: भाषाई पत्रकारिता महोत्सव : ‘खबरों पर सवार बाजारवाद’ विषय पर टॉक शो : इंदौर। इंदौर प्रेस क्लब द्वारा आयोजित सार्क देशों के भाषाई पत्रकारिता महोत्सव के पांचवें सत्र के टॉक शो ‘खबरों पर सवार बाजारवाद’ पर बहस का सबसे बड़ा दिलचस्प हिस्सा था, वक्ताओं द्वारा विषय की रोचकता को अंत तक जस का तज बनाए रखा। खबरों पर सवार बाजारवाद एक ऐसा विषय जो यदि आम जनता के बीच होता तो शायद एक सी प्रतिक्रियाएं सुनने को मिलतीं, लेकिन चूंकि यह पत्रकारों के हिस्से था, इसलिए कमाल ये हुआ कि एक ही मुद्दे पर एक सी प्रतिक्रियाओं को पत्रकारों ने अपनी-अपनी जुबान में श्रोताओं तक पहुंचाया।
साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार प्रभु जोशी ने कहा कि बाजार को इसलिए बढ़ावा मिला, क्योंकि मीडिया को बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने संचालित करना शुरू कर दिया। इसे और भी बढ़ावा तब मिला जब संपादकीय व्यवस्था खत्म हुई। वरिष्ठ पत्रकार आकाश सोनी ने कहा कि बाजारवाद को कोसने से बेहतर है हम अपनी शक्ति पहचाने। यही सही है कि हम भटके थे, लेकिन अब संभलना जरूरी है। बाजार ने भी कुछ चीजें तय करना शुरू की है, लेकिन हमारे पास भी अभी बहुत कुछ बाकी है तय करने के लिए। हमें पॉवर ऑफ नो का इस्तेमाल करना होगा। क्या होगा नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा तो ठीक है कम से कम खुद के सम्मान में समझौता तो नहीं करना होगा। वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश हिन्दुस्तानी ने कहा कि मीडिया अब उन्हीं खबरों को दिखाता है जो बाजार को प्रमोट करती है। बाजारवाद, पत्रकारिता की पीठ पर बेताल की तरह सवाल हो गया है।
इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के अध्यक्ष के. विक्रमराव ने कहा कि मिशन, प्रोफेशन से अब मालिकों के कमीशन में तब्दील हो चुका है। यदि पत्रकारों को सच लिखने पर पाबंदी है तो गुजारिश है कि वे झूठ भी न लिखे। वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र दुबे ने कहा कि पत्रकारिता अब जनोन्मुखी नहीं धनोन्मुखी हो गई है, शायद इसलिए कार्पोरेट की आवाज बन चुकी है। यह वह दौर है जब मीडिया की प्राथमिकता उपभोक्तावाद ही तय कर रहा है। जरूरत है खबरों और विज्ञापनों में संतुलन बनाए रखी की है। पत्रकार निमिष कुमार दुबे ने कहा कि यह सच है कि आज यदि किसी भी अखबार के चार संपादक एक साथ मिलते हैं और चर्चा करते हैं, तो वो बात किसी खबर पर नहीं बाजार में बने रहने की नीतियों पर होती है, दूसरे प्रतियोगी को पछाड़ने पर होती है। वरिष्ठ पत्रकार अनिल शर्मा ने कहा कि अखबार को बाजारवाद में धकेलने वाला भी तो पत्रकार खुद ही है। बाजार में जो कॉम्पीटिशन है उसमें संघर्ष वहीं कर सकता है, जो फिट है और फिट कभी भी बाजार के मुताबिक विचार नहीं बदलता। इसलिए असली लड़ाई खुद से हैं। वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा बाजार और पत्रकारिता में आज कुछ ऐसा संबंध है जैसा राजनीति व आपराधिक तत्वों में, भले ही बाजारवाद ने पत्रकारिता को अपने दरवाजे पर बांध रखा हो, पत्रकारों को जरूरी है अपनी जिम्मेदारियों के साथ एक खबर ऐसी दें जो देशहित, समाजहित में हो।
पत्रकार सुश्री पलक शर्मा ने कहा कि हर कोई टीआरपी के फेर में उलझा है, फिर चाहे इलेक्ट्रॉनिक हो या प्रिंट मीडिया। उन खबरों को तवज्जों नहीं दी जाती जो भले ही सही पत्रकारिता के लिहाज से मीडिया की सुर्खियां बनना चाहिए, उन्हें दिखाया जाता है जिन्हें लोग देखना चाहते हैं। पत्रकार एवं साहित्यकार आलोक श्रीवास्तव ने कहा कि पत्रकारिता कभी उद्देश्य हुआ करती थी, लेकिन अब हम बाजार का हिस्सा हो गए हैं तो लोग हमें खरीदेंगे ही। चूंकि हमारी जरूरते बढ़ी हैं, मीडिया ने अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर को बड़ा कर लिया है। शायद यही वजह है जरूरतें और सुविधाएं जुटाने के लिए यह बाजारवाद हावी हो गया है। अतिथियों का स्वागत नितिन माहेश्वरी, आलोक ठक्कर, अशोक शर्मा, विजय अड़ीचवाल, प्रदीप जोशी, मार्टिन पिंटो आदि ने किया। संचालन सचिव संजय लाहोटी ने किया। विषय प्रवर्तन उपाध्यक्ष अमित सोनी ने किया।





