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‘मेरी 34 सहेलियों ने 8-10 साल की नौकरी के बाद काम छोड़ दिया’

Manisha Pandey : अभी मैं बैठकर कुछ हिसाब लगा रही थी। हिसाब के नतीजे कुछ इस तरह हैं- 1- मेरी 34 सहेलियों ने मीडिया, कॉरपोरेट, आईआईटी और टेलीविजन सीरियल की दुनिया में 8-10 साल की नौकरी के बाद काम छोड़ दिया। नए पैदा हुए बच्चे को पालने के लिए। 34 में से 31 अब तक काम पर लौटकर नहीं गईं। बच्चे की जिम्मेदारियां कभी खत्म ही नहीं होतीं।

Manisha Pandey : अभी मैं बैठकर कुछ हिसाब लगा रही थी। हिसाब के नतीजे कुछ इस तरह हैं- 1- मेरी 34 सहेलियों ने मीडिया, कॉरपोरेट, आईआईटी और टेलीविजन सीरियल की दुनिया में 8-10 साल की नौकरी के बाद काम छोड़ दिया। नए पैदा हुए बच्चे को पालने के लिए। 34 में से 31 अब तक काम पर लौटकर नहीं गईं। बच्चे की जिम्मेदारियां कभी खत्म ही नहीं होतीं।

2- जिन लड़कियों ने बच्चा किया और नौकरी नहीं छोड़ी, वो पागल बनी फिरती हैं। जब भी मिलो, एक ही रोना। काम, काम और काम। मैं बहुत थक गई हूं सब संभालते-संभालते।

3- ऑफिस में स्‍मोकिंग जोन में रोज एक लड़की मिलती है। उसके दो बच्चे हैं। हमेशा थकी-थकी। एक दिन कह रही थी कि मैं डबल शिफ्ट में काम करती हूं। नौ घंटे ऑफिस में और नौ घंटे घर। बच्चों के एग्जाम्‍स आने वाले हैं। घर भागकर उन्हें पढ़ाना है।

4- अपने इतने सालों के कॅरियर में मैंने देखा है कि हर शादीशुदा और बच्‍चों वाली स्‍त्री जल्‍दी से जल्‍दी ऑफिस से छूटकर घर भागना चाहती है। वो कभी खुद इनीशिएटिव लेकर नहीं कहती कि नए प्रोजेक्‍ट की जिम्‍मेदारी मुझे दो। मैं करूंगी। वो सुबह 7 बजे ऑफिस आने और रात 2 बजे तक काम करने को तैयार नहीं होती। घर पर बच्‍चा अकेला है। फैमिली को देखना है। कॅरियर जैसे चल रहा है, चलता रहे। इससे ज्‍यादा नहीं कर सकती।

5- मेरी एक दोस्‍त आईआईटी में बहुत शानदार कॅरियर छोड़कर कॉन्वेंट स्‍कूल में टीचर बन गई। अब उसे बच्चे के लिए ज्‍यादा वक्त मिलता है।

6- एक दोस्त ने नौकरी तो नहीं छोड़ी, लेकिन बाकी सब छोड़ दिया। अब कभी आउट ऑफ स्टेशन किसी सेमिनार में नही जाती। न किताब लिखती है। कई फैलोशिप्‍स मिलीं। इंडिया के बाहर जाना था दो-दो साल के लिए। सब रिजेक्‍ट कर दिया। उसने आगे बढ़ने के सारे ऑफर ठुकरा दिए हैं। बच्चा अभी छोटा है। लेकिन पति की जिंदगी पर कोई फर्क नहीं पड़ा। जनाब अभी-अभी एक साल इस्‍तांबुल रहकर लौटे हैं। पति का नाम है। पत्‍नी की पहचान खो गई।

7- मैं अपनी नौकरीपेशा बहनों को देखा है। घर, नौकरी, बच्चों के बौराई रहती हैं। फोन करो तो बात करने की भी फुरसत नहीं। अभी मैं बेटे को पढ़ा रही हूं। अभी फलां काम कर रही हूं, अभी ढिमका काम कर रही हूं। उसके काम कभी खत्‍म नहीं होते और उसके पास अपने लिए वक्‍त लिए।

ये सब क्‍या है? क्‍या मातृत्‍व का गौरव है? प्रेम का प्रतीक है। न्‍याय, समता, बराबरी का राग है। एक खूबसूरत, मानवीय संसार की झलकियां हैं। आखिर क्‍या है। और जिस लड़की ने ये सब होने से इनकार किया, वो क्रूर हो गई। औरत ही नहीं है वो तो। डायन है, कुलटा है, स्‍वार्थी है। नए जमाने की दुष्‍ट, मॉडर्न लड़की है।

इंडिया टुडे की फीचर एडिटर मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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