मुंबई हमलों के अपराधी को बचा रही है सीआईए

शेष नारायण सिंहअमरीकी नागरिक डेविड कोलमैन हेडली ने 26 नवम्बर 2008 के दिन मुंबई के ताजमहल होटल और उसके आस पास  हुए हमलों में अपने शामिल होने की बात स्वीकार करके यह बात साबित कर दिया है कि अमरीका अभी भारत को अपना शत्रु ही मानता है. यह बात ख़ास तौर से सच होती लगती है कि हेडली अमरीकी सरकार में नौकर है और पिछले कई महीने से अमरीकी की खुफिया एजेंसियां उसे बचाने की जी तोड़ कोशिश कर रही हैं. मुंबई में हमला  करने वाले आतंकवादियों की  डिजाइन  ऐसी थी कि भारत की व्यापारिक राजधानी को दहशत की ज़द में लिया जा सके. हमला लगभग उसी शैली का था जैसा अमरीका के वर्ड ट्रेड टावर पर किया गया था.

बड़े पैमाने पर नुकसान करने की योजना के साथ किया गया मुंबई हमला आतंकवाद की बड़ी घटना है. लेकिन अब इसमें अमरीकी तार जुड़ गए हैं तो यह और बड़ी घटना मानी जायेगी. मुंबई हमले के शुरू के दौर में ही यह बात साफ़ हो गयी थी कि इतने बड़े पैमाने पर विनाश करने की योजना किसी मामूली दिमाग की उपज नहीं हो सकती .इसमें बड़े गैंग  शामिल हैं, यह बात सब को मालूम थी. लेकिन भारत से दोस्ती की नयी पींगें बढ़ा रहे अमरीका की सरकार के लोग इसमें शामिल होंगें, यह शक  आम तौर पर नहीं किया जा रहा था. अब जब धीरे धीरे सच्चाई सामने आ रही है तो पता लग रहा है  कि अमरीकी विदेश नीति के कर्ता धर्ता भारत को चैन से नहीं बैठने देना चाहते.

अमरीकी शहर शिकागो की मुकामी आदालत में हेडली के इक़बालिया बयान का मतलब यह है कि उसने भारत के खिलाफ आतंकवादी साज़िश बनायी भी थी और उसे अंजाम तक पहुंचाया भी था. पूरा अमरीकी अमला उसे निश्चित मृत्युदंड  से बचाने के काम में जुट गया है जिसका मतलब यह है कि वह अमरीकी सी आई ए के डर्टी ट्रिक विभाग का ख़ास बंदा है. भारत पर दबाव बनाने की गरज से किया गया यह हमला पकिस्तान की विदेश नीति को धार देने में कारगर साबित हुआ लेकिन अब लगता है कि अमरीकी विदेश नीति के योजना कारों की चाल भी यही थी कि भारत पर दबाव डाला जाए जिस से उसे पाकिस्तान के सामने थोडा झुकाया जा सके. लगता है कि अमरीकी  और पाकिस्तानी विदेश नीति का वह लक्ष्य तो हासिल नहीं हो सका, उलटे आतंकवाद के पक्षधर के रूप में पहचाने जाने के खतरे के बीच घिरे अमरीकी नीति नियामक मुसीबत में फंस गए लगते हैं. हेडली का बाप अमरीका का नागरिक बनने के पहले एक पाकिस्तानी अफसर रह चुका था. शुरू के दौर में अमरीका की कोशिश  थी कि भारत पर हुए २६/११ के हमले को शुद्ध रूप से पाकिस्तानी कारस्तानी साबित करके पल्ला झाड  लिया जाए लेकिन मीडिया में हेडली की पोल खुल जाने के बाद मामला अमरीकी हुकूमत की काबू के बाहर चला गया.अब इस बात में शक नहीं है कि मुंबई हमलों में अमरीकी खुफिया एजेंसियों  का हाथ भी था. जहां तक पाकिस्तान के शामिल होने की बात है, उसमें तो कोई शक है ही नहीं.

भारत को कमज़ोर करने की अमरीकी डिजाइन को समझने के लिए समकालीन इतिहास के कुछ पन्ने पलटने होंगें. दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब अमरीका एक मज़बूत देश होकर उभरा तो उसकी इच्छा थी कि वह एशिया के नवस्वतंत्र राष्ट्रों को अपने साथ ले लेगा. शीत  युद्ध के बीज बोये जा चुके थे, पूरा विश्व  दो खेमों में बँट रहा रहा था, कोई अमरीका के साथ जा रहा था, तो कोई सोवियत रूस के साथ. अमरीकी विदेश नीति की कोशिश थी कि भारत को  अपना साथी  बना लिया जाए जिसका इस्तेमाल रूस और चीन के खिलाफ हो सकता था  लेकिन अमरीका का दुर्भाग्य था कि उस वक़्त देश का नेतृत्व जवाहर लाल नेहरू के हाथ में था जो किसी भी अमरीकी राजनीतिक चिन्तक और दार्शनिक पर भारी पड़ते. नेहरू ने गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की बुनियाद रख दी और बड़ी संख्या में नवस्वतंत्र देशों को अमरीका के खेमे में जाने से रोक दिया .उसके बाद के अमरीकी प्रशासकों ने इस बात का बुरा माना और भारत से दुश्मनी साधना शुरू कर दिया. भारत हाथ नहीं आया तो उन लोगों ने भारत को भौगोलिक रूप से लिहाज़ से घेरने के चक्कर में पाकिस्तान को अपनी चेलाही में ले लिया.

उन दिनों आज का बांगला देश भी पकिस्तान का ही हिस्सा था. ज़ाहिर है भारत के दोनों तरफ  अमरीका की हमदर्द फौजें तैनात थी लेकिन भारत की विदेश नीति और सीमाओं की रक्षा की नीति दुरुस्त थी और पाकिस्तान ने जितनी बार भी भारत  पर हमला किया, उसे मुंह की खानी पड़ी. 1965 और 1971 में भारत के खिलाफ पकिस्तान की  लड़ाई में अमरीकी शह की मात्रा भी थी  लेकिन हर बार पकिस्तान का ही नुकसान हुआ. सोवियत रूस के ढह जाने के बाद तो हालात बिलकुल बदल गए. शीत युद्ध ख़त्म हो गया, अमरीका दुनिया का सबसे ताक़तवर देश बन गया. भारत की  विदेश नीति ने भी  हिचकोले खाए और दक्षिण पंथियों के प्रभाव में आकर वह भी धीरे धीरे अमरीकापरस्ती के रास्ते पर चल निकली. अफगानिस्तान के आतंक के केन्द्रों के तबाह करने के लिए एक बार फिर अमरीका पकिस्तान  को धन दे रहा है लेकिन अब वह भारत से दोस्ती भी करना चाहता है. अफ़सोस की बात है कि इस दोस्ती में भी वह खेल शातिराना ही रख रहा है. भारत पर तरह तरह के दबाव बनाकर उसे कमज़ोर दोस्त बनाने  की अमरीका की कोशिश को किसी भी हालत में सही नहीं ठहराया जा सकता.अगर अमरीका चाहता है कि भारत से अच्छे सम्बन्ध बनें तो उसे फ़ौरन हेडली को भारत के हवाले करना चाहिए क्योंकि उसने भारत पर हुए कई हमलों में अपने शामिल होने की बात को कुबूल किया है. वह वास्तव  में भारत का दुश्मन है और उसे बचाने की कोशिश करके अमरीका भारत विरोधी काम कर रहा है. एक बार अगर हेडली भारत की जांच एजेंसियों के कब्जे में आ गया तो पाकिस्तानी सरकार और  वहां की फौज को  मुंबई हमलों का अपराधी साबित करना बहुत आसान हो जाए.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क sheshji@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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