एक पत्रकार अपने जीवन में क्या कमा पाता है? कुछ थोड़ी बहुत स्टोरीज, ढेर सारी गल्प और थोथे दावे। रंगीन फोटो फेसबुक पर डालकर खुश भले हो लें लेकिन हकीकत यही है कि ताउम्र नौकरी की दरकार उसे होती है। पेंशन उसके पास होती नहीं और घर से अगर पोढ़े होते तो पत्रकारिता काहे को करते जिसके बारे में आज भी लोग कहते हैं कि अच्छा आप पत्रकारिता करते हैं तो रोटी के लिए और क्या करते हैं? यानी अगले आदमी को भरोसा ही नहीं होता कि पत्रकारिता से आदमी इज्जत की दो रोटी कमा सकता है।
जीवन भर पत्रकार बने रहने के बाद अगर उसने कोई दलाली नहीं की और जमीन की खरीद-फरोख्त का धंधा नहीं किया अथवा किसी राजनेता की चप्पलें नहीं उठाईं तो भले वह किस्से सुना ले पर सत्य तो यह है कि जीवन की सांझ उसे अन्य बूढ़े ठालों की तरह ताश के पत्ते खेलते हुए अथवा मार्निंग वाक करते हुए नहीं बल्कि प्रूफ पढ़ते हुए अनुवाद करते हुए या फिर किसी पत्रकार ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में अध्यापन करते हुए काटनी होगी। छपने से इतना पैसा नहीं मिलता कि एक पत्रकार सिर्फ लेख लिखकर बाकी का जीवन काट ले।
दिल्ली एनसीआर में कहने को तो रोजगार की कमी नहीं है लेकिन रिटायरमेंट के बाद कोई सम्मानजनक काम नहीं मिलता। या तो आप किसी गुटविशेष से जुड़े हों अथवा किसी खेमेबाज के यहां पीर, बवर्ची, भिश्ती या खर का काम करने को तैयार हों तभी आप जिंदा रह सकते हैं। यहां यह नहीं पूछा जाता कि कामरेड आपकी राजनीति क्या है? बल्कि यह पूछा जाता है कि कामरेड आप किस बिरादरी के हो, आप मोदी समर्थक हो कि नहीं और आप कहां के रहने वाले हो? आप बने रहिए फन्ने खां लेकिन अपने मन में, हकीकत में तो आप कुछ नहीं होते हैं इन खेमेबाजों के सामने।
लखनऊ के पत्रकार खुश होंगे कि उनके अनुरोध को अखिलेश यादव ने मान लिया और अब संजय गांधी पीजीआई में उसका मुफ्त इलाज होगा लेकिन वह भी गिने-चुने मान्यता प्राप्त पत्रकारों को जिन्होंने जीवन भर डेस्क पर काम किया या संपादक ने उसे मान्यता नहीं दिलवाई तो ऐसे पत्रकारों का क्या होगा वे इलाज के अभाव में दम तोड़ते रहेंगे ओर कोई पत्रकार संगठन उनके लिए नहीं खड़ा होगा।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से साभार.






