तथा मध्यवर्ग को ‘राष्ट्रवाद’ और ‘विकास’ के दावे से साधते रहने की पीआरआई की रणनीति चूक गई थी। तब, जहां महंगाई और मेक्सिकन मुद्रा पेसो की कीमत में भारी गिरावट से कंगाल हुए उच्च और मध्य वर्ग सरकार को नकारा घोषित कर रहे थे, वहीं सालों की लूट और अनदेखी से बरबाद आबादी का बड़ा हिस्सा अपने आंदोलन खड़ा कर रहा था।

1988 के राष्ट्रपति चुनावों में वंचित तबकों के जमीन और जीवन की मांगों को साथ लेकर तेउआनतेपेक कार्देनास पीआरडी (पार्तिदो दे ला रेवोलुसियोन देमोक्रातिका-लोकतांत्रिक क्रांति का दल)  के झंडे के साथ पीआरआई उम्मीदवार कार्लोस सालिनास गोर्तारी के खिलाफ़ लड़े। व्यापक जनसमर्थन और जबरदस्त लोकप्रियता, कार्देनास के पिता पूर्व समाजवादी राष्ट्रपति लासारो कार्देनास थे, के बावजूद वे चुनाव हार गए। जीत और हार का बहुत कम फासला किसी राजनीतिक उलटफेर से नहीं, बल्कि सोची-समझी सरकारी साजिश से तय हुआ था। इलेक्ट्रॉनिक मतों की गिनती में कार्देनास शुरू से आग चल रहे थे कि ठीक आधी रात को मशीनें ‘अचानक’ खराब हो गईं। और जब उन्हें ‘ठीकठाक’ कर अगली सुबह नतीजों का एलान किया गया, तो कार्देनास राष्ट्रपति के बजाय राष्ट्रपति के भूतपूर्व उम्मीदवार बन चुके थे! लोकतंत्र के खुल्लम-खुल्ला अपहरण में इस बार सरकारी भोंपू बने बड़े मीडिया ने 1994 के चुनावों में अपनी भूमिका निर्णायक रूप से बढ़ा ली थी। तब, पहले से ज्यादा संगठित पीआरडी की चुनौती को एक-दूसरे का पर्याय बने पीआरआई और राज्यसत्ता (जैसे अपने यहां कांग्रेस/बीजेपी/संस्थागत ‘वाम’ और सरकार) तथा सबसे बड़े मीडिया समूह तेलेवीसा ने मिलकर खत्म कर डाला था। श्रम ‘सुधार’ और ‘उदार’ कर-व्यवस्था के नाम पर पूरी तरह से यू.एस. का हुक्म बजाते नाफ्टा [3] करार पर पीआरआई की बलैयाँ  लेने वाली तेलेवीसा ने अपने कारनामों से जनमत सरकार के पक्ष में या ठीक-ठीक कहें तो पीआरडी के खिलाफ़ मोड़ दिया था।
 
सबसे पहले, तेलेवीसा ने अपने बड़े नेटवर्क और उसपर आम लोगों के भरोसे को भंजाते हुए पीआरआई उम्मीदवार एर्नेस्तो सेदियो को अन्य उम्मीदवारों के मुकाबले 10 गुना ज्यादा प्रचार दिया। फिर, पीआरआई विरोधी मतों को बांटने के लिए 1980 में खड़ी हुई कट्टर कैथोलिक रुझानों वाली पार्टी पीएएन (पार्तिदो दे ला आक्सियोन नासियोनाल- राष्ट्रीय कारवाई का दल) को पीआरडी से ज्यादा तवज्जो देकर ‘विपक्ष’ बनाया गया। इतना ही नहीं, पीआरडी की राजनीतिक चुनौती को कुंद करने के लिए बिल्कुल उसी के सुर में मजदूर-किसान हित और व्यवस्था परिवर्तन की बात करने वाली पीटी (पार्तिदो दे लोस त्राबाखादोरेस-मजदूर दल) को रातों-रात सनसनीखेज तरीके से देश का ‘हीरो’ बना दिया गया! यह और बात है कि इस पार्टी का न तो पहले कभी नाम सुना गया था और न ही देश में इसका कोई संगठन था! यह सब करते हुए बाकी खबरें (हां, कहने के लिए तो वे खबरें ही थी!) भी पीआरआई की जीत के हिसाब से तय हो रहीं थी। मसलन, चुनाव से ठीक पहले सर्बिया-बोस्निया गृहयुद्ध और दूसरे देशों के अंदरूनी झगड़ों को बार-बार बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया। इशारा साफ था, अगर मेक्सिको को टूटने या कमजोर होने से बचाना है, तो देशवासियों को ‘अनुभवी’ और ‘सबको साथ लेकर चलने वाली’ पीआरआई का साथ देना ही चाहिए! यहां पीआरडी, जिसके हजारों कार्यकर्ता सरकारी हिंसा का शिकार हुए, और चियापास में भूमिहीन मूलवासियों के हथियारबंद सापातिस्ता आंदोलन को बतौर ‘खलनायक’ पेश किया गया।   

तेलेवीसा की अगुआई में बड़ी मीडिया की इन सब कलाबाजियों का नतीजा