
प्रदीपजी
वहां जाने के बाद उन्होंने सेना में नौकरी कर ली, जहां से उन्हें दक्षिण अफ्रीका भेज दिया गया. सन 1899 से 1902 के बीच दक्षिण अफ्रीका के “बायर” युद्ध में उन्होंने भाग लिया. इसी बीच वहां पर वेंकैय्या साहब क़ी मुलाकात महात्मा गांधी से हो गई, वे उनके विचारों से काफी प्रभावित हुए, स्वदेश वापस लौटने पर मुंबई (तब मुंबई को बम्बई कहा जाता था) में रेलवे में गार्ड की नौकरी में लग गए. इसी बीच मद्रास (जिसे अब चेन्नई के नाम से पुकारते हैं) में प्लेग नामक महामारी के चलते कई लोगों की मौत हो गई, जिससे उनका मन व्यथित हो उठा और उन्होंने वह नौकरी भी छोड़ दी. वहां से मद्रास में प्लेग रोग निर्मूलन इंस्पेक्टर के पद पर तैनात हो गए.
पिंगली वेंकैय्या का संस्कृत, उर्दू एवं हिन्दी आदि भाषाओं पर अच्छी पकड़ थी. इसके साथ ही वे भू-विज्ञान एवं कृषि के अच्छे जानकर भी थे. बात सन 1904 की है, जब जापान ने रूस को हरा दिया था. इस समाचार से वे इतना प्रभावित हुए की उन्होंने तुरंत जापानी भाषा सीख ली. उधर महात्मा गांधी जी का खड़ी आन्दोलन चल ही रहा था, इस आन्दोलन ने भी पिंगली वेंकैय्या के मन को बदल दिया. उस समय उन्होंने अमेरिका से कम्बोडिया नामक कपास की बीज का आयात और इस बीज को भारत के कपास बीज के साथ अंकुरित कर भारतीय संकरित कपास का बीज तैयार किया. जिसे (उनके इस शोध कार्य के लिये ) बाद में “वेंकैय्या कपास” के नाम से जाना जाने लगा.
उधर ब्रिटिश सरकार ने स्वर्गीय पिंगली वेंकैय्या कों “रायल एग्रीकल्चरल सोसायटी ऑफ़ लन्दन” का सदस्य के रूप में मनोनीत कर उनके गौरव को बढाया. सन 1906 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन कलकत्ता में हुआ, जिसकी अध्यक्षता “ग्रेंड ओल्ड मैन” के नाम से पहचाने जाने वाले दादा भाई नौरोजी ने की थी, इस सम्मेलन में दादा भाई नौरोजी ने पिंगली वेंकैय्या के द्वारा निःस्वार्थ भाव से किये गए कार्यों की सरहना की, बाद में उन्हें राष्ट्रीय कांग्रेस का सदस्य मनोनीत कर दिया गया. कांग्रेस के इस अधिवेशन में “यूनियन जैक” का झंडा फहराया गया था, जिसे देख कर पिंगली वेंकैय्या का मन द्रवित हो उठा.
उसी दिन से वे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की संरचना में लग गए. 1916 में उन्होंने “ए नेशनल फ्लैग फार इण्डिया” नामक एक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमे उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज के तीस नमूने प्रकाशित किये थे. पांच साल बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बैठक सन 1921 में विजयवाड़ा में हुई तो उसमे महात्मा गांधी ने सभी को पिंगली वेंकैय्या द्वारा तैयार किये गए राष्ट्रीय ध्वज के चित्रों की जानकारी दी. इसी बैठक में पिंगली वेंकैय्या द्वारा बनाये गए राष्ट्रीय ध्वज क़ी डिजाईन को महात्मा गांधी ने मान्यता दी.
इस सन्दर्भ में महात्मा गांधी ने “यंग इण्डिया” नामक अख़बार के सम्पादकीय में “आवर नेशनल फ्लैग” शीर्षक से लिखा कि राष्ट्रीय ध्वज के लिये हमें बलिदान देने को तैयार रहना चाहिए. वे आगे लिखते हैं कि मछलीपट्टनम के आन्ध्रा कालेज के पिंगली वेंकैय्या ने देश के झंडा के सन्दर्भ एक पुस्तक प्रकाशित क़ी है, जिसमे उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय ध्वज से सम्बंधित अनेकों चित्र प्रकाशित किए हैं, जिसके लिये मैं उनके श्रम को देखते हुए उनका आदर करता हूं.
गांधी जी अपने सम्पादकीय में आगे लिखते हैं, “जब मैं विजयवाड़ा के दौरे पर था उस दौरान पिंगली वेंकैय्या ने मुझे हरा एवम लाल रंगों से बने बिना चरखों वाले कई चित्र बनाकर दिए थे. हर झंडे की रूप-रेखा पर उन्हें कम से कम तीन घंटे तो लगे ही थे. मैंने उन्हें एक झंडे में बीच में सफ़ेद रंग की पट्टी डालने की सलाह दी, जिसका उद्देश्य था कि सफ़ेद रंग सत्य व अहिंसा का होता है. उन्होंने इसे तुरंत मान लिया.” इसी के बाद पिंगली वेंकैय्या द्वारा किये गए झंडे का नाम “झंडा वेंकैय्या” लोगों के बीच लोक प्रिय हो गया.
चार जुलाई, 1963 कोपिंगली वेंकैय्या का निधन हो गया. भारतीय डाक-तार विभाग ने 12 अगस्त, 2009 को यानी उनके निधन के पूरे 46 साल बाद स्वर्गीय पिंगली वेंकैय्या पर एक पांच रुपये का डाक टिकट जारी किया. सीमित संख्या में जारी इस डाक टिकट को महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले के वरिष्ट पत्रकार एवं डाक-टिकट संग्रहकर्ता मोती चांद मुथा के पास देखा जा सकता है. दुख तो इस बात का है कि स्वर्गीय पिंगली वेंकैय्या द्वारा किये गए कार्य की न तो भारत सरकार ने और ना ही कांग्रेस ने सही ढंग से आदर दिया है.
लेखक प्रदीप श्रीवास्तव निजामाबाद से प्रकाशित हिन्दी दैनिक स्वतंत्र वार्ता के स्थानीय संपादक हैं.

