Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

ट्रेन में ‘हापुड़ गैंग’ की हरकत से उस परिवार की हंसी छिन गई

घटना लगभग ढाई साल पुरानी है। अचानक दिल्ली जाना था, सो शाम को बरेली पहुंच गया और बरेली से सुबह को जाने वाली इंटरसिटी ट्रेन में बैठ गया। पूरी ट्रेन में अंगुलियों पर गिनने लायक ही लोग थे। मेरे पास एक परिवार बैठा था, जिसमें माता-पिता के अलावा दो बहनें थीं, जिनकी आयु क्रमश: सत्तरह-अठारह वर्ष रही होगी और एक-दो साल आपस में छोटी-बड़ी रही होंगी। चारों लोग आपस में चुटकुले, कहानी आदि कहते हुए बड़े ही आनंदपूर्वक सफर कर रहे थे। उन चारों की मस्ती देख कर मैं भी मन ही मन प्रसन्न था। पता ही नहीं चला कि समय कब गुजर गया?

घटना लगभग ढाई साल पुरानी है। अचानक दिल्ली जाना था, सो शाम को बरेली पहुंच गया और बरेली से सुबह को जाने वाली इंटरसिटी ट्रेन में बैठ गया। पूरी ट्रेन में अंगुलियों पर गिनने लायक ही लोग थे। मेरे पास एक परिवार बैठा था, जिसमें माता-पिता के अलावा दो बहनें थीं, जिनकी आयु क्रमश: सत्तरह-अठारह वर्ष रही होगी और एक-दो साल आपस में छोटी-बड़ी रही होंगी। चारों लोग आपस में चुटकुले, कहानी आदि कहते हुए बड़े ही आनंदपूर्वक सफर कर रहे थे। उन चारों की मस्ती देख कर मैं भी मन ही मन प्रसन्न था। पता ही नहीं चला कि समय कब गुजर गया?

अब ट्रेन पूरी तरह भर चुकी थी। हापुड़ में लडक़ों के कई ग्रुप सवार हुए। अधिकांश ग्रुप इस परिवार के आसपास ही जमा हो गये। सत्तर-अस्सी लडक़ों की खाने वाली नजरों से दोनों लड़कियां सहम गयीं। छिछोरे लडक़ों की फब्तियों से लड़कियों के साथ उनके माता-पिता भी पूरी तरह असहज थे। कुछ देर पहले अपनी हंसी से सबको आकर्षित करने वाला परिवार नीचे नजरें गड़ाये ऐसे बैठा था, जैसे इन्हें सजा दी जा रही हो। उन छिछोरे लडक़ों की हरकतें देख कर मेरी बाहें फडक़ रही थीं। लगभग ऐसी ही हालत अन्य यात्रियों की भी थी, क्योंकि अधिकांश यात्रियों की आंखें उन लडक़ों को घृणा की दृष्टि से ही देख रही थीं।

इधर-उधर देख कर मुझे लगा कि कोई एक व्यक्ति अगर शुरू हो गया, तो बाकी यात्री समर्थन देने को तैयार ही बैठे हैं। ऐसा महसूस होते ही मेरा साहस बढ़ गया, तो मैं उन छिछोरे लडक़ों को घूरने लगा। मेरे देखने से एक-दो लडक़े नजरें चुराते दिखाई दिए, तो मेरा साहस और बढ़ गया। अब मैं बोल पड़ा कि भैया परिवार के साथ आप कभी यात्रा नहीं करते हो। मेरी किस्मत ही थी कि किसी लडक़े ने पलट कर जवाब नहीं दिया, तो मैंने प्रवचन देना शुरू कर दिया। मेरे प्रवचन पर साथी यात्री दमदार समर्थन कर ही रहे थे, सो एक-एक कर वह छिछोरे लडक़े खिसक लिये, लेकिन उस परिवार की, वो हंसी फिर वापस नहीं आई। उन लडक़ों के आने से पहले वह परिवार अंताक्षरी खेल रहा था और वह लड़कियां करीब पांच-छ: साल के बच्चों जैसी हरकतें कर रही थीं, जो सभी को बड़ी प्यारी लग रही थीं। वह घटना मुझे आज तक याद है और कभी भूल भी नहीं पाऊंगा, क्योंकि उस परिवार के चेहरे पर उस समय जो भाव थे, वह शब्दों में बयां नहीं किये जा सकते, लेकिन मेरे ख्यालों में आज भी एक दम ताजा हैं।

बी.पी.गौतम

स्वतंत्र पत्रकार

[email protected]

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...