: भाषाई पत्रकारिता महोत्सव : ‘जन आंदोलनों में मीडिया की भूमिका’ विषय पर टॉक शो : इंदौर। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, म्यांमार आदि पड़ोसी देशों में मीडिया की हालत भारत के मीडिया से बदतर है। भारत के मीडिया से जुड़े पत्रकारों को पड़ोसी देशों में जाकर वहां के मीडिया में क्या चल रहा है इसकी जानकारी लेते रहना चाहिए। इंदौर प्रेस क्लब द्वारा आयोजित सार्क देशों के भाषाई पत्रकारिता महोत्सव में आकर कई पत्रकारों को इस बात की जानकारी मिली। अत: इस तरह के आयोजन प्रेस क्लब आगे भी कराता रहे और अपना दायरा भी बढ़ाएं। ताकि अन्य मुल्कों में क्या हो रहा है इसकी भी जानकारी भारतीय मीडिया को मिलती रहे।
यह कहना है प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य एवं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का। वे जन आंदोलनों में मीडिया की भूमिका विषय पर आयोजित टॉक शो को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मीडिया की संवेदनशीलता कम हुई है और वह बंटा हुआ है। देश में नर्मदा बचाओ आंदोलन, मनरेगा में हुआ भ्रष्टाचार को लेकर आंदोलन सहित जल, जमीन और जंगल को बचाने को लेकर आंदोलन हो रहे हैं, लेकिन इन आंदोलन के बारे में मीडिया के लोगों को सीमित जानकारी मिल रही है। इससे पूर्व गांधीजी का आंदोलन, जेपी आंदोलन, विनोबा भावे का भू-दान आंदोलन चला। इन आंदोलनों में बड़ी संख्या में लोगों ने जनभागीदारी की थी, जबकि उस समय मीडिया का इतना विस्तृत रूप नहीं था। उन्होंने कहा कि मीडिया चाहे तो किसी जन आंदोलन को शीर्ष पर पहुंचा सकता है और चाहे तो उसे खत्म कर सकता है, क्योंकि मीडिया की ताकत बहुत बढ़ गई है। सरकार किसी भी पार्टी की हो वह मीडिया की आवाज को खत्म करना चाहती है। यह बात भारत में ही नहीं, कई पड़ोसी मुल्कों में भी लागू होती है। ऐसे में मीडिया को बहुत सजग रहने की जरूरत है।
वरिष्ठ पत्रकार उमेश त्रिवेदी ने कहा कि सरकार किसी की भी हो उसे जन आदोलन पसंद नहीं आता। इसलिए वह इसे खत्म करना चाहती है। मीडिया को कभी इस भ्रम में नहीं जीना चाहिए कि वह किसी जन आंदोलन का सूत्रधार है। मीडिया आंदोलन को हवा देता है। वह भी तब तक, जब तक आंदोलन में मीडिया को पहले अपनी भूमिका तय कर लेना चाहिए। आरक्षण विरोधी आंदोलन, राम मंदिर आंदोलन में मीडिया की भूमिका रही। आज आम लोगों की जरूरत मीडिया बन चुका है। इसलिए मीडिया में किसी भी तरह की मिलावट नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज मीडिया ने उद्योग का रूप ले लिया है। इसमें ९३२ मिलियन डालर पैसा लगा है। जो २०१५ में १५०० मिलियन डालर हो जाएगा। दरअसल, आज के रीडर्स को अच्छी सामग्री का ग्लैमर और गॉसिप चाहिए। यही कारण है कि आज मीडिया में नंगे चित्रों की भरमार है।
इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जनर्लिस्ट यूनियन के अध्यक्ष के. विक्रमराव ने कहा कि जन आंदोलन में मीडिया की भूमिका सशक्त होना चाहिए। जो लोग गलत कर रहे हैं या देश की गुमराह कर रहे हैं। उनके खिलाफ मीडिया को खुलकर बोलना चाहिए। मलेशिया से आए वरिष्ठ पत्रकार चेतन कुलकर्णी कहा कि आज मालिक ही तय करता है कि अखबार में क्या छपना चाहिए और क्या नहीं। पैकेज का जमाना है। रिपोर्टरों को भी जब खबरों के लिए अलग से कमीशन मिलेगा तो पत्रकारिता की छवि स्वच्छ और स्पष्ट कैसे रह पाएगी।
नेपाल में स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे नारायण वागले ने कहा कि किस तरह मीडिया ने राजशाही के खिलाफ जनता का सपोर्ट किया था। उन्होंने कहा २००५ में जब हर कोई नेपाल में लोकतंत्र चाहता था, तब कोई ऐसा वर्ग भी था जो राजशाही के ही पेâवर में था, चूंकि, नेपाल की अधिकांश जनता लोकतंत्र के समर्थन में थी इसलिए हमने भी मीडिया का रुख सिर्फ लोकतंत्र की स्थापना की ओर ही रखा और इस तरह हमने जनांदोलन में अहम भूमिका निभाई थी। इस मौके पर काठमांडू पोस्ट के अमित शर्मा ढकाल भी मौजूद थे, जिन्होंने भी २००५ के आंदोलन का जिक्र किया।
भूटान के रिनझिन वांगचु ने कहा कि भूटान की स्थिति एकदम अलग है, वहां अब तक कोई ऐसी स्थिति नहीं बनी है कि जब कोई जनांदोलन छेड़ना पड़े और शायद इसलिए कोई आंदोलन हुआ भी नहीं, न ही मीडिया का कोई अहम रोल हुआ। वहां परिस्थितियां सामान्य है। सिलोन टुडे श्रीलंका के वरिष्ठ पत्रकार ललीथ अल्लाहकून ने कहा कि हिन्दुस्तान में मीडिया की आजादी को देख मैं अभिभूत और आश्चर्यचकित हूं। हमारे यहां मीडिया को आजादी नहीं है, प्रेस पर बैन है। सरकार जब चाहे तब मीडिया पर पाबंदी लगा देती है। उन्होंने अपने अनुभव को शेयर करते हुए कहा कि मैं खुद सरकार के आदेश पर दो महीनों तक अन्य किसी देश में रिफ्यूजी की तरह रहा। संचालन डॉ. सुशीम पगारे ने किया। विषय प्रवर्तन उपाध्यक्ष सुनील जोशी ने कहा। आभार इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने माना। अतिथियों का स्वागत सुनील जोशी, अमित सोनी, संजय लाहोटी, कमल कस्तूरी, सुरेंद्र जोशी, रूपेश व्यास ने किया। टॉक शो में बड़ी संख्या में संपादक, पत्रकार और शोधार्थी उपस्थित थे।





