Gyaneshwar Vatsyayan : आज गुरुवार को पटना की सड़कों पर संख्या में कम ही सही, 'आज' का बैनर देखने को मिला। बड़ा सकून मिला मन को। देश के सैकड़ों बड़े 'आज' की पाठशाला से ही नामचीन बने हैं। मैंने भी 'क, ख, ग' आज में ही जाना। कम संसाधनों में लड़ना 'आज' ही सिखाता रहा है। ठीक है, शार्दूल विक्रम गुप्त की जिद ने 'आज' के प्रभामंडल को सिकोड़ दिया। वे लड़ने को तैयार नहीं हुए, सो लड़ाके काम जानकर भागते रहे।
मीडिया में प्राइस-वार के जन्मदाता भी शार्दूल विक्रम गुप्त ही रहे। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद 'आज' का बंद न होना मन को आलोकित किये रहता है। सुख-सुविधाओं को भोगने के बाद भी जब कभी पुराने साथियों से मिलने 'आज' के दफ्तर में जाना होता है, काठ की पुरानी कुर्सियों को देख मन बाग-बाग हो जाता है। पुराने दिन याद आते हैं, जो ज्यादा आजाद था। खैर, आज टंगे बैनर देख जाना कि तकनीक संपन्न बड़े मीडिया घरानों की कीमत की लड़ाई में 'आज' भले न कदमताल मिलाये, लेकिन खुद को मरने न देने का संकल्प तो ले ही रखा है।
दैनिक भास्कर की आहट में पहले से जमे हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण व प्रभात खबर ने कीमतें घटा दी। सब सवाल कर रहे थे कि अब 'आज' का क्या होगा। खुशी इस बात की है कि माली हालत की चिंता किये बगैर 'आज' एक रुपये का हो गया है। मतलब कापी जितनी रही हो, 'आज' इसे बनाये रखने को जज्बा बनाये हुये है। मालिक-कृपा से कागज और छपाई कुछ ठीक हो जाती, तो प्रसार बढ़ भी सकता था। कैश-सेल में नोटिस करने लायक इजाफा तो हो ही जाता। 'आज' को पटना में जिंदा रखने के लिए संपादकीय टीम के मुखिया दीपक पांडेय की सराहना तो की ही जानी चाहिए। विष्णुकांत, एसएन श्याम और कमलेश कुमार सिंह जैसे पुराने साथी तमाम झंझावात के बाद भी 'आज' छोड़कर कहीं नहीं गये।
दीपक पांडेय का गवाह तो मैं ही रहा हूं। जब दैनिक जागरण, पटना की लांचिंग हो रही थी, तब इन्हें खेल डेस्क पर लेने को सभी कोशिशें हुई थी। दूसरी अच्छी बात है कि पत्रकारों के पाला बदल अभियान के कारण संकट झेल रहे बड़े घराने ठीक से तैयार हुए की खोज में 'आज' की ओर भी झांक रहे हैं। कुछेक को मौका मिला है। 'आज' छोड़ने का गम तो सबों को सताता ही है, लेकिन पैसे तो जीने को चाहिए न। सो, सबों को बेस्ट आफ लक।
पटना के पत्रकार ज्ञानेश्वर वात्स्यायन के फेसबुक वॉल से.





