देश की सारी व्यवस्था अमीरी तथा गरीबी के गहरी खाई के बीच बंट चुकी है. रहने-खाने से लेकर कानून और न्याय तक दो खांचों यानी अमीरी व गरीबी के बीच फिट हो चुके हैं. 16 साल पुराने केस में एक बार भी पेश नहीं हुए सहारा श्री सुब्रत रॉय को अदालत ने बरी कर दिया. साथ ही निचली अदालत ने उनसे जुड़े इस केस को खारिज कर दिया. मामला बदायूं जिले से जुड़ा हुआ है. बिसौली कोर्ट ने सुब्रत रॉय के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया था उसके बाद भी वे अदालत में पेश नहीं हुए.
उनके वकील ने हाजिरी माफी का आवेदन दिया, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया. मामला इस प्रकार है कि बदायूं निवासी अधिवक्ता धनवीर सक्सेना ने सहारा की गोल्डेन स्कीम में पैसा जमा किया था. लेकिन धनवीर को बिना किसी पूर्व सूचना के सहारा ने यह स्कीम बंद कर दी. इसके खिलाफ धनवीर कोर्ट पहुंचे. इस मामले की सुनवाई 16 सालों तक चली. इस दौरान कोर्ट ने सुब्रत रॉय और मैनेजर वेदराम सैलानी को कोर्ट में उपस्थित होने के लिए सम्मन जारी किया, गैर जमानती वारंट जारी किया. इसके बाद भी सुब्रत रॉय कोर्ट में हाजिर नहीं हुए.
उनके अधिवक्ता अमरदीप मिश्रा ने हाजिरी माफी का प्रार्थना पत्र दायर किया, जिसे कोर्ट ने आसानी से स्वीकार कर लिया. इसके बाद मिश्रा ने सुब्रत रॉय तथा वेदराम को दोषमुक्त बताते हुए आरोप मुक्त करने का प्रार्थना पत्र दाखिल किया, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया. इस दौरान सहारा की तरफ से धनवीर को लगभग 14000 रुपये का चेक सौंपा गया. हालांकि कोर्ट में चले मुकदमे के बाद यह चर्चा छिड़ गई है कि न्याय भी अमीर-गरीब के लिए अलग-अलग है. कमजोरों पर फट पड़ने वाली कोर्टें इस मामले में काफी उदार दिखीं.
उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक कोर्ट में सहारा यह मामला हार गया था. इसके बाद सुब्रत रॉय को हाजिर होने के अलावा कोई रास्ता नहीं था, परन्तु उनके लोगों ने इस तरह की व्यवस्था की कि सुब्रत रॉय को न केवल कोर्ट में उपस्थित होने से छूट मिली बल्कि केस भी खारिज कर दिया गया. सूत्रों का कहना है कि इसके लिए कई लोगों को जिम्मेदारी सौंपी गई थी. बताया जा रहा है कि सहारा के रमेश अवस्थी कई बार बदायूं में देखे गए थे. माना जा रहा है कि उनके नेतृत्व में ही गोपनीय तरीके से पूरे मामले को हल करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया गया.








