आदरणीय डॉ नूतन ठाकुर जी, बिलकुल सही सवाल उठाने और प्रेस परिषद चेयरमैन को पत्र भेजने के लिए धन्यवाद। पूरे पेज का यह पेड न्यूज अन्य अखबारों में भी छपा है। चूंकि आप लगातार ऐसे मामले उठा रही हैं, इसलिए मैं कई बिंदुओं पर आपका तथा अन्य मित्रों का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं-
1. जिस पेड न्यूज की आप बात कर रही हैं, उस पेज में खिलाड़ियों एवं हिरोइनों की बड़ी-बड़ी तसवीरों के बीच छोटी सी एक फोटू के नीचे लिखा है- जस्टिस मार्कण्डेय काटजू। मुझे नहीं मालूम कि यह उन्हीं अध्यक्ष, भारतीय प्रेस परिषद के बारे में है अथवा नहीं। लेकिन अगर श्रीमान जी स्वयं वहां उपस्थित रहे हों, तो इस तथाकथित पेड न्यूज पर शायद किसी समुचित कार्रवाई की ज्यादा उम्मीद ठीक नहीं।
2. ऐसे में दूसरे तरीके से गरदन पकड़नी होगी, और इसके लिए आरटीआई एक अच्छा तरीका होगा। जो भी मित्र चाहें, इस पर हाथ आजमा कर देखें, खूब आनंद मिलेगा, थोड़ा कचरा साफ करने का आनंद।
3. मेरा सुझाव है कि इस मामले को पेड न्यूज से आगे एक बड़े दायरे में ले जाकर देखा जाये और कुछ बड़े, बुनियादी सवालों पर चर्चा हो।
4. पूरे पेज के उस पेड न्यूज में लिखा गया था- …. पूर्व राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यपालों, मुख्यमंत्रीगण, कई केंद्रीय मंत्री, 175 से ज्यादा सांसदों और 120 से अधिक वरिष्ठतम ब्यूरोक्रेट्स और उनके परिवार बेबी रोशना को आशीर्वाद देने पहुंचे।
5. उक्त पंक्ति के शब्दों पर गौर करें। राज्यपालों? इस देश में राज्यपाल के लिए महामहिम शब्द का प्रयोग होता है। लेकिन यहां बेरोजगारों, अपराधियों या भिखारियों की तरह राज्यपाल के लिए भी बहुबचन में राज्यपालों शब्द का इस्तेमाल किया गया। यानी अन्नप्राशन जैसे इस एक मामूली कार्यक्रम में थोक के भाव में इत्ते सारे महामहिम पहुंच गये कि उन्हें इज्जत से संबोधित करने तक की फुरसत नहीं मिली। क्या कभी राज्यपाल जैसे अत्यधिक गरिमामय पद के लिए राज्यपालों जैसे शब्द का प्रयोग हुआ होगा ? मुझे नहीं लगता यह शब्द इतना नीचे गिरा हो कभी। महामहिम राज्यपालगण क्षमा करें, यह आपकी मर्यादा को बरकरार रखने की सदिच्छा के तहत जाहिर की गयी पीड़ा है।
6. आखिर पूर्व राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यपालों, मुख्यमंत्रीगण, कई केंद्रीय मंत्री, 175 से ज्यादा सांसदों और 120 से अधिक वरिष्ठतम ब्यूरोक्रेट्स उस एक अन्यथा मामूली से मुंहजुट्ठी या अन्नप्राशन कार्यक्रम में लार टपकाते क्यों पहुंच गये? क्या यह उनके शासकीय या प्रशासनिक दायित्व का अंग था?
7. यह सवाल उस वक्त ज्यादा गंभीर हो जाता है जब आयोजनकर्ता पर सुप्रीम कोर्ट और सेबी जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं द्वारा गंभीर सवाल उठाये गये हों और आयोजनकर्ता द्वारा ऐसे महानुभावों की उपस्थिति का दुरुपयोग अपने शक्ति प्रदर्शन या अपनी हैसियत के विज्ञापन के बतौर कर लिये जाने का पूरा खतरा हो। ऐसा ही हुआ भी है। पूरे पेज के विज्ञापन नुमा समाचार या समाचार नुमा विज्ञापन में महामहिमों की हैसियत छोटे छोटे मॉडलों में नाप दी गयी है। बड़ी हैसियत खिलाड़ियों एवं अभिनेत्रियों को मिली है।
8. भारतीय प्रेस परिषद ने अपने वेबसाइट पर पत्रकारों के लिए एक लंबी चौड़ी आचार संहिता जारी कर रखी है। पूरे 111 पेज की। इसमें मैंने यह तलाशने का प्रयास किया कि भारतीय प्रेस परिषद के माननीय अध्यक्ष के लिए भी कोई आचार संहिता है या नहीं। दुर्भाग्यवश मुझे इस संबंध में एक भी शब्द अब तक नहीं मिल सका है।
9. एक विद्यार्थी का आचरण कैसा हो, किसी महिला के लिए मर्यादा क्या है जैसे विषयों पर बहुतेरे लिखित या अलिखित प्रवचन मिल जायेंगे। लेकिन किसी महामहिम की मर्यादा क्या हो, इस पर मुझे अब तक कुछ नहीं मिल सका है। मैंने भारत का संविधान में सरसरी तौर पर ढूंढ़ा। किसी पूर्व या वर्तमान राष्ट्रपति या राज्यपाल के आचरण के संबंध में किसी आचरण या मर्यादित व्यवहार का कोई उल्लेख नहीं दिखा। जबकि इनके लिए मर्यादित आचरण की अपेक्षा तो पूरे देश का हक बनता है भाई।
10. गुगल सर्च करने पर मंत्री या मुख्यमंत्री तथा नौकरशाहों के आचरण के संबंध में कुछ कोड ऑफ कंडक्ट जरूर मिले। लेकिन इनमें कहीं नहीं मिला कि ऐसे बड़े लोगों को कैसे कार्यक्रमों की शोभा बढ़ानी चाहिए और कैसे आयोजनों से दूर रहना चाहिए। मतलब अगर कोई महानुभव किसी संदिग्ध आचरण वाले आयोजक के साथ अपने संवैधानिक पद की गरिमा को जोड़कर उस पद को कीचड़ में गिराये तो उस पर सवाल उठाने का कोई नियमगत आधार नहीं है।
11. ऐसे में आरटीआई से यह पूछा तो जा ही सकता है कि पूर्व राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यपालों, मुख्यमंत्रीगण, कई केंद्रीय मंत्री, 175 से ज्यादा सांसदों और 120 से अधिक वरिष्ठतम ब्यूरोक्रेट्स आखिर उस कार्यक्रम में किस हैसियत या सरकारी प्रयोजन से गये थे? इनमें से हरेक के कार्यालय के जनसूचना अधिकारी से मार्च महीने में उनकी यात्रा के व्यय एवं उसके प्रयोजन का विवरण मांगा जा सकता है। आखिर सांसदों को भी रेलवे के निशुल्क पास किसी अन्नप्राशन कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने के लिए तो दिये नहीं जाते। देश के संसाधनों को उन पर इसलिए न्योछावर किया जाता है कि वे देश का कुछ भला करें।
12. जाहिर है कि इनमें से हरेक का जवाब होगा कि वे किसी शासकीय प्रयोजन से नहीं बल्कि व्यक्तिगत रिश्ते के कारण उस कार्यक्रम में गये थे। ऐसे में यह तो पूछा जा सकता है कि इस व्यक्तिगत रिश्ते का इतिहास और आधार क्या है? किस तरह का रिश्ता? कब से है यह रिश्ता? क्या मुख्यमंत्री या राज्यपाल या सांसद या नौकरशाह बनने से पहले से है रिश्ता, या कि इन पदों पर आसीन होने के कारण बना यह रिश्ता?
13. आरटीआई से इन महानुभवों के यात्रा के खर्च संबंधी विवरण काफी दिलचस्प जानकारियां उपलब्ध करा सकते हैं। देखा जाये कि आखिर किन-किन लोगों ने किस किस तरह के बहाने मारे।
14. अगर इनके यात्रा व्यय किसी ने प्रायोजित किये तो क्या किसी कोड ऑफ कंडक्ट में ऐसे आफर को स्वीकार करना अनड्यू फेवर की कोटि में नहीं आयेगा? ध्यान रहे कि प्रेस कौंसिल की आचार संहिता के 111 पृष्ठों में से 80 से 84 तक पांच पेज में GUIDELINES ON UNDUE FAVOURS TO JOURNALISTS-1998 यानी पत्रकारों को अनुचित लाभ पहुंचाने संबंधी मार्गदर्शिका भी दी गयी है। जो चीजें पत्रकारों या छोटे अधिकारियों के लिए अनुचित लाभ के दायरे में आती है, वही चीजें महामहिमों के लिए स्वीकार्य कैसे हो सकती है? इसलिए आरटीआई में ऐसे प्रत्येक महानुभव के कार्यालय के जनसूचना अधिकारी से यह सूचना मांगी जा सकती है कि महानुभव के मर्यादित आचरण के बारे में कोई आचार संहिता है या नहीं। अगर है तो हमें दीजिये। अगर हर जगह से पता चलता है कि उन्हें छुट्टे सांढ़ की तरह विचरण की आजादी है तो कल देश यह मांग करने लायक तो होगा कि भइया सारी लाज शरम अकेले हमारे लिए क्यों, आप अपने लिए भी तो थोड़े तौर-तरीकों की सूची बना लें।
15. नूतन जी, आपको और अमिताभ भाई साहब को कोटि-कोटि धन्यवाद कि आप दोनों ने इस देश का कचरा साफ करने का अभियान चला रखा है। हम सचमुच बेहद संकट के दौर से गुजर रहे हैं। अक्सर एक पंक्ति पढ़ने को मिल जाती है- उन लोगों को महिमामंडित मत करो जिन्होंने गलत तरीकों से सफलता हासिल की हो। दुखद है कि जिनसे मर्यादित आचरण की अपेक्षा की जाती है, वे स्वयं अपने पदों की गरिमा भूलकर राज्यपालों की अपमानजनक श्रेणी में जा खड़े होते हैं।
16. मैं समझ नहीं पा रहा कि पंचसितारा होटल में एक प्लेट लजीज भोजन से ज्यादा आखिर कौन सी दूसरी चीज कुछ महानुभवों के लिए उत्प्रेरक का काम कर रही होगी? ऐसे महानतम पदों पर पहुंच चुके लोगों को किस बात का लोभ शेष रह गया है? अब और कैसा सहारा पाने के लिए भटक रही हैं इनकी आत्माएं?
17. और हां, जो बात आरटीआई से नहीं पूछी जा सकती लेकिन जिसे इस देश के नौजवान पूछ सकते हैं, वह यह कि इन महानुभावों ने अपने सगे-संबंधियों एवं कार्यकर्ताओं के घरों में कितने बच्चों की मुंहजुट्ठी या अन्नप्राशन की शोभा बढ़ायी?
18. और इ बाबा रामदेव का स्वाभिमान कहां गुम हो गया?
आपके अभियान के लिए शुभकामना। आशा है, ऐसे सवालों को आज नहीं तो कल कोई जरूर उठायेगा। इस प्रसंग में न सही तो किसी अन्य प्रसंग में। और तब यह भी मांग उठेगी कि ऐसे महानुभावों को भी किसी स्पष्ट आचार संहिता में बांधा जाये।
डॉ विष्णु राजगढ़िया
वरिष्ठ पत्रकार
मूल खबर-
डा. नूतन ठाकुर ने जागरण और उजाला में प्रकाशित सहारा के पेड न्यूज की शिकायत पीसीआई से की





