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मोदी, तो सात जन्मों तक पीएम नहीं बन सकते : पासवान

लोकसभा के चुनाव भले ही अगले साल हों, लेकिन चुनावी सरगर्मियां अभी से तेज हो गई हैं। नए राजनीतिक समीकरण बनाने के लिए तरह-तरह की जोड़-तोड़ हो रही है। लालकृष्ण आडवाणी से लेकर मुलायम सिंह यादव तक ‘डुगडुगी’ बजा रहे हैं कि लोकसभा का चुनाव इसी साल अक्टूबर-नवंबर तक हो जाएगा। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह तो केंद्र में तीसरे मोर्चे की सरकार बनने का सपना देख रहे हैं। जबकि, भाजपा को लगता है कि उनके नेतृत्व वाले एनडीए को ही सत्ता मिलने जा रही है। भाजपा में नरेंद्र मोदी के नाम पर राजनीतिक रार तेज है। जदयू ने मोदी के नाम पर आंखें दिखानी शुरू की हैं। इसी चक्कर में मुख्यमंत्री नीतीश, कांग्रेस से भी नजदीकियां बढ़ाते दिखाई पड़ रहे हैं। आडवाणी, गैर-कांग्रेसवाद का नारा उछाल रहे हैं।

लोकसभा के चुनाव भले ही अगले साल हों, लेकिन चुनावी सरगर्मियां अभी से तेज हो गई हैं। नए राजनीतिक समीकरण बनाने के लिए तरह-तरह की जोड़-तोड़ हो रही है। लालकृष्ण आडवाणी से लेकर मुलायम सिंह यादव तक ‘डुगडुगी’ बजा रहे हैं कि लोकसभा का चुनाव इसी साल अक्टूबर-नवंबर तक हो जाएगा। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह तो केंद्र में तीसरे मोर्चे की सरकार बनने का सपना देख रहे हैं। जबकि, भाजपा को लगता है कि उनके नेतृत्व वाले एनडीए को ही सत्ता मिलने जा रही है। भाजपा में नरेंद्र मोदी के नाम पर राजनीतिक रार तेज है। जदयू ने मोदी के नाम पर आंखें दिखानी शुरू की हैं। इसी चक्कर में मुख्यमंत्री नीतीश, कांग्रेस से भी नजदीकियां बढ़ाते दिखाई पड़ रहे हैं। आडवाणी, गैर-कांग्रेसवाद का नारा उछाल रहे हैं।

दलित नेता राम विलास पासवान एक कद्दावार राष्ट्रीय नेता हैं। वे अपनी लोक जनशक्ति पार्टी के मुखिया हैं। इन दिनों अपने गृह प्रदेश, बिहार की राजनीति में ज्यादा व्यस्त हैं। लालू यादव के साथ मिलकर वे नीतीश सरकार के खिलाफ राजनीतिक अभियान चला रहे हैं। 1977 में पासवान पहली बार रिकॉर्ड मतों से जीतकर लोकसभा में आए थे। इसके बाद पासवान, लगातार राष्ट्रीय राजनीति में अपना दखल बनाए रहे हैं। पासवान का मानना है कि संघ परिवार चाहे जितनी ताकत लगा ले, लेकिन सात जन्मों में भी दंगाई छवि वाले नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। ताजा राजनीतिक मुद्दों पर डीएलए के विशेष संवाददाता एसपी त्रिपाठी ने पासवान से लंबी बातचीत की।

– अल्पमत की मनमोहन सरकार खासतौर पर मुलायम सिंह और मायावती के समर्थन पर जिंदा है। लेकिन मुलायम इन दिनों केंद्र पर लगातार बिफर रहे हैं। केंद्र सरकार के भविष्य के बारे में क्या कहेंगे?

मुलायम सिंह के बिफरने से यूपीए सरकार पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है। केंद्र सरकार को कोई खतरा नहीं लगता है। डीएमके के इस्तीफे के बाद मुलायम सिंह, सरकार को धमकाने में जुटे हैं। सरकार इसको अच्छी तरह से समझ रही है। यदि सरकार सीबीआई का बेजा इस्तेमाल करती, तो अब तक उन्हें जेल में होना चाहिए था। मुलायम सिंह की बंदरघुड़की से सरकार के स्थायित्व पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार अपना कार्यकाल जरूर पूरा करेगी।

– मुलायम, कई बार कह चुके हैं कि अगले लोकसभा चुनाव में गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस दलों का मोर्चा ही सत्ता में आयेगा। एक दौर में आप भी तीसरे मोर्चे के बड़े किरदार रहे हैं। आज की स्थितियों में आप को तीसरे मोर्चे की क्या संभावनाएं दिखती हैं?

तीसरे मोर्चे की कोई संभावना अगले चुनाव में नहीं है। आज की राजनीतिक स्थितियां ऐसी हैं कि तीसरे मोर्चे का अस्तित्व बन ही नहीं सकता। क्योंकि, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी एक साथ नहीं हो सकते। इसी तरह से तमिलनाडु में डीएमके और एआईडीएमके भी कभी एकसाथ नहीं आयेंगे। पश्चिम बंगाल में वामपंथी और तृणमूल कांग्रेस के बीच 36 का आंकड़ा बना हुआ है। जब ये लोग एक साथ चुनाव में शिरकत नहीं कर सकते, तो तीसरा मोर्चा गठित कैसे होगा? मुलायम, चुपके-चुपके तमाम दावेदारी जरूर कर रहे हैं, लेकिन वे तो ममता बनर्जी को चार दिन भी साथ लेकर नहीं चल पाये। फिर कैसे वे तीसरे मोर्चे का ख्वाब देख रहे हैं? यह जरूर है कि अगले लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों का दबदबा बढ़ेगा। लेकिन, इसमें मुलायम सिंह जैसे नेताओं की कोई खास भूमिका नहीं रहेगी।

– मुलायम ने बड़े आहत भाव से कहा है कि कांग्रेस से लड़ना आसान नहीं है। क्योंकि इनके हजार हाथ हैं। ये लोग विरोधियों पर सीबीआई लगाकर जेल भिजवाने की साजिश कर देते हैं। कांग्रेस से आप के भी खट्टे-मीठे रिश्ते रहे हैं। क्या मुलायम सिंह के अनुभव को ठीक मानते हैं?

मुलायम सिंह का यह बयान राजनीतिक है। पिछले 9 सालों से वे यूपीए सरकार को समर्थन दे रहे हैं। उन्हें सीबीआई ने तो जेल में नहीं डाला। वे अपने अनुभव की बात नहीं, अपने तात्कालिक फायदे की बात कर रहे हैं। मुलायम सिंह देश की जनता को ज्यादा गुमराह नहीं कर सकते। क्योंकि, पब्लिक है ये सब जानती है।

– आप अपने गृह राज्य, बिहार की राजनीति में इन दिनों खासे व्यस्त हैं। वहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, भाजपा के साथ साझा सरकार चला रहे हैं। लेकिन तीखे सेक्यूलर तेवर अपनाएं रहते हैं। नीतीश की इस सेक्यूलर राजनीति के बारे में आप क्या कहेंगे?

नीतीश, धर्मनिरपेक्षता का सिर्फ पाखंड करते हैं। इसकी कलई खुल गई है। भाजपा के साथ रहकर वे सेक्यूलर कैसे हो सकते हैं? गुजरात में दंगा कराकर सत्ता में आने और धार्मिक उन्माद फैलाने वाली भाजपा के साथ कौन खड़ा है? जनता दल युनाइटेड कि क्या मजबूरी है? यही न कि किसी तरह से सत्ता में बने रहा जाए। वे किसको बेवकूफ बना रहे हैं? बिहार में एनडीए की सरकार सभी मोर्चे पर फेल हो गई है। दूसरे कार्यकाल के लिए नीतीश को बिहार की जनता ने बड़ी उम्मीदों के साथ जिताया था। लेकिन उन्होंने बिहार की जनता की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। अब वे सेक्यूलर राजनीति की ड्रामेबाजी ज्यादा कर रहे हैं। लेकिन, उनका राजनीतिक पाखंड ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है।

– लेकिन, विवादित नेता मोदी के मुद्दे पर नीतीश ने तो मजबूत स्टैंड लिया है। यहां तक कि वे एनडीए से नाता तोड़ने को भी तैयार हैं। ऐसे में उनकी इस सिद्धांतवादी राजनीति की सराहना करने के  लिए आप का मन नहीं करता?

अरे! बरगलाने वाला उनका स्टैंड है। मोदी और नीतीश के बीच नूरा कुश्ती चल रही है। जिससे जनता का ध्यान मुख्य मुद्दों से हटाया जाए। सामाजिक न्याय, भ्रष्टाचार व विकास के मुद्दों पर असफलता को छिपाने की साजिश के तहत दोनों में नूरा कुश्ती बहुत दिनों से चल रही है। जिस तरह से बिहार और गुजरात में दलित और पिछड़े वर्ग के लोग पलायन के लिए मजबूर हुए हैं। इसके बारे में राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी जिक्र किया है। साजिश के तहत नीतीश, मोदी से परहेज करने वाला स्टैंड ले रहे हैं। यदि उनके अंदर दम है, तो भाजपा से रिश्ता तोड़कर दिखायें। सेक्यूलर तेवर महज, अल्पसंख्यक वोटों के खातिर नीतीश की एक शातिर चाल है। मुझे लगता है कि देश का अल्पसंख्यक वर्ग उनके पाखंड जाल में नहीं फंसने वाला। विकास की वे भले डुगडुगी बजाएं, लेकिन जमीनी स्तर पर विकास नहीं हुआ है। कागजों में आंकड़े बाजी ज्यादा की जा रही है।

– नीतीश, अपनी सरकार के विकास एजेंडे के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं। आप की नजर में इन दावों की जमीनी हकीकत क्या है? केंद्रीय योजना आयोग ने भी बिहार के विकास दर की तेजी को स्वीकार किया है। क्या इस सच्चाई को भी आप लोग स्वीकार नहीं करते?

हमने कह तो दिया, नीतीश सरकार के तमाम दावे बकवास और खोखले हैं। जमीनी हकीकत यह है कि बिहार में एनडीए के शासनकाल के दौरान पुलिस रिकार्ड के अनुसार 25 हजार मर्डर, 24 हजार अपहरण, 8 हजार बलात्कार व 13 हजार लूट की घटनाएं हुई हैं। कानून व्यवस्था की हालत बहुत चिंताजनक है। सभी सिस्टम पूरी तरह से चौपट हो गए हैं। नीतीश सरकार केवल झूठे वायदों पर चल रही है। सरकार, शराब माफियाओं के प्रभाव में है और आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी है। सरकार ने भूमिहीनों को जमीन देने के वायदे किए थे। लेकिन यह वायदा अभी तक नहीं पूरा किया गया। शिक्षा प्रणाली पूरी तरह से चौपट हो चुकी है। अस्थाई शिक्षक अपनी विभिन्न मांगों को लेकर आए दिन सड़कों पर उतरे रहते हैं। ऐसे में, गांव के स्कूलों में पढ़ाई ठप रहती है। यह सब नीतीश सरकार को दिखाई नहीं पड़ता।

– इधर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के मुद्दे पर नीतीश और मनमोहन सरकार के बीच काफी नजदीकियां दिखाई पड़ी हैं। क्या इसके पीछे किसी नए राजनीतिक गठजोड़ की आप को आहट सुनाई दे रही है?

—  यह तो सरासर नीतीश की दोगली राजनीति है। जब वर्ष 2000 में राष्ट्रीय जनता दल की सरकार ने बिहार को विशेष दर्जा देने की मांग की थी, तो उस समय नीतीश ने इसका विरोध किया था। यही नहीं जब एनडीए सरकार में नीतीश रेल मंत्री थे, तो उस समय भी उन्होंने जमकर इसका विरोध किया था। यहां तक कहा कि बिहार को विशेष दर्जा दिए जाने की कोई जरूरत नहीं है। बिहार तो केंद्र द्वारा दी जा रही सामान्य सहायता से ही अपनी तरक्की कर लेगा। अब जनता का ध्यान अपने कुशासन से हटाने के लिए वे विशेष दर्जा देने की मांग को ज्यादा तूल दे रहे हैं। इस मुद्दे को लेकर उन्होंने राजनीतिक ड्रामा करके ‘अधिकार यात्रा’ निकाली। इसमें सरकारी धन का बेजा इस्तेमाल किया गया। दरअसल, सरकारी पैसे से नीतीश ने दिल्ली में शक्ति प्रदर्शन का बड़ा तमाशा कर डाला है। ताकि, एनडीए में वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बना दिए जाएं। ये ओपन सीक्रेट है। वे सरकारी धन का इस्तेमाल करके इस यात्रा के माध्यम से 2014 लोकसभा चुनाव के लिए अपनी पार्टी का प्रचार कर रहे हैं। नीतीश के इस ‘हिडेन’ एजेंडे और दोहरे मापदंड के भांडाफोड़ के लिए हम दीपावली के बाद से ही ‘बिहार बचाओ’ रैलियां कर रहे हैं। 33 जिलों में रैलियां करके नीतीश सरकार के वायदा खिलाफी, भ्रष्टाचार एवं कुशासन के खिलाफ जनता को सचेत कर रहे हैं।

– आप सेक्यूलर राजनीति के बड़े क्षत्रप रहे हैं। यदि एनडीए ने मोदी को ‘पीएम इन वेटिंग’ बनाया, तो क्या आप कांग्रेस के मोर्चे में तत्काल जुड़ना चाहेंगे? पासवान जी इस बारे में क्या हैं आप की पॉलिटिक्स?

मोदी के पीछे गुजरात दंगों का ऐसा जिन्न लगा हुआ है कि वे सात जन्मों तक भारत के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। गुजरात दंगों के तुरंत बाद मैंने एनडीए सरकार के मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। अब एनडीए के मोर्चे में शामिल होने का कोई सवाल ही नहीं है। फिल्हाल, मैं किसी मोर्चे में शामिल नहीं हूं। लेकिन, दलितों, अल्पसंख्यकों व वंचित वर्गों के हकों के लिए संघर्ष करते रहने की हमारी राजनीति है। हम किसी मोड़ पर सेक्यूलर राजनीति से समझौता नहीं कर सकते। क्योंकि, हमारे लिए सत्ता से ज्यादा सिद्धांत की राजनीति की अहमियत हमेशा से रही है।

– बिहार की राजनीति में लालू यादव की राजनीति से आप के रिश्ते बनते-बिगड़ते रहे हैं। लालू की राजनीति को लेकर आप ताजा स्टैंड क्या है?

बिहार में लालू के साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे। क्योंकि, हम लोग सामाजिक न्याय की लड़ाई पूरी ईमानदारी से लड़ रहे हैं। नीतीश सरकार की पाखंडी राजनीति को भी हम मिलजुलकर ध्वस्त करने में लगे हैं। हम केंद्र में मजबूत सेक्यूलर सरकार देखना चाहते हैं। लेकिन, सरकार ऐसी हो, जिसे कि वंचित वर्गों के कल्याण की सच्ची चिंता हो। केवल अमीरों के विकास के लिए विकास दर की चिंता वाली राजनीति को हम स्वीकार नहीं कर सकते। हम चाहते हैं कि देश में वास्तविक मायने में समावेशी विकास हो। इसी के साथ सांप्रदायिक ताकतें अपना मुंह उठाना बंद करें।

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