जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक बेवकूफियों का पर्व

शेष जी : जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री में राजनीतिक समझ है ही नहीं : जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री, उमर अब्दुल्ला के ताज़ा बयानों से  लगता है कि वे अपना दिमागी संतुलन खो बैठे हैं और जम्मू-कश्मीर के बारे में अंट-शंट बोल रहे हैं. उन्होंने विधानसभा में कहा कि जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय एक संधि के तहत था और देश की राजनीतिक पार्टियों ने उस संधि को ख़त्म कर दिया है और कश्मीर के लोग इस से बहुत नाराज़ हैं. विधान सभा में उमर अब्दुल्ला गुस्से में थे और बीजेपी वालों के हल्ले-गुल्ले के जवाब में अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे. गैर ज़िम्मेदार बात को आगे बढाते हुए उमर ने कहा कि हम दोनों से उम्मीद की गयी थी कि हम समझौते का सम्मान करेगें. उन्होंने कहा कि जम्मू- कश्मीर का भारत में विलय नहीं हुआ था, वह एक संधि थी.

उन्होंने ज्ञान दिया कि जूनागढ़ और हैदराबाद के भारत में विलय की बात जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं होती. उन राज्यों का मामला अलग था, जम्मू-कश्मीर के राजा की संधि उस से अलग थी. उसी भाषण में आपने फरमाया कि जम्मू-कश्मीर की समस्या के हल के लिए एक राजनीतिक प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए, जिसके बाद ही राज्य का विलय भारतीय गणराज्य में पूरा होगा. अभी यह अधूरा है. उमर अब्दुल्ला की बातों में कोई सच्चाई नहीं है. और ज़रूरी का है कि इतिहास को कोई विद्यार्थी उन्हें पकड़कर जम्मू-कश्मीर के इतिहास की जानकारी दे. उनकी सबसे बड़ी गलती तो यह है कि वे कह रहे हैं कि वह विलय के दस्तावेज़ को संधि मान रहे हैं. उनको पता होना चाहिए कि जिस कागज़ पर जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह और भारत के गवर्नर जनरल, माउंटबेटन ऑफ़ बर्मा ने दस्तखत किया था, उसके दूसरे पैराग्राफ में ही लिखा है कि वह इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ ऐक्सेशन था यानी विलय का दस्तावेज़ था. यह वही कागज़ है जिस पर बाकी सैकड़ों राजाओं ने दस्तखत किया था और उस दस्तावेज़ का प्रोफार्मा सरदार पटेल के झोले में हमेशा मौजूद रहता था. वह टाइप किया हुआ कागज़ था. उसी पर राजा ने दस्तखत किया था और अपना नाम और अपने राज्य का नाम कलम से लिखा था.

जम्मू-कश्मीर के मामले में थोड़ी रियायत दी गयी थी, क्योंकि ख़तरा यह था कि राज हरि सिंह और उनकी जेबी राजनीतिक पार्टी, प्रजा परिषद् पाकिस्तान से बात करके स्वतंत्र रहने का षड्यंत्र कर रहे थे. उनकी इसी योजना पर पाबंदी लगाने के लिए यह कह दिया गया था कि विलय पर जम्मू-कश्मीर की जनता से मंजूरी ली जायेगी. यह भारत के पक्ष में था क्योंकि राजा के कुछ चापलूसों को छोड़कर बाकी पूरी कश्मीरी जनता, शेख अब्दुल्ला के साथ थी और शेख साहेब की कोशिश से ही जम्मू-कश्मीर का विलय भारत में हुआ था. यह अलग बात है कि प्रजा परिषद् और उसकी उत्तराधिकारी पार्टी ने राज्य में माहौल इतना खराब कर दिया कि सब कुछ बर्बाद हो गया, लेकिन बात इतनी खराब कभी नहीं हुई थी कि जम्मू-कश्मीर का कोई अज्ञानी नेता यह कह दे कि राज्य का विलय भारत में पूरी तरह से नहीं हुआ था.

जब 26 अक्टूबर 1947 के दिन राजा ने विलय के दस्तावेज़ पर दस्तखत  किया, उसके बाद ही भारत की सेना को श्रीनगर भेजा गया और पाकिस्तानी सेना की अगुवाई में श्रीनगर की ओर बढ़ रहे लूट-पाट करते कबायलियों को वापस खदेड़ा जा सका. बस उस वक़्त गलती यह हुई कि सीजफायर हो गया और कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में रह गया. आज जो कश्मीर समस्या है वह उसी हिस्से को भारत में वापस लेने की है. यह बात जम्मू-कश्मीर के मौजूदा मुख्यमंत्री और राहुल गांधी के भक्त उमर अब्दुल्ला की समझ में आ जानी चाहिए. अपने बयान में जम्मू-कश्मीर के मौजूदा मुख्यमंत्री ने एक और भी मूर्खतापूर्ण बात की है. फरमाते हैं कि जम्मू-कश्मीर की मौजूदा समस्या का हल करने के लिए बाकायदा राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने की ज़रूरत है,  जिसमें पाकिस्तान को भी शामिल करने की ज़रूरत है. यह उनकी गैरज़िम्मेदार समझ की हद है.

उन्हें मालूम होना चाहिए कि 26 अक्टूबर 1947  के दिन जब राजा ने भारत के साथ विलय के कागजों पर दस्तखत किया था तो वह काम उन्होंने एक राजनीतिक प्रक्रिया के अंत में ही किया था. महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और शेख अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के लिए जो भी काम किया था, वह सब राजनीति ही थी. उसके बाद से ही वह राज्य भारत का हिस्सा है. हां यह भी सही है कि जम्मू-कश्मीर को थोड़ा अलग दर्ज़ा दिया गया है, लेकिन वह भारतीय संविधान के हिसाब से दिया गया है. उसके बाद जम्मू-कश्मीर की हर समस्या भारत की समस्या है. जहां तक जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान के शामिल होने की बात है वह केवल पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाके के लिए है और वह जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री के कार्य क्षेत्र के बाहर है.

इसलिए जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री के इस गैर-जिम्मेदार बयान की निंदा की जानी चाहिए. कांग्रेस ने भी जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद जम्मू-कश्मीर में सन्दर्भ में गैर-ज़िम्मेदार राजनीति का पालन किया है, जिसकी वजह से वहां हालात बद से बदतर होते गए. 1977 में स्वर्गीय जयप्रकाश नारायण की सकारात्मक पहल के बाद दिल्ली के सभी नेताओं का रवैया कश्मीर के प्रति गैर-ज़िम्मेदारी का रहा है. इंदिरा गांधी, अरुण नेहरू, फारूक अब्दुल्ला, मुफ्ती मुहम्मद सईद, जगमोहन आदि कश्मीर में बिगड़ी हालात के लिए बहुत बड़े पैमाने पर ज़िम्मेदार हैं. पिछले विधानसभा चुनावों  में एक और अवसर आया था, जब आतंकवादियों और अलगाववादियों की गोलियों की परवाह किये बिना कश्मीरी जनता ने वोट डाला था. लेकिन उमर अब्दुल्ला ने उसे भी गंवा दिया.

इस आदमी में नेतृत्व का कोई गुण ही नहीं है. जब किन्हीं कारणों से नाराज़ नौजवानों ने पत्थर फेंकना शुरू किया तो इनको चाहिए था कि उनके नेताओं को तलाशें और उनसे बात करें. अगर यही काम उमर ने कर लिया होता तो अलगाववादी बिलकुल हाशिये पर आ जाते लेकिन इनकी गफलत के चलते सब कुछ खराब हो गया. अब उन पत्थर फेंकने वालों का कंट्रोल पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के हाथ में है. ज़ाहिर है उमर अब्दुल्ला की राजनीतिक अदूरदर्शिता के कारण यह हाल हुए हैं. तकलीफ की बात यह है कि देश भर के कांग्रेसी जिस राहुल गांधी की जय-जयकार कर रहे हैं, वह भी अपने जिद पर अड़े हुए हैं और उमर अब्दुल्ला की तारीफ कर रहे हैं. देश का दुर्भाग्य यह भी है कि खानदानी सत्ता को स्थापित करने की कांग्रेस की कोशिश को किसी भी राजनीतिक दल से कारगर चुनौती नहीं मिल रही है. सभी पार्टियों में अपने वंशजों को राजा बनाने की होड़ लगी हुई है. ऐसी हालत में शेख अब्दुल्ला की तीसरी पीढी और जवाहरलाल नेहरू की चौथी पीढी मिलकर कश्मीर की समस्या को बद से बदतर बना रहे हैं और देश की एक अरब से ज्यादा जनता ठगी सी खडी है और और हाथ मल रही है.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

अपने मोबाइल पर भड़ास की खबरें पाएं. इसके लिए Telegram एप्प इंस्टाल कर यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *