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हाई कोर्ट ने कहा – अवैध विज्ञापनों पर एफआईआर दर्ज कराएं, फिर कोर्ट आएं

औषधि एवं जादुई उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम 1954 के प्रावधानों का उल्लंघन किये जाने सम्बंधित जनहित याचिका में इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच ने याचीगण को एफआईआर दर्ज कराये जाने के वैकैल्पिक उपाय अपनाने के निर्देश देते हुए याचिका निस्तारित कर दिया.

औषधि एवं जादुई उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम 1954 के प्रावधानों का उल्लंघन किये जाने सम्बंधित जनहित याचिका में इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच ने याचीगण को एफआईआर दर्ज कराये जाने के वैकैल्पिक उपाय अपनाने के निर्देश देते हुए याचिका निस्तारित कर दिया.

जस्टिस उमा नाथ सिंह और जस्टिस डॉ. सतीश चंद्र की बेंच ने याची लखनऊ स्थित आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर को आदेशित किया कि चूँकि इस मामले में एफआईआर दर्ज करने की व्यवस्था है, अतः याचीगण पहले उसका प्रयोग करें और यदि उन्हें उस स्तर पर समुचित राहत नहीं मिलती है तो वे पुनः हाई कोर्ट आ सकते हैं.

याचिका में अमिताभ और नूतन ने यह प्रार्थना की थी कि इस एक्ट की धारा 3 के अनुसार लोगों की सेक्स क्षमता की वृद्धि, महिला के गर्भ धारण, मासिक धर्म, डायबेटीज, अन्धता, बहरापन, पागलपन, सफ़ेद दाग, मोटापा सहित 54 बीमारियों से जुड़े किसी भी प्रकार के विज्ञापन पर पूरी तरह रोक है, जबकि  धारा 5 में सभी प्रकार के जादुई उपचार, जैसे तंत्र-मन्त्र, कवच, ताबीज से जुड़े विज्ञापनों पर प्रतिबन्ध है.

धारा 7 के अनुसार इस संज्ञेय अपराध में छह माह से एक साल तक की सजा है. अतः सूचना और प्रसारण मंत्रालय, आरएनआई तथा डीएवीपी को निर्देशित किया जाए कि किसी भी समाचारपत्र तथा टीवी चैनल पर इस प्रकार के गैर-कानूनी विज्ञापन नहीं प्रसारित होंगे और यदि ऐसे विज्ञापन छपते या प्रसारित होते हैं तो सम्बंधित समाचारपत्र अथवा टीवी चैनल के खिलाफ आपराधिक और प्रशासनिक कार्यवाही की जाये.

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