अंतत: नीतीश कुमार ने वही कर डाला, जिसकी तैयारी वे महीनों से कर रहे थे। यहां जदयू के दो दिवसीय सम्मेलन में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पूरी तरह छाए रहे। उन्होंने बड़ी राजनीतिक होशियारी से भाजपा नेता नरेंद्र मोदी की राह में निर्णायक अंडगा लगाने का खेल कर दिया है। मोदी का बगैर नाम लिए हुए उन्होंने कह दिया है कि प्रधानमंत्री पद के लिए ऐसा ही उम्मीदवार उनकी पार्टी को स्वीकार्य होगा, जिसका चाल-चरित्र सेक्यूलर हो और वह पूरे देश को जोड़े रखने की कूवत रखता हो। भाजपा नेतृत्व को थोड़ी राहत देते हुए जदयू नेतृत्व ने पीएम उम्मीदवार के फैसले के लिए पर्याप्त समय दे दिया है। ऐलान कर दिया है कि भाजपा नेतृत्व इस साल दिसंबर तक यह बता दे कि ‘पीएम इन वेटिंग’ के लिए उनका चेहरा कौन होगा?
मोदी का बगैर नाम लिए हुए नीतीश ने तमाम राजनीतिक तीर चला डाले। जिन मुद्दों को लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सफलताओं का ढिंढोरा पीटते घूम रहे हैं, उन्हीं को लेकर नीतीश ने एक-एक करके धुनाई कर डाली। कह दिया कि देश को ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए, जो कि समावेशी विकास का पैरवीकार हो और पूरे देश को एकता के सूत्र में बांधने की काबिलियत रखता हो। सभी धर्मों के लोग उस पर विश्वास कर सकें। इसके साथ ही वह अपने चरित्र में पूरी तरह से धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांतों को मानने वाला हो। जाहिर है, मोदी ने पीएम उम्मीदवारी के लिए जो कसौटियां सामने रख दी हैं, उनमें मोदी खरे नहीं उतर सकते। जबकि, भाजपा में पीएम उम्मीदवारी के लिए मोदी एक बड़े दावेदार बनकर उभरे हैं। संघ का नेतृत्व भी उन्हें ताकत देने में लगा है। कोशिश हो रही है कि मोदी को आगे करके एक बार फिर हिंदुत्व से जुड़े मुद्दे आगे कर दिए जाएं। ताकि, भाजपा के पक्ष में राजनीतिक माहौल बन जाए।
इस राजनीतिक अभियान में मोदी भी जुट गए हैं। वे देश के अलग-अलग हिस्सों में दौरा करके यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके गुजरात का विकास मॉडल देशभर में नायाब है। पिछले 10 सालों में उनकी सरकार ने गुजरात में जिस तरह का विकास किया है। इस मॉडल से पूरे देश का भाग्य बदला जा सकता है। पिछले दिनों मोदी ने उद्योगपतियों के मंचों से भी अपने विकास मॉडल को लेकर बड़े-बड़े दावे किए थे। यह बताने की कोशिश की थी कि उनके पास पूरे देश का विकास कर देने की कूवत है। क्योंकि, अपने विकास मंत्र की कामयाबी वे गुजरात में देख चुके हैं।
भाजपा के अंदर मोदी का कद काफी बढ़ गया है। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह लगातार घोषणा कर रहे हैं कि मोदी देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं। ऐसे में, भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में उनकी बड़ी भूमिका जरूर रहेगी। जाहिर है कि वे संकेत दे रहे हैं कि ‘पीएम इन वेटिंग’ के लिए मोदी सबसे मजबूत दावेदार हैं। हालांकि, वे यह भी कहने से नहीं चूकते कि इस मुद्दे पर सही समय पर संसदीय बोर्ड ही फैसला लेगा। लेकिन मोदी के सवाल पर भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए में रार खड़ी हो गई है। खास तौर पर जदयू ने मोदी के नाम पर दबाव बढ़ा दिया है। भाजपा नेतृत्व को अगाह कर दिया है कि उन्हें किसी कीमत पर मोदी का नाम हजम नहीं हो सकता।
मोदी को लेकर जदयू और भाजपा के बीच पिछले छह महीने से रस्साकसी तेज है। शनिवार और रविवार को जदयू की कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की यहां बैठक हुई। इस बैठक में मोदी का मुद्दा ही छाया रहा। कयास लगाए जा रहे थे कि नीतीश की लॉबी राजनीतिक प्रस्ताव में मोदी का नाम लेकर एक दम रास्ता रोकने की पहल कर देगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इतना जरूर है कि मोदी का नाम लिए बगैर नीतीश ने अपने भाषण में मोदी की खिलाफत पर जमकर निशाने साधे। यह बताने की कोशिश कर डाली, कि गुजरात का विकास मॉडल जरूरी नहीं है कि पूरे देश के लिए उपयुक्त बैठे। उन्होंने बातों-बातों में ही कह दिया कि बिहार का विकास मॉडल कई मायनों में बेहतर है। देश के जितने पिछड़े राज्य है, वे बिहार के विकास मॉडल से काफी सबक ले सकते हैं। जबकि, गुजरात का मॉडल कई मायनों में एकांगी है।
नीतीश ने मोदी की कार्यशैली पर जमकर कटाक्ष कर डाले। कह दिया कि देशभर में घूम-घूम कर हवा बनाने से कोई काबिल नेता नहीं बन जाता। उल्लेखनीय है कि पिछले साल गुजरात में सद्भावना यात्रा के दौरान मोदी को एक मौलाना ने सम्मान के रूप में इस्लामी गोल टोपी पहनाने की कोशिश की थी, तो मोदी ने टोपी पहनने से इनकार कर दिया था। यह दृश्य टीवी की लाइव कवरेज से पूरे देश ने देखा था। इसको लेकर यह चर्चा भी हुई थी कि भले दिखावे के लिए मोदी यह कहते हों कि वे मुसलमानों को भी साथ लेकर चलने की राजनीति करते हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने टोपी का तिस्कार किया, उससे कुछ और ही संदेश जाता है। इसी वाकये की याद दिलाते हुए नीतीश ने कल कटाक्ष कर दिया कि देश को जोड़ने की राजनीति के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है। जरूरत पड़ने पर टोपी भी पहननी पड़ती है।
दरअसल, जदयू के नेताओं की चिंता अपने मुसलिम वोट बैंक की है। बिहार में भाजपा और जदयू की गठबंधन सरकार है। दोनों पार्टियों के बीच पिछले 17 सालों से राजनीतिक गठबंधन है। भाजपा का साथ निभाने के बावजूद जदयू के नेता यह दावा करते रहते हैं कि उन्होंने धर्म-निरपेक्षता के मुद्दों पर कोई समझौता नहीं किया और न आगे करेंगे। नीतीश ने यह भी याद दिलाया कि देश के लिए अटल बिहारी वाजपेयी जैसी उदार राजनीतिक दृष्टि जरूरी है। अटल जी हमेशा राजधर्म का पालन होने पर जोर देते थे। उल्लेखनीय है कि 2002 में गुजरात में हुए भयानक दंगों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को कहा था कि उन्हें राजधर्म का पालन करना चाहिए। उनका यह जुमला बहुचर्चित हुआ था। इसी की याद नीतीश दिला गए। उन्होंने परोक्ष रूप से इशारा कर दिया कि वाजपेयी की नजर में भी मोदी राजधर्म का पालन करने वाले नेता नहीं रहे हैं।
नीतीश ने साफ तौर पर पाला खींचते हुए कह दिया कि अभी तक एनडीए गठबंधन का रास्ता ठीक-ठाक रहा है। क्योंकि, भाजपा नेतृत्व अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं के रास्ते पर चलती रही है। लेकिन, अब कुछ लोग रास्ता बदलने की कोशिश कर रहे हैं। यदि रास्ता बदल गया, तो गठबंधन में कठिनाई जरूर बढेÞगी। नीतीश के अलावा कई और नेताओं ने मोदी के मुद्दे पर कड़े तेवर दिखाए। पार्टी अध्यक्ष शरद यादव ने जो कुछ कहा, उसका लब्बोलुआब यही रहा कि उन्हें भाजपा तो स्वीकार है, लेकिन मोदी का नेतृत्व नहीं। शरद ने साफ-साफ कह दिया कि उनकी पार्टी किसी कीमत पर धर्म-निरपेक्षता से समझौता नहीं करेगी। यह कोशिश अंतिम समय तक करेगी कि गठबंधन न टूटे। लेकिन, बात सिद्धांत की आ जाएगी, तो उनकी पार्टी झुककर कोई समझौता नहीं करेगी।
बीच-बीच में इस तरह की राजनीतिक कयासबाजी होती रही है कि नीतीश कुमार भी अपने को पीएम उम्मीदवार मानकर चलते हैं, इस संदर्भ में भी नीतीश ने खुलकर चुटकी ली। कह दिया कि वे मुगालते में रहने वाले नेता नहीं है। अच्छी तरह जानते हैं कि अपनी छोटी राजनीतिक ताकत से वे देश के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। यदि ऐसी कोशिश करेंगे, तो उनका भी वही हाल होगा, जो देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, चौ. चरण सिंह व चंद्र शेखर जैसों का हुआ था। उन्होंने साफ कर दिया कि वे पीएम की रेस में नहीं हैं। लेकिन, पीएम बनाने में अपनी भूमिका निभाना जरूर चाहते हैं। उनकी कोशिश रहेगी कि इस पद के लिए कोई गैर-सेक्यूलर चेहरा रेस में आगे न आ पाए।
जदयू के नेता एवं बिहार सरकार में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह कहते हैं कि उनकी पार्टी ने दो दिन की बैठक में यह साफ-साफ संदेश दे दिया है कि उसको मोदी जैसा विवादित शख्स ‘पीएम इन वेटिंग’ के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता। भाजपा में लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे कई दिग्गज नेता हैं। इनके सामने मोदी वैसे भी पांचवें-छठवें नंबर के नेता हैं। गठबंधन धर्म निभाने के लिए सभी घटकों को एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना पड़ता है। उन्हें उम्मीद है कि भाजपा नेतृत्व उनकी पार्टी की भावनाओं का सम्मान करेगा। ऐसे में ही एनडीए की एकता बरकरार रह सकती है।
बिहार भाजपा के नेता एवं नीतीश सरकार में कैबिनेट मंत्री गिरीराज सिंह कहते हैं कि उनकी पार्टी को नीतीश कुमार से मोदी के लिए किसी सर्टिफिकेट की दरकार नहीं है। मोदी, सेक्यूलर थे और सेक्यूलर हैं। अब यह बात जदयू के नेताओं को समझ में नहीं आ रही है, तो इसमें भाजपा का क्या कसूर है? भाजपा नेताओं की कोशिश थी कि जदयू की बैठक में जो राजनीतिक प्रस्ताव आए, उसमें मोदी प्रकरण की चर्चा न हो। शनिवार की रात नीतीश कुमार और भाजपा नेता अरुण जेटली की मुलाकात हुई थी। इसके बाद नीतीश ने भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह से भी मुलाकात की थी। समझा जाता है कि इन मुलाकातों के बाद नीतीश ने मोदी के मुद्दे पर रणनीतिक रूप से अपना रुख कुछ नरम कर लिया। इसी के चलते रविवार को जब पार्टी का राजनीतिक प्रस्ताव आया, तो इसमें साफ तौर पर मोदी का जिक्र नहीं किया गया। बस, इतना ही कहा गया कि पार्टी को ‘पीएम इन वेटिंग’ के लिए सेक्यूलर नजरिए वाला शख्स ही स्वीकार्य होगा। यानी, बगैर नाम लिए हुए मोदी को रेस से हटाने का पूरा इंतजाम जदयू नेतृत्व ने कर डाला है।
सहयोगी घटक की इस पहल को लेकर मोदी के समर्थकों में अंदर ही अंदर काफी उबाल है। पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सीपी ठाकुर कहते हैं कि जदयू के कुछ नेता जिस तरह से मोदी के मामले में अनावश्यक बखेड़ा खड़ा कर रहे हैं, यह गठबंधन
धर्म के अनुकूल नहीं है। इसके जवाब में जदयू के सांसद साबिर अली कहते हैं कि सिद्धांत के आगे गठबंधन धर्म की कोई कीमत नहीं है। हमारी पार्टी को ‘पीएम इन वेटिंग’ के लिए मोदी का नाम कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता। यह बात हम लोग डंके की चोट पर कह रहे हैं। इसमें अब कुछ छिपा-लुका नहीं है। भाजपा नेतृत्व के पास दिसंबर तक का समय है वे अपना फैसला सोच-समझ कर बता दें। हमने तो अपनी बात रख दी है।
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।





