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मनमोहन सरकार की जिम्‍मेदारी पर क्‍यों नहीं बोले राहुल गांधी?

कांगेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी ने अपनी फ्री स्टाइल की राजनीति के नए-नए प्रयोग शुरू कर दिए हैं। वे राजनीति की तमाम पारंपरिक शैलियों की लक्ष्मण रेखा तोड़ते नजर आते हैं। शायद इसीलिए कि उनकी छवि कुछ अलग किस्म की बन जाए। पार्टी में औपचारिक रूप से उनकी नंबर दो की हैसियत हो गई है। वे पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिए गए हैं। यह नई जिम्मेदारी मिलने के बाद उन्होंने पहली बार उद्योगपतियों के मंच पर अपना आर्थिक नजरिया देश के सामने रखा। इस मौके पर उन्होंने कई ऐसी बातें कहीं, जिससे कि लगे राहुल गांधी कुछ अलग मिट्टी के नेता हैं। वे सत्ता राजनीति में बड़े बदलाव का सपना देख रहे हैं। उन्होंने देश के समग्र विकास के लिए करोड़ों लोगों की हिस्सेदारी की हिमायत की। कह दिया कि महज चंद लोग ही निर्णायक भूमिका में रहेंगे, तो बात नहीं बनेगी।

कांगेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी ने अपनी फ्री स्टाइल की राजनीति के नए-नए प्रयोग शुरू कर दिए हैं। वे राजनीति की तमाम पारंपरिक शैलियों की लक्ष्मण रेखा तोड़ते नजर आते हैं। शायद इसीलिए कि उनकी छवि कुछ अलग किस्म की बन जाए। पार्टी में औपचारिक रूप से उनकी नंबर दो की हैसियत हो गई है। वे पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिए गए हैं। यह नई जिम्मेदारी मिलने के बाद उन्होंने पहली बार उद्योगपतियों के मंच पर अपना आर्थिक नजरिया देश के सामने रखा। इस मौके पर उन्होंने कई ऐसी बातें कहीं, जिससे कि लगे राहुल गांधी कुछ अलग मिट्टी के नेता हैं। वे सत्ता राजनीति में बड़े बदलाव का सपना देख रहे हैं। उन्होंने देश के समग्र विकास के लिए करोड़ों लोगों की हिस्सेदारी की हिमायत की। कह दिया कि महज चंद लोग ही निर्णायक भूमिका में रहेंगे, तो बात नहीं बनेगी।

गुरुवार को राहुल गांधी यहां उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के दो दिवसीय सालाना कार्यक्रम में बोल रहे थे। उन्होंने यह ऐलान किया कि उद्योगपतियों और कारोबारियों की मेहनत के चलते दुनिया भर में भारत की छवि बदली है। नई आर्थिक नीतियों के चलते आर्थिक विकास की रफ्तार भी तेज हुई है। जरूरत इस बात की है कि ये विकास समावेशी हो, इसमें खासतौर पर दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यक वर्गों की भी पूरी भागीदारी सुनिश्चित हो। वरना दूसरी तरह की दिक्कतें बढ़ेगीं।
 
कांग्रेस उपाध्यक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि विकास की नीतियों में ग्राम प्रधान के नजरिए की भी भागीदारी हो। वरना लोकतांत्रिक प्रकिया मजबूत नहीं हो सकती। यूं तो राहुल कांग्रेस की उस परंपरा से आगे आए हैं, जहां पर नेहरू-गांधी परिवार का सदस्य होना ही पार्टी की अगुवाई के लिए पर्याप्त योग्यता हो जाती है। राहुल कई अवसरों पर स्वीकार भी कर चुके हैं कि एक खास परिवार में जन्म लेने की वजह से उन्हें पार्टी में आगे आने का मौका मिला है। लेकिन वे खुद इस परंपरा को और आगे नहीं ले जाना चाहते।
 
उन्होंने बड़े दार्शनिक अंदाज में कह दिया कि देश के युवा बहुत उम्मीदों से भरे हैं। उनमें कुछ कर गुजर जाने की गजब की ऊर्जा है। जरूरी है कि देश के उद्योगपति इस युवा ऊर्जा का सही उपयोग करने की पहल करें। यह काम अकेले सरकार नहीं कर सकती। जरूरी है कि हमारा उद्योग केवल पैसा कमाने के बारे में न सोचे। उसे अपनी मानसिकता में समय के अनुरूप बदलाव लाना बहुत जरूरी है। यह सच्चाई है कि विकास की रफ्तार बढ़ानी है, तो ढांचागत विकास तेज करना होगा। सड़कें बनानी होंगी, बिजली की आपूर्ति ठीक करनी होगी। इसके बिना हम दुनिया के साथ  विकास की दौड़ में मुकाबला नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि आज बेरोजगारी की बहुत बात होती है। लेकिन बेरोजगारी असली समस्या नहीं है। सच्चाई तो यह है कि अच्छी ट्रेनिंग न होना हमारे यहां बड़ी समस्या है। युवाओं की ऊर्जा का बेहतर उपयोग करना है, तो शिक्षा को बाजार से जोड़ने की जरूरत है। यानि शैक्षणिक क्षेत्र में बुनियादी परिवर्तन बहुत जरूरी हो गए हैं। उन्होंने यह बात जोर देकर कही कि जनभागीदारी और नई सोच से विकास के नए रास्ते खुलेंगे।
 
उद्योगपतियों के बीच राहुल ने अपना भाषण संवाद शैली में करना पसंद किया। उन्होंने बड़ी सहजता से कई बार नाटकीय मुद्राओं के जरिए अपनी बातें रखने की कोशिश की। यह बता डाला कि कैसे उन्होंने गोरखपुर से मुंबई और बंगलुरु आदि की लंबी रेल यात्राएं करके देश को समझने की कोशिश की है। उन्होंने कुछ अपने निजी अनुभवों को बांटते हुए कहा कि ग्रामीण इलाके के युवाओं में जूझने का बहुत माद्दा है। गोरखपुर से एक बेरोजगार युवक अपनी मेहनत के भरोसे मुंबई जाने वाली ट्रेन में बैठ जाता है। कुरेदने पर कह देता है कि उसे शहर में रोजगार जरूर मिलेगा, क्योंकि उसे अपनी मेहनत पर भरोसा है। राहुल ने इस बात पर जोर दिया कि यदि हम अपनी युवा आबादी की ऊर्जा सही दिशा में मोड़ पाए, तो तस्वीर बदल सकती है।
 
करीब एक घंटे का भाषण उन्होंने टुकड़ों-टुकड़ों में किया। इस बात पर भी चुटकी ली कि हमारे यहां गैर जरूरी मुद्दों पर ज्यादा बहस करने की आदत डाल दी गई है। यह ठीक नहीं है। यहां लोग उनसे सवाल करते हैं कि आप कब कर शादी कर रहे हैं? या प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं? या फिल्म अभिनेत्री ऐश्वर्या राय की शादी आदि को लेकर तमाम चर्चाएं की जाती हैं। इससे तमाम ऊर्जा जाया होती है। वैसे भी उनके लिए ये सवाल ज्यादा अहम नहीं हैं। ज्यादा जरूरी यह है कि पार्टी पदाधिकारी और सांसद के नाते अपनी जिम्मेदारी कितनी निभा पाते हैं? अलग शैली के संवाद के चलते सभागार में कई मौकों पर बड़े-बड़े उद्योगपति ताली बजाते भी नजर आए। खास बात यह रही कि वे बगैर किसी ‘स्क्रिप्ट’ के सहारे लंबे समय तक बड़े विश्वास से बोलते रहे। याद कीजिए, पार्टी के जयपुर सम्मेलन में भी राहुल की भाषण अदा पर पार्टी सहित तमाम लोग उन पर फिदा हो गए थे। इस मौके पर भी यही लगा कि अब वे लोटपोट कर  राजनीति के पक्के खिलाड़ी जरूर बनते जा रहे हैं।
 
लेकिन तार्किक दृष्टि से विचार करें, तो इस मौके पर भी आर्थिक मामलों में राहुल का कोई स्पष्ट ‘रोड मैप’ नजर नहीं आया। उन्होंने अपनी सरकार की आर्थिक नीतियों को ही विकास का जरिया बताने की कोशिश की। विकास की दिशा में आ रही तमाम बाधाओं को उन्होंने गिनाया। यह भी बता दिया कि ‘गणेश परिक्रमा’ की राजनीति के चलते जनभागीदारी नहीं बढ़ पा रही है। इस स्थित में बदलाव लाना जरूरी है। उन्होंने उद्योगपतियों को भी बड़े प्यार से लालची न होने की नसीहत दे डाली। लेकिन सवाल यह है कि यदि आजादी के बाद इतने वर्षों में व्यवस्थागत ये खामियां चली आ रही हैं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? जबकि सच्चाई तो यही है कि छह दशक तक केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकारें रही हैं। इस बारे में ‘युवराज’  चुप्पी साधे रहे। मनमोहन सरकार पिछले नौ सालों से सत्ता में है, क्या इस पर उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? इस पर भी राहुल ने एक शब्द भी नहीं बोला। कई बार ऐसा लगा कि वे व्यवस्था को ढर्रे पर लाने की जिम्मेदारी सरकार के अलावा सबकी समझ रहे हैं।
   
राहुल भले प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए अपनी ज्यादा बेचैनी न दिखा रहे हों, लेकिन पार्टी ने उनके लिए यह तैयारी कर ली है। भाजपा में इस जगह के लिए महीनों से नरेंद्र मोदी का नाम उछल रहा है। राजनीतिक हलकों में आगे राजनीति का मुकाबला राहुल बनाम मोदी के रूप में देखा जा रहा है। मोदी भी राहुल के सामने राजनीति की बड़ी लकीर खींचने में लगे हैं। दिल्ली में राहुल ने आर्थिक मुद्दों पर अपना नजरिया रखा, तो इसी दिन गांधी नगर में एक कार्यक्रम में बोलते हुए नरेंद्र मोदी ने कह डाला कि वे लफ्फाजी नहीं, काम करके दिखाने में यकीन करते हैं। उनकी सरकार ने दस सालों में राज्य में जो विकास का मॉडल दिया है, उस पर दुनिया के तमाम लोग रिसर्च करने आ रहे हैं। इस तरह से बातों-बातों में मोदी ने राहुल की ‘प्रवचन’ शैली पर कटाक्ष भी किए। यही जताने की कोशिश की कि वे तो केवल बातें करते हैं, जबकि यहां एक शख्स ऐसा है, तो बातें कम काम ज्यादा करता है।
   
भाजपा नेतृत्व ने कहा है कि राहुल को मोदी का फोबिया हो गया है। भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावेडकर ने कह दिया कि राहुल के आर्थिक नजरिए में विजन कम, प्रवचन ज्यादा रहा। इस आलोचना से नाराज होकर केंद्रीय राज्य मंत्री वी नारायण सामी ने कह दिया कि कांग्रेस को नहीं बल्कि भाजपा को ही मोदी का फोबिया है। बुधवार को सीआईआई के समारोह में प्रधानमंत्री ने अपना उद्घाटन भाषण दिया था। उन्होंने यही कहा था कि कुछ भी हो जाए, आर्थिक सुधारों के कार्यक्रम जारी रहेंगे। उन्होंने गठबंधन राजनीति की मजबूरियों पर ठीकरा फोड़ते हुए कह दिया था कि कुछ जरूरी फैसले राजनीतिक मजबूरियों की वजह से नहीं हो पाए। प्रधानमंत्री ने अपनी नीतियों की जमकर तारीफ की थी। वहीं राहुल गांधी ने एक दार्शनिक किस्म के ‘युवराज’ के रूप में साफगोई वाली बातें कहीं। वैसे भी वे कह चुके हैं कि उनकी मां ने बता दिया है ‘सत्ता जहर होती है’। जयपुर में उन्होंने यह बात कही थी। इस अवसर पर भी उन्होंने यह जताने की कोशिश की थी कि उन्हें सत्ता की नहीं, सेवा का अवसर मिलने की दरकार है। तमाम कोशिशों के बवजूद राहुल यह नहीं बता गए कि आखिर उनका वास्तविक आर्थिक-राजनीतिक दर्शन क्या है?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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