Yashwant Singh : अगर तुम लोगों की तरह पत्रकारों का संगठन चला रहा होता या पत्रकारों की राजनीति कर रहा होता तो वह नहीं लिख पाता जो मैं लिखता आया हूं या जो लिख रहा हूं.. इसी बहाने मैं कहना चाहूंगा कि ज्यादातर पत्रकार संगठन सत्ता के दलाल, दलाली करने वालों के सूत्रधार, दलालों के संरक्षक, दलालों के दोस्त, सुख सुविधाओं का विस्तार करने को उत्सुक वालों के सदस्य, मीडिया के नाम पर नेताओं से झपटने को तैयार लोगों के हमराही, ज्ञापन मांगपत्र के नाम पर खुद को मीडिया के लाइमलाइट में रखने वाले लोगों का मुख्य अड्डा, मीडिया नेताओं नौकरशाहों के बीच का दलालपुल होने के कारण दलाली को हुंकारने और दलाली को सरोकार के नाम पर कायम रखने रहने के लिए तत्पर लोगों का आश्रयस्थल, मीडिया शब्द के जरिए मानवाधिकार, शोषण, संघर्ष, सरोकार जैसे शब्दों को बेचने का सबसे सुरक्षित स्थल मानने वालों का आखिरी व सुरक्षित शरणस्थली है….एक लाइन में कहें तो लफंगो, दलालों और पीआर वाले पत्रकारों का अड्डा है…. ज्यादा अच्छा है कि ये पत्रकार संगठन मर जाएं क्योंकि इन संगठनों और इससे जुड़े लोगों ने मीडिया मालिकों, नेताओं, अफसरों से सांठगांठ कर अच्छे पत्रकारों और अच्छी पत्रकारिता का जीना मुहाल कर दिया है….
Rajeev Pratap Saini hzaar take ki baat guru
Ahmad Raza त्रकारिता की वाणिज्यिक खेती और बंधुआ पत्रकार… आज जेहन में ख्याल आया कि पत्रकारिता भी देश में एक उभरती अर्थव्यवस्था है। इसमें मीडिया कंपनियां शामिल हैं। ये दो प्रकार की हैं प्रिंटऔर इलेक्टानिक।प्रिंटमें अखबार है तो इलेक्टानिक में चैनल्स हैं।इन्हें यदि छोटे अखबारों को सीमांत भूमिक और बडों को दीर्घ भूमिक की संज्ञा दें तो शायद गलत नहीं होगा।रही बात मजदूरों की तो इनमें काम करने वाले पत्रकार और तकनीशियन कामगार की श्रेणी में रखे जा सकते हैं।जिस प्रकार बडी खेतीबारी में बडी मशीने और कुशल कारीगर ज्यादा पैसे पर लगाए जाते हैं उसी प्रकार मीडिया में भी बडी कंपनियों में 5—5 लाख वेतन पर पत्रकार रखे जाते हैं। लेकिन यहां मेरा इशारा सीमांत कामगारों की ओर है जिनकी हालत ठीक बंधुआ मजदूरों की तरह होती है,जिंहें रखते समय ना तो किसी प्रकार का करार होता है ना ही कोई कानूनी कार्रवाई। उनकी बस दशा का पफायदा उठाकर सीमांत जमींदा या तुटपुजिए मालिक उनका निरंतर शोषण कर रहे हैं। देशकी मीडिया का एक बडा हिस्सा ऐसे लोगों से भरा है,जो बिना किसी भय के कापफी शीक्षित और काबिल पत्रकारों की जिंदगी से खेल रहे हैं। उनके खिलापफ आवाज उठाने वाला कोई नहीं है। यहां मै मीडिया के श्याम पहलू पर प्रकाश डाल रहा हूं। शायद यही स्थिति कमोवेश हर असंगठित क्षेत्र की है। लाखों काबिल युवा ऐसे ही चाकी में पिस रहे हैं, कराह रहे हैं। और देश में सर्वाधिक युवाशक्ति की बात हमारे नीति निर्धारक और योजना आयोग के लोग करते हैं। स्थ्िित आइने की तरह सापफ है। 20 सालों बाद यही युवा देश पर भार बन सकते हैं। सरकार की तंद्रा तोडना होगा।
Vinay Maurya Ek dam sahi…….
विभांशु यादव लगे रहो चंपुओं
Vinay Singh Yashwant bhai.. Koi bhi kaam target oriented hota hai, Desh jab gulam tha tab journalism ya politics desh ko gulami ki janjee se hataane ke liye hoti thi lekin aaj kya hai, sab power politics me uljhe hue hai sabka taarget hai paisa aur vo bhi aasani se mil jaane wala paisa to uprokt baate to jhelni hi padegi swasth patrakarita karne walo ko..
विभांशु यादव अँधेरी रात में दिया तेरे हाथ में की भीड़ का शोले
S M Pari Pari bilkul sahi
Harishankar Singh ajj aag jali hai dhu dhu karke
Mukesh Mahto आपके इस सराहनिय कदम की हम तहे दिल से स्वागत करते हैं और आशा करते हैं कि सरकार और गलत लोगों की भंडाफोड़़ करने के काल्पनिक संस्था मीडिया नामक संस्था का भंडाफोड़ आप यूं ही जिम्मेदारी से करते रहेंगे।
Harishankar Shahi मतलब पत्रकारिता खतरे में है…..
Atul Srivastav चलो भईया कम से कम सोशल मीडिया तो है न।
Kislay Gaurav पत्रकारिता के इस घिनौने दौर में मैं आपको Yashwant Singh एक युग-प्रवर्तक के तौर पर देखता हूँ।। इस देश को और हम सबको आपसे बहुत सारी उम्मीदे है, भगवन से मेरी यही प्रार्थना रहेगी की आप किसी भी परिस्थिति में अपने पथ से विचलित न हो।। हम आपको अपना आदर्श मानते हुए हर कदम पर आपके साथ रहने को तैयार है।। हमे आप पर गर्व है आप हमेशा आगे बढ़ते रहे।।।
Faris Ansari Bagi Bahut kadwa aur kasaila hai…..lekin kya kijiye….satya aise he hota hai…..
Anuj Mittal Yashwant bhai aapki bat se sahmat hoo. lekin \dil par hath rakh kar kahna ke aapne kabhi kuch nahi chipaya ya fir kisi ki chamchagiri mai nahi likha apne bhadas par.
Dhirendra Pandey यशवंत भाई ये बताओ कि क्या अभी भी बड़े दे अखबारों को कागज़ पर सब्सिडी मिलती है ? और क्या क्या सरकारी छूट मिलती हैं ?
Asghar Naqui yashwant bhai jo kuch aapne likha hai wo katu such hai, lekin 1jati warg vishesh ne media ko sabse zada dushit kiya hai. Jiska alam ye hai ki ab khud ko patrakar kahne me sharm aati hai. 1 taza udharan hum aur mere sath 1 aur patrakar bandhu chaye pi rahe the usi samay 2 sajjan aye wo galban thekedar the kisi sarak ka kam kra rahe the kisi patrakar ne unhe rob dikya jis per charcha ker rahe the jabhi 2re sajjan ne kaha sale dalal hai 200 de diya hota chup ho jata.
Rita Das 12 aana sach….
Mohammad Anas यशवंत भाई आपको सलाम है
Arvind Kumar Yashwant bhai aapki kalam isi raftaar se chalti rhe.. god aapke kalam ki gti ko yathavt bnaye rkhe.. jai hind jai bharat.
Shashi Shekhar Yashwant bhai , aapne vishwabyapi sachchaai bayaan ki hai … Aapko shat-shat naman … Iss vishwas ke sath ki aage bhi aapke kadam suchch ke sath Angad ke paaon ki bhaanti teeke rahengey …
Sunit Nigam नेताओं और भ्रस्टाचार के बीच पूल का काम करते है ये पत्रकार संगठन
Diwakar Dev Srivastava kadawa sach hai sir ha ha ha
Care Naman Bahut hai bhai jayda kahoge to kuch log aatmhatya kar lenge taarif ke karan
Raman Devasar very much right sir
Jitendra Kumar Khanna KADVA SACH.
Shambhu Dayal Vajpayee अपनी नेतागीरी चमकाने की फिराक में ही रहते हैं।
Samarth Saraswat ये एनडीटीवी वाले तो खुल के दलाली कर रहे हैं।
लोकेश सालारपुरी यार इतना कडुआ बोलता हुआ कोई पत्रकार सचमुच अच्छा लग लग रहा है …..अभी भी दुनिया जीने लायक है ……
Jitu Patil yashwant ji, Aapki kalam jarur kranti layegi…. Ab kehna padega Ummid pe duniya to nahi par BHARAT kayam rahega. Ummid hai aapne chuni hui sahi rah shayad aur bhi media wale chune. Dhanyawad. Jai hind.
Narendra Mishra Jaagna v jagaana jaruri ..bahut ..Badhai aapko ..Bilkul Hadd ho gyaa h.
Shailesh Singh Darr ek aisi chij hai Jise manusya apni jindgi se hata de to kuchh bhi smbhaw hai aam aadmi ko kuchh mutthi Bhar logo ne itna Dara diya hai ki jiyo to gulaam bankar. Bina unki rahnumai ke aam aadmi ke jiwan me ek patta bhi nahi hil sakta, ya yu kah lijiye ki bina chadawe ke ashirwad nahi mil sakta. Ise badlna hi hoga
Subhash Tripathi Kafi kuchh sach hai Com.
Shanker Dev Tiwari जल्दबाजी ठीक नहीं
Pramod Kumar sawal kewal patrakaro ka nahi,samaj me aayi bikriti ka hai,jab aaj bayaktigat ristye bhi vyapar me badal gaye to samacharpatra aur media to vyapario ke hai hi jo unaki hitpurty ke liye hi hai.
S.u. Saiyad BILKUL SACH HAI.
Nitin Sabrangi बेबाक!
Subhash Tripathi Mera yaadein to hoti hi kabsurat post poora padiye maine aapke issues par hi likha hai com.
Shravan Kumar Shukla हाँ. बिलकुल ठीक कहा आपने.. ! फख्र है, हमें आप इस रूप में मिले..!
Sunil Choudhary right ji
Virendra Pandey dil ki baat kisi ki juban pe to aai…than ji
Ashish Tiwari mn ki baat kh diya hai aapne i am praud of you bhaiya
शिव प्रसाद सजग बागों से ज्यादा फुल है फुलों की दुकान में || अगर मैं सच्ची बात करूँ गुस्ताखी होगी शान में ||
Kiran Verma :Yashwant Singh: लगता है कि Media से कोई गहरी चोट खाई है। लेकिन जो भी कहा है सत्य है।
Vivek Shrivastava Jis tarah se BAR council hai CA CS CIMA hai waise he professional body aap patrakaar mitron ki bhi honi chaahiye
Prince Zuber true
Tp Singh chutiyam sulfet ki dukaan banata ja raha hai PATRAKARITA
Jitendra Choubey Ghanghor satya… Dalaal bhi apse sahmat honge..
Gh Qadir bilkul damdaar sachchayee bayan kari hai aapne…aapki JAI ho…
Vidya Shankar Ojha Sir you are great
Vikram Sharma yashwant bhai aap naam se hi nahi kaam se bhi yashwant ho,i m agree wid u
Sunil Bajpai kya bhai itana ktu satya likhana un besrmon ko atamhatya ke leye majbur kar sakta hai ya nahi kahin bhagvan bhi to nahi darta inse
Shivdayal Pandey itna tuta hu ki chhune se bikhar jaunga
Naveen Nigam like
Yugal Kishore Saran Shastri akhbar malik bde dlal hote hain, uski bhi chrcha kriye
Siddharth Kalhans अच्छा किया जो बता दिया कि हम गैर पत्रकार हैं
प्रयाग पाण्डे यशवंत भाई ! यहाँ मैं आंशिक रूप से असहमत हूँ । आप एक विचारवान एवं प्रबुद्ध पत्रकार हैं । पत्रकार की कलम से निकले हर शब्द का मूल्य होता है । निहितार्थ होते हैं । लिहाजा बिना परखे किसी के बारे में पूर्व धारणा बना लेना शायद अनुचित होगा ।सभी लोगों को एक ही नजरिये से देखना / परखना भी ठीक नहीं होगा । आम तौर पर यूनियनों का मतलब चंदाखोरी ही नहीं होता है । हम लोग अलग राज्य बनने के बाद से उत्तराखंड में श्रमजीवी पत्रकार यूनियन से सतत जुड़े हैं । इस दरम्यान हमें कई राष्ट्रीय स्तर के अच्छे कार्यक्रम करने का सुअवसर मिला है । लेकिन हमने आजतक कभी किसी भी स्तर पर चंदा न माँगा न लिया । यूनियन का सारा खर्च सदस्यता शुल्क या आपसी सहयोग से चला लेते हैं ।यहाँ सवाल वो नहीं जो आप उठा रहे हैं । सवाल वैचारिक है । सैद्धांतिक है । मेरी समझ से इस मुद्दे को व्यापक परिपेक्ष्य में देखे जाने की दरकार है ।
आप वाकिफ हैं कि खुली अर्थ व्यवस्था के मौजूदा दौर ने पत्रकार यूनियन ही नहीं सभी ट्रेड यूनियनों को हासिये में धकेल दिया है । इनमें पत्रकारों की ट्रेड यूनियनों की हालत सबसे ज्यादा ख़राब है । मेरी अल्प समझ से इसकी दो वजहें हैं । पहला – पत्रकार यूनियनों का दलाल नेतृत्व । दूसरी वजह खुद पत्रकार साथी स्वयं हैं ।हमारा मानना है कि सभी समाचार समूहों में काम कर रहे पत्रकार और गैर पत्रकार विशुद्ध रूप से "श्रमजीवी " हैं । पर इनमें से ज्यादातर पत्रकारों को अपने को "श्रमजीवी " कहने और कहलाने में शर्म महसूस होती है । माना कि अधिकांश समाचार समूह श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकारों की एकजुटता के पक्षधर नहीं हैं । समाचार समूहों को श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकारों का एका और उनकी यूनियनें कतई रास नहीं आती हैं । " किसी यूनियन के सदस्य नहीं बनना " अब ज्यादातर समाचार – पत्रों में नियुक्ति पाने की पहली शर्त होती है । पत्रकार यूनियनों को आए रोज जी भरकर गरियाने वाले कुछ नामचीन बड़े पत्रकार भी गाहे – बगाहे मौका आने पर पत्रकार यूनियनों की उर्जा का इस्तेमाल करने से चूकते नहीं हैं । भले ही ज्यादातर समाचार – पत्रों की नीति यूनियन विरोधी हो । इसका मतलब यह कतई नहीं है कि अभिव्यक्ति और समाजोन्मुख जनपक्षीय पत्रकारिता की प्रबल पक्षधर पत्रकार अपने खुद के और व्यापक समाज के हित में यूनियनों से न जुड़ें । आज हालत यह है कि असल श्रमजीवी पत्रकार व्यक्तिगत और पेशेगत वजहों के चलते यूनियनों से जुड़ने को तैयार नहीं हैं । असल और पेशेवर पत्रकार यूनियन से नहीं जुड़ते तो उनकी जगह दूसरी प्रजाति के पत्रकारों से भर जाती है । जिनका लक्ष्य , समूची पत्रकार विरादरी या पत्रकारीय पेशे के व्यापक हितों के बजाय निजी स्वार्थ सिद्धि ज्यादा होता है । नतीजन एक मेहनतकश और ईमानदार पत्रकार के मानस में यूनियनों के प्रति घृणा घर कर जाती है । इसका एक ही ईलाज है कि पत्रकारीय पेशे के प्रति ईमानदार और दृष्टिवान पत्रकार आगे आयें । पत्रकार यूनियनों में कुंडली मारे दलालों को बहार का रास्ता दिखाएँ । आज असल पत्रकार के बौद्धिक श्रम , उर्जा और पत्रकारीय आभा को दूसरे लोग सरे बाजार बेचने में संलग्न हैं । असल पत्रकार दूर खड़ा अपनी बौद्धिक सम्पत्ति की खुली लूट का मूक दर्शक बना हुआ है । गलती किसकी है ?।
Yashwant Singh प्रयाग पांडेय जी. मैंने 'ज्यादातर' शब्द लिखा है, 'सभी' नहीं. जेनुइन संगठन और जेनुइन राजनीति भी देश में है. आखिरकार व्यवस्था परिवर्तन राजनीति के जरिए ही संभव है. इसलिए सभी राजनीति और सभी संगठन को गलत कहने वाला राजनीतिक समझ के लिहाज से अपरिपक्व ही कहा जाएगा… मैं आपके प्रयासों और जमीनी स्तर पर काम का काफी सम्मान करता हूं. मैं आपके लिखे से सहमत हूं.
भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.





