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शशि शेखर ने छुटभैये और विचार शून्य लोगों को संपादक बना दिया : शंभूनाथ शुक्ला

Shambhunath Shukla : 2000 के बाद के दशक में टीवी अखबारों पर हावी होने लगा लेकिन किसी स्पष्ट नीति के अभाव में टीवी चैनलों में खबर कम भूत प्रेत की कहानियां, ज्योतिष तथा सिनेमा और क्रिकेट इस कदर हावी रहा कि टीवी कभी भी गंभीर न्यूज स्रोत नहीं बन सका न शुरू में और न अब। उलटे अखबार भी टीवी फोबिया के शिकार हो गए। गंभीर लेखन, रपटें अखबारों से गायब हो गईं। इसमें एक हद तक जनसत्ता ने अपने को साहित्य और उम्दा संपादकीय लेखों से बचाए तो रखा लेकिन बतौर अखबार उसकी भूमिका समाप्त हो गई क्योंकि जो अखबार अपनी खबरों व रपटों के कारण रोज लोकसभा में हंगामा करवाता था वह महज एक इतवारी पत्रिका बन कर रह गया। चूंकि आम अखबारी पाठकों के लिए उसमें कुछ भी नहीं बचा इसलिए २००० आते-आते जनसत्ता बाजार से गायब हो गया।

Shambhunath Shukla : 2000 के बाद के दशक में टीवी अखबारों पर हावी होने लगा लेकिन किसी स्पष्ट नीति के अभाव में टीवी चैनलों में खबर कम भूत प्रेत की कहानियां, ज्योतिष तथा सिनेमा और क्रिकेट इस कदर हावी रहा कि टीवी कभी भी गंभीर न्यूज स्रोत नहीं बन सका न शुरू में और न अब। उलटे अखबार भी टीवी फोबिया के शिकार हो गए। गंभीर लेखन, रपटें अखबारों से गायब हो गईं। इसमें एक हद तक जनसत्ता ने अपने को साहित्य और उम्दा संपादकीय लेखों से बचाए तो रखा लेकिन बतौर अखबार उसकी भूमिका समाप्त हो गई क्योंकि जो अखबार अपनी खबरों व रपटों के कारण रोज लोकसभा में हंगामा करवाता था वह महज एक इतवारी पत्रिका बन कर रह गया। चूंकि आम अखबारी पाठकों के लिए उसमें कुछ भी नहीं बचा इसलिए २००० आते-आते जनसत्ता बाजार से गायब हो गया।

यही हाल धीरे धीरे नवभारत टाइम्स का हुआ। लेकिन इस दौर में अमर उजाला, भास्कर और दैनिक जागरण ने अपने को बचाया और खबरों से अखबार को इस तरह भर दिया कि यही अखबार बाजार के मुख्य अखबार बन गए। इसमें काफी हद तक भूमिका पत्रकारों की नहीं इनके मालिकों की व्यावसायिक समझ की रही। अतुल माहेश्वरी, नरेंद्र मोहन और सुधीर अग्रवाल ने पाठकों की रुचि को ज्यादा करीब से समझा। यह वह दौर था जब संपादकों का दौर खत्म हो गया। संपादक बौने हो गए और अखबार अपने मालिकों के कारण जाने जाने लगे। टीवी से टक्कर भी इन्हीं अखबारों ने ली।

फिर 2005 से एक नया दौर शुरू हुआ। हिंदुस्तान में मृणाल पांडे ने इस अखबार का विस्तार किया और अमर उजाला में शशिशेखर ने तमाम कौतुक किए। अखबार का प्रसार तो उनके कार्यकाल में बढ़ा लेकिन अखबार से पत्रकार रूपी संस्था को कमजोर कर दिया। कोई पत्रकार बराबरी पर न आ सके इसलिए शशि शेखर ने छुटभैये और कमजोर व लेखन तथा विचार में शून्य पत्रकारों को संपादक बना दिया। नतीजा यह हुआ कि अखबार एक व्यक्ति की संस्था बन गया। यह सभी जगह हुआ कहीं अधिक कहीं कम। लेकिन अमर उजाला के मालिकों की अपनी न्यूज की समझ थी यही कारण है कि आज भी यह अखबार बाजार में सबसे ताकतवर अखबार है। हालांकि अतुलजी की मृत्यु के बाद लोगबाग कयास लगाते रहे कि अमर उजाला अब गया कि तब गया लेकिन श्री राजुल माहेश्वरी ने इसकी कमान इतनी कुशलतापूर्वक संभाली कि अमर उजाला आज भी हिंदी बेल्ट का सर्वोत्तम अखबार है। आज वहां आशुतोष चतुर्वेदी कमान संभाले हैं और मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आशुतोष जी ने अमर उजाला के संपादकीय विभाग को नई मजबूती दी है।

दैनिक जागरण में खुद संजय जी और प्रशांत मिश्र जी ने इसे एक मजबूत राजनीतिक सोच समझ वाला अखबार साबित किया है। हालांकि भास्कर ने संपादक रूपी संस्था को पत्रकार कम मैनेजर अधिक बनाया है लेकिन इसके मालिक खुद सुधीरजी एक सफल पत्रकारीय समझ वाले व्यक्ति हैं। अन्य क्षेत्रीय अखबारों में ट्रिब्यून के समूह संपादक संतोष तिवारी एक कुशल और बेहतर पत्रकार हैं इसलिए उन्होंने इसे एक नई दिशा देने में पहल की है। हरिभूमि हरियाणा का एक बेहतर अखबार है और इसकी वजह उसके संपादक ओंकार चौधरी हैं। इसी तरह बिहार में प्रभात खबर को हरिवंश जी तथा संपादक राजेंद्र तिवारी ने उसे और अधिक पाठकोन्मुख बनाया है।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से साभार.

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