: अपनी खौफनाक रेल यात्रा की कहानी, भूमिका राय की जुबानी : सबसे पहले विज्ञान को सलाम क्योंकि उस अकेले सफर में मेरे पास मोबाइल, लैपटॉप के अलावा कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे मैं अपनी मदद कर पाती। फिर उन सभी को जिन्होंने अपने-अपने तरीके से मेरी मदद की। यशवंत सर, अमिताभ सर और जैन सर को खासतौर पर…क्योंकि उन बेहद कठिन क्षणों में जबकि हाथ-पैर होते हुए भी मैं खुद को लाचार महसूस कर रही थी….आप सभी ने मेरी मदद की और इस सफर को ‘सफ़र’ नहीं बनने दिया।
दिल्ली से लखनऊ और लखनऊ से दिल्ली का सफर कोई नया नहीं है और ऐसा पहली बार भी नहीं है कि मैं अकेले सफर कर रही थी। स्कूल के वक्त से अकेले ही आती-जाती रही हूं लेकिन ऐसा अनुभव पहली बार हुआ। पुरानी दिल्ली से फैजाबाद एक्सप्रेस थी, s2 बोगी जिससे लखनऊ जाना था। स्लीपर क्लास से जाना मजबूरी थी क्योंकि टिकट की मारामारी में थर्ड और बाकी एसी कोच सबसे पहले भर जाते हैं…आज ही लखनऊ पहुंचना जरूरी था सो स्लीपर में ही बुकिंग करा ली। गाजियाबाद तक का सफर हमेशा की तरह ही था…एक आम जर्नी की तरह लेकिन गाजियाबाद आते ही मानो जनसैलाब उमड़ आया, कुछ वैसा ही जैसा चीटीं के बिल में पानी डाल देने पर हजारों चीटियां भरभरा कर बाहर निकल आती हैं।
लेटी हुई थी और हो-हल्ला इतना तेज हुआ कि उठ के बैठ गई…और पलक झपकते ही ५-६ लड़के मेरी ६ नंबर की बर्थ पर चढ़ आए। आप सब भी रेलयात्रा करते होंगे अनुमान लगा सकते हैं कि ५-६लोग और एक मैं किस तरह के हालात होंगे…। आराम से कहा, भइया आप लोग इस पर से उतर जाइये ये मेरी सीट है पर वो नहीं उतरे…थोड़ा चीखकर बोला तो न जाने क्या सोचकर उतर गए। उस ग्रुप के कुछ लोग आगे के कंपार्टमेंट में थे, उसमें से एक ने आवाज देकर उन सभी को बुला लिया और करीब २०-२५ बैग मेरी बर्थ पर फेंक दिये…जिसे मैंने उतारने के लिए कहा…नहीं सुना तो मैंने नीचे गिरा दिये….और उसके बाद दौर शुरू हुआ उन सारी बातों को सुनने का जो शायद मैं कभी दोबारा न सुनना चाहूं…मां-बहन की गाली, वो तमाम गालियां जो अभद्रता की किताब में टॉप पर होंगी, और ना जाने क्या-क्या। डर तब लगने लगा, जब एक ने कहा कि हापुड़ रूकने पर इनको बताएंगे… वहीं इनका क्रिया-कर्म कर देंगे। हिरोइन बन रही है— ।
याद नहीं करना चाहती उन बातों को पर भूल भी नहीं पा रही हूं कि कैसे वो मुझे लगातार गालियां दे रहे थे, घूर रहे थे, हर एंगल से निरीक्षण कर रहे थे..मेरे लैपटॉप को फेंक देने की बात कर रहे थे, और डरावनी हंसी हंस रहे थे। हापुड़ की लोकल जबान पूरी तो समझ नहीं आ रही थी लेकिन उनके हाव-भाव से साफ था कि वो मुझे कुछ नुकसान जरूर पहुंचाएंगे। फेसबुक पर अपडेट किया उन हालातों को…लेकिन उससे क्या होना था कोई मदद तो आती नहीं..हां मेंटली ये सोच डेवलप हुई कि मेरी बात कुछ लोग सुन रहे हैं..क्योंकि जो मेरे साथ थे उन्होंने तो अपनी इंद्रियों पर ताले जड़ रखे थे। किसी के मुंह से एक बकार तक नहीं निकली… बल्कि उन घटिया टिप्णियों का वो भी दिल खोलकर मजा ले रहे थे…। पता तो था कि इन लोगों के आगे अगर मेरा खून भी हो जाए तो ये कंबल में सिर छिपाकर सोने से ज्यादा कुछ नहीं करेंगे।
शायद नाटकीय लगे लेकिन मोबाइल में केवल १९ रूपए और बैट्री मश्किल से १५ मिनट के लिए शेष थी..यशवंत जी को फोन किया लेकिन बहुत उम्मीद नहीं थी कि वो कुछ कर पाएंगे क्योकि गाजियाबाद और हापुड़ के बीच में तो शक्तिमान ही आ सकता है…कोई इंसान नहीं। उन्होंने बस इतना कहा कि धीरज रखो..और शांत होकर लेटी रहो..कुछ रिएक्ट मत करना,मैं देखता हूं कि क्या कर सकता हूं। थोड़ा धैर्य बंधा..उसके बाद उन्होंने अमिताभ सर और अमिताभ सर ने वीके जैन सर को सारी सिच्युएशन बताई। इस बीच लगातार ऑनलाइन रिएक्शन आ रहे थे, सच बताऊं शब्दों की ताकत थी जो उन आधे घण्टों को झेल पाई. नहीं पता अमिताभ सर ने जैन सर से किस तरह और क्या कहा लेकिन यशवंत सर ने बताया कि टेंशन नहीं लो हापुड़ में लोग आ जाएंगे। अमिताभ सर और जैन सर को जितनी बार भी थैंक्यू बोलूं , कम ही लगेगा कि अपने कामों के बीच में मेरी मदद के लिए वक्त निकाला वो भी उस वक्त जब मैं लगभग किसी से मदद की उम्मीद खो चुकी थी। गाजियाबाद से जो मेंटली टॉर्चर शुरू हुआ वो टुण्डला जाकर थमा.. ट्रेन रूकते ही कुछ सिपाही आए और मुझे एड्रेस करके पूछा मैडम कौन हैं वो लोग, इससे पहले की मैं बताती वो लड़के पीछे के गेट से छलांग मार चुके थे लेकिन एक धरा गया। मुरादाबाद तक पुलिस के ३ सिपाही मेरे साथ आए… और आगे के लिए ट्रेन में तैनात सिपाही का फोन नंबर दे गए कि कुछ परेशानी हो तो बता दीजिएगा।
अभी लखनऊ में हूं लेकिन भूल नहीं पा रही हूं वो आधे-पौन घण्टे का जलील होना, अपने ही सामने खुद के लिए गालियां सुनना, बेइज्जत होना, मारने के लिए कहना और वो सबकुछ जो आपके दिमाग में एक लड़की के लिए सबसे बुरा होता हो…। इस बुराई के अलावा कुछ बातों से खुश भी हूं कि उन तमाम नपुंसकों ( मेरे साथ,जिनकी खुद की सीट भी उनसे छिन गई थी) के बीच में कम से कम मेरी आवाज मरी नहीं थी, जहां उन्हें मेरा सपोर्ट करना चाहिए था वो कंबल में मुंह ढापे पड़े हुए थे। पुलिस की कार्रवाई से खुश हूं कि अगर उन्हें सूचना हो तो वो मदद जरूर करेंगे और परेशान इसलिए कि अगर मेरे पास मोबाइल नहीं होता, लैपटॉप नहीं होता तो मेरा क्या होता..और अगर पढ़े-लिखे होने के बाद, वो भी मीडिया जैसे बोल्ड प्रोफेशन से जुड़े होने के बाद मेरी ये हालत है तो उन लड़कियों के साथ क्या होता होगा जो पहली बार घर से बाहर निकलती हैं.. और जिनके पास कोई मदद नहीं पहुंच पाती होगी।
अभी घर वाले बेहद तनाव में हैं, आफत भले टल गई हो लेकिन उनके मन में संदेह भर गया है, शायद वो अब मुझे अकेले यात्रा करने से मना भी करें जो बंदिश नहीं डर हो लेकिन इस एक घटना ने बहुत कुछ सिखाया है, अच्छा-बुरा दोनों। ये समझने की बात है कि प्रशासन हरएक के साथ तो खड़ा नहीं हो सकता, समाज को ही समाज की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठानी होगी…क्योंकि समाज को खतरा भी समाज के लोगों से ही है। अगर उस वक्त मेरे कोच के सभी लोगों ने आवाज उठाई होती तो स्थिति इतनी बुरी नहीं होती, पर उन्होंने खुद को इस लफड़े से दूर रखने में ही समझदारी समझी…लेकिन कब तक, कल उनकी लड़कियां भी जाएंगी और यही फेस करेंगी, अभी की चुप्पी ही कल की आफत को न्यौता है। और रही बात प्रशासन की तो अनुरोध है कि हापुड़, टुण्डला जैसे इन तमाम स्टेशनों पर सुरक्षा व्यवस्था के लिए कोई ठोस कदम उठाए, और इन गिरोहों को सही सबक सिखाए…ताकि घर से बाहर
निकला डर के पर्याय न बने।
लेखिका भूमिका राय युवा पत्रकार हैं. भारतीय विद्या भवन, दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई में टॉप करने के बाद दिल्ली से प्रकाशित एक हिंदी अखबार में कुछ समय तक काम किया. फिलहाल ईटीवी, लखनऊ में कार्यरत हैं. भूमिका के संस्मरण को उनके ब्लाग बतकुचनी से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.
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