पिछले एक महीने से खुलकर भाजपा की शान में कसीदे गढ़ने वाले सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की इस राजनीति को कुछ लोग भले ही दूसरे चश्मे से देख रहे हों, मगर उनका भाजपा के प्रति प्रेम का इजहार का सिलसिला कल्याण सिंह के समय से ही चालू है। उत्तर प्रदेश में सपा और भाजपा में यह गठजोड़ था कि भाजपा हिन्दुओं की राजनीति करेगी तो सपा मुसलमानों की। दिन में दोनों राजनैतिक मंच से एक-दूसरे को पानी पी-पी कर कोसते जरूर थे, लेकिन शाम को मुलायम और कल्याण सिंह अमीनाबाद में एक साथ बैठकर लस्सी पीते थे।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अक्टूबर 1990 में उन्होंने कानून का सहारा लेकर बाबरी मस्जिद को शहीद होने से बचा लिया था। जिसकी वजह से मुलायम सिंह यादव को मौलाना मुलायम कहा जाने लगा और उत्तर प्रदेश का मुसलमान आंख मूंद कर सपा पर ईमान ले आया और मुलायम को सत्ता की चाबी सौंपने में अहम किरदार मुसलमानों का ही रहा। लेकिन यह शर्मनाक रहा कि मुसलमानों को मुलायम सिंह यादव ने केवल एक वोट बैंक समझकर उनकी अनदेखी की। वोट के बदले आजम खान सरीखे एक दो मुसलमानों को मंत्री बनाकर यह समझ लिया कि मुसलमानों को सत्ता में भागीदारी मिल गयी है। सरकारी नौकरियों में केवल अपनी जाति के लोगों को तरजीह दी। मुलायम सिंह यादव की सरकार एक तरह से यादवों की सरकार रही। मुसलमान केवल वोट देकर सरकार बनवाने तक ही सीमित रहे।
बात इतनी ही होती तो चल सकता था लेकिन मुलायम सिंह ने इस पर भी सब्र नहीं किया और देश को सांप्रदायिकता की आग में झोंकने वाली भाजपा की शान में कसीदे गढ़ने शुरू कर दिये इतना ही नहीं भाजपा की नेता सुषमा स्वराज ने भी पिछले दिनों लोकसभा में उनका भरपूर समर्थन किया था। दरअसल इससे संघ और सपा के जो छिपे रिश्ते थे अब वे खुले तौर पर सामने आगये हैं। वैसे इन रिश्तों की शुरुआत अमीनाबाद की कल्याण सिंह के साथ पीने वाली लस्सी से हुई थी। दोस्ती बढ़ती गई और ज्यादा गहराती गई जिसके फलस्वरूप मौलाना कहे जाने वाले मुलायम सिंह यादव ने बाबरी मस्जिद के विध्वसंक और जहरीली जुबान बोलने वाले साक्षी महाराज जिसने खुले आम एलान करके कहा था कि कि बाबरी मस्जिद पर सबसे पहला फावड़ा उसने चलाया था, इतना ही नहीं दीवारों पर नारे लिखे थे कि मुल्लाओं के दो स्थान कब्रस्तान या पाकिस्तान, एक नारा और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो, उस व्यक्ति को मुलायम सिंह यादव ने साल 2000 में राज्यसभा में भेजा। मुसलमानों ने इसे बर्दाश्त किया। फिर कल्याण सिंह के बेटे राजबीर सिंह को मंत्री बनाया। मुसलमानों ने इसे भी सहा।
सच यह भी है कि मुलायम सिंह यादव ने कल्याण सिंह को लोध वोटों के लालच में अपने साथ लिया था। लेकिन लोध वोट तो मिला नहीं, मुस्लिम भी छिटक गए। मुसलमान इस बात को नहीं पचा पाए कि जिस कल्याण सिंह को मुसलमान अपना दुश्मन मानते रहे हैं, उस आदमी को कैसे समाजवादी पार्टी में बर्दाश्त किया जा सकता है। हालांकि मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह को सपा से बाहर करके और मुसलमानों से अपनी गलती की माफी मांग ली बदले में मुसलमानों उन्हें फिर से उत्तर प्रदेश दे दिया। मगर सत्ता में आते ही उसने फिर से मुसलमानों को नजरअंदाज करना शुरु कर दिया है। उनके खिलाफ सुनियोजित तरीके से दंगे हो रहे हैं चुनावी घोषणा पत्र में किया गया 18 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा, उस पर तो विचार भी नहीं किया जा रहा है, उल्टे मुसलमानों को आरक्षण देने का खुले तौर से विरोध करने वाली भाजपा, और उसके नेताओं की शान में कसीदे गढ़े जा रहे हैं। जिनका मुस्लिमों की समस्या से कोई लेना देना ही नहीं है जिनकी नजर में मुसलमानों की परिभाषा बस इतनी सी है कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान जरूर होता है। उनसे हाथ मिलाकर उनकी तारीफें करके, समाजवाद को भूल कर हिंदुत्वाद की शरण में जाकर आप कौन – सा हित साधना चाहते हैं? अब कहां गया मुस्लिम प्रेम? और कहां गयी आजम खां जैसे खुद्दार नेता की मुस्लिम राजनीति जो कल्याण सिंह को सपा में लाते ही आग बबूला होने का ढोंग कर रहे थे।
दरअसल सच्चाई ये है कि आजम खां की लड़ाई कल्याण सिंह से नहीं थी, लड़ाई थी जयप्रदा के टिकट को लेकर। क्योंकि अगर आजम खां की लड़ाई कल्याण सिंह को लेकर होती तो न तो कल्याण सिंह के साहबजादे राजबीर सिंह मंत्री बनते और ना ही साक्षी महाराज को सपा से राज्यसभा में भेजा जा सकता था। और अगर आजम खां में कौम परस्ती होती तो इन लोगों का खुले तौर से बहिष्कार करते या खुद स्तीफा देकर पार्टी से अलग हो जाते। मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया उन्हें अपनी कुर्सी प्यारी है कौम नहीं। और यहां पर विभिन्न बुद्धिजीवियों द्वारा कही गई वे बातें सही साबित हो जाती हैं कि मुस्लिम नेताओं को सिर्फ अपने दर्द से प्यार है ना कि कौम के दर्द से। किसी शायर का ये शेर मेरे जेहन में बार बार आता है जब भी कोई इस तरह की इबारतें लिखी जाती हैं….
सब हमारी खैर ख्वाही के अलमबरदार थे
सबके दामन पर हमारे खून के छींटे मिले।
लेखक वसीम अकरम त्यागी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.





