: भाषाई पत्रकारिता महोत्सव : ‘असहमति में क्यों हैं आक्रमकता’ विषय पर टॉक शो : इंदौर। इंदौर प्रेस क्लब के प्रतिष्ठा प्रसंग सार्क देशों के भाषाई पत्रकारिता महोत्सव की शुरुआत गुरुवार २८ मार्च २०१३ को टॉक शो से हुई, जिसका विषय था ‘असहमति में क्यों है आक्रमकता’। इस विषय पर शिक्षाविद पत्रकार, साहित्यकार एवं विचारकों ने अपनी बात बेबाकी के साथ रखी। सभी ने इस बात को एकमत से स्वीकारा कि प्रजातंत्र में असहमति एवं किस्म का आलोचनात्मक हथियार है और इस पर आक्रमकता नहीं होना चाहिए। घर परिवार से लेकर राष्ट्र तक असहमतियां होती है, लेकिन उसे हम एक बहस के रूप में लें, स्वस्थ आलोचना के रूप में लें पर उसको दबाएं नहीं। वरना ये आक्रमकता एक तरह की सामंतवादी या हिटलरशाही होगी।
वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कहा कि क्या हम घर-परिवार में वास्तव में अपने बच्चों की असहमति को बढ़ावा दे रहे हैं। क्या एक विद्यार्थी जब शिक्षक के प्रति असहमति दिखाता है तो क्या शिक्षक हिटलर नहीं बनता। एक संपादक की बात पर रिपोर्टर असहमति दिखाता है तो क्या संपादक उसे स्वीकारता है। दरअसल असहमति स्वतंत्र विचारों से पैदा होती है। चूंकि, भारत एक प्रजातांत्रिक देश है, इसलिए असहमति होना जरूरी है।
साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार प्रभु जोशी ने कहा कि मीडिया और माफिया की युक्ति से असहमति को दबाया जा रहा है। मीडिया हमारी सोच को बदल रहा है। वह एफडीआई को बढ़ावा दे रहा है। मीडिया ही हमें पश्चिम की तरफ देखकर हमारे सपने पूरे होने की शिक्षा दे रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने के बाद राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन को बेच दिया। हमारा समाज राज्यों की कार्यप्रणाली पर असहमति व्यक्त करता है पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कामकाज पर नहीं। १९९१ के बाद देश में ग्लोबलाइजेशन आया, उसके बाद सच कच्चे माल की तरह बिक रहा है। लादेन के अफगानिस्तान में अमेरिका उस राष्ट्र को समाप्त कर देता है तो कभी इराक को बम बताकर उसे खत्म कर देता है। यानी छोटे लोगों की असहमति को दबाने का क्रम जारी है।
विचारक एवं शिक्षा शास्त्री सुषमा यादव ने कहा कि हमारे बच्चे परिवार से नहीं, टीवी, रेडियो, इंटरनेट, पेâसबुक, ट्विटर आदि से सीख रहे हैं, क्योंकि बड़ों के पास वक्त नहीं है अपने बच्चों से बात करने का। घर में सुनने सुनाने की परंपरा खत्म होती जा रही है। एक तरफ राजनीति को घृणा की दृष्टि से देखते हैं तो दूसरी तरफ उसे बदलाव की अपेक्षा करते हैं। ये संभव नहीं है। हमें अपने संविधान के प्रति सम्मान करना सीखना होगा। आलोचक रोहिणी अग्रवाल ने कहा कि हरियाणा के बच्चे सेना, खेल या पुलिस विभाग में जाते हैं पर उनमें अनुशासन की कमी होती जा रही है, जबकि ये तीनों ही विभाग अनुशासन की सबसे अधिक वकालत करते हैं। एक तरफ हरियाणा की महिला पीएचडी कर स्वयं को अधिक शिक्षित होने का दंभ भर रही है। उसी हरियाणा में सबसे अधिक कन्याभ्रूण हत्या हो रही है। उन्होंने कहा कि असहमति का सबसे बड़ा उदाहरण है ऑनर कीलिंग और यह आक्रामकता और असहमति उपजी है विचारशीलता की कमी से। उन्होंने कहा कि परिवार के साथ ही शिक्षा भी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है जहां शिक्षक सिर्पâ अपना आर्थिक आधार सुधारता है न कि नई पीढ़ी के भविष्य को गढ़ता है। वर्तमान क्षेत्र में सिनोप्सिस से लेकर वायवाय तक के पैकेज तय हैं। यहां किसान खेती बेचकर अपने स्टेट्स को संवार रहे हैं, फिर चाहे वो गैर लाइसेंसी हथियार के जखीरा रखने की बात हो या पैसों के दम पर राजनीति में घुसपैठ की। अपने अध्यक्षीय उदबोधन में डॉ. शरद पगारे ने कहा कि सरकार असहमति को दबाने का काम कर रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अण्णा हजारे के आंदोलन को विफल करना है।
प्रांजल धर ने कहा कि लोकतंत्र में जनता की आवाज को अनसुना कर दिया गया है। हमें दो विकल्प में से एक चुनना है। दो विकल्पों के बाहर चुनने की स्वतंत्रता नहीं है। अतिथि स्वागत प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल, मुवुंâद कुलकर्णी, सुनील तिवारी, अतुल लागू, रानी तिवारी, विजय अड़ीचवाल आदि ने किया। टॉक शोक का संचालन राहुल ब्रजमोहन ने किया। आभार प्रेस क्लब महासचिव अरविंद तिवारी ने माना।





