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‘पद के लिए जज ने सुनाया था मेरे खिलाफ यह फैसला’

शेष नारायण सिंह: फासिस्ट नेता ने लगाया सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज पर गंभीर आरोप : फासिज्म अपेक्षाकृत एक नयी राजनीतिक विचारधारा है लेकिन यूरोप में इसका कई बार सत्ता हथियाने और चलाने में इस्तेमाल हो चुका है. मोटे तौर पर नीत्शे के दर्शन पर आधारित फासिस्ट राजनीति के नारे कमज़ोर दिमाग और कमज़ोर मनोबल के लोगों को खासे लुभावने लगते हैं. नीत्शे खुद ही शारीरिक रूप से बहुत कमज़ोर थे लेकिन ताक़त के बल पर राज करने के दर्शन को राजनीतिक विचारधारा बनाने में सफल रहे. उनके सबसे काबिल अनुयायी, हिटलर भी बहुत ही मामूली ताक़त के इंसान थे, और अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए धौंसपट्टी का सहारा लेते थे. जब उन्हें राजनीतिक सत्ता मिली तो अपनी उसी कमजोरी को उन्होंने राज करने का तरीका बनाया और हिटलर बन गए.

शेष नारायण सिंह: फासिस्ट नेता ने लगाया सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज पर गंभीर आरोप : फासिज्म अपेक्षाकृत एक नयी राजनीतिक विचारधारा है लेकिन यूरोप में इसका कई बार सत्ता हथियाने और चलाने में इस्तेमाल हो चुका है. मोटे तौर पर नीत्शे के दर्शन पर आधारित फासिस्ट राजनीति के नारे कमज़ोर दिमाग और कमज़ोर मनोबल के लोगों को खासे लुभावने लगते हैं. नीत्शे खुद ही शारीरिक रूप से बहुत कमज़ोर थे लेकिन ताक़त के बल पर राज करने के दर्शन को राजनीतिक विचारधारा बनाने में सफल रहे. उनके सबसे काबिल अनुयायी, हिटलर भी बहुत ही मामूली ताक़त के इंसान थे, और अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए धौंसपट्टी का सहारा लेते थे. जब उन्हें राजनीतिक सत्ता मिली तो अपनी उसी कमजोरी को उन्होंने राज करने का तरीका बनाया और हिटलर बन गए.

मुसोलिनी, अगस्तस पिनोशे, फ्रांको सब के सब तानाशाह इसी परम्परा के शासक रहे हैं. जो फासिस्ट नेता, सत्ता के शिखर तक पंहुच जाते हैं उन्हें तो दुनिया जान जाती है लेकिन जो फासिस्ट राजनेता या तो किसी अपराध में सज़ा पाकर जेल की हवा खाते हैं या किसी अन्य कारण से सत्ता के पास नहीं फटक पाते, उन्हें कोई नहीं याद रखता. लेकिन उनकी सोच होती फासिस्ट ही है और वे उसका अनुसरण अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में  करते रहते हैं. हर काल में और हर देश में इस तरह के नेताओं का प्रादुर्भाव होता रहता है. फासिस्ट की सबसे बड़ी खासियत होती है कि वह अपने विरोधी को तबाह करके ही विजय हासिल करता है. वह लोकतंत्र में विश्वास नहीं करता और राजनीतिक विरोध की किसी भी संभावना को किसी भी तरीके से ख़त्म करने के लिए कुछ भी कर डालता है. अपनी गलत सोच को सही साबित करने के लिए वह लोकतंत्र के सभी खम्भों का अपने लिए इस्तेमाल करना चाहता है.

विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में वह अपने जैसे लोगों को देखना चाहता है और अगर उसका कोई विरोधी नियमानुसार वहां पहुंच जाए तो उसे तबाह करके उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर उसे नेस्तनाबूद करने की कोशिश करता है. फासिस्ट की कोशिश रहती है कि अगर लोकतंत्र के संविधान सम्मत संस्थान उसके खिलाफ कुछ कहें तो उन संस्थानों की विश्वसनीयता पर इतने सवाल खड़े कर दिए जाएँ कि उनके फैसले ही शंका के घेरे में आ जाएँ. बृहस्पतिवार को भारत के सर्वोच्च न्यायालय में कुछ ऐसा ही आलम था.  गुजरात में किसी फर्जी मुठभेड़ के मामले में पकडे गए राज्य के पूर्व मंत्री, अमित शाह ने सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों के खिलाफ ही अभियान शुरू कर दिया. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी ८९ पेज की याचिका में आरोप लगाया कि उसी कोर्ट के एक पूर्व जज ने १२ जनवरी को २०१० को जो आदेश दिया था, वह न्यायसंगत नहीं था.

उनका आरोप है कि उस वक़्त के माननीय न्यायाधीश ने अपने आप को पीएफ घोटाले से बचाने और रिटायर होने के बाद कोई काम मिल जाने के केंद्र सरकार के वायदे के बाद वह आर्डर लिखा था. उनका आरोप है कि उस फैसले को लिखने वाले माननीय न्यायाधीश ने  पूर्वाग्रह पूर्ण फैसला दिया था. याचिका में लिखा है कि वह आर्डर एक त्रिपक्षीय समझौते का नतीजा है. जिसके तहत उस फैसले के लेखक जज को केंद्र सरकार ने रिटायर होने के बाद किसी नौकरी का वादा किया था, सीबीआई की ओर से पीएफ घोटाले में चार्ज शीट से मुक्ति का वचन दिया था और जज ने केंद्र सरकार की मर्जी का फैसला सुनाया था. इस याचिका को दाखिल करने वाले नेता ने चिली के पूर्व तानाशाह अगस्टस पिनोशे के किसी केस से अपने मामले की तुलना की है. भला बताइये जिस पिनोशे, हिटलर और मुसोलोनी से कोई भी अपने आपको नहीं जोड़ता उसी फासिस्ट पिनोशे के उदाहरण के सहारे यह नेता अपने को भला आदमी साबित करने की कोशिश कर रहा है.

सुप्रीम कोर्ट पर यह आरोप लगाने वाले नेता और कोई नहीं गुजरात के पूर्व मंत्री अमित शाह हैं, जो आजकल किसी फर्जी मुठभेड़ में साज़िश करने के मामले में जेल में हैं और उनके बारे में अखबारों में छपता रहा है कि वे सुपारी लेकर हत्या करने के मामलों में भी लिप्त पाए गए हैं. इन आरोपों की जांच चल रही है. उसी जांच से बचने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जज पर इतना संगीन आरोप लगाया है. लेकिन इन आरोपों को कोई गंभीरता से नहीं ले रहा है. सबको मालूम है कि इस नेता को अब पता है कि वह इतने गंभीर आरोपों से बच तो सकता नहीं, उसे सज़ा मिलने की पूरी संभावना है. इसलिए अपनी कुर्बानी देकर वह अपनी पार्टी के उस एजेंडा को पूरा कर रहा है, जिसके तहत लोकतंत्र के एक अहम खम्भे, न्यायपालिका को तबाह किया जा सके. देश के एक बड़े प्रतिष्ठित अखबार ने इस खबर को प्रमुखता से छापा है, लेकिन बाकी अखबारों में इसका ज़िक्र नहीं है. ज़रुरत इस बात की है कि इस मंत्री के इस दुस्साहस को मीडिया गंभीरता से ले और लोकतंत्र के चौथे खम्भे के रूप में अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करे.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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