Achala Nagar : ….मेरे मन में कल से ताश के पत्तों सी उस सात मंजिला इमारत का मलबा चुभ रहा है ,जो कल शाम से पहले तक वहां के हर रहवासी का सपना थी …वोही सपना जो हर आदमी की आँखें देखती हैं…जिसे पेट काट के..उम्र भर क़र्ज़ चूका के वो ,इसलिए लेता है..की अब उसका एक स्थाई पता होजाएगा…बच्चों के सर पे एक छत रहेगी ….ये सब एक आम आदमी सोच रहा है.इस बात से बेखबर ,की ..उसके उस अनमोल सपने को अंजाम देनेवाला कोइ आदमी नहीं वो राक्षस है, जो किसी के घर नहीं "कब्रे" बनाता है ….कल शाम ठाणे मुम्ब्रा में यही हुआ है …
दिल बहुत भरा हुआ है …कि आज फ्लैट सिस्टम से जुड़ा कोइ भी आदमी ये नहीं जानता की उसकी बिल्डिंग की जो नीव ३५ फीट होनी चाहिए थी ,क्या वो उतनी है,या सिर्फ १० फीट है….उसमे सीमेंट कितनी रेत कितनी …हम बेचारे ये सब नहीं जानते..बस घर मिल जाने पर हवन ,पूजा ,इबादत कर के, कम से कम अपनी अगली पीढी तक के लिए निश्चिन्त हो जाते हैं ….पर होता कुछ और ही है…..क्या कोइ बताएगा इन "राक्षसों " का क्या किया जाए? हर चीज़ हम सरकार या कानून पर नहीं डाल सकते …क्या हम दिन बा दिन शक्तिशाली होते मीडिया से कुछ आशा रख सकते हैं की बताये भोले भाले आम आदमी को इन राक्षसों से कैसे बचाया जा सकता है …..फिलहाल तो हम उन ज़मीदोज़ हो चुके आशियानों में दफ़न हो चुके…. .लूले ..लंगड़े हो चुक… या यतीम हो चुके उन बच्चों के लिए दुआ करें ,की उन्हें ईश्वर ज़रा सा सुकून दे …….आमीन.
वरिष्ठ पत्रकार अचला नागर के फेसबुक वाल से.





