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संघ परिवार के लिए नई चिंता का वक्त

बीजेपी की चिंता करनेवाले संघ परिवार के लिए नया जमाना, नई चिंताओं की चिता सजा रहा है। चिंता यह है कि संघ परिवार में स्वयंसेवकों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। उसकी फौज में नई भर्ती नहीं हो रही है। हो भी रही है तो बहुत कम। इतनी कम कि आंकड़ा गिनाने पर संतोष तो नहीं होता, पर चिंता की लहर जरूर निकलती है। देश भर में लगनेवाली शाखाओं में कमी आई है और प्रचारकों की ताकतवर फौज भी पहले जितनी बड़ी नहीं रही।

बीजेपी की चिंता करनेवाले संघ परिवार के लिए नया जमाना, नई चिंताओं की चिता सजा रहा है। चिंता यह है कि संघ परिवार में स्वयंसेवकों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। उसकी फौज में नई भर्ती नहीं हो रही है। हो भी रही है तो बहुत कम। इतनी कम कि आंकड़ा गिनाने पर संतोष तो नहीं होता, पर चिंता की लहर जरूर निकलती है। देश भर में लगनेवाली शाखाओं में कमी आई है और प्रचारकों की ताकतवर फौज भी पहले जितनी बड़ी नहीं रही।

चिंता का कारण यह भी है कि नई पीढ़ी का संघ के प्रति आकर्षण कम हुआ है। संघ की शाखाओं में युवाओं की संख्या कम हुई है। होने को भले ही यह संघ परिवार का अंदरूनी मामला है, पर संघ परिवार पर लगनेवाले सांप्रदायिकता के आरोप से कहीं ज्यादा चिंताजनक है। बीते दो दशक में जितनी तेजी से जनसंख्या बढ़ी है और  इस जनसंख्या में जितनी तेजी से हमारे देश में युवा वर्ग का अनुपात बढ़ा है, उस अनुपात के मुकाबले युवा वर्ग संघ परिवार में नहीं है। हालांकि यह सही है कि जो स्वयंसेवक बीते दो दशकों में संघ परिवार से जुड़ गए थे, वे अब भी उसके साथ बने हुए हैं। लेकिन संघ परिवार को इस बात की चिंता सबसे ज्यादा है कि नया युवा उसके साथ उत्साह के साथ नहीं जुड़ पा रहा। संघ परिवार अब पुरानी यादों के सागर में हिचकोले खा रहा है।

एक जमाना था, जब देश के ज्यादातर गांवों, कस्बों और शहरों में संघ की शाखाएं लगा करती थी। सुबह और शाम दोनों वक्त इन शाखाओं में बड़ी संख्या में लोग भाग लिया करते थे। मुंह अंधेरे लोग सफेद शर्ट और खाकी निक्कर पहने हाथ में दंड़ लिए घर से निकल कर सुबह पांच बजे भगवा ध्वज के सामने ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे, त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम्’ के गीत गाया करते थे। शाम को भी गांव गांव – गली गली यही माहौल हुआ करता था। झुंड के झुंड शाखाओं में उमड़ते थे। सुबह की शाखाओं में ज्यादातर युवा, विवाहित और चालीस पार के लोग देखे जाते थे। और शाम की शाखाओं में छात्रों व किशोरावस्था को पार कर रहे युवाओं का मेला लगा करता था। शाम की शाखाओं में आनेवाले यही बच्चे और छात्र बड़े होकर बाद के दिनों में सुबह की शाखाओं में जाया करते थे और शाम की शाखा किसी और गांव या गली में लगाया करते थे।

लेकिन छोटे गांवों, बड़े कस्बों और महानगर की रूप धरते शहरों से संघ की शाखाएं लुप्त हो गई हैं। गांव बड़े हो गए, लोग उनसे भी बड़े हो गए, पर संघ की शाखाएं छोटी हो गई। लोग नहीं आ रहे हैं और शाखाओं का आकर्षण भी बहुत कम हो गया है। संघ की इन शाखाओं से न केवल स्वयंसेवक पैदा होते थे, बल्कि जनसेवक भी पैदा होते थे, समाज सेवक भी और मातृ-पितृ सेवक भी। कांग्रेसी परिवारों के बच्चे भी संघ की शाखाओं में आते थे। वजह यही थी कि संघ के ये शाखाएं हमारे देश में कभी संस्कार की पहला स्कूल हुआ करती थी। लोग कहते थे कि वहां जाएंगे, तो कुछ तो सीखेंगे। वैसे तो हमारे देश में ऐसे बहुत सारे लोग हैं, पर विधायक रहे एक एहसानफरामोश को तो अपन भी नजदीक से जानते हैं, जिसने संघ परिवार से संस्कार लिए, चुनाव किसी और पार्टी से लड़ा, संघ परिवार को गालियां दी, बाद में सारे संस्कार भूलकर अपने राजनीतिक पिता का भी खूब अपमान किया।

बहुत सारे अपने ऐसे दोस्तों को भी अपन जानते हैं, जिनका संघ की शाखाओं में जाने के बाद जीवन ही बदल गया। लेकिन वक्त बदला, लोग बदले, तो लोगों के जीने का अंदाज भी बदल गया। मुसीबत यह है कि लोगों के जीने के इस बदले हुए अंदाज के साथ संघ परिवार अपना तालमेल नहीं बिठा पाया। अपना मानना है कि आज संघ परिवार के साथ युवा पीढ़ी के न होने और न जुड़ने का सबसे बड़ा कारण भी यही है। संघ परिवार को खासकर इस पर भी चिंतन करना चाहिए, सिर्फ बीजेपी की चिंता करके कुछ नहीं होनेवाला।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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