नामांकन पत्र की जांच और उम्मीदवारी पक्का होने के बाद चुनाव को लेकर हर तहर की आशंका किनारे हो गई थी। अब सिर्फ अधिकतम लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का प्रयास करना था। मैंने पंचायत के वोटरों से वायदा किया था कि जनता से प्राप्त चंदा से चुनाव लड़ूंगा। अब इसकी शुरुआत का समय आ गया था। उम्मीदवारी वैध होने के अगले दिन एक झोला लेकर मैदान में उतरा। कुराईपुर का बिगहा है ब्रह्म स्थान। पंचायत के दक्खिनवारी छोर पर नहर किनारे बसा है। यहां रहने वाला परिवार कुराईपुर से आकर बसा है। उनके अन्य गोतिया परिवार गांव में ही रहते हैं।
सुबह-सुबह इसी परिवार के दरवाजे पर पहुंचा। सूरज धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगा था। इस कारण ठंड से राहत मिलने लगी थी। हम अभी अपना परिचय-पाती कर ही रहे थे कि एक दूसरे उम्मीदवार सुरेंद्र पासवान भी पहुंच गए। आखिर वोट उन्हें भी चाहिए था। थोड़ी देर बातचीत कर के वह वापस लौट गए। उनके जाने के बाद इसी परिवार के एक सदस्य सुरेंद्र सिंह से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। लगातार जनसंपर्क के कारण लोग मेरा नाम, जाति, गांव, पेशा आदि से अवगत हो चुके थे।
उन्हें मैंने बताया कि आज से हम चुनाव प्रचार में निकले हैं। शुरुआत आपके घर से कर रहे हैं। आपके यहां से ही भात खाकर प्रचार के आगे बढ़ेंगे। धान कटनी का समय होने के कारण सुबह में ही खाना बन जाता था। उन्हें यह भी बताया कि यह चुनाव आप लोगों से प्राप्त चंदा से लड़ना है। चंदा में सिर्फ एक गिलास चावल चाहिए। उन्होंने खाना खिलाया। गरम-गरम भात, आलू की सब्जी और धनिया की चटनी से मन गदगद हो गया। धान के बोझों के बीच खुली हवा में खाने का आनंद ही कुछ और था। उनकी छोटी बच्ची खाना खिला रही थी। इस दौरान बच्चों की संख्या, पढ़ाई, स्कूल आदि के संबंध में बातचीत भी होती रही। परिवार, आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक आदि विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई।
पंचायत की राजनीतिक बनावट और वोटों का झुकाव भी इससे अछूते नहीं थे। चलते-चलते बच्चों ने एक गिलास चावल चंदा में दिया। गांव में नकद चंदा के बजाय अनाज मांगना ज्यादा सुविधाजनक था। बिगहा की दक्षिण ओर ब्रह्म स्थान था। दो-तीन वेदियां बनी हुईं थी। वहां से निकलते हुए उन वेदियों पर जाकर मत्था टेका। आशीर्वाद भी मांगा, पर वोट नहीं। क्योंकि वह वोटर नहीं थे। वहां से निकल कर करीब आधा किलोमीटर दूर कुराईपुर गांव में आया। गांव के किनारे एक घर बना था। उस घर के परिजनों से मैं पहले भी मिल चुका था। इस बार दुबारा आया था। उनकी हालत देखकर उनसे चंदा मांगने का हिम्मत नहीं जुटा सका। उनसे वोट देने का आग्रह कर के दूसरे घर की ओर चला। तेली परिवार का घर था। उनके घर कई वोट थे। उनसे वोट, उम्मीदवार, जाति आदि की चर्चा की। उनसे वोट मांगा और आगे बढ़ लिया।
उनके यहां से एक यादव परिवार के घर पहुंचा। वहां अपना परिचय दिया। वे किसी काम से औरंगाबाद निकलने वाले थे। उन्होंने दालान में बैठाया। पानी पीने के लिए तिलकूट भेजवाया। इस बीच अपनी बात मैंने उनके समक्ष रखी। यह मुहल्ला इसी गांव के उम्मीदवार मनोज सिंह के घर के आसपास का था। इस कारण कोई उनके खिलाफ समीकरण बनाने को कोई तैयार नहीं था। वहां से बगल के घर में पहुंचा। उस घर के पुरुष खेत पर गए हुए थे। एक महिला भैंस के नाद में पानी डाल रही थीं। उनके पहनावे से लग रहा था कि परिवार खुशहाल और खाता-पीता है। चुनाव की चर्चा की। उनसे मैंने कहा कि चुनाव हमें जनता से प्राप्त चंदा से ही लड़ना है। हर घर से एक गिलास अनाज चाहिए। बात करते-करते उनके दरवाजे तक पहुंच गया। वहां उनकी बेटी से मिल गयी। उससे बातचीत करने लगा। उसकी शिक्षा के बारे में जानकारी ली। इस बीच उन्होंने एक गिलास चावल लाया और मेरे झोले में डाल दिया।
अगली गली में मिले एक साव जी। उनसे बातचीत की। इस दौरान घर के आगे दरवाजे पर बने चरअछिया चूल्हा (धान उबालने के लिए चार मुंह वाला मिट्टी का बना चूल्हा) पर बैठ गया। कुछ और लोग जमा हो गए। बात का सिलसिला कभी राजनीतिक तो कभी पारिवारिक पर चलता रहा। इस दौरान फिर चंदा की चर्चा हुई। कई परिवारों ने एक-एक गिलास
चावल लाकर दिया। यहां एक लड़का मिल गया। उसके साथ उसके घर चला। रास्ते में लोगों से वोट भी मांग रहा था और चंदा भी। लेकिन न वोट को लेकर उत्साह दिख रहा था और न चंदा को लेकर उत्सुकता दिख रही थी। वहां से फिर दूसरी गली में पहुंचा। इस दौरान बातचीत करने के लिए लोगों से पानी मांग कर पीने का क्रम चलता रहा।
(जारी)
लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए कर सकते हैं.
इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा





