: झारखंड में आदिवासी कल्याण छात्रावास की दयनीय हालत : कुछ महीने पहले मैं झारखंड में आदिवासी कल्याण छात्रावास की दयनीय स्थिति पर रिपोर्ट/ख़बर तैयार करने के मक़सद से संथाल परगना (दुमका) गया था. वहां आदिवासी महिला छात्रावास की हालत आप इन तस्वीरों को देखकर बखूबी समझ सकते हैं, जहां सीलनयुक्त कमरे, टूटी-फूटी फर्श, मरम्मत के अभाव में बेकार पड़े शौचालय, ईंटों के सहारे टिकी चारपाई, खाना बनाने के लिए अपने सिर पर लकड़ी ढ़ोकर लाती छात्राएं और पानी के लिए घंटों कतार में लगीं आदिवासी छात्राएं. इसे क्या कहेंगे आप?
आदिवासी छात्रावास की इस दशा पर हॉस्टल अधीक्षक का यह कहना कि ये आदिवासी छात्राएं है, जो सांप बिच्छू देखकर ही बड़ी हुई हैं, इसलिए यहां हॉस्टल में जैसी भी सुविधा इन्हें मिल रही है वह काफी है, क्योंकि इनके घरों में इससे भी खराब हालत है. मित्रों इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों में आज भी छात्रावास की कमी है. भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) दिल्ली विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भी सभी छात्रों को हॉस्टल की सुविधा नहीं मिलती. हालांकि हमारे देश में नेताओं और अधिकारियों को रहने के लिए भवन की कमी नहीं होती. ऐसे में देश के छात्रावास विहीन छात्रों की लड़ाई लड़ने का समय आ गया है. चाहे आईआईएमसी हो या दिल्ली विश्वविद्यालय या फिर जामिया, इलाहाबाद सबकी लड़ाई अब साथ मिलकर लड़नी होगी.

झारखंड के संथाल परगना (दुमका) में आदिवासी कल्याण छात्रावास की इन तस्वीरों को देखकर आपको वहां की हक़ीक़त का पता चल जाएगा. सूबे में एक तरफ विकास के नाम पर आदिवासियों को उनके जल, जंगल और रैयती जमीन से बेदखल किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ राज्य में करीब चार सौ आदिवासी कल्याण छात्रावास में रहने वाले हजारों छात्र बुनियादी सुविधाओं से महरूम हैं और उन हॉस्टलों में नारकीय जीवन गुजार रहे हैं. दुर्भाग्यवश यह भेदभाव उस राज्य में हो रहा है, जिसके गठन का एकमात्र मकसद ही था प्रदेश के मूल निवासी आदिवासियों की जान, माल और उनकी संस्कृति की रक्षा करना.
एक तरफ केंद्र सरकार शिक्षा और शिक्षार्थियों की बेहतरी के दावे करती है एवं इससे जुड़ी योजनाएं बनाने का दंभ भरती है, लेकिन इसके विपरीत झारखंड में प्राथमिक शिक्षा के स्तर में सुधार तो दूर की बात, यहां उच्च शिक्षा में भी काफी खामियां देखी जा सकती हैं. झारखंड का संथाल परगना आदिवासी बहुल इलाका है. यहां कल्याण विभाग की ओर से आदिवासी छात्रावासों का निर्माण कराया गया है, ताकि यहां रहकर गरीब आदिवासी छात्र अध्ययन कर सकें. हालांकि यहां रहने वाले छात्रों की किस्मत शिक्षा के केंद्र कहे जाने वाले दिल्ली, मुंबई, इलाहाबाद, वाराणसी लखनऊ और हैदराबाद में मौजूद छात्रों की तरह नहीं है. वर्षों के संघर्ष के बाद इस प्रदेश का अस्तित्व देश के राष्ट्रीय मानचित्र पर उभर कर सामने आया. नवसृजित इस राज्य से जनता की काफी उम्मीदें जुड़ी थीं कि यह सूबा विकास के नए कीर्तिमान गढ़ेगा, लेकिन अपनी स्थापना के तेरह वर्ष बीत जाने के बाद भी झारखंड कई मामलों में देश के अन्य राज्यों के मुकाबले काफी पीछे है. जिस वक्त यह राज्य बना था, उस समय यहां के स्थानीय मूल निवासियों के बीच खुशी का ठिकाना नहीं था। उन्हें लगा कि अब वह दिन आ चुका है, जिसका उन्हें वर्षों से इंतजार था. अपना राज्य, अपनी सरकार और अपनी संस्कृति यह इच्छा उन दिनों करोड़ों झारखंड वासियों के दिल में मौजूद थी.
सपनों को मर जाना खतरनाक होता है, यह स्थिति इन दिनों झारखंड में बखूबी देखी जा सकती है. यह राज्य संविधान के पांचवीं अनुसूची के तहत आने वाला राज्य है, जहां आदिवासियों के हितों, उनकी परंपराएं समेत अन्य सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करना संघ एवं राज्य का दायित्व है, लेकिन मौजूदा समय में यहां ठीक इसके विपरीत काम किए जा रहे हैं. झारखंड में आदिवासी महिला छात्रावासों में कई समस्याएं हैं, समस्याएं ऐसी जिसे शायद हम और आप यकीन न कर पाएं। मिसाल के तौर पर दुमका के संथाल परगना कॉलेज में छात्राओं की कुल संख्या डेढ़ सौ है, जिसमें महज एक शौचालय है, बाकी सभी खराब हो चुके हैं. यहां बारी-बारी से छात्राएं शौचालय का इस्तेमाल करती हैं. औसतन एक छात्रा को शौचादि से निवृत्त होने में पांच से सात मिनट का वक्त लगता है. इस लिहाज से देखा जाए तो विद्यार्थियों के कई महत्वपूर्ण घंटे व्यर्थ चले जाते हैं. अपने घरों से दूर आदिवासी छात्र शिक्षा हासिल करने के लिए शहर आते हैं, लेकिन यहां भी उन्हें वही काम करना पड़ता है, जो वह गांवों में रहकर किया करते थे। छात्रावास में रहने वाली छात्राओं को खुद से खाना पकाना पड़ता है. यहां रसोईये की कोई व्यवस्था नहीं है. सबसे तकलीफदेह बात यह कि छात्राओं को बाजार से लकड़ी और कोयला स्वयं लाना पड़ता है वह भी अपने सर पर ढोकर.
यहां छात्रावासों में हजारों छात्र-छात्राएं रहते हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा के कोई उपाय नहीं हैं. छात्रावास परिसर पूरी तरह असुरक्षित हैं. कहीं चहारदीवारी है, तो कहीं कैंपस पूरी तरह खुले हैं। रात के समय छात्रावास परिसर अंधेरे की आगोश में चला जाता है, क्योंकि यहां बिजली और बल्ब की कोई व्यवस्था नहीं है. कभी-कभी स्थानीय मनचले युवक शराब पीकर देर रात हल्ला हंगामा करते हुए छात्रावास परिसर में घुस जाते हैं. ऐसी घटनाओं से यहां की छात्राएं सदैव दहशत में रहती हैं. अगर आप झारखंड के आदिवासी कल्याण छात्रावास में जाएं, तो आपको बदहाली की ऐसी तस्वीर देखने को मिलेगी, जिसकी कल्पना आजादी की 65 साल बाद कतई नहीं की जा सकती है. प्रदेश के लगभग सभी छात्रावासों के भवन जर्जर हो चुके हैं, ऐसे में यहां कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है. छात्रावासों के भीतर कमरे में फर्श धंस चुके हैं. छात्रों को दी जाने वाली खटिया और फॉल्डिंग टूट चुके हैं, जिसे ईंटों के सहारे उपयोग में लाया जा रहा है. छात्रावासों में महज कुछ बल्ब के सहारे रोशनी की जा रही है. रात के समय बिच्छू और जहरीले सांप छात्रों के कमरे में विचरण करते हुए देखे जा सकते हैं. इस बाबत छात्रावास अधीक्षक का जवाब हैरान करने वाला था. उनके अनुसार, ये आदिवासी समुदाय से हैं, सभी लोग सांप-बिच्छू देखकर ही बड़े हुए हैं, इसलिए यह कोई बड़ी समस्या नहीं है. हॉस्टल में जिस तरह छात्र रह रहे हैं, उनके लिए यहां कहीं बेहतर सुविधा है, क्योंकि उनके घरों में इससे भी खराब व्यवस्था है। सरकारी उदासीनता की वजह से आदिसासी छात्र जानवरों से बदतर जिंदगी जीने को मजबूर है. छात्रावासों में रहने वाली छात्राएं अक्सर बीमार रहती हैं, इसकी वजह यह है कि यहां खान-पान की उचित व्यवस्था नहीं है. छात्राएं आपस में मिलकर खाना बनाती हैं, लेकिन हरी सब्जियां, और दूध के अभाव में उन्हें उचित पोषण नहीं मिल पाता है. छात्रावासों में डॉक्टरों की कोई व्यवस्था नहीं है, लिहाजा बीमार पड़ने वाले छात्रों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. इन्हीं सब कमियों की वजह से छात्रावासों में रहने वाली ज्यादातर लड़कियां एनीमिया से पीड़ित हैं.
इस देश में कई कल्याणकारी योजनाएं बनी हैं, लेकिन उनका क्या हश्र हो रहा है, यह झारखंड में मौजूद आदिवासी कल्याण छात्रावास में देखा जा सकता है. एक तरफ सरकार शिक्षा के अधिकार कानून लागू करने की बात करती है, वही दूसरी तरफ उच्च शिक्षा प्राप्त करने आए आदिवासी छात्र हास्टलों में जिस तरह रह रहे हैं, उससे सरकार की असलियत सामने आ गई है. अगर सरकार जल्द ही आदिवासी छात्रों की इस समस्या का समाधान नहीं करेगी, तो निश्चित तौर पर कलम-किताब की जगह छात्र तीर धनुष लेकर सड़कों पर उतरेंगे.
अभिषेक रंजन सिंह ने नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरुआत सकाल मीडिया समूह से किया। इन दिनों ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इनसे संपर्क मो. 9313174426 के जरिए किया जा सकता है।





