हैदराबाद के दंगे प्रापर्टी डीलरों ने करवाए थे

[caption id="attachment_2300" align="alignleft"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]आरएसएस की दंगे फैलाने की योजना बन चुकी है और राष्ट्र को चाहिए कि इससे सावधान रहे : हर दंगे की तरह, मार्च में हैदराबाद में हुआ दंगा भी निहित स्वार्थ वालों ने करवाया था. नागरिक अधिकारों के क्षेत्र में सक्रिय कार्यकर्ताओं ने पता लगाया है कि २३ मार्च से २७ मार्च तक चले दंगे में ज़मीन का कारोबार करने वाले माफिया का हाथ था. यह लोग बीजेपी, मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन और टीडीपी के नगर सेवकों को साथ लेकर दंगों का आयोजन कर रहे थे. सिविल लिबर्टीज़ मानिटरिंग कमेटी, कुला निर्मूलन पुरता समिति, पैट्रियाटिक डेमोक्रेटिक मूवमेंट, चैतन्य समाख्या और विप्लव रचैतुला संगम नाम के संगठनों की एक संयुक्त समिति ने पता लगाया है कि दंगों को शुरू करने में मुकामी आबादी का कोई हाथ नहीं था. शुरुआती पत्थरबाजी उन लोगों ने की जो कहीं से बस में बैठ कर आये थे.

सवा करोड़ की रोटी खा जाते हैं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री

[caption id="attachment_2293" align="alignleft" width="85"]शेषजीशेषजी[/caption]मुंबई : महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री मिल कर साल में सवा करोड़ रुपये का खाना खा जाते हैं और इसका भुगतान उनकी अपनी कमाई से नहीं, सरकारी खजाने से होता है. इसके लिए बाकायदा सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से टेंडर निकाल कर इंतज़ाम किया जाता है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के निवास, ‘वर्षा’ और उप मुख्यमंत्री के निवास ‘रामटेक’ नामक बंगलों में साल भर के खाने का खर्च एक करोड़ पचीस लाख के करीब आता है. यह तो एक सरकारी अंदाज़ पर आधारित है. सच्च्चाई यह है कि इस अनुमान में करीब 10 फीसदी की वृद्धि भी हो सकती है. सरकारी खजाने से खाने का यह खर्च कोई चोरी छुपे नहीं होता.

मुंबई हमलों के अपराधी को बचा रही है सीआईए

[caption id="attachment_2202" align="alignleft"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]अमरीकी नागरिक डेविड कोलमैन हेडली ने 26 नवम्बर 2008 के दिन मुंबई के ताजमहल होटल और उसके आस पास  हुए हमलों में अपने शामिल होने की बात स्वीकार करके यह बात साबित कर दिया है कि अमरीका अभी भारत को अपना शत्रु ही मानता है. यह बात ख़ास तौर से सच होती लगती है कि हेडली अमरीकी सरकार में नौकर है और पिछले कई महीने से अमरीकी की खुफिया एजेंसियां उसे बचाने की जी तोड़ कोशिश कर रही हैं. मुंबई में हमला  करने वाले आतंकवादियों की  डिजाइन  ऐसी थी कि भारत की व्यापारिक राजधानी को दहशत की ज़द में लिया जा सके. हमला लगभग उसी शैली का था जैसा अमरीका के वर्ड ट्रेड टावर पर किया गया था.

हार मानने को मजबूर हुए आरएसएस वाले

[caption id="attachment_2202" align="alignleft"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]राजनीतिक एकजुटता और जन जागरण में सांस्कृतिक हस्तक्षेप की भूमिका : 21 साल पहले सफ़दर हाशमी को दिल्ली के पास एक औद्योगिक इलाके में मार डाला गया था. वे मार्क्सवादी कमुनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता थे. उनको मारने वाला एक मुकामी गुंडा था और किसी लोकल चुनाव में कांग्रेसी उम्मीदवार था. अपनी मौत के समय सफ़दर एक नाटक प्रस्तुत कर रहे थे. सफ़दर हाशमी ने अपनी मौत के कुछ साल पहले से राजनीतिक लामबंदी के लिए सांस्कृतिक हस्तक्षेप की तरकीब पर काम करना शुरू किया था. कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाले बहुत सारे बड़े लोगों को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहे थे वे. सफ़दर की मौत के बाद दिल्ली और फिर पूरे देश में ग़म और गुस्से की एक लहर फूट पड़ी थी. जो काम सफ़दर करना चाहते थे और उन्हें कई साल लगते. पर एकाएक उनकी मौत के बाद वह काम स्वतः स्फूर्त तरीके से बहुत जल्दी हो गया.

बुश और ब्लेयर के झूठ का एजेंट था पश्चिमी मीडिया

[caption id="attachment_2202" align="alignleft"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]जब अमरीका ने इराक पर हमला किया था तो उसकी दुम की तरह एक और प्रधानमंत्री उसके पीछे पीछे लगा हुआ था. वह अमरीकी राष्ट्रपति बुश की हर बात पर हाँ में हाँ मिला रहा था. उस वक़्त के ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर इतनी शेखी में थे कि लगता था कि वे दुनिया बदल देंगे,  इराक के सद्दाम हुसैन को हटाकर इंसानियत को तबाही से बचा लेंगें. झूठ के सहारे मीडिया में ऐसी ऐसी ख़बरें छपवा दी थीं कि लगता  था कि अगर सद्दाम हुसैन को ख़त्म न किया गया तो दुनिया पर पता नहीं क्या दुर्दिन आ जाएगा.  उन्होंने अपने लोगों और पूरी दुनिया को बता रखा था कि इराक के पास सामूहिक संहार के हथियार थे और अगर इराक को फ़ौरन तबाह न किया गया तो सद्दाम हुसैन  ४५ मिनट के अन्दर ब्रिटेन पर हमला कर सकते हैं.

परंपरागत दुश्मन को बनाया दोस्त

[caption id="attachment_2202" align="alignleft"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]जलवायु परिवर्तन पर होने वाले कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन में भारत को चीन की अगुवाई मंज़ूर : अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में आजकल सबसे अहम् मुद्दा जलवायु परिवर्तन का है. विकसित देशों में सघन औद्योगिक तंत्र की वजह से वहां प्रदूषण करने वाली गैसें बहुत ज्यादा निकलती हैं. उनकी वजह से पूरी दुनिया को जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान को झेलना पड़ता है. अमरीका सहित विकसित देशों की कोशिश है कि भारत और चीन सहित अन्य विकासशील देशों को इस बात पर राजी कर लिया जाए कि वे अपनी औद्योगीकरण की गति धीमी कर दें जिससे वातावरण पर पड़ने वाला उल्टा असर कम हो जाए. लेकिन जिन विकासशील देशों में विकास की गति ऐसे मुकाम पर है जहां औद्योगीकारण की प्रक्रिया का तेज़ होना लाजिमी है, वे विकसित देशों की इस राजनीति से परेशान हैं.  पिछले कई वर्षों से जलवायु परिवर्तन की कूटनीति दुनिया के देशों के आपसी संबंधों का प्रमुख मुद्दा बन चुकी है.