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मध्य प्रदेश

महाघोटाले की ‘सोसायटी’

यह वाकया एक दिसंबर, 2011 का है जब मध्य प्रदेश में विपक्षी पार्टी कांग्रेस शिवराज सिंह चौहान सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाई थी और विरोधी पार्टी के विधायकों ने मुख्यमंत्री चौहान पर आरोप लगाया था कि उनके करीबी रिश्तेदार उनके पद का गलत फायदा उठाते हुए भांति-भांति के फर्जीवाड़ों में शामिल हैं. तब चौहान ने बड़ी दृढ़ता के साथ जवाब दिया था कि उनकी नजर में मध्य प्रदेश का हर आदमी बराबर की हैसियत रखता है और यदि उनका रिश्तेदार भी कोई नियम विरुद्ध काम करेगा तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. किंतु राजधानी भोपाल में बावड़िया कला के महंगे इलाके वाली रोहित गृह निर्माण सहकारी सोसाइटी का मामला उनके सदन में दिए गए उस बयान से ठीक उलट है.

यह वाकया एक दिसंबर, 2011 का है जब मध्य प्रदेश में विपक्षी पार्टी कांग्रेस शिवराज सिंह चौहान सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाई थी और विरोधी पार्टी के विधायकों ने मुख्यमंत्री चौहान पर आरोप लगाया था कि उनके करीबी रिश्तेदार उनके पद का गलत फायदा उठाते हुए भांति-भांति के फर्जीवाड़ों में शामिल हैं. तब चौहान ने बड़ी दृढ़ता के साथ जवाब दिया था कि उनकी नजर में मध्य प्रदेश का हर आदमी बराबर की हैसियत रखता है और यदि उनका रिश्तेदार भी कोई नियम विरुद्ध काम करेगा तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. किंतु राजधानी भोपाल में बावड़िया कला के महंगे इलाके वाली रोहित गृह निर्माण सहकारी सोसाइटी का मामला उनके सदन में दिए गए उस बयान से ठीक उलट है.

इस सोसाइटी में की गई गड़बड़ियों का सिलसिला इस मायने में साधारण नहीं कहा जा सकता है कि यहां खासी तादाद में रसूखदारों ने सहकारिता के बुनियादी नियमों को ताक पर रखते हुए न केवल जमीन की बंदरबांट की बल्कि कई पुराने और पात्र सदस्यों के लिए पहले से ही आवंटित भूखंडों तक की रजिस्ट्री अपने नाम करा ली. हैरानी तब और बढ़ जाती है जब इनमें ऐसे नामों का भी खुलासा होता है जिनका संबंध किसी और से नहीं बल्कि मुख्यमंत्री के निजी सचिव के अलावा मुख्यमंत्री के ही करीब दर्जन भर परिजनों और उनके करीबी रिश्तेदारों से है. दूसरे शब्दों में सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों ने सोसाइटी के कर्ताधर्ताओं की मिलीभगत से एक ऐसा खेल खेला जिसमें वे करोड़पति बन गए और भूखंडों के असली मालिक दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो गए.

2008 में चौहान के मुख्यमंत्री के तौर पर दूसरी बार शपथ लेने के बाद से रोहित नगर सोसाइटी के शिकायतकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने राज्य की जांच एंजेसियों, संबंधित विभागों और मुख्यमंत्री आवास तक कई चक्कर काटे लेकिन उनकी सुनवाई कहीं नहीं हुई. और यह तब है जब राज्य के ही सहकारिता विभाग और कलेक्टर ने समय-समय पर की गई अपनी जांच रिपोर्टों में इस बात का खुलासा किया है कि इस सोसाइटी में भूखंडों के आवंटन और उनकी रजिस्ट्री में भारी फर्जीवाड़ा हुआ है और इन्हीं आधार पर उन्होंने कई भूखंडों के कब्जे को बाकायदा अवैध घोषित करते हुए कब्जाधारियों पर कड़ी कार्रवाई किए जाने की बात भी की है. यही नहीं, इस मामले में हुए गड़बड़झाले की गूंज सड़क से लेकर विधानसभा तक में गूंजी लेकिन रोहित नगर में घरों का ख्वाब देखने वाले सैकड़ों लोगों को कार्रवाई के आश्वासन के सिवा अब तक कुछ हासिल नहीं हुआ है. चौहान सरकार की नीयत पर सवाल इसलिए भी उठता है कि 2012 में जब उसने राज्य भर के भूमाफियाओं के खिलाफ अभियान छेड़ा था तब राजधानी में रोहित नगर सोसाइटी के ऐसे कब्जाधारियों को क्यों छोड़ दिया गया जिसमें खुद मुख्यमंत्री के सगे-संबंधियों के नाम भी शामिल हैं.

कैसे बांधा धांधलियों का पुलिंदा

इस कथित महाफर्जीवाड़े पर से पर्दा हटाने के लिए हमें रोहित नगर सोसाइटी बनने की शुरुआत में जाना पड़ेगा. मार्च, 1983 में जब सोसाइटी का रजिस्ट्रेशन हुआ तब उसके पास कोई भूखंड और पैसा नहीं था. लिहाजा उसने सदस्य बनाकर उनकी जमा की गई रकम से बाजार भाव पर जमीन खरीदी और मकान बनाने के लिए भूखंड काटे. जाहिर है सोसाइटी ने उस सदस्य को भूखंड पाने का पात्र माना जिसके पैसे से उसने जमीन खरीदी और उसे विकसित किया. इस लिहाज से 2003 तक सोसाइटी ने जहां करीब 1,500 सदस्य बनाए वहीं इस समय तक उसके पास सौ एकड़ जमीन पर 1,269 भूखंड हो गए. जाहिर है इस समय तक भूखंडों के मुकाबले सदस्यों की संख्या पहले ही अधिक हो चुकी थी और इसलिए अब सोसाइटी की जिम्मेदारी थी कि वह नए सदस्य बनाने के बजाय पात्र सदस्यों को आवंटित भूखंडों की रजिस्ट्री करवाता. किंतु आगे जाकर हुआ इसके ठीक उलटा.

तहलका के पास मौजूद 2005 में तैयार की गई सोसाइटी की आखिरी ऑडिट रिपोर्ट में यह साफ कहा गया है कि पुराने सदस्यों के नाम पंजीयन में दर्ज नहीं हैं और नए सदस्यों की भर्ती में अनियमितता हुई है. ऑडिट में बताया गया है कि उस साल सोसाइटी के सदस्यों की संख्या बढ़कर 1,644 हो गई थी. ऑडिट के सहकारी निरीक्षक राजेश वर्मा ने तब भूखंड कम होने के बाद भी नए सदस्यों की भर्ती पर आपत्ति जताई थी.

गौरतलब है कि सहकारी सोसाइटी अधिनियम 1960 (72) के मुताबिक भूखंडों के अनुपात से अधिक सदस्यों की भर्ती अपराध है और ऐसी भर्ती किए जाने पर पांच लाख रुपये का जुर्माना और तीन साल तक के कारावास की सजा है. बावजूद इसके सोसाइटी में नए सदस्यों की भर्ती का सिलसिला चलता रहा. अब तक सदस्यता का क्रमांक 2,450 को पार कर चुका है. वहीं एक नियम यह कहता है कि इस तरह से बनाए गए नए सदस्यों का आवंटित या पंजीकृत भूखंड अवैध हैं. बावजूद इसके सहकारिता विभाग की रिपोर्ट में ही यह बात उजागर हो चुकी है कि रोहित नगर सोसाइटी में ऐसे नए सदस्यों के नाम कई भूखंडों की रजिस्ट्री की जा चुकी है.

सीधी बात है कि यदि सहकारिता विभाग ने 2005 की ऑडिट रिपोर्ट को सामने रखते हुए उस समय भी कार्रवाई की होती तो न अवैध तरीके से बड़ी संख्या में नए सदस्यों की भर्ती की जाती न सोसाइटी के संचालक मंडल के हाथों इस हद तक रिकॉर्डों में कूटरचना की जाती, न बड़े अफसरों से लेकर रसूखदारों को अनियमितताओं का फायदा उठाने का मौका मिलता और न ही भूखंडों के असली मालिकों को अपने हक के लिए जांच एजेंसियों और विभागों के पास भटकना पड़ता. किंतु यह संयोग ही है कि 2005 में ही शिवराज सिंह चौहान के पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद जिस बड़े पैमाने पर इस सोसाइटी की जमीन खुदबुर्द की गई और जिस तरीके से इसमें मुख्यमंत्री आवास के अधिकारियों और मुख्यमंत्री के परिजनों के नाम सामने आए उसने मौजूदा सरकार के भरोसे पर संदेह पैदा कर दिया है.

गड़बड़झालों के सूत्रधार

सीबीआई के छापे, सहकारिता विभाग द्वारा तीन बार की गई जांच-पड़ताल, सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन के विधानसभा में दिए गए बयान और सोसाइटी के सदस्यों की मानें तो रोहित नगर सोसाइटी में एक के बाद एक हुए कई गड़बड़झालों का मुख्य सूत्रधार घनश्याम सिंह राजपूत है. सहकारिता विभाग की पहली ही जांच रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि 2005 में सोसाइटी का संचालक बनने के बाद राजपूत ने फर्जी तरीके से कई नए सदस्य बनाए और भूखंड पंजी में कूटरचना करते हुए अवैध कमाई की. कभी रेलवे में तृतीय श्रेणी के कर्मचारी रहे और इन दिनों खुद को सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के नेता के तौर पर प्रचारित करने वाले राजपूत के बारे में सोसाइटी के सदस्यों का कहना है कि सहकारिता विभाग के भीतर इसकी अच्छी पकड़ तो है ही, मुख्यमंत्री के निजी सचिव हरीश सिंह के करीबी होने के नाते मुख्यमंत्री आवास तक सीधी पहुंच भी है. गौर करने लायक बात यह भी है कि हरीश सिंह का भूखंड (भूखंड क्र.265/III) भी इसी सोसाइटी में है. मगर राजपूत का कहना है कि उसके किसी से करीबी होने या न होने का रोहित नगर सोसाइटी की गड़बडि़यों से कोई लेना-देना नहीं है.

राजपूत के मुताबिक, ‘रोहत नगर सोसाइटी की गड़बडि़यों में मेरा कोई हाथ नहीं है.’ लेकिन रोहित नगर सोसाइटी के दो दर्जन से अधिक भूखंडों की गड़बडि़यों की छानबीन के लिए तैनात किए गए सहकारिता विभाग के जांच अधिकारी ज्ञानचंद पाण्डेय की मार्च, 2008 की रिपोर्ट बताती है कि उनकी पड़ताल में 23 मामले ऐसे निकले जिनमें भूखंड किसी और को आंवटित किए गए थे लेकिन सोसाइटी के कर्ताधर्ताओं ने सदस्यों के सदस्यता क्रमांक से छेड़खानी करते हुए उनकी रजिस्ट्री किसी और के नाम करा दी. वहीं छह मामले तो ऐसे निकले जिनमें सदस्यों ने अपने भूखंडों की रजिस्ट्री भी करा ली थी, आश्चर्य कि इसके बावजूद उनकी रजिस्ट्री किसी किसी दूसरे के नाम कर दी.

पाण्डेय ने अपनी रिपोर्ट में इन अवैध गतिविधियों के लिए घनश्याम सिंह राजपूत के साथ सोसाइटी के पूर्व संचालक एनएल रोहितास सहित अवैध पंजीयनधारियों को दोषी ठहराते हुए उन पर कार्रवाई किए जाने की सिफारिश की थी. हालांकि इसके बाद से अब तक सहकारिता विभाग ने राजपूत पर कोई कार्रवाई नहीं की लेकिन रेलवे कर्मचारी रहते हुए फरवरी, 2007 में सीबीआई ने राजपूत के यहां छापा मारा तो रोहित नगर सोसाइटी से जुड़े बेनामी संपत्ति के कई कागजात बरामद हुए. इसके बाद सीबीआई ने यह मामला राज्य की जांच एजेंसी आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो को आवश्यक कार्यवाही के लिए भेजा. यह अलग बात है कि यहां भी कार्यवाही की फाइल पांच साल से धूल चाट रही है.

विवादों की जमीन पर मुख्यमंत्री का परिवार

रोहित नगर सोसाइटी में जब घपलों की कई परतें खुलीं तो यह साफ हुआ कि विवादों की इस जमीन पर सूबे के मुखिया चौहान के कई करीबियों और परिजनों को भी भूखंड बांटे गए हैं (देखें बॉक्स). जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि इस सोसाइटी में जब भूखंडों से अधिक सदस्यों की संख्या हो गई तो सहकारिता विभाग ने अपने ऑडिट में नए सदस्यों की भर्ती पर आपत्ति जताते हुए उन पर रोक लगा दी थी. इसी के साथ सहकारिता विभाग के नियमों के तहत यह भी कहा जा चुका है कि विभाग ने 2003 के बाद से बनाए गए नए सदस्यों को आवंटित या पंजीकृत भूखंडों को अवैध घोषित कर दिया था. बावजूद इसके मुख्यमंत्री के भाई रोहित चौहान (स.क्र. 2198ए) और रोहित सिंह चौहान की पत्नी (स.क्र. 2199ए) को न केवल नए सदस्यों के तौर पर भर्ती किया गया बल्कि दोनों के नाम और आजू-बाजू में ही 2,100 वर्ग फुट के दो बड़े भूखंडों की रजिस्ट्री भी करा दी गई. रोहित सिंह चौहान ने इन भूखंडों पर 2008 में एक आलीशान मकान बनाया और उसे बेच दिया.

वहीं अक्टूबर, 2009 में भोपाल के कलेक्टर की वेबसाइट पर जब रोहित नगर सोसाइटी के सदस्यों ने आवंटित और पंजीकृत सूची में मुख्यमंत्री चौहान के ही कई और परिजनों के नाम देखे तो वे भौचक्के रह गए. वजह यह थी कि सोसाइटी की 2005 की आखिरी ऑडिट की सदस्यता सूची और 2008 की सोसाइटी की मतदाता सूची में जब चौहान परिवार के ऐसे किसी भी सदस्य का नाम था ही नहीं तो अचानक और क्रमबद्ध तरीके से इतने सारे नाम कहां से आ गए. सोसाइटी के कई संस्थापक सदस्यों का आरोप है कि चौहान के परिजनों को दी गई सदस्यता का क्रमांक फर्जी है. अपना भूखंड पाने की उम्मीद पर सालों से लड़ रहे जैनेंद्र जैन बताते हैं कि चौहान के परिजनों के नाम के आगे जो सदस्यता क्रमांक लिखा गया है यदि ऑडिट की सूची से उसका मिलान किया जाए तो वह किसी और आदमी का सदस्यता क्रमांक निकलता है.

उदाहरण के लिए, बृजेश चौहान (सं क्र. 1253), प्रद्युम्न चौहान (सं क्र. 1254) और अनीता चौहान (सं क्र. 1255) के आगे क्रमबद्ध तरीके से जो सदस्यता क्रमांक लिखा गया है यदि ऑडिट की सूची में देखें तो उसमें सदस्यता के ये क्रमांक क्रमशः बीना मखेजा, पंकज मखेजा और संगीता मखेजा के नाम पर दर्ज है. इसी तर्ज पर चौहान परिवार के धर्मेंद्र सिंह चौहान (मुख्यमंत्री के भाई का दामाद ), बलवंत चौहान और ममता चौहान (मुख्यमंत्री के करीबी) सहित बाकी लोगों के नाम के आगे भी किसी दूसरे का सदस्यता क्रमांक लिखा मिलता है. बावजूद इसके इन सभी के नाम 1,500 से लेकर 2,100 वर्ग फुट के भूखंड की रजिस्ट्री भी हो गई है. यहां 1,500 वर्ग फुट के एक भूखंड की कीमत ही 30 लाख रुपये आंकी जा रही है. वहीं जैनेंद्र जैन के मुताबिक, ‘इस समय यहां जमीन का बाजार भाव 2,000 रु वर्ग फुट है, जबकि 2003 तक सोसाइटी के सदस्यों को 30 रु वर्ग फुट के हिसाब से भूखंड दिया गया है. इसलिए सस्ती कीमत पर भूखंड हथियाने के लिए भी इन बड़े लोगों ने 2003 के सदस्यों की सदस्यता का क्रमांक अपने नाम दर्शा दिया.’

खुलासे पर खुलासा, पर कार्रवाई नहीं

रोहित नगर सोसाइटी का ऑडिट 2005 में जब हुआ तब पहली बार स्थापित हुआ कि सोसाइटी में कई गड़बड़झाले हैं.  फिर मार्च, 2008 में सहकारिता विभाग के जांच अधिकारी ज्ञानचंद पाण्डेय ने खुलासा किया था कि सोसाइटी के कर्ताधर्ताओं की सांठगांठ से कई फर्जी सदस्य इसमें घुस गए हैं और उन्होंने 29 भूखंडों पर कब्जा जमा लिया है. मार्च, 2008 में ही विभाग के जांच अधिकारी आरके पाटिल ने और एक घोटाले को उजागर करते हुए कहा कि यहां कई पात्र सदस्यों को नजरअंदाज करते हुए 17 भूखंडों की अवैध तरीके से रजिस्ट्री की गई है. इतना ही नहीं, अगस्त, 2007 को कांग्रेस के विधायकों ने यहां हुए 48 भूखंडों की धोखाधड़ी का मामला विधानसभा में उठाते हुए सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन को घेरा. जवाब में बिसेन ने धोखाधड़ी की बात मानते हुए वादा किया कि दोषियों को जेल की हवा खिलाएंगे. अगली कड़ी में नवंबर, 2009 में सहकारी विभाग के जांच अधिकारी प्रकाश खरे ने जब 23 भूखंडों को नियमों के विरुद्ध बांटे जाने की पड़ताल की तो पाया कि सभी 23 मामलों में हेराफेरी हुई है. खरे ने साथ ही यह भी कहा कि सोसाइटी के कागजात इस हद तक अस्त-व्यस्त पाए गए कि उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इसी से जुड़ी एक अहम बात यह है कि 2005 के बाद से सोसाइटी का ऑडिट नहीं करवाया गया है. पीड़ित सदस्यों की शिकायत है कि सोसाइटी के सरगनाओं ने फर्जी सदस्यों के कारनामों को छिपाने के लिए ऐसा किया. जानकारों की राय में यदि सोसाइटी का ऑडिट किया जाता तो पता चल जाता कि कब, कौन सदस्य बना और सोसाइटी के पास उससे लिए गए पैसों का हिसाब होता. यही वजह है कि भ्रष्टाचार का यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहा और एक बार फिर अगस्त, 2010 में भोपाल के कलेक्टर को 79 भूखंडों की रजिस्ट्री को अवैध ठहराना पड़ा.

हद तो तब हो गई जब 2012 में सोसाइटी के कर्ताधर्ताओं द्वारा आवंटित और पंजीकृत भूखंडों की एक और सूची भोपाल के कलेक्टर की वेबसाइट पर जारी कर दी गई जिसमें 96 लोगों के नाम हैं. गौर करने लायक बात है कि इसमें भी आधे के नाम 2005 की ऑडिट रिपोर्ट में नहीं हैं. और यही वजह है कि अक्टूबर, 2012 में खुद सहकारिता जिला उपायुक्त आरएस विश्वकर्मा ने इस सूची पर आपत्ति जताते हुए सोसाइटी को कारण बताओ नोटिस भेजा है. विश्वकर्मा ने कहा है कि सोसाइटी को चाहिए कि पहले अपना ऑडिट करवाए. यदि ऐसा हुआ तो सदस्यों द्वारा जमा कराए गए पैसों की जानकारी साथ ही यह भी सार्वजनिक हो जाएगा कि उन्हें बांटा गया भूखंड वैध है या नहीं.

तहलका के पास ये सारे दस्तावेज हैं और इनमें घनश्याम सिंह राजपूत के अलावा सोसाइटी के वर्तमान अध्यक्ष रामबहादुर तथा तीन पूर्व अध्यक्ष एमके सिंह, बसंत जोशी और अमरनाथ मिश्र सहित कई कर्ताधर्ताओं को दोषी ठहराया गया है. बावजूद इसके उपयुक्त कार्रवाई न होने से दोषियों के हौसले बुलंद हैं और इसका अंदाजा सोसाइटी के सदस्य योगेश पुर्सवनी की आपबीती से लगाया जा सकता है. 2000 में पुर्सवनी को यहां भूखंड आवंटित हुआ था और इसके लिए उन्होंने सोसाइटी को एक लाख 38 हजार रुपये भी दिए. लेकिन उनके भूखंड की रजिस्ट्री जब संजय कुमार सिंह के नाम पर कर दी गई तो पुर्सवनी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. 2005 में हाई कोर्ट से केस जीतने के बाद भी जिस आदमी की अवैध तरीके से रजिस्ट्री की गई थी वह कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं है. पुर्सवनी का आरोप है कि उसके भूखंड पर परोक्ष तौर पर घनश्याम सिंह राजपूत का कब्जा है.

क्या विकल्प है?

रोहित नगर सोसाइटी प्रकरण में राज्य सहकारी सतर्कता सेल के प्रभारी बीएस बास्केल यह तो मानते हैं कि कार्रवाई गति नहीं पकड़ पा रही है लेकिन इसका कारण पूछने पर उनके पास कोई जवाब नहीं है. बकौल बास्केल, ‘इसके लिए आयुक्त से बात करूंगा.’ वहीं सहकारिता विभाग के आयुक्त मनीष श्रीवास्तव की सुनें तो उन्हें हाल ही में इस सोसाइटी में की गई गड़बडि़यों की जानकारी मिली है. उनका दावा है, ‘दोषी चाहे जो भी हो उसे छोड़ा नहीं जाएगा.’ दूसरी तरफ सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन को लगता है कि इस तरह की गृह निर्माण सोसाइटियों में चल रही धांधलियों पर जल्द ही लगाम कसी जा सकती है. वे कहते हैं, ‘सहकारिता के नियमों की यदि अनदेखी की गई है तो विभाग कोर्ट में सीधे मामला ले जा सकता है और दोषियों को सजा दिलवा सकता है.’ वहीं इस पूरे प्रकरण में जब तहलका ने मुख्यमंत्री चौहान से जवाब मांगने के लिए जनसंपर्क विभाग के आयुक्त राकेश श्रीवास्तव से संपर्क किया तो उन्होंने कहा, 'रोहित नगर को लेकर मुख्यमंत्री कोई जवाब नहीं देंगे.'

दरअसल रोहित नगर सोसाइटी में इतनी सारी गड़बडि़यां सामने आ चुकी हैं कि उन्हें सुलझाने और दोषियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने में काफी वक्त लग जाएगा. विशेषज्ञों के मुताबिक इस हालत में मध्य प्रदेश सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1960 के आठवें अध्याय में सहकारी गृह निर्माण सोसाइटियों को लेकर बनाया गया वह प्रावधान अहम हो सकता है जिसमें उसने एक सीमा तक ही सदस्य बनाए जाने की बात की है और इस बिंदु के आधार पर यदि नए और अवैध तरीके से बनाए गए सदस्यों को सोसाइटी से बाहर कर उन पर कार्रवाई की जाए तो इसके बाद बचे पात्र सदस्यों को भूखंड आंवटित करने का रास्ता साफ हो सकता है. विशेषज्ञों की राय में यह रास्ता इसलिए भी ठीक है कि नए सदस्यों ने समस्या तो पैदा की ही, नाजायज तौर-तरीके से कई भूखंड भी हड़प लिए हैं.

लेकिन अब रोहित नगर सोसाइटी में जिस संख्या में मुख्यमंत्री के परिजनों सहित कई रसूखदारों के नाम आए हैं और जिस तरीके से सहकारिता विभाग ने लंबे समय से अपने ही जांच अधिकारियों की जांच और ऑडिट रिपोर्टों को अनदेखा किया है, उसके बाद सोसाइटी के भूखंड के पात्र सदस्यों में से ज्यादातर की आखिरी उम्मीद अब कोर्ट की चौखट पर जाकर टिक गई है.

तहलका में प्रकाशित शिरीष खरे की रिपोर्ट.

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