आरटीआई एक्टिविस्ट सुभाष अग्रवाल ने आरटीआई से पूछा कि प्रेस काउंसिल के पास पेड न्यूज की जो शिकायतें आती हैं, काउंसिल उन पर क्या ऐक्शन लेता है? इसके जवाब में काउंसिल की तरफ से कहा गया है कि ज्यादातर शिकायतों पर काउंसिल की तरफ से काम होता है, लेकिन उन्हें लंबे समय तक अनुसरण नहीं किया जाता इसलिए शिकायतों पर कोई कार्यवाही नहीं हो पाती. भ्रामित करने वाले विज्ञापनों की शिकायतों पर एक्शन के सवाल पर जवाब दिया गया कि ऐसे मामलों को कुछ सेटेलमेंट के बाद बंद कर दिया जाता है.
आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल कहते हैं कि यह दोनों ही स्थितियां मीडिया और समाज के लिए खतरनाक है. प्रेस काउंसिल अध्यक्ष खुद को लोगों को क्षमादान दिलाने में व्यस्त रख रहे हैं. आरटीआई से पता चलता है कि काउंसिल अपने महत्वपूर्ण कामों को नजरअंदाज कर रही है. तो ये है काटजू का असली चेहरा. उनके बारे में अब कहा जा सकता है कि काटजू के खाने के दांत और दिखाने के दांत अलग अलग हैं. यानि वे सिर्फ बयान वीर और विवाद वीर हैं. वे ठोस काम करना पसंद नहीं करते. यही कारण है कि वे प्रेस काउंसिल का अध्यक्ष बनने के बाद से मीडिया फील्ड में कोई खास सक्रियता नहीं दिखा पाए. बस, बयानों के जरिए वह सुर्खियां बटोरते रहे.






